अनुभव करना कि चीज़ें कैसे काम करती हैं

अनुवाद : हिमालय तहसीन | पुनरीक्षण : सुशील जोशी | कॉपी एडिटर : प्रतिका गुप्ता

अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में बच्चे वस्तुओं के घूमने, तैरने और डूबने के कई उदाहरण देखते हैं। जब उन्हें कक्षा में ख़ुद करके सीखने वाली गतिविधियों के ज़रिए इन घटनाओं को समझने का मौक़ा मिलता है, तो वे कौन–सी वैज्ञानिक अवधारणाएँ और कौशल सीखते हैं?

कक्षा–4 की पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस) की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025–2026) की इकाई–4 में, ‘शिक्षक के लिए’ नोट में अध्याय–7 (‘वस्तुएँ कैसे कार्य करती हैं?’) यह बताता है कि “…विद्यार्थियों की अपने आस-पास की सामान्‍य घटनाओं का परीक्षण और अवलोकन करने की स्वाभाविक जिज्ञासा को बढ़ावा दिया जाए। इनमें वस्तुओं का घूमना (घूर्णन), तैरना और डूबना सम्मिलित है। वे खिलौनों, काग़ज़ों और दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली दूसरी वस्तुओं के साथ क्रियात्‍मक गतिविधियों के माध्‍यम से पैटर्न की खोज करेंगे। इससे उन्‍हें वस्‍तुओं के कार्य करने के तरीक़ों के बारे में जानने की उत्‍सुकता होगी।”1 यह हो पाए इसके लिए इस अध्याय में ख़ुद करने वाले कई सरल प्रयोग दिए गए हैं, जो इस प्रकार डिज़ाइन किए गए हैं कि वे “…विद्यार्थियों को यह समझने में सक्षम बनाएँगे कि विभिन्न स्थितियों में क्या होता है और वस्तुएँ कैसे कार्य करती हैं। इस प्रक्रिया में वे विभिन्न सामान्य पैटर्न खोजेंगे, जो उन्हें वस्तुओं के बारे में नई सीख देंगे। ये नई खोजें वस्तुओं में उनकी रुचि और जिज्ञासा को और बढ़ाएँगी…।1 इस पाठ्यपुस्तक में शिक्षकों को दिए गए मार्गदर्शन के बावजूद पर्यावरण अध्‍ययन की बाकी पाठ्यचर्या की तरह ही इस अध्याय को भी अकसर रटवाकर और पाठ्यपुस्तक की बातों के पुन:स्‍मरण का आकलन करने वाली वर्कशीटों के ज़रिए पढ़ाया जाता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा—फ़ाउण्‍डेशनल स्‍टेज (एनसीएफ़–एफ़एस) 2022 द्वारा अनुशंसित अनुभव-आधारित और बाल-केन्द्रित दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए मैंने एक चार दिवसीय ग्रीष्मकालीन शिविर की तैयारी की।2,3 मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के राहतगढ़ ब्लॉक के सरकारी स्कूलों की कक्षा–3 से 5 के चौंतीस विद्यार्थी इस शिविर में शामिल हुए। इसने विद्यार्थियों को एक बहुकक्षीय और बहुस्‍तरीय सीखने का माहौल दिया। तो आइए देखें कि मेरे इस तरीक़े से बच्चों ने क्या सीखा?

कौन–सी वस्तुएँ घूमती हैं?

कक्षा–4 की ईवीएस की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-2026) का अध्याय–7 घूमने (spinning) की खोज-बीन के कुछ विचारों से शुरू होता है।4 मैंने विद्यार्थियों से यह पूछते हुए इस पड़ताल की शुरुआत की : “क्या तुम कुछ ऐसी चीज़ों के नाम बता सकते हो जिन्हें घुमाया जा सकता हो?” पहले तो विद्यार्थी कुछ नहीं बोले। लेकिन जब मैंने चूड़ी जैसे उदाहरण दिए तो वे भी चकरी, गेंद, कड़ा, लट्टू और चकरीवाला झूला जैसे उदाहरण देने लगे। मैंने पाया कि कई विद्यार्थी घूमने वाली एक से ज़्यादा वस्तुओं के नाम नहीं बता पा रहे थे। फिर, मैंने विद्यार्थियों से कहा कि वे कक्षा और उसके आस-पास ऐसी वस्तुओं का पता लगाएँ और उनको इकट्ठा करें जो उनके मुताबिक़ घूम सकती हैं। विद्यार्थी इरेज़र, चूड़ियाँ, टेप और बोतल के ढक्कन जैसी चीज़ें लेकर आए। फिर हमने उनको घुमाया। मैंने विद्यार्थियों से कहा कि वे घूमती हुई वस्तुओं को ध्यान से देखें। वे कक्षा में जो कर रहे थे, और उन्होंने कक्षा के बाहर कहीं जो देखा था, उसमें मेल बिठाते हुए एक विद्यार्थी ने कहा, “मैम, टेप तो मटके की तरह घूम रही है!

अभ्यास के अगले हिस्से में मैंने विद्यार्थियों को गत्ते और टूथपिक का इस्तेमाल करके ख़ुद अपनी ‘फिरकनी’ (spinners) बनाने को कहा (बॉक्स–1 देखें)। उनकी फिरकनी तैयार होने के बाद मैंने उन्हें यह देखने को कहा कि उन्होंने अपने मॉडलों के लिए जो अलग-अलग आकृतियाँ चुनी हैं, उन पर घूमने का क्या असर होता है (चित्र–1 देखें)। जब एक अण्डाकार फिरकनी को घुमाया गया, तो शुरुआत में एक विद्यार्थी ने इसकी गति को केवल ‘घूमा’ (यह घूमा) कहकर वर्णित किया। जब वे इसे और ध्यान से देखने लगे तो उन्होंने पाया कि यह फिरकनी घूमते हुए पंखे जैसी दिखती थी, और घूमते वक़्त वृत्ताकार आकृति बनाती थी। वृत्ताकार फिरकनी पर विद्यार्थियों की कुछ ऐसी टिप्पणियाँ थीं :“यह गेंद की तरह घूम रही है” या “यह लट्टू जैसी है।” जब एक वर्गाकार फिरकनी को घुमाया गया, तो विद्यार्थियों ने पाया कि इसका आकार तो कोण वाला था, लेकिन घूमते वक़्त यह वृत्ताकार दिखाई देती थी। एक विद्यार्थी ने कहा कि उन्हें वर्ग के किनारे नहीं दिख रहे थे, जिससे यह पता चलता है कि किसी वस्‍तु का आकार क्‍या है इस बारे में हमारी धारणा को गति कैसे बदल सकती है। तारे के आकार की फिरकनी ने कई विद्यार्थियों का ध्यान खींचा। एक विद्यार्थी ने देखा, “जब यह तेज़ घूमती है तो इसका केन्द्रीय हिस्‍सा गोलाकार हो जाता है।” एक अन्य विद्यार्थी ने बताया कि वे घूमती हुई फिरकनी की भुजाओं की संख्या नहीं गिन पा रहे थे। तीसरे विद्यार्थी का कहना था, “यह पंखे जैसी दिखती है।” उनसे जब अपनी बात को विस्तार से समझाने के लिए कहा गया तो, उन्होंने बताया कि तेज़ी से घूमते वक़्त तारे के आकार की फिरकनी के किनारे धुँधले हो रहे थे या ग़ायब हो जा रहे थे, जैसा कि तेज़ गति से घूमते छत के पंखे की ब्लेड को देखने पर भी लगता है।

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चित्र–1 : विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई अलग तरह के आकारों वाली फिरकनियों पर उनके शुरूआती अवलोकनों का रिकॉर्ड। Credits: Anshika Sharma. License: CC BY-NC 4.0.

बॉक्स–1 : फिरकनी डिज़ाइन करना और बनाना

अलग-अलग वस्तुओं को घूमते हुए देखकर एक विद्यार्थी ने कहा, “मेरे भैया के पास लट्टू है, जो ऐसे ही घूमता है।” मैंने उससे पूछा, “तुम्हारे भाई के लट्टू का आकार कैसा है?” उसने जवाब दिया, “गोल”। मैंने गत्ते का टुकड़ा और पेन्सिल निकाली। हमने मिलकर गत्ते के टुकड़े पर गोलाकार फिरकनी बनाई। फिर, मैंने बाक़ी विद्यार्थियों से और आकार सुझाने को कहा। एक विद्यार्थी ने कहा, “अण्डाकार”। तो, मैंने उसे गत्ते पर अण्डाकार आकृति बनाने के लिए बुलाया। इससे प्रेरित होकर एक छात्रा ने कहा, “मैम, हम तारे के आकार की फिरकनी बना सकते हैं!” वह भी आगे आई और गत्ते पर तारा बनाया। इस तरह, फिरकनी को डिज़ाइन करना हम सबकी साझा प्रक्रिया बन गई। मेरी भूमिका महज़ सामान्य-सा संकेत देने तक सीमित थी : “अपने आस-पास ध्यान से देखो। किसी एक अलग आकृति के बारे में सोचो और उसे गत्ते पर बनाने के लिए आगे आओ।” इस खुली सम्‍भावनाओं वाले संकेत ने विद्यार्थियों को अपनी रचनात्मकता और अवलोकन के कौशल को अमल में लाने का मौक़ा दिया। कुछ ने कक्षा में चारों ओर नज़र दौड़ाई और चार्ट, पोस्टर या जिन वस्तुओं वे परिचित थे उनसे प्रेरणा ली। अन्य ने ख़ुद ही आकृतियों की कल्पना की और उन्हें गतिविधि में शामिल किया। अभ्यास पूरा होने तक गत्ते के टुकड़े पर कई अलग-अलग आकृतियाँ बनाई जा चुकी थीं, जिनमें वृत्त, वर्ग, आयत, अर्धचन्द्र, तारा, बादल, गुब्बारा, त्रिभुज और पानी की बूँद शामिल थीं। मैंने विद्यार्थियों को दो-दो की जोड़ियों में इस तरह बाँटा कि पाँचवीं कक्षा के हर विद्यार्थी के साथ तीसरी या चौथी कक्षा का एक विद्यार्थी हो। इस तरह की जोड़ी से छोटे विद्यार्थियों को बड़ों से मदद मिल पाई। हर जोड़ी को गत्ते से अलग-अलग आकृतियाँ काटने का काम सौंपा गया। फिर हमने इन आकृतियों में टूथपिक डालीं और हमारी फिरकनी तैयार हो गईं।

इस गतिविधि के लिए हर चरण पर निर्देश न देकर मैंने विद्यार्थियों को सीखने की प्रक्रिया की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेने दी। यह गतिविधि केवल फिरकनी बनाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि कल्पना करने, पहल करने और अपने विचारों को आज़ादी से ज़ाहिर करने का ज़रिया बन गई। मैंने ध्यान देकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि हर विद्यार्थी को हिस्सेदारी का मौक़ा मिले। अगर किसी विद्यार्थी ने पहले से बनाई जा चुकी कोई आकृति ही सुझाई, तो भी आगे आकर उसे ख़ुद बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। मेरा ज़ोर उनकी बनाई गई आकृतियों की विशिष्टता पर नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करने पर था कि हर बच्चे को अपने हाथों से करके सीखने का अनुभव मिले और वह डिज़ाइन प्रक्रिया में ख़ुद को शामिल महसूस करे। कुछ विद्यार्थियों ने कई (2–3) आकृतियों से फिरकनी बनाईं, जबकि बाक़ी ने सिर्फ़ एक ही मॉडल बनाया। उन्होंने चाहे कितनी भी आकृतियाँ बनाने की कोशिश की हो, मगर हर बच्चे को कम-से-कम एक बार फिरकनी बनाने और अपने डिज़ाइन को जीवन्त होते देखने का मौक़ा ज़रूर मिला। इस तरीक़े ने यह सुनिश्चित करने में मदद की कि कक्षा सभी के लिए बराबरी के जुड़ाव और रचनात्मक खोज-बीन की जगह बनी, जहाँ हर शिक्षार्थी के योगदान की अहमियत थी और उसका काम सबके सामने दिखा।

इन सहज और सोच–समझ से भरे अवलोकनों से पता चला कि विद्यार्थी अपने सामने मौजूद भौतिक घटनाओं को सक्रियता से प्रोसेस कर रहे थे। गति के पैटर्न की ओर ध्‍यान देकर पहचानने, गति की तुलना करने और कक्षा के अनुभवों को वास्तविक दुनिया की जानी-पहचानी वस्तुओं (जैसे पंखे, गेंद या लट्टू) से जोड़ने की उनकी क्षमता इस बात की सशक्‍त मिसाल पेश करती है कि कैसे बच्चों की जिज्ञासा को जगाकर और उनके अवलोकनों को दिशा देकर उनका सीखना मुमकिन बनता है।

विद्यार्थियों ने यह भी देखा कि उनकी फिरकनियों की गति शुरू में तेज़ थी, लेकिन धीरे-धीरे धीमी होकर थम गई। एक विद्यार्थी ने पूछा ही लिया : “मैम, यह आख़िर में गिरती क्यों है?” चौथी कक्षा के एक विद्यार्थी ने एक विशेष रूप से विचारशील कथन पेश किया : “यह आख़िर में इसलिए गिरती है क्योंकि इसकी गति (चाल) धीमी हो जाती है। पहले यह बहुत तेज़ घूमती है, फिर गति कम हो जाती है और आख़िर में, जब चाल कुछ नहीं रह जाती है, तो यह गिर जाती है।” इसे उसने गाँवों में बच्चे जो चके (टायर) से खेलते हैं, उससे जोड़ते हुए कहा, “जब तक हम टायर को धकेलते रहते हैं, तब तक वह चलता रहता है। जब टायर की चाल लगभग शून्य हो जाती है, तो वह गिर जाता है।” उस विद्यार्थी के अवलोकन की सटीकता तो क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी ही, ख़ास बात यह थी कि वह विद्यार्थी ख़ुद से मूर्त रूप से करने वाली गतिविधि को गति की अमूर्त अवधारणा से जोड़ रहा था। हालाँकि विद्यार्थियों को इस अवधारणा से औपचारिक रूप से बाद में परिचित कराया जाता है, लेकिन वह विद्यार्थी रोज़मर्रा की तार्किकता के ज़रिए गति के धीमे होने को सहज रूप से समझाने में सक्षम था। गति से जुड़ी तकनीकी शब्दावली को जाने बिना ऐसा कर पाना उसकी सतही स्तर से आगे जाकर समझने की उभरती हुई क्षमता को दिखाता है। इससे पता चलता है कि जब विद्यार्थियों को बारीकी से देखने-समझने और घटनाओं को अपने शब्दों में समझाने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाता है, तो वे स्वाभाविक रूप से उच्च-स्तरीय अवधारणाओं से जुड़ने लगते हैं, यहाँ तक कि उन अवधारणाओं से भी जिन्हें अभी तक उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं पढ़ाया गया है। वे जो कुछ देखते हैं, उसे उस रूप में समझाने में जो उनके स्‍वयं के लिए अर्थपूर्ण है, वे भविष्य में ज़्यादा जटिल वैज्ञानिक समझ बनाने के लिए नींव का निमार्ण शुरू कर देते हैं।

विद्यार्थियों ने उस टूथपिक की स्थिति और आकार के साथ भी प्रयोग किए, जो उनकी फिरकनियों के लिए घूर्णन के अक्ष का काम कर रही थी। मिसाल के तौर पर, तारे के आकार की फिरकनी बनाने वाले एक विद्यार्थी ने अपनी टूथपिक तारे के केन्द्र में लगाने के बजाय उसकी एक भुजा के किनारे पर लगा दी। जब उसने उसे घुमाने की कोशिश की, तो फिरकनी ठीक से नहीं घूमी। वह डगमगाई और जल्दी ही गिर गई। उस विद्यार्थी का अवलोकन यह था : “मेरी फिरकनी का वज़न संतुलित नहीं है; टूथपिक बीच में नहीं है।” उसने जो कारण समझा था, उसके बारे में पूछने पर विद्यार्थी ने अपनी फिरकनी के असन्तुलन को वास्तविक ज़िन्दगी के एक अवलोकन से जोड़ते हुए बताया : “यह ऐसा है जब हम एक पैर में ऊँची एड़ी का जूता या सैंडल पहनते हैं तो हम ठीक से नहीं चल पाते हैं क्योंकि एक साइड, दूसरी से ऊँची हो जाती है।” उसने अपने उदाहरण में तारे के टूथपिक वाले हिस्से को एड़ी वाले जूते से जोड़ते हुए कहा, “यह हिस्सा ज़्यादा भारी है।” उसने समझाया कि जैसे दोनों पैरों को सन्तुलन बनाए रखने के लिए बराबर के सपोर्ट की ज़रूरत होती है, वैसे ही टूथपिक को फिरकनी के ठीक बीचों-बीच डालना ज़रूरी है। टूथपिक की स्थिति को दुरुस्त करने के बाद विद्यार्थी ने अपनी फिरकनी को तीन बार घुमाने की कोशिश की। इसमें असफल रहने के बाद उसने कहा, “फिरकनी के किनारे ज़मीन को छू रहे हैं, इसलिए यह ठीक से घूम नहीं पा रही है।” कुछ देर बाद ही उसी विद्यार्थी ने सोचा कि कहीं टूथपिक की लम्बाई तो फिरकनी के सन्तुलन को नहीं बिगाड़ रही है। उसने पूछा, “क्या हम टूथपिक का साइज़ कुछ कम कर सकते हैं?” इससे मालूम हुआ कि विद्यार्थी ने आकार, सममिति और गति के बीच के सम्बन्ध के बारे में ज़्यादा खुले और खोज-बीन के अन्दाज़ में सोचना शुरू कर दिया था। यह अनुभव विद्यार्थियों को खोज-बीन करने, ग़लतियाँ करने और अपने अनुभवों पर सोच-विचार करने का अवसर देने की अहमियत को सामने लाता है। इसके अलावा यह विद्यार्थियों को अपने ढंग से भाषा का इस्तेमाल करते हुए अपनी समझ को बताने का मौक़ा देने के महत्त्व को भी दिखाता है, क्योंकि इससे अकसर तकनीकी शब्दों की तुलना में ज़्यादा समृद्ध और अपनी ज़िन्दगी से ज़्यादा जुड़ा हुआ गहरा नज़रिया हासिल होता है।

कुछ विद्यार्थियों ने इस गतिविधि को घर पर फिर से आज़माया और अगले दिन कक्षा में अपने अनुभव साझा किए। उदाहरण के लिए, एक विद्यार्थी ने अर्धचन्द्राकार फिरकनी बनाई और उसने बताया कि जब उसने फिरकनी को घुमाया तो कैसे घूमी थी, “घूमते वक़्त वह चाक़ू जैसी लग रही थी।” यह बात ख़ासतौर पर इसलिए भी महत्त्वपूर्ण थी क्योंकि विद्यार्थी ने अपने अवलोकन को काग़ज़ पर लिखकर दर्ज किया था, जो कि स्‍व-प्रेरित वैज्ञानिक रिकॉर्डिंग करने का शुरुआती प्रयास था। यह बताता है कि कक्षा में सीखने को किसी विशेष रूप से संरचित गतिविधि तक सीमित रखने की ज़रूरत नहीं है; यह विद्यार्थियों में ऐसी जिज्ञासा जगा सकती है जो स्कूली जीवन के बाद भी जारी रहे।

कुछ वस्तुएँ क्यों तैरती हैं?

कक्षा–4 की पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025–2026) के अध्याय–7 के अगले हिस्से में तैरने और डूबने को जाँचने-समझने पर विचार किया गया है। मैंने विद्यार्थियों से यह पूछकर इस अभ्यास की शुरुआत की : “आपने किन चीज़ों को पानी पर तैरते हुए और किन चीज़ों को पानी में डूबते हुए देखा है?”4 विद्यार्थियों ने बताया कि उन्होंने पत्तियों जैसी हल्की वस्तुओं को तैरते और पत्थरों जैसी भारी वस्तुओं को डूबते हुए देखा है। फिर, मैंने विद्यार्थियों को 8–10 मिनट का समय दिया कि वे कक्षा और उसके आस-पास ऐसी वस्तुओं का पता लगाएँ और उनको इकट्ठा करें, जो उनके मुताबिक़ पानी पर तैर सकती हैं या पानी में डूब सकती हैं। इन वस्तुओं को एक ढेर में इकट्ठा किया गया, जिसमें पत्तियाँ, रबरबैण्ड, पत्थर, रस्सी, इरेज़र, छड़ी, हेयरपिन शामिल थे। मैंने विद्यार्थियों को अर्धवृत्त में बैठने के लिए कहा, जिससे सामने जो हो रहा है वह आसानी से सभी देख सकें और आपस में चर्चा कर सकें। मैंने उस ढेर में रखी वस्तुओं की सूची बोर्ड पर बना दी। अब विद्यार्थियों से कहा कि वे एक-एक करके आगे आएँ, एक वस्तु को चुनें और यह अन्दाज़ लगाएँ कि वह तैरेगी या डूबेगी, और ऐसा क्यों होगा। जैसे-जैसे विद्यार्थी अपने अनुमान ज़ाहिर करते गए, मैं उनको बोर्ड पर इस प्रकार से लिखती गई जिससे पूरी कक्षा देख पाए (चित्र–2 देखें)।

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चित्र–2 : विद्यार्थियों द्वारा जमा की गई रोज़मर्रा की चीज़ों के पानी में तैरने या डूबने के बारे में उनके पूर्वानुमानों का रिकॉर्ड। Credits: Anshika Sharma. License: CC BY-NC 4.0.

इससे कक्षा को सामूहिक रूप से अपनी सोच पर फिर से विचार करने, उस पर मनन करने और उसको बेहतर बनाने का मौक़ा मिला। मैंने पाया कि सबसे छोटे विद्यार्थी भी इस अभ्यास में भाग लेने में जिज्ञासु थे, उन्होंने पहल की और तत्परता दिखाई। उदाहरण के लिए, तीसरी कक्षा के कई विद्यार्थी उन तर्कों को बहुत ध्यान से सुन रहे थे, जो उनके बड़े साथी पेश कर रहे थे। अपनी बारी आने पर उन्होंने अकसर उसी तरह की तार्किकता के साथ जवाब देने की कोशिश की। ख़ास बात यह थी कि कक्षा के इस स्तर के विद्यार्थी भी उच्च–स्तर पर सोचकर समझने वाले सवाल पूछे जाने पर जवाब देने में हिचकिचा नहीं रहे थे। हालाँकि उनके तर्क हमेशा सटीक नहीं होते थे, फिर भी उन्होंने अपनी सोच को समझाने की ईमानदार कोशिश की, जो आत्मविश्वास बढ़ने और अवधारणात्मक स्तर पर जुड़ाव की उत्साहजनक निशानी है। यह अनुभव इस बात की पुष्टि करता है कि किसी भी स्तर की कक्षा के विद्यार्थियों को सम्मानजनक और समावेशी माहौल में अपनी बात रखने का मौक़ा, समय और इसके लिए समर्थन दिया जाए, तो वे किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं।

विद्यार्थियों ने शुरुआती पूर्वानुमान सिर्फ़ वज़न के आधार पर लगाए। मसलन, एक विद्यार्थी ने पूरे विश्वास के साथ अपना यह पूर्वानुमान प्रस्‍तुत किया कि वह जो पत्थर लाया था, वह “डूब जाएगा।” जब पूछा गया कि ऐसा क्यों होगा, तो जवाब मिला, “क्योंकि यह भारी है”, और “यह बड़ा पत्थर है।” फिर मैंने तुलना करने के लिए उस विद्यार्थी से छोटा और हल्का पत्थर लाने को कहा। दोनों पत्थर हाथ में आने पर मैंने पूछा : “क्या ये दोनों पत्थर डूब जाएँगे?” विद्यार्थी ने उन्हें ध्यान से देखते हुए कहा, “हाँ, दोनों डूब जाएँगे। दोनों भारी हैं।” इस पूर्वानुमान को परखने के लिए हमने दोनों पत्थरों को पानी में डाला। जैसी कि उम्मीद थी, दोनों डूब गए, लेकिन डूबने के साथ ही एक दिलचस्प अवलोकन हुआ। विद्यार्थियों ने देखा कि जैसे ही पत्थर पानी में डाले गए, उनके चारों ओर बुलबुले बनने लगे। ये बुलबुले तब तक ही दिखाई दे रहे थे जब तक कि पत्थर नीचे की ओर जा रहे थे। जैसे ही पत्थर बर्तन की तली में बैठे, बुलबुले ग़ायब हो गए। मैंने एक गिलास की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा, “यह गिलास तैरेगा या डूबेगा?” ज़्यादातर विद्यार्थियों को लगा कि यह डूब जाएगा। उनका कारण फिर से वज़न से जुड़ा हुआ था। कुछ विद्यार्थियों को लगा कि यह तैर सकता है। एक विद्यार्थी ने कहा, “अगर गिलास में पानी है, तो यह डूब जाएगा। अगर गिलास में पानी नहीं है, तो यह तैरेगा।

मैं उन विद्यार्थियों से मुख़ातिब हुई, जो आश्वस्त थे कि गिलास अपने भारीपन की वजह से डूब जाएगा। मैंने पूछा, “अगर भारी वस्तुएँ डूबती हैं, तो नाव पानी पर क्यों तैरती है, वह तो भारी होती है?” इस सवाल से गहरी चर्चा छिड़ गई (चित्र–3 देखें)। एक छात्रा का विचार था कि नाव तैरती है क्योंकि : “उसमें पहिए होते हैं।” अब यह सीधे तौर पर तैरने से जुड़ी बात नहीं लग रही थी, इसलिए मैंने इन्तज़ार किया कि वह इसे और समझाए। छात्रा ने कहा कि उसने टेलीविज़न पर एक ऐसी नाव देखी है जिसमें पहिए लगे हुए हैं, और पहिए उसे पानी को काटकर आगे बढ़ने में मदद कर रहे हैं।

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चित्र–3 : नावें पानी पर क्यों तैरती हैं, इस बारे में विद्यार्थियों ने तीन अलग-अलग परिकल्पनाएँ साझा कीं। Credits: Anshika Sharma. License: CC BY-NC 4.0.

मैं सोचने लगी कि क्या यह छात्रा किसी काम करती हुई टर्बाइन का वर्णन कर रही है। दूसरे विद्यार्थी ने समझाया : “पानी आगे बढ़ता जाता है, इसलिए नाव तैरती है।” यह समझाने का प्रयास बताता है कि विद्यार्थी ने पानी की गति को नाव के उत्प्लावन (buoyancy) से जोड़ने की कोशिश की है। पाँचवीं कक्षा के एक विद्यार्थी ने यह व्याख्या पेश की : “पानी का वज़न इसे ऊपर ले जाता है, इसलिए नाव नहीं डूबती।” एक अन्य विद्यार्थी ने कहा, “हम भी तो पानी पर तैरते हैं।” इस चर्चा ने विद्यार्थियों को मौक़ा दिया कि वे किसी वस्तु द्वारा हटाए गए पानी के वज़न की भूमिका का उस वस्तु के उस माध्‍यम (यहाँ पानी) में तैरने या डूबने की प्रवृत्ति के सम्बन्ध में विचार कर पाएँ। इसने उन्हें वस्तुओं के तैरने और डूबने के गुणों पर असर डालने वाले कारकों के बारे में ज़्यादा आलोचनात्‍मक ढंग से सोचने, और इन अवधारणाओं के बारे में और अधिक गहराई से खोज-बीन के लिए भी प्रोत्साहित किया (बॉक्स–2 देखें)।

हमने विद्यार्थियों के पूर्वानुमानों का परीक्षण करने के लिए हर वस्तु को पानी में डालकर अवलोकन किया। विद्यार्थियों द्वारा लाई गई एक डोरी (रस्सी का पतला टुकड़ा) का परीक्षण ख़ासतौर से दिलचस्प व सभी को जोड़ने वाला रहा। लगभग सभी विद्यार्थियों का पूर्वानुमान यही था कि डोरी पानी पर तैरेगी। जब उनसे इसकी वजह पूछी गई, तो जवाब थे, “यह बहुत हल्की है,” और “इसका कोई भार नहीं है।” कुछ ने यह भी कहा कि यह ‘पतली’ है, और यह बात उनकी धारणा को और पुख़्ता कर रही थी। हालाँकि, जब रस्सी को पानी में डाला गया तो पूर्वानुमान और उम्मीद के विपरीत वह डूब गई। विद्यार्थी हैरान थे, बोले, “मैम, हमने पूर्वानुमान तो कुछ और लगाया था, लेकिन हुआ तो कुछ और ही!” मैंने उनसे कहा कि वे सोचें, ऐसा क्यों हुआ होगा। एक विद्यार्थी ने रस्सी को ध्यान से देखा और कहा, “इसमें एक तार है। इसीलिए यह डूब गई।” ग़ौर से देखने पर हमने पाया कि रस्सी पर काले रंग की एक मोटी परत चढ़ी हुई थी, जिससे यह सख़्त तार जैसी दिखने लगी थी, और इस वजह से इसका वज़न और बढ़ गया था।

विद्यार्थी ने निष्कर्ष निकाला कि डूबने की वजह अपने आप में रस्सी नहीं थी, बल्कि उस पर चढ़ी यह बाहरी परत थी। उनकी जानकारी को और आगे ले जाने के लिए मैंने विद्यार्थियों को एक काम दिया : वे अपने घर में रस्सी जैसी सभी चीज़ ढूँढ़ें और परखें कि वे पानी पर तैरती हैं या उसमें डूब जाती हैं। अगले रोज़ विद्यार्थी अपने नतीजे साझा करने के उत्साह के साथ कक्षा में आए। कुछ ने कहा, “मैम, हमारी रस्सी तैर गई”, जबकि कुछ ने कहा, “हमारी डूब गई।” जब मैंने उनसे पूछा कि रस्सियाँ किस चीज़ की बनी थीं, तो एक विद्यार्थी ने बताया, “वह जूट की थी… बोरी वाली”, जबकि दूसरे ने कहा, “हमारे घर में तो पतली–सी थी, वह डूबी नहीं।” अब तक की इस पूरी चर्चा के ज़रिए कक्षा सामूहिक रूप से एक अहम निष्कर्ष पर पहुँची : वज़न वह एक मात्र कारक नहीं हो सकता जो तय करता है कि कोई वस्तु पानी में तैरेगी या डूबेगी।

इस अभ्यास ने विद्यार्थियों को धारणाएँ बनाने, उनके समर्थन में विवेक व बुद्धि से तर्क गढ़ने, उन धारणाओं का परीक्षण करने और जब ज़रूरत पड़े तो अपनी समझ को संशोधित करने में मदद की। उनकी ग़लत धारणाएँ व्याख्यानों से नहीं, बल्कि साथ जुड़कर कार्य और बातचीत के ज़रिए धीरे-धीरे दूर हुईं।

बॉक्स–2 : तैरने वाली नावें बनाना

कक्षा–4 की ईवीएस की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-2026) का अध्याय–7 विद्यार्थियों को नावों के अपने मॉडल डिज़ाइन करने के लिए कहते हुए ख़त्म होता है।4 मैंने विद्यार्थियों से कहा कि वे घर से ऐसी कोई भी सस्ती सामग्री लाएँ, जिससे वे नाव का कार्यकारी मॉडल कक्षा में डिज़ाइन कर सकें। मैंने उन्हें कुछ संकेत व (सुझाव) प्रोम्‍पट दिए। उदाहरण के लिए, उन्हें बताया गया कि वे नाव बनाने के लिए नारियल के खोल जैसी चीज़ों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा, विद्यार्थी थर्मोकोल, ख़ाली बोतलें, आइसक्रीम–स्टिक और गत्ते जैसी सामग्री भी लाए। मैंने उन्‍हें फ़ैविकोल और क़ैंची जैसी बुनियादी चीज़ें मुहैया कराईं। विद्यार्थियों को समूहों में काम करके तैरने वाली नावें डिज़ाइन करने और बनाने के लिए कहा गया। मैंने उन्हें इस तरह से समूहों में बाँटा, जिससे न सिर्फ़ संसाधनों को साझा करना और आपसी सहयोग सुनिश्चित हुआ, बल्कि सीखने-सिखाने का समावेशी, सहयोगी माहौल बनाने में भी मदद मिली। मसलन, अगर दो विद्यार्थी एक जैसी सामग्री लाए, तो उन्हें एक साथ रखा गया। बड़े विद्यार्थियों (कक्षा–5) को छोटे विद्यार्थियों (कक्षा–4) के साथ रखा गया। जो विद्यार्थी काफ़ी सामग्री लाए थे, उन्हें ऐसे विद्यार्थियों के साथ जोड़ा गया जिनके पास कम सामग्री थी। कुल मिलाकर, विद्यार्थियों की 17 जोड़ियाँ थीं। हर समूह के विद्यार्थियों ने अपने मॉडल बनाने और उनका परीक्षण करने के लिए मिलकर काम किया। उनसे नाव बनाने में इस्तेमाल की गई सामग्री और बनाने की प्रक्रिया को, और साथ ही चुनौतियों का समाधान करने के तरीक़ों को लिखकर दर्ज करने के लिए कहा गया (चित्र–4 देखें)।

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चित्र–4 : विद्यार्थियों ने अपने नाव के मॉडल बनाने में इस्तेमाल की गई सामग्री और इसकी प्रक्रिया को दर्ज किया। नोट : यह फ़ोटो एक वास्तविक कक्षा का है और उसे यहाँ फ़ोटो में दिख रहे बच्चे के अभिभावकों की अनुमति से प्रकाशित किया गया है। बच्चे की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बच्चे का चेहरा धुँधला कर दिया गया है। इस फोटो के पुनः उपयोग के विवरण के लिए कृपया यहाँ ‘इमेज और मीडिया उपयोग’ देखें। Credits: Anshika Sharma. License: CC BY-NC-ND 4.0

मिसाल के तौर पर, एक समूह ने यह दर्ज किया कि कैसे उन्होंने थर्मोकोल के दो टुकड़ों को आपस में जोड़कर नाव का मॉडल बनाने की कोशिश की। पहले उन्होंने फ़ैविकोल का इस्तेमाल करके निर्माण की कोशिश की। लेकिन यह कारगर नहीं हुआ। तो, विद्यार्थियों ने कक्षा में ही इधर–उधर देखते हुए इस काम के लिए इस्तेमाल की जा सकने वाली अन्य सामग्री ढूँढ़ी। उन्हें कुछ टूथपिक मिलीं। लेकिन ये भी दोनों टुकड़ों को एक साथ रख पाने में ज़्यादा कारगर नहीं थीं। आख़िरकार, वे प्रधानाध्यापक के कार्यालय से काग़ज़ों पर लगाने वाली आलपिन लाए। इन आलपिनों को उन्‍होंने थर्मोकोल के दो टुकड़ों के बीच फँसा‍ दिया। यह तरीक़ा कारगर रहा और उनका थर्मोकोल मॉडल सफलता से पूरा हो गया। इस अभ्यास के अन्‍त तक, हमारे पास 17 अलग-अलग डिज़ाइन थे। मैंने हर जोड़ी से अपने मॉडल की तुलना दूसरे समूह के मॉडल से करने को कहा। उनसे कहा कि वे दोनों मॉडलों की ख़ूबियों का ज़िक्र करें, यह बताएँ कि कोई एक मॉडल दूसरे से बेहतर क्यों है, और यह अनुमान लगाएँ कि दोनों मॉडल पानी में तैर पाएँगे या डूब जाएँगे। एक डिज़ाइन मुझे ख़ास तौर पर पसन्द आया। एक छात्रा ने कक्षा में कुछ डिस्पोज़ेबल कप देखे, और बड़ी होशियारी से उनमें से दो को जोड़ दिया। फिर उसने दोनों कपों को बीच से काटकर नाव जैसी संरचना बना दी। मुझे लगता है कि अगर मैंने अध्याय की विषयवस्तु पर व्याख्यान देने के ज़्यादा पारम्परिक तरीक़े को अपनाया होता, तो शायद ऐसी रचनात्मकता सामने नहीं आती। इस मामले में, सीखने–सिखाने के माहौल ने इस छात्रा की अपने काम को नई तरह से करने की सोच को उभारने में अहम भूमिका अदा की।

बॉक्स-3 : पाठ्यचर्या से सम्‍बन्‍ध

यह शिक्षण विधि शिक्षकों को निम्नलिखित लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार हो सकती है :

  • फ़ाउण्‍डेशनल स्‍टेज के लिए पाठ्यचर्या के लक्ष्य :
  • CG-7 : बच्चे अवलोकन और तार्किक चिन्तन के ज़रिए अपने आस-पास की दुनिया को समझते हैं। विशिष्ट रूप से, इससे बच्चों को निम्नलिखित क्षमताएँ विकसित करने में मदद मिलती है :
  • (C-7.1) : “वस्तुओं की विभिन्न श्रेणियों और उनके बीच के सम्बन्धों को देखना–समझना।
  • (C-7.2) : “प्रकृति में कारण–कार्य सम्बन्धों को सरल परिकल्पनाएँ बनाकर देखना और समझना, और अपनी परिकल्पनाओं को समझाने के लिए अपने अवलोकनों का इस्तेमाल करना।
  • (C-7.3) : “दैनिक जीवन की परिस्थितियों में और सीखने में उपयुक्त उपकरणों और तकनीकी का इस्तेमाल करना।
  • CG-8 : बच्चे मात्राओं, आकृतियों और मापों के माध्यम से गणितीय समझ और दुनिया को पहचानने की क्षमता विकसित करते हैं। विशिष्ट रूप से, इससे विद्यार्थियों को निम्नलिखित क्षमताएँ विकसित करने में मदद मिलती है :
  • (C-8.1) : “चीज़ों को एक से अधिक गुणों के आधार पर समूहों और उप-समूहों में छाँटना।
  • (C-8.2) : “अपने परिवेश, आकृतियों और संख्याओं में सरल पैटर्न्स को पहचानना और उनका विस्तार करना।
  • (C-8.8) : “बुनियादी ज्यामितीय आकृतियों और उनके प्रेक्षणीय गुणों को पहचानना।
  • (C-8.12) : “मात्राओं, आकृतियों, स्थान और मापन से सम्बन्धित अवधारणाओं और प्रक्रियाओं को समझने और व्यक्त करने के लिए पर्याप्त और उपयुक्त शब्दावली विकसित करना।3
  • प्रिपरेटरी स्‍टेज के ईवीएस के लिए पाठ्यचर्या के लक्ष्य :
  • CG-1 : [विद्यार्थी] अपने परिवेश में प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण के बारे में खोज-बीन करते हैं और उससे जुड़ते हैं। विशिष्ट रूप से, इससे विद्यार्थियों को निम्नलिखित क्षमताएँ विकसित करने में मदद मिलती है :
  • (C-1.3) : “ऐसे सरल पैटर्न्स के बारे में सवाल पूछना और पूर्वानुमान लगाना…जो अपने आस-पास के वातावरण में दिखाई देते हैं।
  • (C-1.5) : “स्थानीय सामग्रियों का इस्तेमाल करके सरल चीज़ें बनाना…कक्षा प्रक्रियाओं में इस्तेमाल या फिर प्रदर्शन के लिए ख़ुद ही निर्माण करना।
  • CG-6 : [विद्यार्थी] अपने आस-पास के वातावरण से जुड़े सवालों की जाँच करने के लिए विभिन्न स्रोतों से डेटा और जानकारी का इस्तेमाल करता है। विशिष्ट रूप से, इससे विद्यार्थियों को निम्नलिखित क्षमताएँ विकसित करने में मदद मिलती है :
  • (C-6.1) : “ख़ुद से या समूहों में, विशिष्ट प्रश्नों से सम्बन्धित सरल खोजबीन करना।
  • CG-7 : [विद्यार्थी] प्राकृतिक विज्ञानों (जीवविज्ञान, भौतिकविज्ञान, और पृथ्वी एवं अन्तरिक्ष विज्ञान) और इंजीनियरिंग की बुनियादी अवधारणाओं और विधियों से मूलभूत परिचय पाता है। विशिष्ट रूप से, इससे विद्यार्थियों को निम्नलिखित क्षमताएँ विकसित करने में मदद मिलती है :
  • (C-7.1) : “अन्वेषण में वैज्ञानिक पद्धति के उपयोग से परिचित होना, साथ ही ऊर्जा, पदार्थ और प्रणालियों जैसी एक–दूसरे से सम्बन्धित अन्‍य अवधारणाओं से भी परिचित होना, जो विज्ञान और इंजीनियरिंग के सभी क्षेत्रों में लागू होती हैं।”
  • (C-7.2) : “प्राकृतिक विज्ञानों के साथ-साथ इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी और विज्ञान के अनुप्रयोगों में विषय से सम्बन्धित बुनियादी विचारों से परिचित होना, जो बाद की कक्षाओं में विभिन्न विषय–क्षेत्रों में सीखी जाने वाली विषयवस्तु से जुड़ते हैं।5

चलते-चलते

पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यचर्या को प्रिपरेटरी स्‍टेज में एक विषय से ज़्यादा बच्चों को उनके परिवेश से जोड़ने के तरीक़े के रूप में डिज़ाइन किया गया है। यह उन्‍हें अपनी दुनिया का अवलोकन करने, सवाल करने और उसे समझने में मदद करेगा। इस बात को पहचानते हुए, पर्यावरण अध्ययन की कई पाठ्यपुस्तकें ऐसी गतिविधियों के विचार उपलब्‍ध करवाती हैं, जिनका मक़सद विद्यार्थियों को अपने परिवेश की खोज-बीन करने के लिए प्रोत्साहित करना है। मसलन, कक्षा–4 की पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यपुस्तक (एनसीआरटी, 2025–2026) अध्याय–7 में विद्यार्थियों को यह जाँचने के लिए कहती है कि क्या रोज़मर्रा की वस्तुएँ (जैसे इरेज़र, चूड़ियाँ और बोतल के ढक्कन) पानी में तैरती हैं या डूबती हैं, साथ ही उन्हें अपने जवाबों के समर्थन में कारण देने को कहती है।4 कक्षा में इस गतिविधि को करने से विद्यार्थियों को ख़ुद अवलोकन करने और तर्क करने का मौक़ा मिलेगा। लेकिन कई शिक्षक पर्यावरण अध्ययन को एक और ऐसे विषय की तरह देखते हैं जिसे बस याद कर लेना है और मानते हैं कि गतिविधियों से जुड़े प्रश्न सिर्फ़ आकलन के लिए दिए गए हैं। तो ये शिक्षक शायद अपने विद्यार्थियों को इन प्रश्नों के ‘सही उत्तर’ बता देंगे। उदाहरण के लिए, कोई शिक्षक कह सकता है, “रबर डूब जाएगा क्योंकि यह भारी है।” फिर विद्यार्थियों से उम्मीद की जाएगी कि वे इन उत्तरों को याद कर लें। इससे वे पड़ताल करने और सोच-विचार करने की गतिविधि के कार्य में शामिल हो ही नहीं पाते हैं।

मैंने जो शिविर आयोजित किया, उसमें पाठ्यचर्या से हटकर कुछ नहीं था। वास्तव में, विद्यार्थियों ने जो भी गतिविधियाँ कीं, वे कक्षा–4 की पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यपुस्तक (एनसीआरटी, 2025–2026) से ली गई थीं। जिस बात ने इसे पर्यावरण अध्ययन की बहुत-सी कक्षाओं से अलग बनाया वह तो मेरा शिक्षण का तौर-तरीक़ा था। मिसाल के तौर पर, कक्षा–5 के किसी भी विद्यार्थी ने अपनी कक्षा में नाव का मॉडल नहीं बनाया था। शिविर ने उन्हें घरेलू सामानों का इस्तेमाल कर यह करने का मौक़ा मुहैया करवाया। एनसीएफ़–एफ़एस (2022) के मुताबिक़, कक्षा के अधिगम को बच्चे की वास्तविक दुनिया के सन्दर्भों से जोड़ना उसकी समझ को बढ़ाता है।3 हमने इसे व्यवहार में होते देखा। रोज़मर्रा के साज़-ओ-सामान के साथ ख़ुद करके सीखने के अनुभवों ने शिविर को जीवन्त प्रयोगशाला में बदल दिया। विद्यार्थियों ने जो भी मॉडल डिज़ाइन किए, उनसे उन बच्चों की रचनात्मकता, प्रयोग करने और टीम–वर्क की क्षमता की झलक मिली। इन अन्वेषणों ने दर्शाया कि कैसे जानी-पहचानी चीज़ों के साथ अपने हाथों से काम करने के अनुभव विद्यार्थियों की जिज्ञासा को जगा सकते हैं।

यह अनुभव दिखाता है कि पर्यावरण अध्ययन की कक्षाओं के लिए किस तरह की शिक्षण–पद्धति की ज़रूरत है। रटने से चिन्तन करने की ओर, याद करने से निर्माण करने की ओर, और डर से आज़ादी की ओर जाने से कक्षा ऐसी जगह बन सकती है, जहाँ बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा का सम्मान हो और उसे बढ़ावा मिले। जब बच्चों को अपने आस-पास के सामानों के साथ प्रयोग करने की आज़ादी दी जाती है, तो वे पाठ्यपुस्तक से आगे सोचने लगते हैं। वे अपना तर्क स्वयं बनाते हैं, अपनी मान्यताओं का परीक्षण करते हैं, और अपने ख़ुद के अनुभव के ज़रिए अपनी समझ को गहरा करते हैं (बॉक्स–3 देखें)। जब शिक्षक सहजकर्ता के रूप में काम करते हैं — जो अवलोकन करने, सवाल पूछने और ख़ुद करके देखने को प्रोत्साहित करते हैं — तो विद्यार्थी उस विषय से जुड़ाव महसूस करते हैं। वह महज़ याद करने का अध्याय न रहकर उनकी दुनिया बन जाती है। इसलिए, आइए हम विद्यार्थियों को बस बता देने से बचें, जैसे कि क्या तैरेगा या क्या डूबेगा। इसके बजाय, हम उन पर भरोसा करें कि वे ख़ुद पता लगा लेंगे। क्योंकि जब बच्चे खोज-बीन करते हैं, तो वे महज़ उस बात का उत्तर ही नहीं सीखते; वे सोचना भी सीखते हैं। यह तरीक़ा न सिर्फ़ वैज्ञानिक सोच का निमार्ण करता है, बल्कि सीखने में जिज्ञासा को, सीखने की प्रक्रिया पर स्‍वामित्‍व को और उसमें आनन्द को भी बढ़ावा देता है। तो, हम पर्यावरण अध्ययन को ऐसा ‘विषय’ बनने दें जो बच्चे को सीखने से प्यार करना सिखाए।

मुख्‍य बिन्‍दु

अनुभव करना कि चीज़ें कैसे काम करती हैं
  • फ़ाउण्‍डेशनल स्‍टेज में, पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यचर्या विद्यार्थियों को कई गतिविधियाँ के माध्‍यम से यह खोज-बीन करने के लिए आमंत्रित करती है कि वस्‍तुएँ कैसे घूमती हैं, तैरती हैं या डूबती हैं।
  • पाठ्यपुस्तक में शिक्षकों को दिए मार्गदर्शन के बावजूद कई स्कूलों में पर्यावरण अध्ययन को रटने और पाठ्यपुस्तक में से क्या याद रहा इसका आकलन करने वाली वर्कशीट के ज़रिए ही पढ़ाया जा रहा है।
  • पर्यावरण अध्ययन को पढ़ाने के लिए अनुभवात्मक, ख़ुद करके सीखने की पद्धति को अपनाने से विद्यार्थियों को महज़ रटन्त से आगे बढ़कर जिज्ञासु होने, सवाल पूछने और वास्तविक दुनिया की समझ विकसित करने में मदद मिलती है।
  • वस्तुओं के घूमने, तैरने और डूबने पर ख़ुद करके सीखने की गतिविधियों में विद्यार्थियों को शामिल करने से उन्हें बेहतर अवलोकन करने और पूर्वानुमान लगाने के अधिक मज़बूत कौशल को विकसित करने में मदद मिल सकती है।
  • फिरकनियों और नावों के अपने मॉडल डिज़ाइन करने की प्रक्रिया में विद्यार्थियों के मिल-जुलकर काम करने में शामिल होने से उनमें आपसी संवाद और व्यवहार, रचनात्मकता और टीम–वर्क के कौशल विकसित करने में मदद मिल सकती है।
  • फिरकनियों और नावों के उनके बनाए मॉडल कैसे काम करते हैं, इसका अवलोकन करने से विद्यार्थियों में उन वैज्ञानिक अवधारणाओं और उनकी अभिव्‍यक्ति की शुरुआती समझ विकसित करने में मदद मिल सकती है, जिनसे उनका औपचारिक परिचय स्कूली शिक्षा के बाद के चरणों में कराया जाता है।

टिप्पणियाँ

  • Credits for the image (A Wooden Top Toy) used in the background of the article title: Tara Winstead, Pexels. URL: https://www.pexels.com/ photo/close-up-shot-of-a-wooden-top-toy-7123022/. License: Free to Use.
  • लेख के हिन्‍दी अनुवाद की समीक्षा करने के लिए हम हृदय कान्‍त दीवान के आभारी हैं।

सन्दर्भ

  1. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसन्‍धान और प्रशिक्षण परिषद (2025)। ‘इकाई-4 : हमारे आस-पास की वस्‍तुएँ’। हमारा अद्भुत संसार, कक्षा-4 की पर्यावरण विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 102-116. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?deev1=7-10.
  2. Ministry of Human Resource and Development, Government of India (2020). ‘National Education Policy 2020’. Ministry of Education. URL: https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf.
  3. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks (2022). ‘National Curriculum Framework for Foundational Stage 2022’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCF_for_Foundational_Stage_20_October_2022.pdf.
  4. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसन्‍धान और प्रशिक्षण परिषद (2025)। ‘अध्‍याय 7: वस्‍तुएँ कैसे कार्य करती हैं?’। हमारा अद्भुत संसार, कक्षा-4 की पर्यावरण विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 102-116. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?deev1=7-10.
  5. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks (2023). ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.