मॉडल निर्माण का शिक्षणशास्त्र : पिनहोल कैमरा

अनुवाद : हिमालय तहसीन | पुनरीक्षण : उमा सुधीर | कॉपी एडि‍टर : प्रतिका गुप्‍ता

जब बच्चे ख़ुद से सरल वैज्ञानिक उपकरणों के मॉडल बनाते हैं तो वे क्या-क्या सीखते हैं? क्या बच्चों द्वारा मॉडल निर्माण के अनुभवों को उनमें अधिक गहराई से खोजबीन करने और उस पर चर्चा हेतु प्रोत्साहित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है? इस प्रक्रिया में शिक्षक की क्या भूमिका होगी?

कक्षा में विद्यार्थियों को वैज्ञानिक उपकरणों के सरल मॉडलों का ख़ुद से ‘निर्माण’ करने के लिए आमंत्रित करने के कई फ़ायदे हैं। इन मॉडलों को बनाते हुए, और यह विश्लेषण करते हुए कि ये क्यों और कैसे काम करते हैं, विद्यार्थियों को एक वैज्ञानिक की तरह सोच–विचार करने का मौक़ा मिलता है। इन मॉडलों को बनाने के लिए सस्ती, बच्चों के परिवेश मेँ आसानी से मिलने वाली सामग्री का इस्तेमाल करने से विद्यार्थियों की रचनात्मकता को बढ़ावा मिलता है। साथ ही उनमें, अपने मॉडल मेँ बार-बार सुधार कर पाने और असफलताओं से सीखने की क्षमताएँ बेहतर होती हैं। विज्ञान के किसी मॉडल के अलग-अलग घटकों के काम को समझने एवं विभिन्न परिवर्तनशील कारकों को नियंत्रित करने की गतिविधियाँ करने पर विद्यार्थी उस मॉडल से जुड़ी वैज्ञानिक अवधारणाओं की गहराई से समझ बना पाते हैं। मॉडल निर्माण करने के अनुभव से विद्यार्थियों को विज्ञान के कई महत्त्वपूर्ण कौशल विकसित करने में भी मदद मिल सकती है। जैसे कि किसी मॉडल की डिज़ाइन में तब्दीली करने या उसके किसी घटक के कार्य को समझने या उसकी कार्यक्षमता बढ़ाने हेतु उसे किसी और चीज से प्रतिस्थापित करने की क्षमता, विभिन्न परिवर्तनशील कारकों के बीच परस्पर सम्बन्धों एवं कारण-एवं-प्रभाव को समझने की क्षमता और अपने निष्कर्षों की सीमाओं की पहचान कर पाने की क्षमता आदि। मॉडल निर्माण के ऐसे अनुभव से हासिल, अवधारणात्मक समझ और कौशल को विद्यार्थी ज़्यादा लम्बे समय तक याद रखते हैं। इस तरह के मौक़े नियमित रूप से मिलते रहें तो ये विद्यार्थियों को ख़ुद से सीखने वाले स्वतंत्र शिक्षार्थी के रूप में विकसित होने में मदद कर सकते हैं।

कक्षा में मॉडल निर्माण करने के ऐसे अनुभवों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ही माध्यमिक स्तर की विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में पाठ्यचर्या में शामिल विभिन्न अवधारणाओं की पुख़्ता समझ बनाने हेतु सम्‍बन्धित उपकरणों के साथ प्रयोगों और मॉडलों के निर्माण के लिए चरण-दर-चरण प्रक्रियाएँ दी गई हैं। शिक्षक अकसर अपने विद्यार्थियों से अपेक्षा करते हैं कि वे इन प्रक्रियाओं को ख़ुद पढ़ेंगे, समझेंगे और उनका जहाँ तक हो सके सटीक रूप से पालन करते हुए मॉडल निर्माण करेंगे। विद्यार्थी इस तरह के बँधे-बँधाए दोहराव से कुछ तकनीकी दक्षता और वैचारिक समझ तो विकसित कर सकते हैं पर उन्हें अपनी रचनात्मक और समालोचनात्मक सोच के कौशल का इस्तेमाल करने और उसे विकसित करने का मौक़ा भी मिलना चाहिए। विज्ञान की कक्षा में मॉडल निर्माण के अनुभव को अधिक असरदार बनाने के लिए शिक्षकों को चाहिए कि :

  • विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तक में मॉडल निर्माण हेतु दी गई प्रक्रियाओं, सामग्री एवं चरणों को अपनी रचनात्मक सोच का इस्तेमाल करके अपने आस-पास उपलब्‍ध उचित सामग्री द्वारा बदलने एवं बनाने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • विद्यार्थियों को उनके मॉडलों के साथ खेलने और ख़ुद से इसे काम में लेने दें जिससे कि वे अपने अवलोकनों को आधार बनाकर उनकी कार्य प्रणाली एवं वैज्ञानिक सिद्धान्तों को समझ पाएँ।
  • विद्यार्थियों ने क्या देखा-समझा और क्या निष्कर्ष निकाले, इसकी परख करते हुए सवाल पूछें ताकि उन्हें पुनः सोचने एवं नई खोजबीन की ओर ले जाया जा सके।

पाठ्यपुस्तकों में मॉडल निर्माण हेतु दी हुई कुछ प्रक्रियाएँ काफ़ी जटिल हो सकती हैं क्योंकि इनमें कई चरण और सावधानियाँ शामिल होती हैं। ऐसे में, विद्यार्थियों को अपने शिक्षकों से हर एक चरण में मार्गदर्शन और मदद की ज़रूरत पड़ती है। अगर शिक्षक ख़ुद भी दी गई प्रक्रिया के मुताबिक़ काम करने की कोशिश करें, तो इसमें इतना समय, ऊर्जा और ध्यान लग सकता है कि वे विद्यार्थियों को मॉडल के अलग-अलग घटकों को हेर-फेर करके देखने और परिवर्तनकारी कारकों में बदलाव करते हुए प्रयोग करने के मौक़े ही नहीं दे पाएँगे। सृजनशील विज्ञान शिक्षक, मॉडल बनाने की प्रक्रिया और सामग्री की ज़रूरतों को सरल बनाकर इस समस्या का समाधान कर सकते हैं और अपने विद्यार्थियों का ध्यान शिक्षण योजना के सीखने–सिखाने के उद्देश्यों पर वापस ला सकते हैं। इसकी एक मिसाल कक्षा-6 की पाठ्यचर्या में ‘पिनहोल कैमरा’ बनाने की प्रक्रिया में देखी जा सकती है (बॉक्स-1 देखें)।

बॉक्स-1 : कक्षा-6 की पाठ्यचर्या में पिनहोल कैमरे

पिनहोल कैमरा, प्रकाश और दृष्टि से सम्बन्धित (optical—ऑप्टिकल) उपकरण है, जो दर्पण या लैंस का इस्तेमाल किए बिना छवि बनाता है। अपने सबसे आम रूप में यह ऐसा खोखला बॉक्स होता है जिसमें प्रकाश नहीं जा सकता है, इसके एक तरफ़ छोटा एपर्चर (पिनहोल) और दूसरी तरफ़ एक पारभासी (translucent) परदा होता है। जब विद्यार्थी बॉक्स के एपर्चर वाले हिस्से को किसी प्रकाशित चीज़ की तरफ़ करते हैं, तो उन्हें परदे पर उस चीज़ की वास्तविक लेकिन उलटी छवि बनी दिखाई देती है (चित्र-1 देखें)।1 पिनहोल कैमरे का निर्माण कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2023-2024) के अध्याय 8 (प्रकाश, छाया और प्रतिबिम्ब) में शामिल है।2 यह अध्याय पारदर्शी माध्यम में प्रकाश के सीधी रेखा में यात्रा करने के गुण के बारे में है। इसे ‘प्रकाश का सरलरेखीय प्रसार’ (rectilinear propagation of light) कहा जाता है। इस गुण का इस्तेमाल करते हुए वास्तविक दुनिया की कई घटनाओं, जैसे ग्रहण और छाया बनने, को समझाया जा सकता है। इसे अब कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय 11 (प्रकाश) में दिया गया है।3

The Pedagogy fig-1
चित्र-1 : पिनहोल कैमरे का सिद्धान्त। प्रकाशित वस्‍तु से रोशनी एक छोटे छेद के ज़रिए, एक अँधेरे बॉक्स में दाख़िल होती है और छेद के सामने लगे परदे पर उस वस्‍तु का वास्तविक, उलटा और छोटा प्रतिबिम्ब बनाती है। Credits: en:User:DrBob (original); en:User:Pbroks13 (redraw), Wikimedia Commons. URL: https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Pinhole-camera.svg. License: Public Domain.

हालाँकि इस गुण को अकसर ऐसे तथ्य के रूप में पढ़ाया जाता है जिसे विद्यार्थियों को याद कर लेना चाहिए, फिर भी ‘शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ (एनसीएफ़-एसई—NCF-SE) 2023 की सिफ़ारिश है कि : ‘‘…प्रकाश के सरल रेखीय प्रसार को बताना भर काफ़ी नहीं है… प्रकाश के सरलरेखीय प्रसार के उदाहरण को आगे ले जाते हुए, विद्यार्थी इसे मोमबत्ती के सामने छोटे छेदों वाली कार्डबोर्ड शीट में मामूली बदलावों के ज़रिए, या कक्षा में बनाए पिनहोल कैमरा/पेरिस्कोप का इस्तेमाल करके देख सकते हैं।’’4,5 कक्षा-7 में विज्ञान का इससे जुड़ा हुआ अधिगम का प्रतिफल इस प्रकार है : ‘‘विद्यार्थी अपने आस-पास की सामग्रियों का इस्तेमाल करके मॉडलों को बनाते हैं और उनके काम करने के तरीक़े को समझाते हैं, जैसे कि पिनहोल कैमरा, पेरिस्कोप, इलैक्ट्रिक टॉर्च आदि।”6

पिनहोल कैमरा बनाना

मैंने उधम सिंह नगर के एक राजकीय उच्च प्राथमिक स्कूल में कक्षा-6 के विद्यार्थियों से अपने ख़ुद के पिनहोल कैमरा बनवाने और उनमें प्रायोगिक बदलाव करने के लिए उनके साथ काम किया (देखें गतिविधि शीट : अपना पिनहोल कैमरा बनाएँ)। मैंने जिन शिक्षण प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया, वह इस प्रकार हैं :

चरण 1 : मैंने गतिविधि की शुरुआत विद्यार्थियों को एक पिनहोल कैमरा दिखाकर की। इसे मैंने काग़ज़ के एक डिस्पोज़ेबल कप और बटर पेपर के एक छोटे-से टुकड़े का इस्तेमाल करके बनाया था। बटर पेपर सिर्फ़ इतना बड़ा था कि कप के खुले सिरे को ढँक पाए। मैंने कप के बन्द सिरे यानी कि उसकी पेंदी में पिन से एक बारीक छेद किया, जिससे कि किसी प्रकाश स्रोत से आता प्रकाश इस छेद से कप में दाख़िल हो पाए। बटर पेपर एक परदे की तरह काम करता था जिस पर उस प्रकाश स्रोत की छवि बनती थी। मैंने यह कैमरा विद्यार्थियों को दिया और यह देखने के लिए प्रोत्साहित किया कि क्या वे इसे बनाने के लिए ज़रूरी सामग्रियों की पहचान कर सकते हैं। जब उन्होंने सभी सामग्रियों के नाम बता दिए जिन्हें वे देख पा रहे थे तब मैंने एक मोमबत्ती जलाई, कैमरे की पिनहोल वाली सतह को लौ की ओर घुमाया, और विद्यार्थियों से कैमरे के परदे को देखने के लिए कहा। विद्यार्थियों ने कहा कि उन्हें मोमबत्ती की लौ की उलटी छवि पर्दे पर दिखाई दे रही है। फिर मैंने कैमरे के घटकों, जैसे बटर पेपर और कप को अलग-अलग किया और विद्यार्थियों को इसका हर हिस्सा दिखाया। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को यह समझाना था कि पिन होल कैमरे में प्रकाश को छनकर आने के लिए पिनहोल वाली किसी भी अपारदर्शी (opaque) सतह का इस्तेमाल किया जा सकता है, और किसी प्रकाशित वस्तु की छवि को प्रक्षेपित करने के लिए किसी भी पारभासी (translucent) सतह का परदे की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

चरण 2 : जब विद्यार्थियों ने ख़ुद के कैमरे बनाने की इच्छा जताई, तो मैंने उन्हें शिक्षक की मेज़ पर रखे बॉक्स से इसे बनाने की सामग्री लेने के लिए बुलाया। बॉक्स में काग़ज़ के कप, कटर, बटर पेपर के टुकड़े, गोंद, टेप आदि रखे थे। जब विद्यार्थी इन सामग्रियों के साथ अपनी-अपनी बेंच-डेस्क पर लौटे, और अपने मॉडल के पुर्ज़े जोड़ना शुरू किया, तो मैं कक्षा में घूमकर उनके काम को देखने लगा।

कई विद्यार्थियों को बटर पेपर को कप के खुले सिरे पर चिपकाना मुश्किल लग रहा था क्योंकि ऐसा करते समय बटर पेपर में या तो सलवटें रह जाती थीं, या वह फट जाता था। ऐसी स्थिति में मैंने उन्हें किसी दोस्त से इसे अच्छे से चिपकाने में मदद माँगने का सुझाव दिया। कुछ विद्यार्थियों ने सबसे पहले, बटर पेपर को कप पर लगाने के लिए रबरबैण्ड का इस्तेमाल किया। लेकिन हमने देखा कि परदे को इस तरह से लगाने के बाद, बार-बार इस्तेमाल होने पर उसमें सलवटें आ जाती हैं। तब मैंने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे बटर पेपर के टुकड़े के किनारों पर गोंद का इस्तेमाल करके इसे कप के मुँह पर अच्छे से चिपका दें। जब कक्षा के सभी विद्यार्थियों ने अपने-अपने कैमरे बना लिए तो मैंने उन्हें यह जाँचने के लिए कहा कि क्या उनके मॉडल काम करते हैं। मैंने शिक्षक की मेज़ पर एक मोमबत्ती जलाई। एक-एक करके विद्यार्थी अपने कैमरे मेज़ तक लाए और उसके परदे पर बनी छवि को देखा।

ज़्यादा गहराई से खोजबीन और चर्चा के लिए हौसला बढ़ाना

विद्यार्थियों के बनाए कैमरों में से जिन शुरुआती कैमरों को परखा गया, उनमें से एक ने धुँधली छवि बनाई। जिस विद्यार्थी ने इसे बनाया था, उसने किसी निर्देश के बिना ही मोमबत्ती से अपने कैमरे की दूरी को बदलना शुरू कर दिया — वह कैमरे को पहले लौ के थोड़ा क़रीब लाया, फिर थोड़ा दूर ले गया। इस प्रक्रिया के माध्यम से मामूली समायोजन के ज़रिए विद्यार्थी ने उस दूरी का पता लगाना सीख लिया, जिस पर उसकी छवि सबसे साफ़ (sharp) बन पा रही थी। एक अन्य विद्यार्थी ने इस खोजबीन में पाया कि कैमरे और लौ के बीच की दूरी बदलने से छवि का आकार भी बदल रहा है। फिर तो बाक़ी सभी विद्यार्थियों ने भी फ़ोकस करने की इस गतिविधि को अपने-अपने कैमरों से आज़माया। इन प्रयोगों के ज़रिए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि कैमरे का छेद यानी एपर्चर (aperture) किसी प्रकाशित चीज़ के जितना क़रीब होगा, परदे पर उस चीज़ की छवि उतनी ही साफ़ होगी।

कुछ विद्यार्थियों को अपने कैमरे से लौ की साफ़ छवि हासिल करने में दूसरों से ज़्यादा मुश्किल हुई। मैंने इन विद्यार्थियों से अपने सहपाठियों के कैमरों से अपने कैमरे की तुलना करने को कहा और पूछा कि क्या उन्हें अपने कैमरे की बनावट में कोई साफ़ फ़र्क़ दिख रहे हैं? हमने जो फ़र्क़ देखे, उनमें से एक फ़र्क़ उस छेद के आकार को लेकर था जिसके ज़रिए प्रकाश कैमरे के अन्दर आता है। कुछ विद्यार्थियों ने सुई के बजाय बॉलपॉइण्ट पेन की नोक से अपने कप के निचले हिस्से में बड़े आकार का छेद किया था। इससे विद्यार्थियों ने निष्कर्ष निकाला कि पिनहोल कैमरे में छेद का आकार जितना छोटा होगा, कैमरा उतनी ही साफ़ छवि बनाएगा। मेरा अगला सवाल था : अगर मैं उनके कैमरे की सतह पर बने बड़े छेद (जो बॉलपॉइण्ट पेन की नोक से बना था) के पास एक और छोटा छेद (पिन से) बनाऊँ तो मुझे परदे पर क्या दिखाई देगा? कुछ विद्यार्थियों ने इसे आज़माने का फ़ैसला किया और अपने कैमरे के परदे पर लौ की दो उलटी छवियाँ देखकर हैरान रह गए। इससे बाक़ी विद्यार्थियों की जिज्ञासा जगी, और उन्होंने फ़ौरन अपने-अपने कप के पेंदे में कई छेद करना शुरू कर दिया। इससे उनके कैमरे के पर्दों पर भी कई छवियाँ बनीं, और उन्होंने इन छवियों के बनने के पैटर्न और उनके अभिविन्यास की तुलना करते हुए कुछ बहुत ही रोमांचक लम्हे बिताए। विद्यार्थियों का ध्यान उनके कैमरे से बनी छवियों की स्पष्टता पर वापस लाने के लिए, मैंने पूछा कि क्या कमरे में अँधेरा करने से इसमें बदलाव आएगा। चूँकि विद्यार्थियों को यह साफ़ नहीं था कि इसका क्या असर होगा, तो इसको आज़माने के लिए मैंने उनका हौसला बढ़ाया। जब हमने खिड़कियाँ बन्द कीं और कक्षा में रोशनी करने वाले एक मात्र बल्ब को बन्द किया, तो उनके कैमरे के परदों पर छवियाँ पहले से बहुत ज़्यादा साफ़ हो गईं। जब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों हुआ, तो कुछ विद्यार्थियों का सोचना था कि कमरे में अँधेरा करने से कैमरे में दाख़िल होने वाली ज़्यादातर रोशनी लौ से ही आई होगी। मैंने याद दिलाया कि हमने तो कप के पेंदे और दीवारों को काला करके ऐसा पहले ही सुनिश्चित कर लिया था। कुछ चर्चा के बाद विद्यार्थियों ने निष्कर्ष निकाला कि परदे पर वस्तु के अतिरिक्त हमारे आस-पास की जितनी कम रोशनी आएगी, उस पर बनने वाली छवि उतनी ही साफ़ होगी।

मैंने विद्यार्थियों से पूछा कि क्या हम कैमरे की डिज़ाइन में ऐसा बदलाव कर सकते हैं जिससे आस-पास के वातावरण से परदे पर कम रोशनी पड़े। एक विद्यार्थी ने परदे को काला करने का सुझाव दिया। मैंने सहमति जताई कि इससे हमारा मक़सद पूरा हो जाएगा। लेकिन, फिर मैंने पूछा कि इससे परदे पर बनने वाली लौ की छवि पर क्या असर पड़ेगा? विद्यार्थी समझ नहीं पा रहे थे कि इस सवाल का जवाब कैसे दिया जाए। सवाल को आसान बनाने के लिए मैंने पूछा कि क्या वे बता सकते हैं कि हम परदे के लिए बटर पेपर का इस्तेमाल क्यों कर रहे थे। क्या कैमरे के परदे को किसी दूसरी तरह की सामग्री से भी बनाया जा सकता है? जब इस पर भी चुप्पी रही, तो मैंने विद्यार्थियों से कोई दूसरी तरह की सामग्री सुझाने के लिए कहा जिसे हम परदे की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करके देखें। मेरी बस एक ही शर्त थी कि वह सामग्री सस्ती और आसानी से मिलने वाली होनी चाहिए। विद्यार्थियों ने अपने सुझाव देने शुरू किए और मैं उन्हें कक्षा के बोर्ड पर लिखता गया। बच्चों ने बताया — तैलीय काग़ज़ (oiled paper), सादा सफ़ेद काग़ज़, कपड़ा और पॉलिथीन। मैंने इस सूची में काला किया हुआ काग़ज़ भी जोड़ा और सभी विद्यार्थियों को इनमें से हर विकल्प को आज़माने के लिए कहा। समूहों में काम करते हुए विद्यार्थियों ने कैमरे के पाँच अलग-अलग मॉडल बनाए। इन सभी मॉडलों को परखने पर उन्होंने पाया कि लौ की छवियाँ बटर पेपर और तैलीय काग़ज़ से बने परदे पर दिखाई दे रही थीं, लेकिन पॉलिथीन, सफ़ेद काग़ज़ और काले किए हुए तैलीय काग़ज़ से बने परदे पर नहीं दिख रही थीं। मैंने पूछा कि क्या वे जो देख रहे हैं उसे समझा सकते हैं। कुछ चर्चा के बाद विद्यार्थियों की राय बनी कि काले या अपारदर्शी परदे (जैसे कि जो सफ़ेद काग़ज़ से बना हुआ था) मोमबत्ती से रोशनी को हमारी आँखों तक पहुँचने से रोकते हैं। इसके विपरीत, पारदर्शी परदा (जैसे कि जो पॉलिथीन से बना था) पूरी रोशनी को अपने आर-पार गुज़र जाने देता है, जिससे लौ की छवि बन ही नहीं पाती है।

मैं चर्चा को फिर से उसी सवाल पर लाया, जिससे शुरुआत की थी : क्या हम कैमरे की डिज़ाइन में ऐसा बदलाव कर सकते हैं जिससे आस-पास के वातावरण से परदे पर कम रोशनी पड़े? एक विद्यार्थी ने परदे को काग़ज़ से बने गोल घेरे की आड़ देकर या ऐसी ही किसी चीज़ से ढँकने का सुझाव दिया। बाक़ी विद्यार्थियों ने कहा कि ऐसी आड़ आस-पास की रोशनी को कम करने में मददगार हो सकती है, लेकिन यह परदे पर छवि को देखने में भी बाधा बनेगी। एक अन्य विद्यार्थी ने काले चार्ट पेपर की एक पट्टी को एक खोखले पाइप जैसी संरचना में रोल किया और पूछा कि क्या हम इसका इस्तेमाल परदे पर बनी छवि को देखने के लिए कर सकते हैं। एक तीसरे विद्यार्थी ने एक अन्य बदलाव के साथ काग़ज़ की आड़ का समर्थन किया और सुझाया कि हम परदे के चारों तरफ़ काग़ज़ की आड़ बनाकर उसमें एक छोटी खिड़की काट दें जिसके ज़रिए परदे को देख पाएँ। इन दोनों तब्दीलियों पर चर्चा हुई और इन्हें मिलाकर काम करने का फ़ैसला लिया गया। इसके लिए हमने एक अन्य काग़ज़ के कप की बाहरी सतह को काला कर दिया और उसके पेंदे से काग़ज़ का एक छोटा टुकड़ा काट दिया और एक छोटी खिड़की बना दी। अब इस कप के मुँह को पिनहोल कैमरे के मुँह से चिपका दिया गया (चित्र-2 देखें)। जब विद्यार्थियों ने नए मॉडल को परखा, तो उन्होंने देखा कि कमरे में अँधेरा किए बिना भी इस कैमरे से बनाई गई छवि उतनी ही साफ़ थी जितनी कि पुराने मॉडल के कैमरे से अँधेरे कमरे में बनाई गई छवि थी। सत्र के अन्त में मैंने विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया कि वे अपने कैमरे घर ले जाएँ और अलग-अलग प्रकाशित चीज़ों, जैसे पेड़, जानवर, लोग, चाँद आदि की छवियों को देखने के लिए इनका इस्तेमाल करें।

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चित्र-2 : पिनहोल कैमरे की डिज़ायन में बदलाव करते हुए बच्‍चे। नोट : यह फ़ोटो एक वास्तविक कक्षा का है और उसे यहाँ फ़ोटो में दिख रहे बच्चों के अभिभावकों की अनुमति से प्रकाशित किया गया है। बच्चों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए सामने की ओर देख रहे बच्चों का चेहरा धुँधला कर दिया गया है। इस फोटो के पुनः उपयोग के विवरण के लिए कृपया यहाँ ‘इमेज और मीडिया उपयोग’ देखें। Credits: Shiv Pandey. License: CC BY-NC-ND 4.0.

चलते-चलते

मॉडल निर्माण के अनुभव विद्यार्थियों को विज्ञान की प्रक्रियाओं को करते हुए सीखने का मौक़ा देते हैं। मिसाल के तौर पर, शिक्षक चाहें तो विद्यार्थियों के अवलोकनों और पिनहोल कैमरा बनाने के अनुभवों को पाठ्यपुस्तक में शामिल कई महत्वपूर्ण अवधारणाओं जैसे कि प्रकाश के सरलरेखीय प्रसार (rectilinear propagation), वस्तुओं में से प्रकाश के गुज़रने की मात्रा के हिसाब से उनका पारदर्शी (transparent), पारभासी (translucent) और अपारदर्शी (opaque) में वर्गीकरण, विभिन्न प्रकार के कैमरों द्वारा प्रतिबिम्‍ब के बनने की क्रियाविधि और इन प्रतिबिम्‍बों के गुण के बारे में चर्चा कर सकते हैं। लेकिन ऐसा करने के लिए विद्यार्थियों को स्कूली पाठ्यपुस्तक में दी गई जटिल प्रक्रियाओं को यंत्रवत अनुसरण करने के लिए कहना पर्याप्त नहीं होगा। इसके बजाय, शिक्षकों को अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल करके जहाँ तक हो सके कम और सस्ती सामग्री के साथ ऐसे सरल मॉडल बनवाने होंगे, जिन्‍हें विद्यार्थी शिक्षक की बहुत अधिक मदद या मार्गदर्शन के बिना ख़ुद ही पुर्ज़ा-पुर्ज़ा अलग करके देख सकते हों और फिर से उसे जोड़कर बना सकते हों। शिक्षक ऐसे सवाल पूछने में भी अहम भूमिका अदा कर सकते हैं जिनसे इन मॉडलों की सामग्री, निर्माण और कार्यप्रणाली के साथ कुछ मौलिक प्रयोग करने के लिए विद्यार्थियों का हौसला बढ़ता हो। इससे विद्यार्थियों को विश्लेषणात्मक, तार्किक और समालोचनात्मक रूप से सोचने का कौशल विकसित करने का मौक़ा मिलेगा। मॉडल निर्माण करने के ऐसे अनुभव विद्यार्थियों को पाठ्यचर्या में शामिल वैज्ञानिक अवधारणाओं के साथ जुड़ाव बनाने से कहीं आगे जाकर, अपनी रचनात्मकता और जिज्ञासा के ज़रिए विज्ञान की प्रक्रिया से जुड़ने में मदद कर सकते हैं।

मुख्‍य बिन्‍दु

मॉडल निर्माण का शिक्षणशास्त्र : पिनहोल कैमरा
  • वैज्ञानिक उपकरणों के सरल मॉडल बनाने से विद्यार्थियों को वैज्ञानिक प्रक्रिया से जुड़ने, विज्ञान के कौशल विकसित करने और इन उपकरणों से जुड़ी वैज्ञानिक अवधारणाओं के ज्ञान को लम्बे वक़्त तक याद रखने में मदद मिलती है।
  • जब मॉडल बनाने के लिए पाठ्यपुस्तक में दी गई प्रक्रियाएँ जटिल और लम्बी हों, जैसे कि पिनहोल कैमरे को बनाना, तो शिक्षकों को ऐसी प्रक्रियाएँ अपनाने की ज़रूरत पड़ सकती है जिनमें कम चरण हों और उनमें ज़्यादा आसानी से मिलने वाली और सस्ती सामग्री का इस्तेमाल होता हो।
  • विद्यार्थियों को किसी कार्यकारी मॉडल को खोलने, उसके पुर्ज़ों को देखने-समझने, अपने ख़ुद के मॉडल बनाने एवं उनको परखने, और अलग-अलग मानदण्डों के साथ तरह-तरह से प्रयोग करते हुए अपने मॉडल के डिज़ाइन को परिष्कृत करने का मौक़ा देने से उनमें विश्लेषणात्मक, तार्किक और समालोचनात्मक रूप से सोचने का कौशल विकसित करने में मदद मिल सकती है।
  • शिक्षकों के लिए विद्यार्थियों से मॉडल के काम करने के तौर-तरीक़ों के पीछे के सिद्धान्‍तों के बारे में सवाल पूछना भी महत्त्वपूर्ण है। इससे विद्यार्थियों में ज़्यादा गहराई से पड़ताल करने, सोच-विचार करने और चर्चा करने का हौसला बढ़ता है।
  • मॉडल निर्माण करने के ऐसे अनुभव विद्यार्थियों को पाठ्यचर्या में शामिल अवधारणाओं के साथ जुड़ाव बनाने से आगे बढ़कर, अपनी रचनात्मकता और जिज्ञासा के ज़रिए विज्ञान की प्रक्रिया से जुड़ने में मदद कर सकते हैं।

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  • लेख के शीर्षक की पृष्ठभूमि में इस्तेमाल की गई छवि का स्रोत : Pinhole Leaves, Shelly, Flickr. URL: https://www.flickr.com/photos/cat-sidh/36580062351/. License: CC BY-NC-SA 2.0 Generic Deed.
  • पिनहोल कैमरों के कई डिज़ाइन इस तरह के हैं, जिनका इस्तेमाल सूरज या ग्रहण की ऐसी छवि को प्रक्षेपित करने के लिए किया जा सकता है जिसे देखना सुरक्षित हो। क्योंकि उनकी बनावट और इस्तेमाल इस प्रकार का है कि देखने वाले अपनी पीठ सूरज की तरफ़ रख सकते हैं। हालाँकि, इस लेख में बताए गए डिज़ाइन में देखने वालों को सूरज का सामना करना होगा और पिनहोल कैमरे के ज़रिए सूरज को देखना होगा। यह उनकी आँखों को नुक़सान पहुँचा सकता है। विद्यार्थियों के साथ इस पर चर्चा करना और उन्हें याद दिलाना ज़रूरी है कि वे कभी भी सूरज को सीधे न देखें या किसी ऐसे उपकरण से भी नहीं देखें जो विशेष रूप से इस उद्देश्य के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया है। इस हक़ीक़त को भी ज़ोर देकर समझाना ज़रूरी है कि धूप का चश्मा, दूरबीन, टैलीस्कोप और पिनहोल कैमरे का यह डिज़ाइन सूरज से ज़रूरी सुरक्षा नहीं देते हैं। आप अपने विद्यार्थियों से पूछ सकते हैं कि वे इस लेख में बताई गई डिज़ाइन को किस तरह से बदलेंगे जिससे सूरज को सुरक्षित रूप से देखा जा सके।
  • इस लेख में कक्षा में इस्तेमाल करने योग्य संसाधन शामिल है, जिसे लेख से अलग किया जा सकता है : गतिविधि शीट 1 : अपना पिनहोल कैमरा बनाएँ।

सन्दर्भ

  1. Khan Academy Labs. ‘What is a pinhole camera? | Virtual Cameras | Computer animation | Khan Academy’. YouTube. Uploaded on: Apr 13, 2019. URL: https://www.youtube.com/watch?v=jhBC39xZVnw.
  2. National Council of Educational Research and Training (2006, 2022). ‘Chapter 8: Light, Shadows and Reflections’. Science Textbook for Class VI (Rationalised 2023-24): 86-94. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?fesc1=8-16.
  3. National Council of Educational Research and Training (2007, 2022). ‘Chapter 11: Light’. Science Textbook for Class VII (Reprint 2024-25): 123-141. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?gesc1=11-13.
  4. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks. ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.
  5. ThinkTac. ‘Light – Rectilinear Propagation | ThinkTac’. YouTube. Uploaded on Dec 30, 2020. URL: https://www.youtube.com/watch?v=3VlPtST5-HA.
  6. National Council of Educational Research and Training. ‘Learning Outcomes at the Elementary Stage’. First Edition. April 2017. National Council of Educational Research and Training, Sri Aurobindo Marg, New Delhi. ISBN 978-93-5007-785-6. URL: https://ncert.nic.in/pdf/publication/otherpublications/tilops101.pdf.