‘हमारे आस-पास की सामग्री’ से बच्चों का औपचारिक परिचय छठवीं कक्षा की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में कराया जाता है (एनसीईआरटी, पुनर्मुद्रण 2025-2026)। हो सकता है कि वे एकदम से इस बारे में न सोचें, लेकिन इनमें से एक सामग्री ‘हवा’ है। हम अपना पूरा जीवन ‘हवा के समुद्र’ यानी पृथ्वी के वायुमण्डल तले बिताते हैं। यह एक ऐसी सामग्री है जिसमें बच्चों की स्वाभाविक दिलचस्पी होती है, और इसके बारे में उनके ख़ुद के दिलचस्प अन्दाज़े भी होते हैं। लेकिन यह दिलचस्पी और जिज्ञासा केवल बच्चों तक सीमित नहीं होती।
‘हमारे आस-पास की सामग्री’ से बच्चों का औपचारिक परिचय छठवीं कक्षा की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में कराया जाता है (एनसीईआरटी, पुनर्मुद्रण 2025-2026)। हो सकता है कि वे एकदम से इस बारे में न सोचें, लेकिन इनमें से एक सामग्री ‘हवा’ है। हम अपना पूरा जीवन ‘हवा के समुद्र’ यानी पृथ्वी के वायुमण्डल तले बिताते हैं। यह एक ऐसी सामग्री है जिसमें बच्चों की स्वाभाविक दिलचस्पी होती है, और इसके बारे में उनके ख़ुद के दिलचस्प अन्दाज़े भी होते हैं। लेकिन यह दिलचस्पी और जिज्ञासा केवल बच्चों तक सीमित नहीं होती। सदियों से मनुष्य हवा की प्रकृति के बारे में सोच-विचार करते रहे हैं, और अकसर इनकी बुनियाद में उनके अपने रोज़मर्रा के अनुभव और अपेक्षाएँ रही हैं। अधिकांश प्राचीन संस्कृतियाँ और सभ्यताएँ हवा को भौतिक दुनिया का निर्माण करने वाले तत्त्वों में से एक मानती रही हैं। लगभग 2500 साल पहले, ग्रीक दार्शनिक एम्पेडोकल्स ने दर्शाया था कि हवा बस ख़ाली स्थान या शून्य नहीं है। उन्होंने एक ख़ाली कटोरा लिया जिसके तले में एक छोटा-सा छेद था (इसे उन्होंने अपनी उँगली से ढँक लिया था), और फिर एक पानी से भरे बर्तन में उलटा रख दिया। उन्होंने देखा कि हवा की मौजूदगी ने पानी को कटोरे में एकदम से घुसने से रोक लिया। इससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि हवा एक ऐसा पदार्थ है जो पानी को पीछे धकेल सकता है। अगर बच्चे यह प्रयोग करके देखें, और छेद के मुँह पर से उँगली हटाएँ तो वे उसमें से हवा को निकलता महसूस कर पाएँगे। एक और सफलता लगभग चार सदी पहले हाथ लगी। इटैलियन भौतिकशास्त्री गास्पारो बेर्ती ने दिखाया कि हमें घेरे रहने वाली हवा में भार होता है। इसे ही हम वायुमण्डलीय दबाव कहते हैं। तक़रीबन 250 साल पहले, ध्यानपूर्वक किए गए प्रयोगों और मापों के माध्यम से, फ़्रेंच रसायनशास्त्री आंतवाँ एल.लवाइजिए (और अन्य समकालीन रसायनशास्त्रियों) ने पाया कि हवा का एक घटक, जिसे उन्होंने ऑक्सीजन नाम दिया, जलने या दहन में शामिल रहता है। उन्होंने यह भी पाया कि जब हम हवा में मौजूद ऑक्सीजन के द्रव्यमान का हिसाब रखते हैं (प्रयोग बन्द डिब्बों में किए गए थे) तो दहन में शामिल पदार्थों का द्रव्यमान अभिक्रिया के पहले और बाद में समान रहता है। अन्य विचारों और तकनीकों के साथ, द्रव्यमान के संरक्षण के इस नियम ने रसायनविज्ञान के आगे के विकास की राह प्रशस्त की।
लेकिन आज भी बच्चों और बड़ों के लिए भी, इस बात को स्वीकार करना मुश्किल होता कि हवा एक पदार्थ है या उसका द्रव्यमान होता है। यह देखते हुए, कि हवा की प्रकृति और गुणों की एक सूक्ष्म समझ तक पहुँचने में हमें सदियाँ लगी हैं, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हवा की एक बेहतर समझ विकसित करने और इसके बारे में वैज्ञानिक रूप से सटीक निष्कर्षों तक पहुँचने में हम विद्यार्थियों की किस प्रकार मदद कर सकते हैं? ये सवाल आई वंडर… के इस अंक के दो लेखों के केन्द्र में हैं। लेख ‘‘क्या किसी ‘ख़ाली’ गिलास में हवा होती है?’’ में विपिन कुमार हवा के गुणों को लेकर विद्यार्थियों के विचारों के बारे में उनके साथ संवाद क़ायम करने के अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। बच्चों के साथ काम करने के अपने विस्तृत अनुभव का उपयोग करते हुए वे दिखाते हैं कि प्रयोग से निकले प्रमाण किस प्रकार बच्चों को धीरे-धीरे अपनी समझ को परिष्कृत करने, संशोधित करने और पैना बनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। दूसरे लेख, ‘‘क्या फूले हुए ग़ुब्बारे में भरी हवा उसका भार बढ़ाती है?’’ में सौरभ सोम और विजेता रघुराम रोज़मर्रा की वस्तुओं के साथ की जाने वाली एक ऐसी गतिविधि के विचार को प्रस्तुत कर रहे हैं जो विद्यार्थियों को हवा के द्रव्यमान की एक परिष्कृत वैज्ञानिक समझ की ओर ले जा सकती है। जैसा कि राष्ट्रीय जीवविज्ञान केन्द्र (एनसीबीएस), बेंगलूरु के संस्थापक निदेशक ओबैद सिद्दीकी ने एक बार कहा था, “परिष्कार दिमाग़ में होना चाहिए, न कि महँगे गैजेट या फिर प्रयोगशालाओं में।” इन दोनों लेखों के विचारों को विभिन्न टॉपिक और कक्षाओं में हवा के इर्द-गिर्द एक विस्तृत विषयवस्तु की पड़ताल करने के लिए भी विकसित किया जा सकता है।
हम आशा करते हैं कि ये लेख और सम्बन्धित संसाधन आपके लिए अपनी कक्षाओं में अपने विद्यार्थियों के साथ उपयोगी सिद्ध होंगे। हमें भरोसा है कि आप इन शिक्षण-सम्बन्धी विचारों को अपने हिसाब से ढालने तथा उन्हें और आगे बढ़ाने के तरीक़े ईजाद कर लेंगे। हमेशा की तरह, हमें आपके शिक्षण अनुभव सुनने का इन्तज़ार रहेगा!
अनीश मोकाशी
सम्पादकीय टीम सदस्य