जीबीएस प्रकोप को समझना

हम सभी मीडिया ख़बरों में पढ़-सुन रहे हैं कि जनवरी से मार्च, 2025 के बीच पुणे में गीयां-बारे सिंड्रोम (GBS) नामक एक गम्भीर बीमारी के मामले बढ़ गए हैं। (बॉक्स-1 देखें)। चूँकि कुछ ही दिनों या हफ़्तों के भीतर शहर के एक हिस्से से इस सिंड्रोम से दर्जनों के पीड़ित होने की ख़बरें आने लगी हैं, इसलिए शोधकर्ता इसे एक ‘प्रकोप (outbreak)’ के रूप में देखने लगे हैं (बॉक्स-2 देखें)।
GBS एक गम्भीर बीमारी है। जानकारी यह है कि अब तक इस बीमारी से 200 से अधिक लोग प्रभावित हो चुके हैं। आमतौर पर इतनी संख्या में मामले साल भर में रिपोर्ट होते हैं। सम्भवतः कुछ लोग इस बीमारी से मर भी गए हैं। इन आँकड़ों की विश्वसनीयता हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सूचना प्रणालियों की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। लेकिन यह बात साफ़ है कि इस बीमारी से कई लोग गम्भीर रूप से पीड़ित हुए हैं। इसलिए इस बीमारी के बारे में सोचने-विचारने में ही समझदारी है (शिक्षक मार्गदर्शिका-I देखें)।
बॉक्स-1 : ‘गीयां-बारे सिंड्रोम’ वास्तव में क्या है?
बीमारी के औपचारिक नाम से इसके बारे में बहुत कुछ पता नहीं चलता है। इस बीमारी के नाम में बस उन दो फ्रांसीसी चिकित्सकों के उपनाम हैं, जिन्होंने सौ से कुछ अधिक साल पहले इसके बारे में बताया था। ‘सिंड्रोम’ भी सिर्फ़ एक जटिलता का द्योतक शब्द है। हम अस्वस्थता के पैटर्न को सबसे पहले विशिष्ट ‘लक्षणों’ (बीमार व्यक्ति को जो चीज़ें असामान्य और असहज अनुभव होती हैं) और ‘संकेतों’ (जो अन्य लोग जैसे चिकित्सक, बीमार व्यक्ति या ‘रोगी’ में देखते हैं) के संयोजन के रूप में पहचानते हैं। अगर लक्षणों और संकेतों का कोई ख़ास संयोजन अस्वस्थ व्यक्तियों में बार-बार दिखाई दे तो यह अस्वस्थता का एक पैटर्न है, एक ‘सिंड्रोम’ है। यह विचार उपयोगी है, क्योंकि यह चिकित्सकों को इन ख़ास लक्षणों और संकेतों को कम करने पर केन्द्रित सहायक प्रयासों की योजना बनाने में मदद करता है। लेकिन परेशानी यह है कि यह लक्षण और संकेत सिर्फ़ अस्वस्थता के विवरण हैं। यह इस बारे में कुछ नहीं बताते कि इसका कारण क्या हो सकता है।
बॉक्स-2 : हम कब किसी बीमारी को ‘प्रकोप (outbreak)’ कहते हैं?
किसी बीमारी को प्रकोप मानना किसी ‘स्थान और समयकाल में’ उस बीमारी के सामने आने वाले मामलों की संख्या पर निर्भर है। उदाहरण के लिए, किसी एक मोहल्ले में यदि कुछ ही हफ़्तों के भीतर किसी बीमारी के कई सारे मामले सामने आए हों तो वह बीमारी प्रकोप कहलाती है। स्पष्ट है कि जीबीएस को प्रकोप की श्रेणी में रखने के लिए उस क्षेत्र में ‘प्रकोप’ शुरू होने से पहले प्रकरणों की आवृत्ति इतनी नहीं रही होगी। बस शंका की एक ही बात है : हम पक्के तौर पर कैसे कह सकते हैं कि इससे पहले वहाँ बीमारी के बहुत कम मामले थे? हम पक्के तौर पर तभी कह सकते हैं जब हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की सभी बीमारियों को दर्ज करने और उनके बारे में जानकारी रखने की सूचना व्यवस्था मजबूत हो और अच्छी तरह से काम कर रही हो। हम सभी इस बारे में अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि ऐसा होने की कितनी सम्भावना है।
GBS क्या है?
GBS के लक्षण और संकेत मुख्य रूप से वे हैं जो परिधीय तंत्रिकाओं (peripheral nerves) में क्षति और उनके सामान्य कार्यों में गड़बड़ी के कारण उभरते हैं (चित्र-1 देखें)। परिधीय तंत्रिकाएँ वे तंत्रिकाएँ हैं जो मस्तिष्क और मेरुरज्जू के बाहर होती हैं। मोटेतौर पर सभी तंत्रिकाएँ हमें संवेदनाओं को महसूस करने और मांसपेशियों को हिलाने-डुलाने में मदद करती हैं। इसलिए तंत्रिकाओं के क्षतिग्रस्त होने और उनके काम करने की क्षमता खोने का मतलब है मांसपेशियों को हिलाने-डुलाने की क्षमता का खोना (या लकवा लगना), सामान्य संवेदनाओं का ख़त्म हो जाना और उनकी बजाय दर्द और झुनझुनी (या ‘सुइयाँ’ चुभने) जैसे अजीब-अजीब ‘मिथ्या’ एहसास होना।

उदाहरण के लिए, लोगों को आमतौर पर ऐसा महसूस होने लगता है कि जैसे उन्होंने मोटे मोज़े या दस्ताने पहन रखे हैं और उन्हें चलने में या चाय की प्याली उठाने में कठिनाई हो रही है।
चूँकि GBS में आमतौर पर तंत्रिकाओं में क्षति (‘न्यूरोपैथी’ या तंत्रिकाविकार) हो जाती है और आमतौर पर यह परिधीय तंत्रिकाओं में होती है, इसलिए इसे ‘परिधीय न्यूरोपैथी’ कहा जाता है। लेकिन परिधीय तंत्रिकाविकार सिर्फ़ GBS में नहीं होता है। अन्य तंत्रिकाविकारों और GBS के बीच अन्तर इससे जुड़ी तीन बातों (जाँच परिणामों) से किया जाता है। पहली, स्थिति यह कि GBS प्रायः गम्भीर श्वसन या आँत के संक्रमण से प्रभावित हुए लोगों में संक्रमण ठीक हो जाने के कुछ दिनों या हफ़्तों बाद दिखाई देता है। दूसरी यह कि, इससे प्रभावित लोगों में ऐसे लक्षण (जैसे बुखार) नहीं दिखाई देते जो किसी अन्य संक्रमण की ओर इशारा करें। इससे यह सम्भावना घट जाती है कि न्यूरोपैथी किसी चल रहे सूक्ष्मजीवी संक्रमण का नतीजा है। तीसरा, प्रभावित लोगों के मस्तिष्क-मेरु द्रव (मस्तिष्क और मेरुरज्जू के आस-पास के द्रव (cerebrospinal fluid) में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है। ऐसा इस तथ्य के बावजूद होता है कि इस बीमारी के लक्षणों और संकेतों में मस्तिष्क और मेरुरज्जू पर बहुत कम ही प्रभाव पड़ता प्रतीत होता है। यह सब कुछ काफ़ी कच्चा व अनिश्चित-सा लगता है और है भी। इस सबसे इस बात का कोई सुराग़ नहीं मिलता कि GBS वास्तव में होता किस कारण है।
GBS के कारकों के बारे में हम क्या जानते हैं?
ऐसा लगता है कि GBS ‘संक्रमण उपरान्त’ होता है। यानी कि यह लोगों में संक्रमण होने और उस संक्रमण के ठीक हो चुकने के तुरन्त बाद होता है। यह ज़्यादातर आँत के संक्रमण के बाद दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी (Campylobacter jejuni – C. jejuni) बैक्टीरिया से हुए आँत के संक्रमण (जो GBS के लगभग एक तिहाई मामलों में कारक के रूप में पाया गया है) और हेपेटाइटिस-ई वायरस के संक्रमण के बाद GBS हो सकता है। या फिर यह श्वसन संक्रमण, जैसे माइकोप्लाज्मा न्यूमोनिए (Mycoplasma pneumoniae) के बाद उभरता है। GBS का जुड़ाव ज़ीका वायरस और साइटोमेगालोवायरस से होने वाले संक्रमणों से भी जुड़ा पाया गया है। ऐसे भी दावे हैं कि कभी-कभी टीकाकरण के बाद भी GBS होता है। लेकिन, टीकाकरण के बाद GBS के मामले बहुत ही दुर्लभ मामलों में प्रमाणिक तौर पर रिपोर्ट हुए हैं। ये मामले पिछले सालों में COVID-19 के ख़िलाफ़ कुछ अत्यधिक प्रभावी एडेनोवायरस-आधारित टीके लगवाने के बाद दिखे हैं।
यह सही है कि GBS एक दुर्लभ बीमारी है, लेकिन संक्रमण (विशेष रूप से आँत और श्वसन के संक्रमण) तो काफ़ी आम हैं। हम सभी को संक्रमण होते रहते हैं। इसका मतलब यह है कि सभी समुदायों में कभी-न-कभी GBS के कुछ मामले होते हैं। वास्तव में, यह बता पाना आसान नहीं है कि GBS से कौन प्रभावित होगा और कौन नहीं। हर किसी को GBS होने का थोड़ा ख़तरा है। यदि संक्रमण प्रकोप का रूप ले ले, तो GBS के मामले बढ़ भी सकते हैं। इसलिए यदि GBS का प्रकोप फैला है, तो इसे समझने के लिए यह देखना चाहिए कि क्या किसी संक्रमण का प्रकोप हुआ है। यह COVID-19 जैसे किसी श्वसन संक्रमण का प्रकोप हो सकता है या दूषित जल आपूर्ति से जुड़ा आँत का संक्रमण हो सकता है (शिक्षक मार्गदर्शिका-।। देखें)।
लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं है कि श्वसन या आँत के संक्रमण से पीड़ित हर व्यक्ति को GBS होगा। ऐसा अनुमान है कि इन संक्रमणों से प्रभावित होने वाले कई हज़ार लोगों में से केवल एक को GBS होता है। तो, वास्तव में मुश्किल पहेली यह है कि दुर्लभ GBS-प्रभावित लोगों में ऐसा क्या अलग होता है जिससे संक्रमण ठीक होने के बाद यह तंत्रिकाविकार का कारण बनता है? हालाँकि हम अभी तक इसे बहुत अच्छी तरह से नहीं समझ पाए हैं, लेकिन यह एक ‘ऑटोइम्यून’ (आत्म-प्रतिरक्षा) विकार लगता है। इसका क्या मतलब है? आमतौर पर शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) हमारे शरीर में घुसने वाले और हमारे लिए ख़तरा या नुक़सान पैदा करने वाले ख़तरनाक ‘हमलावरों’ (जैसे सूक्ष्मजीव) को पहचानता है और ऐसी प्रतिक्रियाएँ करता है जो इन ख़तरों से छुटकारा पाने में मदद करती हैं। ये प्रतिरक्षा प्रक्रियाएँ आमतौर पर अपने शरीर के घटकों को लक्ष्य के रूप में नहीं देखती हैं। लेकिन, यदि ऐसा होने लगे तो यह आत्म-प्रतिरक्षा प्रक्रिया अपने ही शरीर के कुछ हिस्सों से छुटकारा पाने की कोशिश करेगी। साफ़ है कि ऐसा होना कुछ परेशानी और सम्भवतः गम्भीर बीमारी का कारण बन सकता है। वास्तव में कभी-कभी आत्म-प्रतिरक्षा प्रक्रियाएँ सामने आती भी हैं। जब यह प्रतिरक्षा प्रक्रियाएँ उन विनियामक तंत्रों से बच निकलती हैं जो उसे नियंत्रित रखते हैं तो इनसे बीमारी हो सकती है। GBS से प्रभावित आधे से ज़्यादा लोगों में इस बात के प्रमाण मिले हैं कि उनमें आत्म-प्रतिरक्षा प्रक्रियाएँ सक्रिय हो जाती हैं। यह प्रक्रियाएँ परिधीय तंत्रिकाओं के कुछ हिस्सों को हमलावर लक्ष्य के रूप में पहचानती हैं और इनके विरुद्ध कार्यवाही करने लगती हैं। इन तंत्रिकाओं के विरुद्ध प्रतिरक्षा तंत्र की गतिविधि तंत्रिका क्षति का कारण बनती है और GBS के लक्षण व संकेत उभरने लगते हैं।
यह सब थोड़ी कच्ची-पक्की-सी समझ है, और अनिश्चितताओं से घिरी है कि वास्तव में ऐसा ही होता है। ऐसे लोग भी हैं और बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्हें सूक्ष्मजीव संक्रमण होता है लेकिन उन्हें GBS नहीं होता। और, ऐसे भी लोग हैं जिन्हें कोई सूक्ष्मजीव संक्रमण नहीं हुआ, लेकिन उनमें GBS उभरा। तो, क्या ऐसे GBS से पीड़ित लोगों को याद ही नहीं रहा कि उन्हें हाल ही में कोई संक्रमण हुआ था? या उनमें संक्रमण इतना मामूली था कि उन्हें इसका पता ही नहीं चला? या सच में GBS बिना किसी पूर्व संक्रमण के हो सकता है? हमें अभी तक इस बारे में पता नहीं है। अगर GBS इस तरह की आत्म-प्रतिरक्षा से ही होता है, तो इसका श्वसन या आँत के संक्रमण से क्या नाता है? ऐसा लगता है कि मामला ‘नक़लपट्टी’ का है। जब हमें सूक्ष्मजीव संक्रमण होता है, मसलन सी-जेजुनी जीवाणु के कारण आँत का संक्रमण होता है, तो हमारा प्रतिरक्षा तंत्र सी-जेजुनी में पाए जाने वाले टारगेट पर हमले के लिए सक्रिय हो जाता है। यह सक्रियता हमें संक्रमण से छुटकारा पाने में हमारी मदद करती है। लेकिन, कुछ बिरली स्थितियों में, जिन कारणों को हम अभी भी नहीं समझ पाए हैं, तंत्रिका तंत्र को अपने शरीर की तंत्रिकाएँ सूक्ष्मजीवी हमलावरों की तरह प्रतीत होती हैं। इसलिए कुछ लोगों में (उदाहरण के लिए) सी-जेजुनी के ख़िलाफ़ जो एंटीबॉडी बनती हैं वे तंत्रिका घटकों के ख़िलाफ़ भी काम करती हैं। हमें नहीं पता कि इन लोगों में यह फ़र्क़ कैसे आ जाता है। इसके अलावा, GBS आमतौर पर एक ही व्यक्ति में बार-बार नहीं होता है। इसलिए यह भी स्पष्ट नहीं है कि कैसे सिर्फ़ एक बार ही इस तरह की नक़लपट्टी होती है और उसके प्रति आत्म-प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया करते हैं।
यहाँ भी मामला पेचीदा ही है। आत्म-प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को उकसाने वाले संक्रमण के दौरान ही नक़लपट्टी के प्रति भी आत्म-प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शक्तिशाली होनी चाहिए। तो, संक्रमण के दौरान तंत्रिका क्षति क्यों शुरू नहीं होती है? संक्रमण के लक्षण कम होने के कुछ दिनों या हफ़्तों बाद ये लक्षण क्यों दिखाई देते हैं? इस बारे में हमारी अभी तक कोई समझ नहीं है। अभी तक हम इतना ही समझते हैं, ऐसा लगता है कि GBS इसी तरह होता है।
GBS का इलाज कैसे किया जाता है?
चूँकि हम इसके कारणों को अच्छी तरह से नहीं समझते हैं, इसलिए अमूमन GBS के लक्षणों और संकेतों का ही इलाज किया जाता है। अगर प्रभावित व्यक्ति अपनी मांसपेशियाँ हिला-डुला न पाएँ और अपने शरीर के कुछ हिस्सों में संवेदना महसूस न कर पाएँ, तो वे बिस्तर पकड़ लेंगे और उन्हें लगातार गहन और कुशल सेवा-सुश्रुषा की आवश्यकता होगी। लगभग चार-पाँच में से एक मामले में, लोगों को साँस लेने में कठिनाई होने लगती है क्योंकि उनकी श्वसन सम्बन्धी मांसपेशियाँ हरक़त नहीं कर पाती हैं। इस स्थिति में मरीज़ को अस्पताल के आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखने की ज़रूरत होगी। ऐसी विकट स्थितियों में इन सब देखभाल और इलाज के बावजूद मरीज़ मर भी सकते हैं और मरते भी हैं। इन स्थितियों में पहुँचे 20 में से एक व्यक्ति की मृत्यु होती है। और आमतौर पर 10 में से सात लोग पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं, लेकिन ठीक होने में महीनों लग सकते हैं। कुछ मामलों में, कुछ मांसपेशियों की कमज़ोरी बहुत लम्बे समय तक बनी रह सकती है।
निहायत ज़रूरी अक्षमता सम्बन्धी देखभाल के अलावा, रोगी का इलाज प्रायः किसी स्वस्थ व्यक्ति के रक्त से इम्युनोग्लोबुलिन देकर भी किया जाता है। इम्युनोग्लोबुलिन उन सभी एंटीबॉडी का समूह है जो एक स्वस्थ व्यक्ति (दाता) का शरीर बनाता है (बॉक्स-3 देखें)।
एंटीबॉडी प्रोटीन होते हैं जो प्रतिरक्षा तंत्र विशिष्ट टारगेट के ख़िलाफ़ बनाता है। इसलिए इम्युनोग्लोबुलिन में मौजूद एंटीबॉडी किसी रोगाणु, टीके आदि के विरूद्ध कार्य कर सकती हैं, जिनसे दाता का सामना हुआ हो। यहाँ अगला अनसुलझा सवाल आ खड़ा होता है : यह उपचार आत्म-प्रतिरक्षा के कारण हुई तंत्रिका क्षति से राहत दिलाने में कैसे मदद करता है? इसकी कई सम्भावित व्याख्याएँ हो सकती हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हम इसके बारे में नहीं जानते। ऐसा लगता है कि यह तरीक़ा काम करता है तो इससे उपचार किया जाता है, हालाँकि यह पूरी तरह से कारगर या विश्वसनीय नहीं है। और फिर यह अन्य अध्ययन किए जा रहे अधिक केन्द्रित उपचारों की अपेक्षा सस्ता है, जैसे कि वे जो तंत्रिका के लिए विशिष्ट एंटीबॉडी हटाते हैं।
बॉक्स-3 : एंटीबॉडी क्या हैं?
कक्षा-8 (NCERT, 2024-2025) की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक का अध्याय-2 (‘सूक्ष्मजीव : मित्र और शत्रु’) एंटीबॉडी का परिचय कुछ इस प्रकार देता है : “जब कोई बीमारी फैलाने वाला सूक्ष्मजीव हमारे शरीर में प्रवेश करता है तो शरीर इस हमलावर से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाता है। शरीर यह भी याद रखता है कि अगर यह सूक्ष्मजीव दोबारा शरीर में आया तो उससे कैसे लड़ना है। अगर मृत या कमज़ोर सूक्ष्मजीव स्वस्थ शरीर में प्रवेश करता है, तो शरीर उपयुक्त एंटीबॉडी बनाकर हमलावर बैक्टीरिया (सूक्ष्मजीव) से लड़ता है और उन्हें मार देता है। एंटीबॉडी शरीर में बनी रहती हैं और हम सुरक्षित रहते हैं।”1
बॉक्स-4 : पाठ्यचर्या से सम्बन्ध :
यह थीम और इसके इर्द-गिर्द की चर्चाएँ शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF-SE) 2023 में सूचीबद्ध निम्नलिखित पाठ्यचर्या लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकती हैं :
- मिडिल स्टेज विज्ञान :
- CG-3 : [विद्यार्थी] वैज्ञानिक दृष्टि से (या वैज्ञानिक शब्दावली में) सजीव दुनिया के बारे में खोज-बीन करता है। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों में निम्नलिखित दक्षता विकसित करने में मदद कर सकता है : C-3.1 : “अपने आस-पास के प्राकृतिक परिवेश में देखे गए विविध जीवों (कीट, केंचुआ, घोंघे, पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, मकड़ियाँ, विविध पौधे और कवक) का वर्णन करना, इन जीवों में सूक्ष्मजीव भी शामिल हो सकते हैं।”2
- CG-7 : [विद्यार्थी] विज्ञान से सम्बन्धित प्रश्न, अवलोकन और निष्कर्ष व्यक्त करता है। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों को निम्नलिखित दक्षता विकसित करने में मदद कर सकता है : C-7.1 : “वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग कर मौखिक और लिखित रूप में एवं दृश्यांकन के माध्यम से विज्ञान को सटीक रूप में व्यक्त करना।”2
- CG-9 : [विद्यार्थी] वैज्ञानिक ज्ञान के सभी क्षेत्रों में सबसे ताज़ा खोजों, विचारों और सीमाओं के बारे में जागरूकता विकसित करे ताकि वह यह समझ सके कि विज्ञान हमेशा विकसित होता रहता है और अभी भी कई प्रश्न अनुत्तरित हैं। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों में निम्नलिखित दक्षता विकसित करने में मदद कर सकता है : C-9.1 : “ऐसी अवधारणाएँ बताना जो अध्ययन किए जा रहे विषयों की सबसे हालिया समझ दर्शाती हों — सिर्फ़ परिचय से लेकर विद्यार्थियों के विकास चरण के हिसाब से उपयुक्त अवधारणात्मक समझ के विकास तक।”2
- प्रिपरेटरी स्टेज पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस) :
- CG-2 : [विद्यार्थी] अवलोकन और अनुभवों के माध्यम से अपने पर्यावरण में परस्पर निर्भरता को समझता है, जिससे उसमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के विचार को बढ़ावा देने का आधार विकसित हो। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों को निम्नलिखित दक्षता विकसित करने में मदद कर सकता है : C-2.1 : “प्राकृतिक और मानव निर्मित ऐसी प्रणालियों की पहचान जो उनके जीवन को चलाती हैं (जल आपूर्ति, जल चक्र, नदी प्रवाह प्रणाली… भोजन…)।”2
- CG-3 : [विद्यार्थी] बताता है कि विभिन्न (सामान्य और आपातकालीन) स्थितियों में ख़ुद की और दूसरों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों को निम्नलिखित दक्षताएँ विकसित करने में मदद कर सकता है : (i) C-3.1 : “मनुष्यों, पक्षियों और जानवरों की बुनियादी सुरक्षा आवश्यकताओं और संरक्षण (स्वास्थ्य और स्वच्छता, भोजन, पानी… सावधानियाँ, आपातकालीन, उत्पीड़न और असुरक्षित स्थितियों के बारे में जागरूकता…) का वर्णन करना।”2
इस विषय पर चर्चा कक्षा-8 के विज्ञान के लिए निम्नलिखित सीखने के उद्देश्यों को पूरा करने में भी मदद कर सकती है :
- हानिकारक सूक्ष्मजीवों के वर्ग को सूचीबद्ध करने के लिए रोगजनकों को परिभाषित करें।
- सूक्ष्मजीवों के हानिकारक प्रभावों को समझाने के लिए मनुष्यों, पौधों और जानवरों में सूक्ष्मजीवों के कारण होने वाली बीमारियों की सूची बनाएँ।3
चलते-चलते
GBS एक ऐसी बीमारी है जो कुछ ही हफ़्तों में अपने आप ही ठीक हो जाती है, बशर्ते इससे प्रभावित लोगों को हम तब तक जीवित और कार्यशील रखें, उनकी देखभाल करें। यह तो GBS की एक और गुत्थी है जिसे हम अभी तक ठीक से समझ नहीं पाए हैं। यदि कुछ रोगाणुओं के ख़िलाफ़ मुस्तैद हुई प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अपनी ही तंत्रिकाओं को प्रभावित करने लगती है और बीमारी का कारण बनती है, तो वह थम कैसे जाती है? यह रोगजनक प्रतिक्रिया शुरू में सूक्ष्मजीवों के कारण सक्रिय होती है, इसलिए ऐसा सम्भव है कि जब सूक्ष्मजीव मौजूद ही न रहें तो यह कम होते-होते बन्द हो जाती है।
कुल मिलाकर, GBS के बारे में बहुत कुछ ऐसा है जो हम नहीं जानते (बॉक्स-4 देखें)। हालाँकि, हम इतना जानते हैं कि यह आँत के संक्रमण के कारण हो सकता है। इसलिए, ज़ाहिर-सी बात है कि हमें अपने खान-पान के बारे में स्वच्छता व सावधानी रखना चाहिए।
मुख्य बिन्दु
- जनवरी, 2025 की शुरुआत से महाराष्ट्र के पुणे में GBS के मामलों में वृद्धि ख़बरें आ रही हैं। यह दुर्लभ आत्म-प्रतिरक्षा विकार लोगों में श्वसन या आँत का संक्रमण ठीक होने के तुरन्त बाद होता है। मुख्य रूप से इसके लक्षण और संकेत ऐसे हैं जो परिधीय तंत्रिकाओं में क्षति और उनके कार्य करने की क्षमता खोने के परिणामस्वरूप होते हैं।
- चूँकि GBS ख़बरों में है और यह लोगों के लिए गहन चिन्ता का विषय है, इसलिए इसे विज्ञान के व्यावहारिक अनुप्रयोग के उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। विद्यार्थियों को अख़बारों की (स्थानीय भाषाओं के अख़बारों की भी) कतरनों की मदद लेकर इस बीमारी के कारणों, लक्षणों, निदान, उपचार और निवारक उपायों के बारे में पता करने के लिए कहा जा सकता है।
- चूँकि GBS के मामलों में यह वृद्धि दूषित पानी से जुड़ी है, इसलिए विद्यार्थियों ने EVS और विज्ञान के पाठ्यक्रमों में स्वच्छ पेयजल तक पहुँच के बारे में जो पढ़ा उसका वास्तविक दुनिया से जुड़ाव बनाने में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। विद्यार्थियों को यह पता लगाने के लिए कहा जा सकता है कि उनके स्कूल और घरों में पानी कहाँ से आता है, साथ-ही-साथ बीमारी के जोख़िम को कम करने के लिए इसे कैसे संग्रहित और उपचारित किया जाता है।
आभार
आई वंडर…में यह लेख लिखने के लिए सत्यजित रथ को आमंत्रित करने में मदद तथा हिन्दी अनुवाद की समीक्षा करने के लिए सम्पादक मण्डल हृदय कान्त दीवान का आभारी है।
टिप्पणियाँ
- Credits for the image (Child Drinking Water) used in the background of the article title: Anil Gulati, India Water Portal. URL: https://www.flickr.com/photos/indiawaterportal/4483915884. License: CC BY-NC-SA 2.0 Generic Deed.
- इस लेख के साथ दो कक्षा संसाधन हैं : शिक्षक मार्गदर्शिका-। : विद्यार्थियों द्वारा जाँच-पड़ताल करने के लिए एक थीम के रूप में GBS तथा शिक्षक मार्गदर्शिका-।। : GBS और दूषित जल।
सन्दर्भ
- National Council of Educational Research and Training (2024). ‘Chapter 2: Microorganisms: Friend and Foe’. Science Textbook for Grade VIII: 17-31. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?hesc1=2-13.
- National Steering Committee for National Curriculum Frameworks (2023). ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.
- Central Board of Secondary Education (2020). ‘Teachers’ Resource for Achieving Learning Outcomes, Classes 1 to 10’. URL: https://cbseacademic.nic.in/web_material/Manuals/TeachersResource_LODoc.pdf.