कपिला बाइदेउ : विद्यार्थियों के सवालों को सुनना

14 सितम्बर 2022 को मैंने आई वंडर… का एक वेबिनार देखा जिसका शीर्षक था ‘विज्ञान में सवाल पूछना’ (Asking Questions In Science)।1 इस वेबिनार में माधव केलकर (एकलव्य, भोपाल से) और सौरभ सोम (अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन से) के बीच बातचीत हुई। बातचीत में माधव केलकर ने बताया कि विज्ञान के ऐसे सवाल जो बच्चों में जिज्ञासा जगाते हैं, वे बच्चों द्वारा पूछे जाएँ, इसके लिए बच्चों को प्रेरित करने के लिए होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम में ‘सवालीराम’ नामक एक काल्पनिक किरदार बनाया गया था। यह तरीक़ा कारगर रहा। कार्यक्रम में शामिल स्कूलों के बच्चे सवालीराम को अपने सवाल पोस्टकार्ड पर लिखकर भेजते थे। सवाल कभी-कभी अन्तर्देशीय पत्र या लिफाफे में भी आते थे। हर पत्र का जवाब हाथ से लिखकर सवालीराम की ओर से डाक से बच्चों को भेजा जाता था।2 बाद के वर्षों में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम की ज़िम्मेदारी एकलव्य की टीम ने सम्हाली। तब एकलव्य की टीम ने ‘सवालीराम’ के नाम आने वाले बच्चों के पत्रों में पूछे गए सवालों के जवाब भेजने का काम किया। यह एक बहुत ही सुन्दर तरीक़ा था जिसमें जिज्ञासा के मूल्य के साथ-साथ हाथ से लिखे संवाद का अपनापन भी झलकता था। इससे प्रेरित होकर मैंने सोचा, “क्यों न ऐसा ही कुछ अपने स्कूल में भी करके देखा जाए?”
विद्यार्थियों से सवाल आमंत्रित करना
हमिंगबर्ड स्कूल असम के माजुली ज़िले में स्थित है। मुख्य रूप से इसमें द्वीप के मिशिंग समुदाय के बच्चे पढ़ते हैं। हमने हमेशा स्कूल में प्रश्न पूछने और खोज-बीन की संस्कृति को बढ़ावा देने की कोशिश की है। सवालीराम से प्रेरित होकर हमने 2023 में अपने विद्यार्थियों से सवाल आमंत्रित करने के लिए एक पहल की औपचारिक शुरुआत की। विद्यार्थियों का परिचय कपिला बाइदेउ नामक एक काल्पनिक किरदार से कराया गया। यह नाम बहुत सोच-समझकर रखा गया था। मिशिंग आदिवासी भाषा में ‘कपिला’ का अर्थ होता है ‘क्यों’, और असमिया में ‘बाइदेउ’ का अर्थ होता है ‘बड़ी बहन’। दोनों को मिलाकर बनता है ‘कपिला बाइदेउ’, जिसका मोटेतौर पर अर्थ है ‘क्यों दीदी’। उम्मीद थी कि विद्यार्थी उसे एक देखभाल करने वाली और जिज्ञासु बड़ी बहन के रूप में देखेंगे जो उनकी बात सुनेगी, और उनके सवालों का विचारशीलता व गहराई से जवाब देगी। हमें मालूम था कि विद्यार्थी कपिला बाइदेउ के जीवन के बारे में जानना चाहेंगे, इसलिए हमने उसकी एक पृष्ठभूमि बनाई। वह रेशनैलिया (तार्किक से बना) नामक एक काल्पनिक देश से हैं, और पीस (यानी शान्ति के) विश्वविद्यालय के मानविकी विभाग में पढ़ाती हैं। स्वभाव से बहुत ज्ञानी हैं, वे हर चीज़ के बारे में बहुत कुछ जानती हैं — चाहे वह विज्ञान हो, समाज हो या भावनाएँ। विद्यार्थियों के सवालों को एकत्रित करने के लिए हमने एक विशेष ‘कपिला बाइदेउ बॉक्स’ डिज़ाइन किया जो एक पारम्परिक लेटर बॉक्स जैसा दिखता था (चित्र-1 देखें)।

शुरुआत से ही इस पहल का स्वागत हुआ है। विद्यार्थी उत्सुकता से अपने सवाल बॉक्स में डालते हैं। हम उनके ढेर सारे पत्र और उनमें सवालों की गहराई देखकर ख़ुशी से हैरान हो जाते हैं। 4-5 शिक्षकों का एक छोटा समूह सवालों के जवाब देने के लिए लगन से काम करता है। मैं भी इस समूह में हूँ। हम सवाल मिलने के 15 दिनों के अन्दर जवाब भेजने का प्रयास करते हैं। देरी हो जाने से विद्यार्थी बेसब्र हो जाते हैं। सवालों का जवाब देने की प्रक्रिया अत्यन्त सहयोगात्मक है। जो भी सवाल हमें मिलते हैं, उनको एक स्प्रेडशीट में दर्ज किया जाता है जो टीम के सभी सदस्यों की पहुँच में है। समूह के जिस सदस्य को जो सवाल आकर्षित करते हैं, वे उसका जवाब देने के लिए साइन अप करते हैं। हम एक-दूसरे द्वारा लिखे गए जवाबों के ड्राफ़्ट भी पढ़ते हैं, और सुझाव देते हैं। एक टीम के रूप में, हम अकसर विषयों को अच्छी तरह समझने के लिए चर्चा और इंटरनेट शोध पर निर्भर होते हैं ताकि विचारशील जवाब दे सकें। इसके अलावा, टीम के सदस्य अकसर अन्य लोगों से भी परामर्श करते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि कोई विद्यार्थी बाढ़ या प्राकृतिक आपदाओं के बारे में पूछता है तो हम ऐसे अनुभवों से परिचित स्थानीय शिक्षकों से उनके विचार लेने के लिए सम्पर्क करते हैं। हालाँकि हम विशेषज्ञता का कोई दावा नहीं करते फिर भी यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि कपिला बाइदेउ की बातों में सावधानी और विश्वसनीयता दोनों हों। जब कपिला बाइदेउ “पत्तियाँ हरी क्यों होती हैं?’’ जैसे वैज्ञानिक सवालों का जवाब देती हैं, तो वह केवल पाठ्यपुस्तक की परिभाषाएँ या तथ्य नहीं बतातीं। बल्कि, वे विद्यार्थियों को बातचीत के लिए आमंत्रित करती हैं। जवाब अकसर आगे और भी सवालों तथा पत्रों के आदान-प्रदान की ओर ले जाते हैं। इससे विद्यार्थी अधिक गहराई से सोचने के लिए प्रेरित होते हैं। उदाहरण के लिए, चर्चा इस ओर जा सकती है कि पौधों को हरा क्या बनाता है, यह रंग क्यों मायने रखता है, और पौधे कैसे जीवित रहते और बढ़ते हैं (चित्र-2 देखें)। इन विचारशील संवादों के ज़रिए, कपिला बाइदेउ एक व्यक्तिगत मार्गदर्शक बन जाती हैं, जो हर विद्यार्थी को उसकी जिज्ञासा और समझ के अनुसार जवाब देती हैं। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि पूछताछ की प्रक्रिया अब केवल सूचना साझा करने तक सीमित नहीं है; यह एक रिश्ता भी बना रही है।

शुरुआत में हमने सोचा था कि कपिला बाइदेउ सिर्फ़ विज्ञान से जुड़े सवालों के प्रति जिज्ञासा पैदा करने पर केन्द्रित रहेंगी। बेशक, कई विद्यार्थी पूछते हैं, “पत्तियाँ हरी क्यों होती हैं?” या “तारे कैसे चमकते हैं?” लेकिन हमें आश्चर्य हुआ (और ख़ुशी भी हुई) कि सवालों की विविधता में बढ़ोतरी होने लगी। कुछ विद्यार्थी अपनी निजी चिन्ताएँ साझा करने लगे : “मेरे कोई दोस्त क्यों नहीं हैं?” या “मेरे बाल छोटे क्यों हैं?” कुछ ने सामाजिक या दार्शनिक सवाल पूछे, जैसे : “हमारे स्कूल में विद्यार्थी यूनियन क्यों है?” ये पत्र अब केवल सरल सवालों की अभिव्यक्ति नहीं रह गए हैं — ये हमारे विद्यार्थियों की भावनात्मक और बौद्धिक दुनिया में खिड़कियाँ बन गए हैं। हमारी टीम के एक सदस्य स्कूल काउंसलर हैं। वे भावनात्मक रूप से संवेदनशील पत्रों का जवाब देते हैं, ख़ासकर उन पत्रों का जो डर, उदासी या आत्मसम्मान में कमी से सम्बन्धित होते हैं। विद्यार्थी कभी-कभी कुछ इस तरह लिखते हैं : “मैं गणित में अच्छा क्यों नहीं हूँ?” या “मैं अपनी परीक्षा में फ़ेल हो गया और मुझे शर्म आती है।” ऐसे मामलों में, सम्बन्धित विषय के शिक्षक जवाब देने के लिए आगे आते हैं, भले ही वे कपिला की मुख्य टीम का हिस्सा न हों।
हमारे विद्यार्थी मानते हैं कि उनके सवालों के जो जवाब उन्हें मिल रहे हैं वे कपिला बाइदेउ ने ही लिखे हैं। इसलिए हम हमेशा जवाबों को लिखते समय कपिला बाइदेउ के चरित्र को ध्यान में रखते हैं। हम इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि टीम के सभी सदस्यों में एक समानता रहे। हम विरोधाभासी बात नहीं कर सकते। हम अलग-अलग पत्रों में अलग-अलग बात नहीं कह सकते। इसी कारण से हमने पत्रों के जवाब हाथ से लिखने का विचार त्याग दिया। क्योंकि बच्चे किसी शिक्षक की हैंडराइटिंग पहचान सकते थे। इसलिए जब हमारा जवाब अन्तिम तौर पर तय हो जाता है तो हम उसे एक विशेष ‘कपिला’ प्रारूप में छापते हैं। यह एक सौम्य टाइपराइटिंग डिज़ाइन है जो पहचान को उजागर न करते हुए भी व्यक्तिगत एहसास देती है। और इसमें मेहनत भी कम है। हम वर्तमान में पत्र प्राप्त करने के अनुभव को और भी यादगार बनाने के तरीक़ों पर प्रयोग कर रहे हैं। एक नए सदस्य, जिनकी डिजाइनिंग में रुचि है, वे हर पत्र में छोटी-छोटी व्यक्ति-विशेष चीज़ें शामिल करने में हमारी सहायता कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए, अगर कोई विद्यार्थी किसी खिलाड़ी के बारे में अपनी पसन्द लिखता है, तो हम उसकी रुचि से सम्बन्धित एक छोटा कार्ड या टोकन शामिल कर सकते हैं। इन पत्रों के जवाब विद्यार्थियों तक पहुँचाने के लिए हमारे पास एक डाकिया भी है! यह हमारे पसन्दीदा सहयोगियों में से एक हैं, जो स्कूल के रख-रखाव में मदद करने के साथ ही स्कूल के गेट की निगरानी भी करते हैं। कपिला बाइदेउ की ओर से आए जवाबी पत्रों को अपने झोले में लेकर वे कक्षा में प्रवेश करते हैं, विद्यार्थी का नाम पुकारते हैं, और चुपचाप मुस्कुराते हुए पत्र उसके हाथ में दे देते हैं (चित्र-3 देखें)। अब यह एक प्रिय परम्परा बन चुकी है।
चलते-चलते
हमारा यह प्रयास कि विद्यार्थी को प्रश्न सोचने और पूछने के लिए आमंत्रित किया जाए। अब हमिंगबर्ड स्कूल की एक पूर्ण विकसित पहल बन चुकी है। कपिला बाइदेउ अब हमारे स्कूल में एक मौन, लेकिन प्रभावशाली, उपस्थिति बन चुकी हैं जो जिज्ञासा, सहानुभूति और आत्मचिन्तन को बढ़ावा देती हैं।
यह पहल इतनी सफल क्यों हुई? कुछ कारण जो मैं सोच सकता हूँ वे यह हैं :
- पहला है कपिला बाइदेउ के इर्द-गिर्द उपस्थित रहस्य। विद्यार्थी इस किरदार को स्कूल के एक शान्त कोने में रखे लेटर बॉक्स और उन तक पहुँचने वाले जवाबी पत्रों से जोड़ते हैं। यह सरल-सा सेटअप जिज्ञासा और उत्साह पैदा करता है। ये जवाबी पत्र कौन लिख रहा है? यह सवाल विद्यार्थियों की उत्सुकता को जगाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। छोटे विद्यार्थी मानते हैं कि कपिला बाइदेउ एक असली किरदार हैं। यह उनके द्वारा भेजे गए कुछ सवालों में झलकता भी है। उदाहरण के लिए, वे अकसर पूछते हैं, “आप कहाँ रहती हैं?“, “आपके दोस्त कौन हैं?“, “क्या आप मेरी दोस्त बनेंगी?“, “आप हमारे स्कूल कब आएँगी?” बड़े या ज़्यादा समझदार विद्यार्थियों को सन्देह हो सकता है कि स्कूल का ही कोई व्यक्ति कपिला बाइदेउ के नाम से जवाब लिख रहा है। पर वे भी इस रहस्य को बनाए रखना पसन्द करते हैं। ख़ासतौर से इसलिए क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि इस पहल के पीछे कौन-से शिक्षक हैं, और वे कैसे काम करते हैं। हमारी ओर से हमें यह पसन्द है कि कपिला बाइदेउ से जुड़ा रहस्य इस पहल को फैलाए रखने देता है। चूँकि यह किसी एक शिक्षक से जुड़ा हुआ नहीं है, इसलिए स्कूल के कई लोग कपिला बाइदेउ की तरह बोलने के लिए आगे आ सकते हैं। कभी-कभी हम सक्रिय रूप से इस रहस्य को प्रोत्साहित करते हैं। उदाहरण के लिए, हमने हाल ही में देखा कि कई विद्यार्थियों ने पत्रों में बिना अपना नाम या कक्षा बताए सवाल पूछे। इन विवरणों के बिना, हम उन्हें व्यक्तिगत जवाब कैसे भेजेंगे! हमने कपिला बाइदेउ के एक जवाबी पत्र में विद्यार्थियों को अपनी इस चुनौती के बारे में बताया। पत्र को सुबह की सभा में पढ़ा गया। इसे किसी शिक्षक के द्वारा न पढ़ा जाकर विद्यार्थी परिषद के एक छात्र नेता द्वारा पढ़ा गया। इससे हम, अपनी पहचान ज़ाहिर किए बिना, अपना सन्देश विद्यार्थियों तक पहुँचाने में सफल रहे। अन्य मामलों में, रहस्य की यह भावना हमें विद्यार्थियों को उनकी कल्पना के माध्यम से व्यापक दुनिया से जोड़ने में हमारी मदद करती है। उदाहरण के लिए, जैसे-जैसे 2024 आगे बढ़ा, स्कूल की समय-सारणी में हुए बदलाव से हमारी पहल की लय कुछ रुक-सी गई। हमारी टीम के कई सदस्यों को जवाब लिखने का पर्याप्त समय नहीं मिला। लगभग आठ महिनों तक यह पहल सुस्त ही रही। बच्चों के सवाल तो आते रहे, पर उन्हें उनके जवाब जाने रुक गए। विद्यार्थियों में इस बात की चर्चा शुरू हो गई कि शायद कपिला बाइदेउ की मृत्यु हो गई है। यह अफ़वाह पूरे स्कूल में फैलनी शुरू हो गई। कुछ विद्यार्थियों ने ऐसे पत्र भी भेजे जिनमें पूछा गया था, “आपको क्या हुआ?” शुक्र है कि जवाब देने वाली टीम में कुछ नए सदस्य शामिल हुए। जवाब देने में यह जो रुकावट आई थी उसे हमारे विद्यार्थियों को इस तरीक़े से समझाने के लिए, कि यह तार्किक लगे, हमने एक पृष्ठभूमि तैयार की : कपिला बाइदेउ यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध को कवर करने के लिए यूरोप गई थीं। इसीलिए वे हमारे विद्यार्थियों के पत्रों का जवाब नहीं दे सकीं। उन्होंने खेद व्यक्त किया। इस आसान क़दम ने हमें इस पहल को पुनर्जीवित करने का मौक़ा दिया।
- दूसरा, यह पहल विद्यार्थियों को बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी जिज्ञासा व्यक्त करने की आज़ादी देती है। शुरुआत में, हमने विद्यार्थियों से ऐसे ‘उचित’ पत्र, जो किसी माकूल पत्र के सभी मापदण्ड पूरे करते हों, लिखने के लिए कहने या अपने सवालों के लिए एक ख़ास तरह के काग़ज़ का इस्तेमाल करने पर ज़ोर देने के विचार को अपने मन्थन में शामिल किया। लेकिन, कुछ सोच-विचार के बाद, हमने कोई नियम न थोपने का फ़ैसला लिया। विद्यार्थी, कपिला बाइदेउ को जिस तरह चाहें उस तरह पत्र लिखते हैं। जब भी उन्हें समय मिलता है, वे अपने सवाल भेज देते हैं। उन्हें जो काग़ज़ मिलता है उस पर लिख देते हैं — सख़्त, मुलायम, या यहाँ तक कि नोटबुक से फाड़ी हुई पट्टियों (स्ट्रिप) पर भी (चित्र-4 देखें)। कभी-कभी वे बॉक्स के अन्दर अपनी एक छोटी-सी तस्वीर भी डाल देते हैं। शायद, वे यह विश्वास करते हैं कि कपिला ये तस्वीर देखेंगी।

- तीसरा कारण यह है कि कपिला बाइदेउ के जवाबी पत्र जब विद्यार्थियों को मिलते हैं तो वे जो महसूस करते हैं। प्रत्येक पत्र कक्षा में उनको हाथ से दिया जाता है। वे पत्र खोलते हैं तो उन्हें एक स्नेही और कोमल बात सुनाई देती है। पत्र जिस विद्यार्थी को भेजा जा रहा है, पत्र की विषयवस्तु उसके स्तर के अनुरूप रखी जाती है। व्यक्तिगत होने के बावजूद, यह पत्र विद्यार्थियों को उपदेश नहीं देता या उन्हें असहज महसूस नहीं कराता। वे कपिला के साथ संवाद करते हुए सुरक्षित महसूस करते हैं।
इस पहल को अपने स्कूल और विद्यार्थियों के अनुकूल बनाने के लिए शिक्षक कई तरीक़े अपना सकते हैं। हमारे लिए तो यह बस एक शुरुआत है। हम अभी भी सीख ही रहे हैं, और इसमें इज़ाफ़े की बहुत गुंजाइश है। हम और भी कई तरीक़े आज़माना चाहते हैं ताकि हमारे विद्यार्थी यह जान सकें कि उनके सवाल महत्त्वपूर्ण हैं, और उन्हें यह महसूस हो कि उनकी बात सुनी जा रही है।
टिप्पणियाँ
- Credits for the image (The Kapila Baideu corner in school) used in the background of the article title: Deepak Rajput. License: CC BY-NC-ND 4.0.
- लेख के हिन्दी अनुवाद की समीक्षा के लिए हम हृदय कान्त दीवान के आभारी हैं।
सन्दर्भ
- Azim Premji University (2022). ‘i wonder… Webinar : Asking Questions in Science’. URL: https://www.youtube.com/watch?v=eQdloz9PgRU.
- Eklavya. ‘Sawaliram’. Tata Institute of Fundamental Research (TIFR Centre for Interdisciplinary Sciences), Hyderabad, and Eklavya, Bhopal. URL: https://sawaliram.org/. Accessed on Aug 6, 2025.