क्या किसी ‘ख़ाली’ गिलास में हवा होती है?

कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025–26) का अध्याय-6 (‘हमारे आस-पास की सामग्री’) पदार्थ और उसके मूलभूत गुणों से विद्यार्थियों का परिचय करवाता है। इसमें लिखा है : ‘‘कोई भी वस्तु जो स्थान घेरती है और द्रव्यमान रखती है उसे द्रव्य कहा जाता है। द्रव्य द्वारा घेरा गया स्थान उसका आयतन है।”1 इसके बाद अध्याय यह सवाल रखता है, “क्या हमारे आस-पास की सभी सामग्रियाँ द्रव्य के विभिन्न उदाहरण मानी जा सकती हैं? उदाहरण के लिए जल द्रव्य है, रेत और कंकड़ द्रव्य हैं और इसी प्रकार कप भी द्रव्य है… लेकिन क्या वायु भी द्रव्य है?”1
हवा के गुणों की पड़ताल
मैं राजस्थान के सिरोही ज़िले के एक राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय की कक्षा-6 में था। मैंने हवा पर चर्चा की शुरुआत एक प्रश्न के साथ की : “क्या हवा होती है?” इसके जवाब में सभी विद्यार्थियों ने कहा, “हाँ!” फिर मैंने पूछा, “लेकिन मुझे तो हवा नज़र नहीं आती। तुम्हें कैसे पता कि हवा सचमुच में होती है?” कुछ विद्यार्थियों ने मेरी बात से सहमति जताई, “हाँ, हवा को तो हम भी नहीं देख सकते।” मैंने सवाल फिर दोहराया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। तब मैंने विद्यार्थियों से कहा कि वे पास बैठे अपने किसी सहपाठी के साथ इस पर थोड़ी देर चर्चा करें। मेरे अनुभव में बच्चे जब हमउम्र साथियों से बात करते हैं, तो ज़्यादा सहज होकर अपने अवलोकन और विचार साझा कर पाते हैं। इससे उन्हें अपने विचारों की पुष्टि करने का अवसर मिलता है और फिर वे पूरे आत्मविश्वास के साथ उसे कक्षा के समक्ष व्यक्त कर पाते हैं। जब मैंने तीसरी बार वही सवाल किया, तो अब विद्यार्थियों के जवाबों की झड़ी लग गई : “हम हवा को देख नहीं सकते, लेकिन पेड़ों को हवा से हिलते देख सकते हैं। रेत उड़ती है। और भी चीज़ें उड़ती हैं। जब हवा तेज़ी से चलती है, तो हम उसकी आवाज़ भी सुन सकते हैं।” कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, पुनर्मुद्रण 2025–26) के अध्याय-11 (‘प्रकृति की अमूल्य सम्पदा’) में बताया गया है : “चलती हुई हवा को पवन कहते हैं। कभी-कभी यह बहुत तेज़ गति से चलती है, जैसे आँधी के समय या कभी-कभी यह धीमी गति से चलती है, जैसे बयार (मन्द पवन)।”2 मैंने विद्यार्थियों से पूछा, “क्या हवा में सब चीज़ें उड़ जाती हैं?” विद्यार्थियों ने कहा कि उन्होंने हल्की चीज़ों जैसे ख़ाली पॉलिथीन (पन्नी), घास के तिनके, पक्षियों के पंख आदि उड़ते हुए देखे हैं। मैंने कहा, “तो मतलब हवा हल्की चीज़ों को उड़ा सकती है। लेकिन भारी चीज़ों को क्यों नहीं?” जब कोई जवाब नहीं आया, तो मैंने बताया कि जब हवा की गति बहुत अधिक होती है, तो छत पर लगी टीन की चादरों जैसी भारी चीज़ें भी उड़ सकती हैं। इसकी और विस्तृत व्याख्या कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-26) के अध्याय-6 (‘Pressure, Winds, Storms, and Cyclones’) में दी गई है। इसमें बताया गया है : “जब तेज़ हवाएँ मकानों के ऊपर से गुज़रती हैं, तो वहाँ कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है, क्योंकि तेज़ गति हवाओं के साथ वायुदाब घट जाता है। इस वजह से छत के ऊपर का दबाव उसके नीचे के दबाव की तुलना में कम हो जाता है। अगर दबाव का यह अन्तर बड़ा हो और छत मज़बूत न हो, तो उसके उड़ जाने की सम्भावना रहती है।”3
फिर मैंने पूछा, “तो हम ‘देख’ सकते हैं कि हवा चीज़ों को उड़ा सकती है। हम बहती हुई हवा की आवाज़ भी ‘सुन’ सकते हैं। क्या हम हवा को ‘महसूस’ भी कर सकते हैं?” बच्चों ने उत्साह से कहा, “हाँ।” कई विद्यार्थियों ने अपने जवाब के समर्थन में अपने अवलोकन और अनुभव भी साझा किए। इनमें एक इस बल के अनुभव का था। जब वे साइकिल, बाइक या बस में बैठकर हवा की विपरीत दिशा में चलते हैं तब हवा उनकी उलटी दिशा से आकर टकराती है। कुछ देर रुककर मैंने बच्चों से पूछा, “तो हम जानते हैं कि हवा होती है, क्योंकि हम उसे बहते हुए देख सकते हैं, उसकी आवाज़ सुन सकते हैं और उसे महसूस भी कर सकते हैं। लेकिन अगर हवा बिल्कुल न चले, तब? क्या हवा तब भी होती है?” कई विद्यार्थी इस सवाल को सुनकर दुविधा में पड़ गए। थोड़ी देर सोचने के बाद कुछ विद्यार्थियों ने कहा, “हाँ।” मैंने पूछा, “तो हम हवा को कहाँ ढूँढ़ सकते हैं?” अधिकांश विद्यार्थियों ने जवाब दिया, हवा तो ‘बाहर’ हर जगह होती है। फिर मैंने अगला सवाल पूछा, “और हम साँस लेते समय क्या अन्दर लेते हैं और क्या बाहर छोड़ते हैं?” एक विद्यार्थी ने जवाब दिया, “हम ऑक्सीजन अन्दर लेते हैं।” मैंने पूछा, “तो हम साँस में हवा लेते हैं या ऑक्सीजन?” कुछ ने कहा, “हम साँस में जिस हवा को लेते हैं, उसमें और भी गैसें होती हैं।” तभी बाक़ी विद्यार्थी उन गैसों के नाम बताने लगे, जो उन्हें याद थे − कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन। कक्षा-3 की पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस) की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-26) के अध्याय-10 (‘वस्तुओं की दुनिया’) में विद्यार्थी पहली बार यह सबक सीखते हैं : “…पदार्थों को तीन प्रकारों में बाँट सकते हैं − ठोस, द्रव एवं गैस।”4 फिर कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, पुनर्मुद्रण 2025-26) के अध्याय-11 में विद्यार्थी सीखते हैं : “पृथ्वी के चारों ओर उपस्थित वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है। वायु में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म मात्रा में अन्य गैसें होती हैं।”2 मैंने विद्यार्थियों से कहा कि उनके सभी जवाब सही हैं।
साथ ही संक्षेप में यह भी समझाया कि मिश्रण क्या होता है। यह अवधारणा अब कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025–26) के अध्याय-8 (‘Nature of Matter: Elements, Compounds, and Mixtures’) में इस तरह प्रस्तुत की गई है : “जब दो या दो से अधिक पदार्थ आपस में मिलाए जाते हैं और प्रत्येक पदार्थ अपने गुण बनाए रखता है, तो उसे मिश्रण कहते हैं। वे अलग-अलग पदार्थ जिनसे मिश्रण बनता है, उन्हें मिश्रण के अवयव (components) कहा जाता है। किसी मिश्रण के अवयव आपस में रासायनिक अभिक्रिया नहीं करते।”5 विद्यार्थियों को इस बात से जोड़ने के लिए मैंने स्कूल के आँगन में पड़े रेत के एक ढेर की ओर इशारा करते हुए पूछा, “क्या इस ढेर को मिश्रण कहा जा सकता है?” कई विद्यार्थियों ने “हाँ।” कहा। मैंने कारण पूछा तो जवाब आया, “इसमें रेत है, छोटे-छोटे कंकड़ हैं और लोहे के कुछ कण भी हैं।” कुछ ने बताया कि वे चुम्बक की मदद से लोहे के इन कणों को ढेर से अलग भी कर लेते हैं। मैंने ख़ुद भी उन्हें ऐसा करते देखा था। इसी से मेरे मन में ढेर के बारे में यह सवाल उपजा था। मैंने कहा, “हवा के अलग-अलग अवयव भी इसी तरह घुले-मिले होते हैं। तुम लोगों ने हवा में मौजूद कुछ गैसों के नाम भी गिनाए। क्या तुम्हें पता है कि इस मिश्रण में और कौन-कौन-सी चीज़ें शामिल होती हैं?” जब उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया, तब मैंने उनके द्वारा पहले साझा किए गए एक अवलोकन पर आधारित सवाल किया : “क्या हवा रेत को उड़ा सकती है?” विद्यार्थियों ने कहा : “हाँ, हम इसे हवा में उड़ते हुए देखते हैं। और धूल के कणों को भी।” फिर मैंने पूछा, “पानी के बारे में क्या सोचते हो? अगर हम स्कूल के इस खुले आँगन में पानी छिड़क दें तो उसका क्या होगा?”
विद्यार्थियों ने जवाब दिया कि पानी ग़ायब हो जाएगा। हमने इसे करके देखा। चूँकि यह राजस्थान की गर्मी का मौसम था, इसलिए पानी कुछ ही मिनटों में ग़ायब हो गया। मैंने पूछा, “तो पानी कहाँ गया?” विद्यार्थियों ने जवाब दिया कि वह हवा में चला गया। मैंने समझाया कि पानी गैस में बदलकर हवा में मौजूद अन्य गैसों के साथ मिल जाता है। कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, पुनर्मुद्रण 2025-26) के अध्याय-8 (‘जल की विविध अवस्थाओं की यात्रा’) में विद्यार्थी ‘पानी का ग़ायब होना’ के बारे में अधिक विस्तार से सीखते हैं : “जल के वाष्प अवस्था में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण या वाष्पन कहते हैं।”6 विद्यार्थियों को वायु की संरचना के बारे में मात्रात्मक समझ देने के लिए मैंने पूछा, “यह तो हम जानते हैं कि हवा कई गैसों का मिश्रण है। लेकिन उसमें ये गैसें कितनी-कितनी मात्रा में पाई जाती हैं?” जब कोई जवाब नहीं मिला तो मैंने उनसे कहा कि वे अपनी पाठ्यपुस्तकों में देखें। शायद वहाँ से कोई मदद मिल सके। विद्यार्थियों ने किताब के पन्ने पलटने शुरू किए और अन्ततः उन्हें आवश्यक जानकारी मिल गई। फिर उन्होंने उसे ज़ोर से पढ़कर सुनाया। मैंने उनके जवाब बोर्ड पर लिख दिए : नाइट्रोजन : 78%, ऑक्सीजन : 21%, कार्बन डाइऑक्साइड : 0.03%, अन्य गैसें : 0.97%। कक्षा-6 की विज्ञान की नवीनतम पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, पुनर्मुद्रण 2025-26) के अध्याय-11 में इसी जानकारी को भिन्नात्मक संख्याओं (fractions) के रूप में प्रस्तुत किया गया है : “100 वर्ग वाले चार्ट में से 78 वर्ग नाइट्रोजन द्वारा भरे होते हैं, 21 वर्ग ऑक्सीजन द्वारा और 1 वर्ग आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य गैसों द्वारा।”2
मैंने स्टील के गिलास को उठाया, जो मैं कक्षा में अपने साथ लेकर आया था। गिलास को चारों ओर घुमाकर दिखाया ताकि सभी विद्यार्थी उसे भीतर से भी देख सकें। फिर मैंने पूछा, “क्या यह गिलास ख़ाली है या इसमें कुछ है?” विद्यार्थियों ने जवाब दिया, “ख़ाली है।” मैंने पूछा, “क्या इसमें हवा है?” कई विद्यार्थियों ने तुरन्त कहा, “नहीं।” कुछ विद्यार्थी थोड़े भ्रमित दिखे और उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने कक्षा को सोचने के लिए कुछ समय दिया और फिर से अपना यही सवाल दोहराया। इस बार एक-दूसरे की ओर देखकर सभी विद्यार्थियों ने कहा कि गिलास में हवा नहीं है। मैं एक बाल्टी में पानी भरकर कक्षा में लाया। विद्यार्थी बड़ी जिज्ञासा से देखने लगे। मैंने गिलास को हाथ में लिया और उलटा किया और पूछा, “क्या तुम आश्वस्त हो कि इस गिलास में हवा नहीं है?” विद्यार्थी अपनी राय पर अड़े रहे और उनका जवाब हाँ में ही आया, यानी गिलास में कोई हवा नहीं है। फिर मैंने पूछा, “अगर मैं इस ख़ाली गिलास को उलटा करके इस पानी वाली बाल्टी में डाल दूँ, तो आपको क्या लगता है क्या होगा?” एक विद्यार्थी ने अनुमान लगाते हुए कहा कि अगर मैं गिलास को पानी में धकेलकर नीचे ले जाकर छोड़ दूँ, तो यह उछलकर पुन: पानी की सतह पर वापस आ जाएगा।
यह दर्शा रहा था कि उस विद्यार्थी ने वस्तुओं पर पानी के ‘उत्प्लावन प्रभाव’ (Effect of Buoyancy, यानी किसी वस्तु को पानी द्वारा ऊपर धक्का देने का बल) के बारे में पहले से अवलोकन किया हुआ था। कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-26) के अध्याय-5 (‘Exploring Forces’) में विद्यार्थियों को इस अवधारणा से औपचारिक रूप से परिचित कराने के लिए इसी तरह की एक गतिविधि दी गई है : “प्लास्टिक की ख़ाली बोतल लो (जिसका ढक्कन अच्छी तरह बन्द हो) और पानी से भरी एक बाल्टी लो। बोतल को पानी में नीचे की ओर धकेलो… क्या तुम्हें ऊपर की ओर कोई धक्का महसूस होता है? अब बोतल को छोड़ दो। क्या यह ऊपर उछलती है? तुम्हें ऊपर की ओर धक्का महसूस हुआ होगा और बोतल उछलकर फिर से पानी की सतह पर आ गई होगी। यह दर्शाता है कि पानी बोतल पर ऊपर की तरफ़ एक बल लगाता है। दरअसल, सभी तरल पदार्थ इसी तरह का बल लगाते हैं। किसी तरल पदार्थ द्वारा किसी वस्तु पर ऊपर की तरफ़ लगाया गया बल ‘अपथ्रस्ट’ या ‘उत्प्लावक बल’ (buoyant force) कहलाता है।”7 मैंने उसी विद्यार्थी से पूछा, “ऐसा क्यों? क्या गिलास इसलिए ऊपर आ जाएगा, क्योंकि उसमें हवा है?” उसने कहा कि उसे पूरा यक़ीन है कि गिलास में कोई हवा नहीं है। गिलास ऊपर आ जाएगा, यह तो उसे मालूम था मगर ऊपर क्यों आएगा, इसकी वजह उसे मालूम नहीं थी। मैंने कहा : “चलो, इस गिलास को बाल्टी में डालकर देखते हैं।”
मैंने सभी विद्यार्थियों से कहा कि वे थोड़ा क़रीब आ जाएँ, ताकि इस गतिविधि को सभी ठीक से देख सकें। मैंने गिलास उठाया और दोबारा से पूछा, “क्या किसी को लगता है कि इस गिलास में हवा है?” किसी भी विद्यार्थी ने जवाब नहीं दिया। दरअसल, बार-बार वही सवाल पूछने का मेरा उद्देश्य यह था कि विद्यार्थी ध्यान से देखें और ख़ाली गिलास में हवा मौजूद है या नहीं, इसका कोई सबूत तलाशें। अब मैंने ख़ाली गिलास को उलटा कर दिया, उसके खुले मुँह को अपने दूसरे हाथ की हथेली से बन्द किया और हथेली समेत ही उसे धीरे-धीरे पानी में डुबो दिया। मैं गिलास को खड़ा (उर्ध्वाधर) पकड़े हुए था और नीचे से उसका खुला मुँह अपनी हथेली से बन्द किए हुए था। मैंने विद्यार्थियों से कहा कि वे बाल्टी के पानी को ध्यान से देखें। “क्या तुम्हें कोई भी संकेत दिखाई दे रहा है कि गिलास में हवा है?” विद्यार्थी पानी में ध्यान से देखने लगे, लेकिन चुप रहे। फिर मैंने बहुत धीरे-धीरे गिलास के मुँह से अपनी हथेली हटानी शुरू की और गिलास को हल्का-सा झुका भी दिया (देखें चित्र-1)।

सबने अचानक देखा कि पानी में बुलबुले निकलकर ऊपर सतह की ओर उठने लगे थे। मैंने विद्यार्थियों से पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, यहाँ क्या हो रहा है?” उन्होंने तुरन्त जवाब दिया, “हवा निकल रही है।” उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के कुछ उदाहरण वे पहले भी देख चुके हैं। कुछ ने बताया कि बाल्टी में उठ रहे बुलबुले वैसे ही लग रहे हैं, जैसे चाय बनाते समय पानी को गरम करने पर सतह की ओर ऊपर आते हैं। मैंने पूछा, “लेकिन हवा कहाँ से आई होगी? तुम लोगों ने तो कहा था कि पानी में डालने से पहले उलटा किए गए गिलास में कोई हवा नहीं है। मैंने तुम्हारे सामने ही गिलास का मुँह बन्द किया था। फिर जब हथेली हटाई, तो ख़ाली गिलास में से हवा कैसे निकली?” अब विद्यार्थियों ने पूरे यक़ीन से कहा कि गिलास ख़ाली नहीं था, उसमें हवा होगी ही, क्योंकि उन्होंने उसमें से निकलते बुलबुले देखे थे।
मैंने इस गतिविधि को एक बार और दोहराया। फिर विद्यार्थियों से कहा कि अब वे ख़ुद इसे करके देखें। कुछ विद्यार्थियों ने हूबहू वैसा ही किया, जैसा उन्होंने मुझे करते देखा था। लेकिन कुछ ने इसमें बदलाव करने शुरू कर दिए। उदाहरण के लिए, एक विद्यार्थी ने मेरी नक़ल करते हुए पानी में गिलास को हल्का-सा तिरछा किया। जैसे ही गिलास से बुलबुले निकलने लगे, उसने गिलास को और ज़्यादा तिरछा कर दिया। अन्य जो विद्यार्थी यह देख रहे थे, उनका कहना था कि बुलबुलों की संख्या और उनके बाहर आने की गति, दोनों में इज़ाफ़ा हो गया था। वह विद्यार्थी गिलास को तब तक और ज़्यादा ऊपर की तरफ़ झुकाता चला गया, जब तक कि गिलास पानी से पूरी तरह भर नहीं गया। हम सबने देखा कि अब पानी में से बुलबुले निकलने बन्द हो गए थे। मैंने पूछा, “अब गिलास से बुलबुले क्यों नहीं निकल रहे?” विद्यार्थियों ने अनुमान लगाया कि ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि गिलास की सारी हवा बाहर निकल चुकी है। उन्होंने कहा, “गिलास में अब कोई हवा शेष नहीं बची है।” योगिता नाम की एक छात्रा ने गिलास को इस तरह से उलटा पकड़ा कि उसकी तर्जनी उँगली गिलास के भीतर ही रहे। उसने फिर गिलास को इस स्थिति में कुछ देर तक पानी के नीचे रखा। फिर उँगली को गिलास के अन्दर उसी स्थिति में रखे हुए गिलास को बाहर निकाला और उँगली को देखा और फिर सहपाठियों को अपनी उँगली दिखाते हुए बोली, “देखो, यह अब भी सूखी है।” मैंने योगिता से पूछा, “तुम्हें क्या लगता है तुम्हारी उँगली सूखी क्यों रही?” उसने जवाब दिया, “क्योंकि ख़ाली गिलास में हवा है, पानी नहीं। इसलिए मेरी उँगली गीली नहीं हुई।” यह गतिविधि देखने में भले ही आसान लगे, लेकिन यह योगिता द्वारा वैज्ञानिक प्रक्रिया के इस्तेमाल को दर्शाती है। उसने ग़ौर किया था कि जैसे ही हमने गिलास के ढँके हुए मुँह से हथेली हटाई, बुलबुले बाहर निकलने लगे। अन्य विद्यार्थियों की तरह उसका भी यही निष्कर्ष था कि यह गिलास की हवा ही थी जो बुलबुलों के रूप में बाहर निकली थी।
लेकिन क्या गिलास के भीतर पानी जाने के लिए अन्दर की हवा का बाहर निकलना ज़रूरी है? उसने इस तर्क का इस्तेमाल किया कि गिलास तब तक हवा से भरा रहता है जब तक वह एकदम उर्ध्वाधर उलटा है और उसका मुँह हथेली से बन्द है। ऐसे में अगर कोई सूखी चीज़ गिलास में रखी हो, तो वह सूखी ही बनी रहेगी। यह उसकी परिकल्पना थी। और जब उसने गिलास को पानी से बाहर निकाला और देखा कि उसकी उँगली सचमुच सूखी ही रही, तो उसकी परिकल्पना की पुष्टि हुई। उसने अपने ही अनुभव से यह जान लिया कि जब तक गिलास से हवा नहीं निकलती, तब तक पानी अन्दर नहीं जा सकता। मैंने योगिता की यही व्याख्या अन्य विद्यार्थियों के सामने रखी और उन्हें भी इस प्रयोग को स्वयं आज़माने के लिए आमंत्रित किया।
विद्यार्थियों को इस गतिविधि को करने के लिए पर्याप्त समय देने के बाद मैंने उनसे पूछा, “जब हम गिलास के मुँह से हथेली हटाते हैं, तो वह तुरन्त पानी से क्यों नहीं भर जाता?” इस समय तक कई विद्यार्थियों ने योगिता वाली गतिविधि करके देख ली थी और उन्हें वही नतीजा मिला था, यानी ठीक उर्ध्वाधर उलटे गिलास के भीतर रखी उँगली सूखी ही रही। उन्होंने जवाब दिया, “गिलास के भीतर हवा होती है, तो उसमें पानी कैसे भर सकता है?” मैंने अगला सवाल किया, “गिलास पूरी तरह पानी में डूबा हुआ है। इसके बावजूद, जब तक वह एकदम उर्ध्वाधर रहता है, तब तक उसमें पानी नहीं जाता है। आख़िर उसमें पानी भरना कब शुरू होता है? चलो, इसे देखने की कोशिश करते हैं।” मैंने प्लास्टिक की एक पारदर्शी बोतल उठाकर दिखाई और विद्यार्थियों से कहा, “अब हम गिलास वाला प्रयोग इस बोतल से दोहराएँगे। अगर इसके भीतर कुछ पानी जाएगा, तो क्या वह हमें दिखाई देगा?” विद्यार्थियों ने एक स्वर में कहा, “हाँ।” कुछ क्षण बाद ही कुछ विद्यार्थियों ने पूछा, “लेकिन हम पानी को बोतल में घुसाएँगे कैसे?” मैंने उन्हें याद दिलाया कि उनके कुछ साथियों ने गतिविधि में परिवर्तन किया था। वे गिलास को धीरे-धीरे ऊपर की ओर तिरछा करते गए थे। उन्होंने उसे जितना ज़्यादा तिरछा किया था, उतना ही अधिक पानी उसमें भर गया था। इसके बाद विद्यार्थियों और मैंने वही प्रक्रिया बोतल के साथ दोहराई। हमने अवलोकन किया कि बोतल से जितनी कम हवा बुलबुलों के रूप में बाहर निकली, उतना ही कम पानी बोतल में भरा। और जितने अधिक हवा के बुलबुले बोतल से बाहर आए, पानी की उतनी ही अधिक मात्रा बोतल में भरी। मैंने पूछा, “तुम्हें क्यों लगता है कि बोतल में भरने वाला पानी उससे बाहर निकलने वाली हवा की मात्रा पर निर्भर करता है?” विद्यार्थियों ने जवाब दिया, “बोतल के अन्दर गया पानी उसमें से निकली हवा के बराबर है।”
इसके बाद मैंने विद्यार्थियों के साथ साझा किया कि हवा हमारी पृथ्वी पर हर ख़ाली जगह को भरकर रखती है। गिलास भले ही ख़ाली दिख रहा था, लेकिन जब हमने उसे उलटा करके पानी में डुबोया और तिरछा करना शुरू किया तो उसमें से कुछ मात्रा (आयतन) में हवा बाहर निकली और उतनी ही मात्रा (आयतन) का पानी अन्दर चला गया। यह दिखाता है कि जो गिलास ‘ख़ाली’ लग रहा था, वह दरअसल हवा से भरा हुआ था और यह भी कि हवा भी जगह घेरती है। जब किसी ख़ाली प्रतीत हो रही जगह में किसी मात्रा में कोई दूसरा पदार्थ भरा जाता है, तो उसके बराबर मात्रा में वहाँ से हवा भी बाहर निकलती है। इसे और स्पष्ट करने के लिए मैंने विद्यार्थियों को एक ऐसा उदाहरण दिया जिससे वे आसानी से जुड़ सकें। मैंने कहा, “इस कमरे में हवा हर जगह फैली हुई है। वह उन जगहों पर भी है, जो ख़ाली दिखाई देती हैं। यह तुम्हारी किताब के खुले पन्नों के बीच है, तुम्हारे बस्ते में है और तुम्हारे शरीर के भीतर भी है। जब तुम इस कमरे से बाहर जाते हो, तो तुम्हारे शरीर ने जितनी जगह घेरी होती है, उतनी हवा कमरे में आ जाती है। और जब तुम वापस कमरे में आते हो, तो उतनी ही हवा बाहर निकल जाती है।” विद्यार्थी इसे कितना समझ पाए, इसे परखने के लिए मैंने आधे गिलास को पानी से भर दिया और उसे दिखाते हुए उनसे पूछा, “इस गिलास में क्या है?” विद्यार्थियों ने जवाब दिया, “इसमें पानी है।” फिर मैंने पूछा, “क्या पूरा गिलास पानी से भरा है?” उन्होंने जवाब दिया, “नहीं, इसमें कुछ पानी है और कुछ हवा है।” इससे साफ़ हुआ कि बच्चे समझ पा रहे थे कि जो जगह ख़ाली दिख रही है, वहाँ वास्तव में हवा मौजूद है। इसे और स्पष्ट करने के लिए मैंने समझाया, “अगर मैं इस गिलास का पानी दूसरे गिलास में डाल दूँ, तो दूसरे गिलास से कुछ हवा बाहर निकल जाएगी, ताकि पानी को जगह मिल सके। अगर मैं दूसरे गिलास को पानी से पूरी तरह भर दूँ, तो उसके भीतर की सारी हवा बाहर निकल जाएगी और उसमें केवल पानी रह जाएगा, बिल्कुल भी हवा नहीं रहेगी।” विद्यार्थियों ने इस अनुभव को साझा करके चर्चा का समापन किया कि उन्होंने कक्षा में क्या-क्या किया, क्या देखा और क्या सीखा।
बॉक्स-1 : पाठ्यचर्या से सम्बन्ध
इस तरह की गतिविधियाँ और उनसे जुड़ी चर्चा निम्नलिखित शैक्षिक उद्देश्यों को पूरा करने में मदद कर सकती हैं :
- मिडिल स्टेज की विज्ञान शिक्षा के पाठ्यक्रम लक्ष्य :
- CG-1 : [विद्यार्थी] पदार्थ की दुनिया, उसके घटकों, गुणों तथा व्यवहार की जाँच-पड़ताल करता है। ख़ासतौर से इस गतिविधि से विद्यार्थियों में निम्नलिखित क्षमता को विकसित करने में मदद मिलेगी (C-1.2) : “पदार्थ में होने वाले बदलावों (भौतिक और रासायनिक) का वर्णन करना और पदार्थ की कणिकीय प्रकृति का उपयोग करके पदार्थ के गुणों और बदलावों को निरूपण करना।”
- CG-6 : [विद्यार्थी] विज्ञान के ज्ञान के उद्विकास और वैज्ञानिक अध्ययन के साथ जूझकर विज्ञान की प्रकृति और प्रक्रिया पर खोजबीन करता है। ख़ासतौर पर यह विद्यार्थियों में निम्नलिखित क्षमता को विकसित करने में मदद कर सकता है (C-6.2) : “वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग करके प्रश्न बनाना और (प्राकृतिक पर्यावरण के अवलोकन, सरल प्रयोगों का डिज़ायन करके या छोटे वैज्ञानिक उपकरणों के ज़रिए) साक्ष्य के तौर पर डेटा जुटाना।”8
- मिडिल स्टेज की विज्ञान शिक्षा के लिए अपेक्षाएँ : विद्यार्थियों से अपेक्षा है कि वे विज्ञान के प्रक्रिया-सम्बन्धी कौशल विकसित करें। इनमें शामिल हैं : अवलोकन करना, प्रश्न पूछना, जानकारी के विभिन्न स्रोत खोजना, परीक्षणों की योजनाएँ बनाना, परिकल्पना तैयार करना और जाँचना, आँकड़ों के संग्रहण, विश्लेषण व व्याख्या करने के लिए अलग-अलग टूल्स का इस्तेमाल करना, व्याख्या को साक्ष्यों के आधार पर प्रबलन देना, आलोचनात्मक रूप से सोचकर अलग-अलग व्याख्याओं को परखना व उनका मूल्यांकन करना और अपने विचारों पर मन्थन करना।9
- मिडिल स्टेज की विज्ञान शिक्षा के प्रतिफल :
- सरल तहकीकात करके सवालों के जवाब खोजना।
- प्रक्रियाओं और परिघटनाओं को उनके कारणों से जोड़ना।
- प्रक्रियाओं और घटनाओं को समझाना।
- वैज्ञानिक अवधारणाओं के सीखने को दैनिक जीवन में लागू करना।
- डिज़ाइन बनाने, योजना तैयार करने, उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करने आदि में रचनात्मकता दिखाना।9
चलते-चलते
बच्चों को जब स्वयं प्रयोग करने और खोज-बीन के ज़रिए सीखने का अवसर दिया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक प्रक्रिया से परिचित होना सम्भव हो जाता है (देखें गतिविधि शीट और शिक्षक मार्गदर्शिका)। मैंने देखा कि बच्चे किसी परिघटना की पड़ताल करते समय इतने मनोयोग से जुट जाते हैं कि वे मेरे द्वारा दिखाई गई किसी गतिविधि या प्रयोग में अकसर बदलाव कर देते हैं या उसके आधार पर नई गतिविधियाँ भी गढ़ लेते हैं। जब मैंने योगिता द्वारा किए गए बदलाव को अन्य स्कूलों के बच्चों के साथ साझा किया, तो उन्हें इससे नए तरह के परिवर्तनों की प्रेरणा मिली। उदाहरण के लिए, एक स्कूल में एक विद्यार्थी ने उलटे गिलास में पेन्सिल फँसाकर यह प्रयोग किया। दूसरे स्कूल में कुछ विद्यार्थियों ने गिलास के भीतरी तले पर एक काग़ज़ चिपका दिया। योगिता की तरह इन विद्यार्थियों ने भी पाया कि जब उलटे गिलास को पानी में डुबोया गया और उसे उर्ध्वाधर ही रखा गया, तो पेन्सिल और काग़ज़ सूखे ही रहे। इससे उनकी इस धारणा को पुष्टि मिली कि ख़ाली दिखाई देने वाले गिलास में हवा वास्तव में उपस्थित है। वह अपने इस निष्कर्ष के बारे में ज़्यादा आश्वस्त थे, क्योंकि यह उनकी अपनी बनाई हुई गतिविधि और प्रत्यक्ष अवलोकन से निकला था (देखें बॉक्स-1)।
यदि विद्यार्थियों को विज्ञान की कक्षा में इस तरह की प्रक्रिया को आज़माने के अवसर लगातार दिए जाएँ, तो वे पाठ्यपुस्तक में दिए गए तथ्यों की सत्यता स्वयं परखने का कौशल हासिल कर लेंगे, अपने अवलोकनों से तार्किक निष्कर्ष निकालते हुए परिघटनाओं के बारे में ख़ुद का ज्ञान विकसित करेंगे। इस तरह के अनुभव आगे चलकर उन्हें ऐसे ज़िम्मेदार नागरिक बनने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं, जिनमें ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवता और खोज-बीन व सुधार की भावना’ जैसे गुण हों। ये हमारे संविधान के अनुच्छेद 51A (h) में नागरिकों के मौलिक गुणों के रूप में शामिल हैं।10
मुख्य बिन्दु
- प्रिपरेटरी स्टेज के ईवीएस पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों को ठोस, द्रव तथा गैसों के बीच के अन्तर से परिचित करवाया जाता है और मिडिल स्टेज के विज्ञान पाठ्यक्रमों में पदार्थ की अवधारणा तथा उसके गुणों से। लेकिन विद्यार्थी शायद इन अवधारणाओं को हवा से जोड़कर नहीं देखें।
- ऐसे सवाल पूछना, जो विद्यार्थियों को हवा से जुड़े उनके रोज़मर्रा के अनुभवों को साझा करने और उनकी पड़ताल करने के लिए प्रेरित करने, उन्हें अपनी इन्द्रियों द्वारा महसूस की गई हवा की विशेषताओं को पाठ्यपुस्तक में वर्णित पदार्थ सम्बन्धी अवधारणाओं से जोड़ने में सहायक हो सकते हैं।
- विद्यार्थियों को ख़ुद से करके देखने वाली गतिविधि से खाली गिलास में हवा की मौजूदगी की जाँच में शामिल करना, उन्हें तथ्य को स्वयं परखने और उसे स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है।
टिप्पणियाँ
- Credits for the image (Metal tumblers) used in the background of the article title: FullyFunctnlPhil. URL: https://www.flickr.com/ photos/83626281@N00/5085420947/. License: CC BY-NC-SA 2.0 Generic Deed.
- लेख में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्रकाशित कक्षा-6 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक ‘जिज्ञासा’ के विभिन्न अध्यायों से उद्धरण साभार लिए गए हैं। कक्षा-3 की पर्यावरण अध्ययन पाठ्यपुस्तक से भी एक उद्धरण लिया गया है। कक्षा-8 की अँग्रेजी माध्यम की विज्ञान पाठ्यपुस्तक के विभिन्न अध्यायों से भी उद्धरण साभार लिए गए हैं और उन्हें हिन्दी में अनूदित किया गया है।
- सम्पादक अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन के अमोल आनन्दराव काटे और शिव पाण्डेय का इस लेख का ड्राफ्ट साझा करने के लिए आभार व्यक्त करते हैं। हम मूल हिन्दी ड्राफ्ट का अँग्रेज़ी अनुवाद साझा करने के लिए अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के राजेश उत्साही का भी आभार व्यक्त करते हैं।
- इस लेख के साथ अलग किए जा सकने वाले दो संसाधन हैं : गतिविधि शीट : क्या एक गिलास सचमुच पदार्थ विहीन होता है? और शिक्षक मार्गदर्शिका : विज्ञान की कक्षा में खोज-बीन आधारित पद्धति का उपयोग।
- लेख के हिन्दी अनुवाद की समीक्षा के लिए हम हृदय कान्त दीवान के आभारी हैं।
सन्दर्भ
- राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (पुनर्मुद्रण 2025-2026)। ‘अध्याय-6 : हमारे आस-पास की सामग्री’। जिज्ञासा, कक्षा-6 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक : 99-118. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?fecu1=6-12.
- राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (पुनर्मुद्रण 2025-2026)। ‘अध्याय-11 : प्रकृति की अमूल्य सम्पदा’। जिज्ञासा,कक्षा-6 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक : 201-224. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?fecu1=11-12.
- National Council of Educational Research and Training (2025). ‘Chapter 6: Pressure, Winds, Storms, and Cyclones’. Curiosity, Textbook of Science for Grade VIII: 80-97. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?hecu1=6-12.
- राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (पुनर्मुद्रण 2025-2026). ‘अध्याय-10 : वस्तुओं की दुनिया’। हमारा अद्भुत संसार , कक्षा-3 की पर्यावरण विज्ञान पाठ्यपुस्तक : 124-134. URL: https://ncert.nic.in/textbook/pdf/ceev110.pdf.
- National Council of Educational Research and Training (2025-2026). ‘Chapter 8: Nature of Matter: Elements, Compounds, and Mixtures’. Curiosity, Textbook of Science for Grade VIII: 117. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?hecu1=8-13.
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