ग़ायब होते गिद्ध

अनुवाद : जयजीत अकलेचा | पुनरीक्षण : उमा सुधीर | कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्याय

स्कूली पाठ्यपुस्तकें विद्यार्थियों को यह समझाती हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न घटक आपस में कैसे जुड़े हैं और यदि इनमें से कोई एक घटक लुप्त हो जाए, तो पूरे तंत्र पर क्या असर पड़ सकता है। ऐसे में क्‍या इन अवधारणाओं को और बेहतर ढंग से समझाने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप से गिद्धों के ग़ायब होने की कहानी का उपयोग किया जा सकता है?

कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-12 (‘वन : हमारी जीवन रेखा’) में विद्यार्थी यह पढ़ते हैं कि किस तरह पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न सजीव घटक (पौधे, पशु और सूक्ष्मजीव) एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं : “तुमने पढ़ा है कि हरे पादप किस प्रकार भोजन का निमार्ण करते हैं। सभी जन्‍तु, चाहे वे शाकाहारी हों या मांसाहारी, अन्ततः भोजन के लिए पादप पर ही निर्भर होते हैं। जो जीव पादपों का भोजन करते हैं, उन्‍हें अकसर अन्‍य जन्‍तुओं द्वारा भोजन के रूप में ले लिया जाता है और इस प्रकार यह क्रम चलता रहता है। उदाहरण के लिए, घास को कीटों द्वारा खाया जाता है, जिन्‍हें मेंढक खा लेते हैं। मेंढक को सर्प खा लेते हैं। इसे खाद्य शृंखला कहा जाता है : घास → कीट → मेंढक → सर्प → उकाब (गरूड़)। वन में अनेक खाद्य शृंखलाएँ पाई जाती हैं। सभी खाद्य शृंखलाएँ परस्‍पर सम्‍बद्ध होती हैं। यदि किसी एक शृंखला में कोई विघ्‍न पड़ता है, तो यह सभी खाद्य शृंखलाओं को प्रभावित करता है।1 कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-2026) के अध्याय-13 (‘Our Home: Earth, a Unique Life Sustaining Planet’) में इसे और स्पष्ट किया गया है : “…यदि सभी घास विलुप्‍त हो जाएँ, तो उस पर निर्भर रहने वाले जीवों जैसे हिरण या टिड्डियों को जीवित रहने के लिए कड़ा संघर्ष करना होगा। और शाकाहारी जीवों के बिना बाघ या लोमड़ी जैसे शिकारी जानवर भी अपने भोजन से वंचित हो जाएँगे। प्रत्येक प्रकार की जीवित वस्‍तु की एक भूमिका होती है और इनमें से कुछ के भी विलुप्त हो जाने पर प्रकृति की जीवन को सहारा देने की क्षमता कमज़ोर हो जाएगी।2 इसी तरह, कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-5 (‘पौधे एवं जन्‍तुओं का संरक्षण’) में विद्यार्थी पढ़ते हैं कि : “अकसर हम साँप, मेंढक, छिपकली, चमगादड़ तथा उल्लू इत्‍यादि को पारिस्थितिकी तंत्र में उनके महत्त्व पहचाने बिना ही निर्दयता से मार डालते हैं। यद्यपि वे आकार में छोटे हैं परन्‍तु पारिस्थितिकी तंत्र में उनके योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता। वे आहार जाल एवं आहार शृंखलाओं के भाग हैं।3 इन पाठ्यपुस्तकों में बताए गए ‘तथ्यों’ का एक जीवन्त उदाहरण लुप्त हो रहे गिद्धों के मामले में देखा जा सकता है।

ग़ायब होते गिद्धों का मामला

किसी पारिस्थितिकी तंत्र में गिद्ध क्या भूमिका निभाते हैं? कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-12 (‘वन : हमारी जीवन रेखा’) में विद्यार्थी दो बच्चों के बीच के इस संवाद को पढ़ते हैं : शीला ने पूछा, “ जब वन में कोई जन्‍तु मर जाता है, तो उसका क्या होता है?” टीबू ने उत्तर दिया : “मृत जन्‍तु गिद्धों, कौओं, गीदड़ों और कीड़ों का भोजन बन जाते हैं। इस प्रकार पोषक तत्वों का चक्र चलता रहता है, जिससे वन में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता है।1 मरे हुए जानवरों का सड़ा-गला मांस खाने वाले जीव ‘शवभक्षी जीव’ (स्कैवेंजर्स) कहलाते हैं। पाठ्यपुस्तक में इस तरह के कई जानवरों के नाम दिए गए हैं, लेकिन इनमें गिद्ध ही ऐसा एकमात्र जीव है, जो अपने आहार के लिए लगभग पूरी तरह से सड़े-गले शवों पर निर्भर रहता है। गिद्धों को ‘अपेक्स प्रीडैटर्स’ (खाद्य शृंखला के शीर्ष पर रहने वाले शिकारी) माना जाता है और कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-2026) के अध्याय-12 (‘How Nature Works in Harmony’) में इन बड़े पक्षियों को बाघों के साथ ‘बड़े मांसाहारी’ जानवरों की श्रेणी में रखा गया है।4

किसी समय भारत में लाखों की संख्या में गिद्ध हुआ करते थे।5 गाँव-शहरों में खुले मैदानों, कचरे के ढेरों और मरे हुए जानवरों, ख़ासकर मवेशियों के शवों पर इन्हें झुण्ड में मँडराते देखना आम बात थी (देखें चित्र-1)। भारत की पहली ‘बर्डवुमन’ जमाल आरा ने बच्चों के लिए लिखी अपनी किताब ‘वॉचिंग बर्ड्स’ (1970) में गिद्ध का वर्णन इस तरह किया है : “भारी-भरकम शरीर, गंजा सिर और पतली गर्दन की वजह से वह बहुत सुन्दर नहीं दिखता, लेकिन उड़ने में उसका कोई मुक़ाबला नहीं है। वह आसमान में ऊँचे उड़ते हुए चक्‍कर लगाते-लगाते नीचे की दुनिया पर नज़र रखता है। वह अपने साझेदारों यानी चीलों के साथ मिलकर गलियों, गाँवों व श्मशान घाटों पर गश्त लगाता है, कचरे के ढेरों से गन्दगी साफ़ करता है और सड़कों पर पड़े मरे जानवरों को हटाता है।6 फिर भी आज की पीढ़ी के विद्यार्थियों को इन पक्षियों को देखने का मौक़ा शायद ही कभी मिला होगा।

Disappearing Vultures fig 1
चित्र-1 : जनवरी 2016 में छतरपुर, मध्य प्रदेश में गिद्धों का एक झुण्ड मृत जानवर को खाते हुए दिखाई दिया। Credits: Arindam Aditya, Wikimedia Commons. URL: https://commons.wikimedia.org/wiki/File:A_flock_of_Vultures_on_carcass.jpg. License: CC BY-SA 4.0. International Deed.

ऐसा इसलिए क्योंकि क़रीब 25 साल पहले गाँवों और शहरों से गिद्ध अचानक बड़ी तेज़ी से लुप्‍त होने लगे। यह गिरावट इतनी तेज़ और भयावह थी कि इसे ‘महाविनाश’ कहा गया। नतीजतन, गिद्ध भारतीय उपमहाद्वीप में लुप्तप्राय प्रजाति की श्रेणी में आ गए। जैसा कि कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-5 में बताया गया है, “इनकी संख्या इस हद तक घट गई है कि अब इनके विलुप्त हो जाने का ख़तरा पैदा हो गया है।3

गिद्धों की संख्या में गिरावट का अहसास सबसे पहले ग्रामीणों को हुआ। उन्होंने ग़ौर किया कि मवेशियों के शव अब गाँवों के बाहर ही पड़े-पड़े सड़ने लगे थे। यह चिन्ता की बात थी, क्योंकि बहुत से रोगाणु ऐसे ही शवों में पनपते हैं। गिद्धों की मज़बूत चोंच, नुकीले नाखूनों और खुरदुरी जीभ ऐसे शवों को बड़ी तेज़ी से निपटाने में बहुत कुशल है। गिद्धों का झुण्ड मवेशी के एक शव को एक घण्टे से भी कम समय में साफ़ कर सकता है।7 उनकी अनुपस्थिति में, सड़े हुए शव चूहों व अन्‍य कृन्‍तकों (rodents) और जंगली कुत्तों को आकर्षित करने लगे। इनकी संख्या बढ़ने लगी और इसके साथ ही रेबीज़ जैसी बीमारियाँ इन्सानों में फैलने लगीं, ख़ासकर उन गाँवों में जहाँ बड़ी संख्या में मवेशी, भेड़-बकरियाँ और मुर्गे-मुर्गियाँ पाले जाते थे। सड़े-गले शवों से छुटकारा पाने के लिए अब किसान रसायनों का सहारा लेने लगे थे। इससे तालाब और पोखर न केवल जानवरों के शवों से निकले रोगाणुओं, बल्कि इन रसायनों से भी प्रदूषित होने लगे।8,9 यह प्रभाव उस अहम भूमिका को रेखांकित करते हैं जो गिद्ध हमारी बस्तियों को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाए रखने में निभाते थे।

वैज्ञानिकों ने इन पक्षियों की संख्या में अचानक आई गिरावट के कारणों की खोज शुरू की। लेकिन लगभग आठ साल तक यह एक रहस्य ही बना रहा। फिर जैसा कि कक्षा-8 की भूगोल की पाठ्यपुस्तक (2024) के अध्याय-2 (‘भूमि, मृदा,जल,प्राकृतिक वनस्‍पति और वन्‍य जीवन संसाधन’) में विद्यार्थी पढ़ते हैं, वैज्ञानिकों ने पाया है कि : “भारतीय उपमहाद्वीप में गिद्ध उन मवेशियों का मांस खाने के बाद किडनी फ़ेल होने से मर रहे थे, जिनका इलाज डाइक्लोफ़ेनाक नामक दवा से किया जा रहा था, जो कि एस्पिरिन और आईबुप्रोफ़ेन जैसी ही एक दर्द निवारक दवा होती है।10 चूँकि डाइक्लोफ़ेनाक सस्ती और आसानी से उपलब्ध थी, इसलिए पशु-चिकित्सक (जिन्हें गाँवों में प्रायः ढोरों के डॉक्टर कहते हैं) मवेशियों के इलाज में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते थे। जब ये मवेशी मर जाते, तो अन्य मृत जानवरों के शवों की तरह ही उनके शव भी गाँव के बाहर या कूड़े के ढेर पर छोड़ दिए जाते। अगर उनके मरने से पहले एक हफ़्ते के भीतर उन्हें डाइक्लोफ़ेनाक दी गई होती, तो उसका कुछ अंश शव में बचा रहता। गिद्ध जब इन शवों को खाते, तो दवा उनके शरीर में चली जाती। दवा की थोड़ी-सी मात्रा भी उनकी किडनियों को ख़राब कर देती, जिससे वे किडनी फेल होने से मर जाते।8,11

साल 2006 में भारत सरकार ने डाइक्लोफ़ेनाक के उत्पादन, बिक्री और पशु चिकित्सा में इस्‍तेमाल पर प्रतिबन्ध लगा दिया।12 इसके बाद देश भर में गिद्धों के संरक्षण के लिए शुरू किए गए बहुत से प्रयासों के चलते उनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी है। वैज्ञानिक इनकी संख्या पर लगातार नज़र रखे हुए हैं। उनका अनुमान है कि आज भी केवल कुछ हज़ार गिद्ध ही बचे हैं और उनके अस्तित्व पर अब भी ख़तरे की तलवार लटकी हुई है।12,13 सवाल यह है कि इनकी संख्या बढ़ने में इतना समय क्यों लग रहा है? आख़िर कुछ गिद्ध तो विनाश के उस दौर में भी बच गए थे। समय आने पर उन्होंने प्रजनन भी किया ही होगा। आप सोचेंगे कि 18 साल का समय गिद्धों को अपनी पुरानी संख्या के स्तर तक पहुँचने के लिए पर्याप्त होगा।

दरअसल वैज्ञानिकों ने पाया कि गिद्धों की संख्‍या में धीमी रिकवरी की असल वजह उनका प्रजनन चक्र है। ज़्यादातर गिद्ध साल में सिर्फ़ एक बार ही प्रजनन करते हैं। अन्य पक्षियों की तरह गिद्ध भी ‘ओविपैरस’ (अण्‍डप्रजक) होते हैं, यानी अण्डे देकर बच्चे पैदा करते हैं। कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-6 (‘जन्‍तुओं में जनन’) में विद्यार्थी पढ़ते हैं कि मछलियाँ और मेंढक एक बार में कई अण्डे देते हैं, जबकि मुर्गी केवल एक अण्डा देती है।14 उसी तरह मादा गिद्ध भी हर प्रजनन मौसम में सिर्फ़ एक अण्डा देती है। फिर, चूज़े को बड़ा होकर स्‍वयं अण्डे देने लायक बनने में 4 से 5 साल लग जाते हैं।15 इसके अलावा कई अण्डे और चूज़े शिकारी जानवरों द्वारा खा लिए जाते हैं। इसलिए आप देख सकते हैं कि गिद्धों की संख्या को फिर से पहले जैसे स्तर पर आने में कितना लम्बा वक़्त लगेगा। और फिर जब ऐसा लगा कि गिद्धों की संख्या में इज़ाफ़ा होना शुरू हुआ है तभी वैज्ञानिकों ने पाया कि डाइक्लोफ़ेनाक के अलावा छह और दवाएँ भी गिद्धों के लिए घातक साबित हो रही हैं। इन सभी दवाओं का इस्तेमाल मवेशियों के दर्द या बुखार के इलाज के लिए होता है। इनका असर भी वैसा ही था, यानी गिद्धों के शरीर में एक छोटी-सी मात्रा के जाते ही उनकी किडनी फ़ेल हो जाती थी और वे मर जाते थे।16 जनवरी, 2025 में भारत सरकार ने इनमें से एक और दवा (निमेसुलाइड) के उत्‍पादन, बिक्री और पशु चिकित्सा में इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इसके अलावा वैज्ञानिक मवेशियों के लिए ऐसी दवाएँ विकसित कर रहे हैं, जो गिद्धों के लिए सुरक्षित हों। पशु चिकित्सा में अब इनका ही इस्तेमाल करने की सिफ़ारिश की जा रही है।17

बॉक्स-1 : पाठ्यचर्या से सम्बन्ध

इस आलेख पर चर्चा और इससे सम्बन्धित गतिविधियों पर चर्चा (देखें गतिविधि शीट-1 और 2 और शिक्षक मागर्दर्शिका) के माध्यम से शिक्षक अपने विद्यार्थियों को स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (एनसीएफ़-एसई) 2023 में बताए गए कुछ प्रमुख पाठ्यचर्या लक्ष्यों तक पहुँचने में मदद कर सकते हैं।

  • मिडिल स्‍टेज विज्ञान :
  • CG-3 : [विद्यार्थी] अपने आस-पास के जीव-जन्तुओं की वैज्ञानिक ढंग से खोज-बीन करें। इसके ज़रिए वे विशेष रूप से निम्‍न क्षमताएँ हासिल कर सकते हैं :
  • (C-3.1) : “अपने प्राकृतिक परिवेश में दिखाई देने वाले जीव-जन्तुओं (जैसे…पक्षियों…) और विविधता का वर्णन करना। इसमें बहुत छोटे जीवों को भी शामिल करते हुए…।
  • (C-3.3) : “सजीवों और उनके वातावरण के बीच एक-दूसरे पर निर्भरता और प्रतिक्रिया के सम्‍बन्‍धों के पैटर्न का विश्‍लेषण करना।
  • CG-5 : [विद्यार्थी] विज्ञान, प्रौद्योगिकी और समाज के बीच के इंटरफेस को समझता है। विशेषतौर पर वे यह निम्‍नलिखित क्षमताएँ विकसित कर सकते हैं (C-5.2) : “विज्ञान/ प्रौद्योगिकी और समाज एक-दूसरे पर किस तरह से असर डालते हैं, इससे सम्बन्धित समाचारों और लेखों पर अपनी राय देना।
  • प्रिपरेटरी स्‍टेज पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस) :
  • CG-2 : [विद्यार्थी] अपने अनुभवों और आस-पास के अवलोकनों से प्रकृति में परस्‍पर-निर्भरता को समझता है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना का सम्मान करने का आधार विकसित करता है। वे विशेष रूप से निम्‍न क्षमताएँ विकसित कर सकते हैं :
  • (C-2.1) : “समझना कि उनके जीवन को कौन-सी प्राकृतिक और मानव-निर्मित व्यवस्थाएँ मदद करती हैं (पानी की आपूर्ति, नदियों के बहाव का सिस्‍टम, पौधों और जानवरों का जीवन चक्र, भोजन आदि)।
  • (C-2.3) : “बड़े-बुजुर्गों द्वारा बताई गई और स्‍थानीय कहानियों को परिवेश और उनके परिवार और समुदाय के जीवन में आने वाले बदलावों से जोड़कर देख पाना…।
  • CG-4 : [विद्यार्थी] सामाजिक और प्राकृतिक वातावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करें। विशेष रूप से वे निम्‍नलिखित क्षमताएँ विकसित कर सकते हैं (C-4.5) : “पौधों, पक्षियों और जानवरों की आवश्यकताओं (पानी, मिट्टी, भोजन, देखभाल) को पहचानना तथा यह समझना कि उन्हें किस तरह पूरा किया जा सकता है।18

चलते-चलते

गिद्ध मनुष्यों से लगभग 1.5 करोड़ वर्ष पहले से धरती पर मौजूद रहे हैं। फिर भी इन्सानों द्वारा बनाई गई एक दवा के प्रति उनकी कमजोरी की वजह से वे भारतीय उपमहाद्वीप से लगभग विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए!8,11 उनके लुप्‍त होने का इन्सानों पर इतना गहरा असर पड़ा कि यह हमें (विद्यार्थियों और शिक्षकों को) रुककर सोचने पर मजबूर करता है कि हमारा जीवन अन्य जीव-जन्तुओं से किस क़दर गुथा हुआ है (देखें बॉक्स-1)।

इस कहानी के ज़रिए विद्यार्थी इस भयावह नज़र आने वाले पक्षी की अहमियत को समझ सकते हैं, जिसे कक्षा-8 की भूगोल की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-25) के अध्याय-2 में “…पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण सफ़ाईकर्मी” कहा गया है।10 लेकिन यह कहानी एक और पहलू की तरफ़ भी हमारा ध्यान आकर्षित करती है। विज्ञान की प्रक्रिया के माध्यम से ही बीमार मवेशियों का इलाज करने वाली दवाइयाँ बनीं। विज्ञान की प्रक्रिया से ही हमें डाइक्लोफ़ेनाक और निमेसुलाइड जैसी उन सात दवाइयों के बारे में पता चला, जिनकी वजह से गिद्धों की मौत हुई और जो आगे भी उनके विनाश की वजह बन सकती हैं। पशु चिकित्सा में डाइक्लोफ़ेनाक और निमेसुलाइड के इस्तेमाल को प्रतिबन्धित करने, मवेशियों के इलाज के वास्ते गिद्ध-सुरक्षित दवाएँ और सरंक्षण के अनेक उपायों के ज़रिए इन पक्षियों की रक्षा करने में ही हमारी उम्मीद टिकी हुई है।19 ये हमें नए दृष्टिकोण के साथ सह-अस्तित्व से रहने का रास्ता दिखाती हैं।

मुख्‍य बिन्‍दु

ग़ायब होते गिद्ध
  • गिद्धों के लुप्‍त होने के इस मामले से प्रिपरेटरी स्‍टेज के ईवीएस और मिडिल स्‍टेज विज्ञान के विद्यार्थियों को जीवों की परस्पर निर्भरता को समझने का अवसर मिलता है।
  • भयावह दिखने वाले इन पक्षियों के लुप्‍त होने का मानव समुदायों पर जो प्रभाव पड़ा है, उससे मिडिल स्‍टेज विज्ञान के विद्यार्थी यह समझ सकते हैं कि स्‍वस्‍थ्‍य पारिस्थितिकीय तंत्र को बेहतर बनाए रखने में सफ़ाई करने वाले जीवों की भूमिका कितनी महत्त्वपूर्ण होती है।
  • गिद्धों की आबादी में अचानक से आई गिरावट और फिर धीरे-धीरे उनकी रिकवरी के कारणों की पड़ताल करते हुए विद्यार्थी यह समझ सकते हैं कि पाठ्यपुस्तक में दिए संरक्षण से जुड़े सिद्धान्तों की वास्तविक जीवन में कितनी अहमियत है।
  • बीमार मवेशियों के लिए दवाइयाँ विकसित करने में, उन दवाओं का गिद्धों पर प्रभाव पता करने और फिर इन पक्षियों के संरक्षण के वास्ते किए गए प्रयासों में वैज्ञानिकों की भूमिका के अध्ययन से मिडिल स्‍टेज विद्यार्थी समाज में विज्ञान की भूमिका का परीक्षण कर सकते हैं।

टिप्पणियाँ

  • Credits for the image (Indian Long-billed Vulture in Flight) used in the background of the article title: Chinmayisk, Wikimedia Commons. URL: https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Indian_long_billed_vulture_bottom_view_in_flight.jpeg. License: CC BY-SA 3.0 Unported Deed.
  • लेख में राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसन्‍धान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्रकाशित कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक तथा कक्षा-8 की विज्ञान एवं भूगोल पाठ्यपुस्‍तकों के विभिन्‍न अध्‍यायों से उद्धरण साभार लिए गए हैं। कक्षा-8 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक के अँग्रेज़ी संस्‍करण (2025-26) से भी उद्धरण साभार लिए गए हैं। इन उद्धरणों को हिन्‍दी में अनूदित किया गया है।
  • इस लेख में तीन शैक्षणिक संसाधन हैं, जिन्‍हें पत्रिका से अलग किया जा सकता है : गतिविधि शीट-I : गिद्ध कहाँ हैं?, गतिविधि शीट-II : गिद्धों के बारे में पूछो, और शिक्षक मार्गदर्शिका : गतिविधि शीट-I और II के लिए
  • लेख के हिन्‍दी अनुवाद की समीक्षा के लिए हम हृदय कान्‍त दीवान के आभारी हैं।

सन्दर्भ

  1. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसन्‍धान और प्रशिक्षण परिषद (2024)। ‘अध्‍याय-12: वन : हमारी जीवन रेखा’। जिज्ञासा, कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 149-162. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?ghsc1=12-13.
  2. National Council of Educational Research and Training (2025-2026). ‘Chapter 13: Our Home: Earth, a Unique Life Sustaining Planet’. Curiosity, Textbook of Science for Grade VIII: 223. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?hecu1=13-13.
  3. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसन्‍धान और प्रशिक्षण परिषद (2024)। ‘अध्‍याय-5 : पौधे एवं जन्‍तुओं का संरक्षण’। कक्षा-8 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 54-65. URL: https://ncert.nic.in/textbook/pdf/hhsc105.pdf.
  4. National Council of Educational Research and Training (2025-2026). ‘Chapter 12: How Nature Works in Harmony’. Curiosity, Textbook of Science for Grade VIII: 200. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?hecu1=12-13.
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  9. Bindra, P. S. (2018). ‘Declining vulture population can cause a health crisis’. Mongabay. URL: https://india.mongabay.com/2018/02/decliningvulture-population-can-cause-a-health-crisis/. Accessed on Dec 18, 2024.
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  19. John, S. and Majgaonkar, I. (2023). ‘Dizzying Decline of the Indian Vulture’. RoundGlass Sustain. URL: https://roundglasssustain.com/species/ indian-vultures-decline. Accessed on Dec 18, 2024.