विज्ञान की कक्षा में नीति और अमल का तालमेल

अनुवाद : हिमालय तहसीन | पुनरीक्षण : सुशील जोशी | कॉपी एडिटर : प्रतिका गुप्ता

शालेय विज्ञान शिक्षा नीतियाँ सिफ़ारिश करती हैं कि शिक्षक बच्चों को ख़ुद करके सीखने का अनुभव मुहैया करवाएँ और पाठ्यपुस्तक की अवधारणाओं को उनकी वास्तविक दुनिया से जोड़ें। शासकीय स्कूलों में मिडिल स्‍टेज विज्ञान की कक्षाओं में इस विचार की क्या भूमिका है?

विज्ञान की अच्छी शिक्षा वह है जो बच्चों को प्रत्यक्ष अनुभवों के ज़रिए अवधारणाओं को सीखने में और अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इनकी प्रासंगिकता को देखने में मदद करती हो। शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-SE 2023) में इन दोनों पहलुओं पर ज़ोर दिया गया है (बॉक्स-1 देखें)।

विज्ञान को सीखने में, ‘करने’ (‘doing’ science) की भूमिका को व्यापक रूप से पहचाना व स्‍वीकारा जाता है। बहरहाल, मैं इस सन्दर्भ में दमोह (मध्य प्रदेश) में अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन की विज्ञान टीम के मेरे सहकर्मियों और अपने अनुभवों से हासिल तीन व्यावहारिक तरीक़े पेश करना चाहूँगा जिन्हें हमने कक्षा के कामकाज में असरदार रूप से मददगार बनते देखा है :

  • टॉपिक की शुरुआत किसी गतिविधि से शुरू करने से रुचि बढ़ती है। ऐसा हमने न सिर्फ़ कक्षा में विद्यार्थियों के साथ बल्कि कार्यशाला में शिक्षकों के साथ भी देखा है। उदाहरण के लिए, हम ऐसा सवाल पूछकर सत्र की शुरुआत करते हैं जिसका जवाब विद्यार्थी या शिक्षक कोई गतिविधि करके और अपने अवलोकन दर्ज करके ही दे सकते हैं। इससे उनकी जिज्ञासा बढ़ती है, ज़्यादा सवाल सामने आते हैं और जाँच-पड़ताल को बढ़ावा मिलता है।
  • हममें से कई लोगों ने अपनी पाठ्यपुस्तक में दिए प्रयोगों और गतिविधियों के चित्रण को याद कर लिया है। लेकिन, हम सवाल करना और सीखना तभी शुरू करते हैं, जब हम ख़ुद कोई गतिविधि करने की कोशिश करते हैं। मिसाल के तौर पर, हाल ही में एक कार्यशाला में हमने शिक्षकों से एक गतिविधि करवाई जिसमें उन्हें मोमबत्ती की लौ के प्रतिबिम्ब का अध्ययन करने के लिए अवतल दर्पण (concave mirror) का इस्तेमाल करना था। उन्होंने कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय-11 (प्रकाश) में इस गतिविधि का चित्रण देखा था, लेकिन उन्हें इसे ख़ुद आज़माने का मौक़ा नहीं मिला था (चित्र-1 देखें)।5 उन्हें कुछ कोशिशों के बाद समझ आया कि दर्पण, परदा और वस्तु को एक-दूसरे के सापेक्ष कहाँ रखा जाना चाहिए।
  • किसी गतिविधि को करने और उससे प्राप्‍त अवलोकनों को साझा करने की प्रक्रिया से रचनात्मकता को बढ़ावा मिलता है। पहले से तैयार जवाब पाने के बजाय विद्यार्थी एवं शिक्षक सोचने और समझने के अलग-अलग तरीक़े सामने लाने लगते हैं। विद्यार्थी और शिक्षक की समझ के इर्द–गिर्द चर्चा करने से दोनों को तर्क करने की क्षमता और वैज्ञानिक रवैया विकसित करने में मदद मिल सकती है।
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चित्र-1 : कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय-11 (प्रकाश) के एक चित्र के आधार पर निर्मित। यह चित्र दिखाता है कि अवतल दर्पण से प्रकाश का परावर्तन होने पर बनने वाले प्रतिबिम्ब को देखने के लिए सामग्री को कैसे जमाया जाता है। Credits: i wonder… Apr 2025 issue. License: CC BY-NC 4.0.

बॉक्स-1 : नीतिगत दस्‍तावेज़ों में स्कूली विज्ञान

स्कूल की विज्ञान शिक्षा के उद्देश्यों पर अनुभाग में, एनसीएफ़–एसई (NCF–SE 2023) ज़ोर देता है कि विद्यार्थी : “…व्यवस्थित रूप से पड़ताल करते हुए प्राकृतिक और भौतिक दुनिया की समझ विकसित करें। विज्ञान सीखने से अवलोकन, विश्लेषण और नतीजे निकालने जैसी महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ भी विकसित होती हैं। ऐसा होने पर लोग वैज्ञानिक मिज़ाज, समालोचनात्मक और साक्ष्य-आधारित सोच, प्रासंगिक प्रश्न पूछने, रीति-रिवाज़ों का विश्लेषण करने और ज़रूरी बदलाव के लिए काम करते हुए समाज और अपने कामकाज के क्षेत्र में सार्थक भागीदारी के लिए सक्षम बनते हैं।1 इसी तरह, विज्ञान से जुड़ी पाठ्यचर्या के लक्ष्यों और दक्षताओं की बात करते हुए, एनसीएफ़–एसई (2023) शिक्षकों से यह सुनिश्चित करने पर ज़ोर देता है कि विद्यार्थियों में : “…अवधारणात्मक समझ के साथ-साथ, उम्र के अनुसार उपयुक्त वैज्ञानिक पड़ताल की क्षमताएँ विकसित होंगी। इन अवधारणाओं और क्षमताओं का चयन विषय के नज़रिए से और दैनिक जीवन में उपयोगिता के लिहाज़ से किया जाता है। इस तरह से विद्यार्थी अपने आस-पास की दुनिया को ज़्यादा गहराई से समझने लगते हैं, वे चर्चा और प्रयोग के ज़रिए विभिन्न स्तरों पर वैज्ञानिक प्रश्नों की खोजबीन करते हैं, और इस समझ को अलग-अलग ढंग से व्यक्त करना सीखते हैं।1

ये दोनों पहलू मिडिल स्‍टेज में ख़ासतौर से महत्त्वपूर्ण हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के फ़ोकस समूह (2006) ने विज्ञान के शिक्षण पर जो पोजीशन पेपर पेश किया था, उसके अनुसार इस स्तर पर विद्यार्थियों को : “…अपने जाने-पहचाने अनुभवों के ज़रिए विज्ञान के सिद्धान्तों को सीखने में तल्लीन होना चाहिए, उन्हें हाथों से काम करते हुए सरल तकनीकी इकाइयाँ और मॉड्यूल बनाने चाहिए (जैसे वज़न उठाने के लिए पवनचक्की का कामकाजी मॉडल डिज़ाइन करना और बनाना), और गतिविधियों एवं सर्वे के ज़रिए पर्यावरण और स्वास्थ्य पर ज़्यादा-से-ज़्यादा सीखना जारी रखना चाहिए। उन्हें वैज्ञानिक अवधारणाओं तक मुख्यतः गतिविधियों और प्रयोगों के ज़रिए पहुँचना चाहिए। इस स्तर पर विज्ञान की विषयवस्तु को माध्यमिक विद्यालय के विज्ञान का तनु (diluted) संस्करण नहीं माना जाना चाहिए। सामूहिक गतिविधि, साथियों और शिक्षकों के साथ चर्चा, सर्वे, डेटा को व्यवस्थित करना और प्रदर्शनियों के ज़रिए स्कूलों और आस-पड़ोस में उनका प्रदर्शन करना, आदि शिक्षणशास्त्र के ज़रूरी घटक होने चाहिए..।2

मुझे लगता है कि ये उद्देश्य और लक्ष्य गाँधीजी के मस्तिष्क–हृदय–हाथ के विचार (head-heart-hand framework) और ब्लूम (Bloom) के वर्गीकरण के संज्ञानात्मक-भावात्मक-मनोप्रेरक कौशलों (cognitive-affective-psychomotor skills) (मस्तिष्क से जुड़े संज्ञानात्मक कौशल, हृदय से जुड़े भावात्मक कौशल और हाथ से जुड़े मनोप्रेरक कौशल) के ढाँचे से प्रभावित हैं।3,4

विज्ञान सीखने-सिखाने में करके सीखना सरकारी स्कूलों में ख़ासतौर पर महत्त्वपूर्ण है। इसकी एक मिसाल मध्य प्रदेश में देखी जा सकती है। शिक्षकों की कमी की वजह से विज्ञान सहित हर विषय के लिए कक्षा 6–8 के विद्यार्थियों के मल्टीग्रेड समूह बनाए जाते हैं। शिक्षकों को पता होता है कि प्रत्येक विद्यार्थी किस कक्षा स्तर पर है, लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि किसी टॉपिक के बारे में विद्यार्थियों की समझ उनकी कक्षा के स्तर से मेल खाती हो। इसके समाधान के लिए, हमारा सुझाव है कि शिक्षक हर टॉपिक की शुरुआत किसी गतिविधि से करें। मसलन, कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) का अध्याय-4 (अम्ल, क्षार और लवण) अम्ल और क्षार से विद्यार्थियों का परिचय कराता है।6 शिक्षक इस अध्याय की शुरुआत रोज़मर्रा के पदार्थों को अम्लीय, क्षारीय या उदासीन के रूप में पहचानने और उनके समूह बनाने की विद्यार्थियों क्षमता के आकलन से कर सकते हैं। विद्यार्थियों को यह गतिविधि करते हुए देखने से शिक्षकों को इस विषय पर उनकी समझ का वर्तमान स्तर मालूम हो जाएगा और वे उसके मुताबिक़ विद्यार्थियों के समूह बना सकते हैं। इस तरह, ऐसे हर समूह में कक्षा-6 से 8 के विद्यार्थी हो सकते हैं। अब शिक्षक पूरी कक्षा को अम्ल-क्षार संयोजनों के साथ उदासीनीकरण अभिक्रियाओं के बारे में बता सकते हैं। लेकिन हर समूह को उसकी वर्तमान समझ के स्तर के लिए उपयुक्‍त जटिलता के स्तर वाली गतिविधि दी जा सकती है।

एक अन्‍य मिसाल महामारी और लॉकडाउन से जुड़ी है। इस दौरान विद्यार्थियों को साक्षरता और संख्या-ज्ञान सीखने में बहुत नुक़सान हुआ था। इसका विज्ञान सीखने पर भी बहुत असर हुआ। इसे एक उदाहरण से समझें। कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) का अध्याय-13 (प्रकाश) बच्चों का परावर्तन से परिचय ऐसी गतिविधियों के ज़रिए कराता है, जिनमें उन्हें दूरी और कोण मापने की ज़रूरत होती है (चित्र-2 देखें)।7

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चित्र-2 : कक्षा 8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय 13 (‘प्रकाश’) के एक चित्र के आधार पर निर्मित। यह चित्र विद्यार्थियों को दिखाता है कि आपतन और परावर्तन के कोण कैसे नापे जाते हैं। Credits: i wonder… Apr 2025 issue. License: CC BY-NC 4.0.

उम्मीद की जाती है कि बच्चे कक्षा 2-4 की गणित की पढ़ाई में लम्बाई और दूरी मापना सीख चुके होंगे। उन्हें कक्षा-5 के गणित में कोणों से परिचित कराया जाता है। लेकिन कक्षा-7 के विज्ञान के शिक्षकों ने पाया कि परावर्तन के बारे में अवधारणाएँ सिखाने के लिए उन्हें पहले बच्चों को कोण को मापना सिखाना होगा। इसी तरह, कई बच्चे ऐसे थे जो गतिविधि कर पा रहे थे, लेकिन साक्षरता का ह्रास होने की वजह से वे अपने अवलोकनों को दर्ज करने या अपनी समझ को मौखिक या लिखित रूप से बताने में असमर्थ थे। इन चुनौतियों के बावजूद विज्ञान सीखना थम नहीं गया था। सरकारी स्कूल के शिक्षकों ने गाँवों में ‘मोहल्ला कक्षाएँ’ लगाईं और इनमें 8-10 बच्चों के समूहों के साथ काम किया। यहाँ भी गतिविधि पर आधारित तरीक़ा कारगर साबित हुआ। उदाहरण के लिए, कक्षा-5 की पर्यावरण अध्ययन (EVS) की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय-7 (पानी के प्रयोग) में बच्चों से कहा गया है कि वे पानी में डूबने या तैरने की प्रवृत्ति के आधार पर घरेलू चीज़ों के अलग-अलग समूह बनाएँ।8

शिक्षकों ने इस समझ को कुछ आगे ले जाते हुए विद्यार्थियों से यह तुलना करने को कहा कि नींबू और अण्डे को सादे पानी में डालने पर क्या होगा और नमक मिले हुए पानी में डालने पर क्या होगा। हमने ऐसी गतिविधि शीट तैयार कीं, जिन पर बने बॉक्स में विद्यार्थी सही या गलत का निशान लगाकर अपने अवलोकन दर्ज कर पाएँ। इस तरह, पढ़ने और लिखने में दिक्‍़क़त होने के बावजूद उन्होंने जो देखा उसे व्यक्त करने का उन्हें मौक़ा मिला। फिर शिक्षकों ने इन अवलोकनों को समझाते हुए चर्चा की। स्कूल फिर से खुलने के बाद भी साक्षरता और संख्या–ज्ञान के नुक़सान का असर विज्ञान सीखने पर बना रहा। उदाहरण के लिए, कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय-10 (विद्युत धारा और उसके प्रभाव) में विद्यार्थियों को विद्युत परिपथ बनाने के लिए कहा गया है (चित्र-3 देखें)।9 जब इसे गतिविधि के ज़रिए प्रदर्शित किया गया, तो विद्यार्थी कामकाजी परिपथ सटीक रूप से बना पाए थे। लेकिन ज़्यादा औपचारिक आकलन के समय वे अपनी कक्षा के स्तर की शब्दावली में अपनी समझ को बता पाने में असमर्थ थे। इसका समाधान करने के लिए, हमने ऐसी गतिविधि शीट तैयार कीं जो शिक्षकों को मिडिल स्‍टेज विज्ञान की पाठ्यचर्या (जैसे घुलनशीलता, अम्ल व क्षार, और भौतिक व रासायनिक परिवर्तन) के विषयों पर अपने विद्यार्थियों की अवधारणात्मक समझ का आकलन करने में मददगार हों, और साथ-ही-साथ विद्यार्थियों के बुनियादी साक्षरता और संख्या–ज्ञान (एफ़एलएन) के कौशल का निर्माण भी करें।

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चित्र-3 : कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय-10 (विद्युत धारा और उसके प्रभाव) के एक चित्र के आधार पर निर्मित। यह चित्र विद्यार्थियों को विद्युत परिपथ बनाने का तरीक़ा दिखाता है। Credits: i wonder… Apr 2025 issue. License: CC BY-NC 4.0.

यह भी ज़रूरी है कि बच्चे विज्ञान को सिर्फ़ एक विषय के रूप में न देखें, बल्कि अपने आस-पास की दुनिया को समझने के एक तरीक़े की तरह भी देखें। हम जिन बच्चों के साथ काम करते हैं उनमें से कई बच्चे कक्षा-8, 9 या 10 के बाद स्कूल छोड़ देते हैं। अगर हम विज्ञान को इस तरह से पढ़ाएँ कि जिससे कोई पेशा अपनाने और आजीविका कमाने के लिए उनके कौशल का निर्माण और विकास हो पाए, तो विज्ञान उन बच्चों के लिए भी प्रासंगिक बन पाएगा जो उच्च शिक्षा के लिए नहीं जा पाते हैं। यह उन्हें समाज में पहचान और सम्मान का एहसास भी देगा। गाँधीजी ने शिक्षा के बारे में अपने विचारों में इस पर रोशनी डाली है : “साक्षरता अपने आपमें कोई शिक्षा नहीं है। इसलिए मैं बच्चों की शिक्षा की शुरुआत उन्हें कोई उपयोगी हस्तकला सिखाकर और उन्हें उनके प्रशिक्षण की शुरुआत से ही उत्पादन करने लायक़ बनाकर करूँगा… मेरा मानना ​​है कि ऐसी शिक्षा प्रणाली के तहत मन और आत्मा का उच्चतम विकास मुमकिन है। बस यह ध्यान रहे कि हर हस्तकला को सिर्फ़ यांत्रिक तरीक़े से नहीं सिखाया जाना चाहिए, जैसा कि आजकल किया जाता है, बल्कि वैज्ञानिक तरीक़े से सिखाया जाना चाहिए, यानी बच्चे को पता होना चाहिए कि हर प्रक्रिया को क्यों, किस तरह और किसलिए किया जाए10

उदाहरण के लिए, कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) का अध्याय-11 (विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव) विद्यार्थियों को विद्युत धाराओं के रासायनिक प्रभावों का एक इस्तेमाल बताता है : “विद्युत लेपन बहुत उपयोगी प्रक्रिया है। धातु की वस्तुओं पर किसी अन्‍य धातु की पतली परत चढ़ाने के लिए उद्योगों में इसका बहुत इस्तेमाल किया जाता है। धातु की जो परत चढ़ाई जाती है, उसमें कुछ ऐसे वांछित गुण होते हैं, जो उस वस्तु की धातु में नहीं होते हैं जिस पर यह परत चढ़ाई जाती है।”11 इस अध्याय में वास्तविक दुनिया में इस प्रक्रिया के कई इस्तेमाल बताए गए हैं (चित्र-4 देखें)। इसके ज़रिए विद्यार्थी सीखते हैं कि लोहे पर विद्युत लेप करने के लिए टिन और ज़िंक का इस्तेमाल किया जाता है। हमने यह चर्चा शुरू की कि लोहे के पात्रों पर यह परत चढ़ाने की ज़रूरत क्यों होती है। विद्यार्थियों ने तो अपनी रोज़मर्रा की दुनिया में ज़ंग लगते हुए देखा था, इसलिए वे लोहे के बर्तनों को वातावरण से अलग करके ज़ंग लगने से बचाने में टिन की भूमिका को समझ पाए। फिर हमने क़लई की सदियों पुरानी हस्तकला की ओर उनका ध्यान दिलाया। इस प्रक्रिया में ताँबे और पीतल के बर्तनों की सतह पर टिन की परत चढ़ाई जाती है। कई विद्यार्थियों ने इस प्रक्रिया को अपनी रोज़मर्रा की दुनिया में देखा था, और वे इसे पाठ्यपुस्तक में विद्युत लेपन के बारे में जो सीख रहे थे, उसे अपनी समझ से भी जोड़ पाए। अब वे समझ पाए कि टिन इन धातुओं को ऑक्सीकरण से कैसे बचा सकता है। विज्ञान की इस तरह की शिक्षा उनके लिए प्रासंगिकता रखती है।

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चित्र-4 : कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय-11 (विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव) के एक चित्र के आधार पर निर्मित। यह चित्र विद्युत लेपन के कुछ आम इस्तेमाल दिखाता है। Credits: i wonder… Apr 2025 issue. License: CC BY-NC 4.0.

विज्ञान शिक्षण का यह तरीक़ा विद्यार्थियों को स्कूल जाने के लिए और ज़्यादा प्रेरित कर सकता है। इससे अभिभावकों में शिक्षकों और स्कूल के प्रति विश्वास बनाने में भी मदद मिल सकती है। मैं इस बारे में यहाँ कुछ सन्दर्भ पेश करना चाहूँगा। कुछ अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में इसलिए भेजते हैं क्योंकि वे उन्हें निजी स्कूलों में भेजने का ख़र्च नहीं उठा सकते हैं। अलबत्ता, वे यह भी मान रहे हो सकते हैं कि बच्चे स्कूल में काम की कोई ख़ास बात नहीं सीखते हैं। इसलिए, जब भी मौक़ा मिलता है तो हो सकता है कि अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल के बजाय काम करने भेज दें (जैसे खेत में फ़सल काटना, क़स्बे के नानबाई की बेकरी या दुकान में मदद करना, या किसी स्थानीय उद्योग में काम करना)। इस स्थिति को बदलने के लिए अभिभावक और शिक्षक के बीच भरोसे का रिश्ता बनाना ज़रूरी है। हम यह कैसे कर सकते हैं? हमने एक अभिभावक-शिक्षक बैठक में मिड-डे-मील के सिलसिले में बच्चों से यह बताने के लिए कहा कि उन्होंने स्कूल में भोजन और पोषण के बारे में क्या सीखा है। बच्चों ने कुछ सरल तथ्य साझा किए, जो चर्चा के लिए प्रासंगिक थे। मिसाल के तौर पर, उनमें से कुछ ने बताया कि मेवे किस तरह से पोषण (विशेष रूप से प्रोटीन) और ऊर्जा (कैलोरी) का अच्छा स्रोत हैं। लेकिन वे यह भी जानते थे कि कई तरह के मेवे ऐसे हैं जिन्हें नियमित रूप से मँगवाने का ख़र्च उनके परिवार और स्कूल नहीं उठा सकते हैं। इसलिए उन्होंने दोपहर के खाने में मूँगफली को शामिल करने का सुझाव दिया, और अपने माता-पिता को समझाया कि ज़्यादा महँगे मेवों (जैसे बादाम) की बजाय मूँगफली पोषण का अच्छा विकल्प हो सकता है। इसे अभिभावकों ने सराहा कि उनके बच्चे स्कूल में व्यावहारिक महत्त्व की बातें सीख रहे हैं। बच्चे स्कूल में क्या सीखते हैं, इसके बारे में जागरूकता पैदा करने का एक और तरीक़ा ग्राम सभा की मदद से मेलों का आयोजन करना है। मसलन, हमारे कार्यक्रम ‘जादू नहीं, विज्ञान है’ का मक़सद विज्ञान के बारे में जागरूकता पैदा करना है और यह बताना है कि बच्चे अपनी वास्तविक दुनिया में मिथकों को तथ्यों से अलग करने में इसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं (चित्र-5 देखें)।

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चित्र-5 : हमारे सत्र ‘जादू नहीं, विज्ञान है’ की एक तस्वीर। नोट : बैकग्राउंड का फ़ोटो एक वास्तविक कक्षा का है और इसे यहाँ फोटो में दिख रहे बच्चों के अभिभावकों की अनुमति से प्रकाशित किया गया है। बच्‍चों की गोपनीयता की रक्षा के लिए उनके चेहरे धुँधले कर दिए गए हैं। इस फ़ोटो के पुनः उपयोग के विवरण के लिए कृपया यहाँ ‘इमेज और मीडिया उपयोग’ देखें। Credits: Aditya Prakash. License: CC BY-NC-ND 4.0.

ऐसी मिसालें सरकारी स्कूलों में शिक्षा के बारे में आम धारणाओं को बदलने में मदद कर सकती हैं। इससे अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल के बाहर काम में लगाने के बजाय स्कूल भेजने के लिए प्रेरित भी हो सकते हैं। हम देखते हैं कि इन प्रयासों से हमारे दमोह ब्लॉक में कैसे छोटे-छोटे बदलाव हुए हैं।

मुख्‍य बिन्‍दु

विज्ञान की कक्षा में नीति और अमल का तालमेल
  • विज्ञान शिक्षा पर कई नीतियाँ यह कहती हैं कि शिक्षक विद्यार्थियों को ‘करके सीखने’ की इजाज़त दें और पाठ्यपुस्तक को विद्यार्थियों की वास्तविक दुनिया से जोड़ें।
  • किसी गतिविधि को करके विज्ञान की अवधारणाओं को सीखना विद्यार्थियों की रुचि बढ़ाने, उन्हें सवाल पूछने और अपने अवलोकनों एवं अनुभवों से सीखने के लिए प्रोत्साहित करने और उनके तार्किक कौशल को मज़बूत करने में मदद कर सकता है।
  • मल्टीग्रेड कक्षाओं में, किसी गतिविधि के साथ कक्षा को शुरू करने से शिक्षकों को विद्यार्थियों की समझ के वर्तमान स्तर के आधार पर उनका आकलन करने और उसके मुताबिक़ उनके समूह बनाने में मदद मिल सकती है। फिर, शिक्षक प्रत्येक समूह के लिए जटिलता के उस स्तर पर गतिविधियों की योजना बना सकते हैं जो उन्हें ज़्यादा उन्नत अवधारणाओं को सीखने में मदद करने के लिए सबसे मुनासिब है।
  • बुनियादी साक्षरता और संख्या-ज्ञान के कौशलों से जूझने वाले विद्यार्थियों के साथ काम करते वक़्त उन्हें ख़ुद करके सीखने का अनुभव देने से शिक्षक विज्ञान में अवधारणाओं को सामने होता हुआ दिखा सकते हैं, अधिगम का आकलन कर सकते हैं, और ज़्यादा समावेशी व कम चुनौतीपूर्ण तरीक़ों से विद्यार्थियों के वैज्ञानिक कौशलों को गढ़ सकते हैं।
  • विज्ञान को विद्यार्थी इस दुनिया को समझने का तरीक़ा बना पाएँ, इसके लिए ज़रूरी है कि विज्ञान विद्यार्थियों के लिए मिथक को तथ्य से अलग करने में मददगार हो। विज्ञान के ज़रिए वे अपने स्वास्थ्य और ख़ुशहाली पर असर डालने वाले मुद्दों के बारे में बेहतर जानकारी हासिल कर पाएँ। विज्ञान उन्हें व्यवसाय करने में या आजीविका कमाने में मददगार हो। इस तरह के जुड़ाव बनने से विद्यार्थियों को उनकी वास्तविक दुनिया में विज्ञान की प्रासंगिकता समझ आ सकती है तथा समाज में पहचान और सम्मान का भाव प्रदान करने में इसकी भूमिका को समझने में मदद मिल सकती है।
  • अभिभावक–शिक्षक बैठकें और विज्ञान मेले विद्यार्थियों को अपने कौशलों को और विज्ञान की कक्षाओं में सीखी गई बातों की प्रासंगिकता को अपने अभिभावकों के सामने प्रदर्शित करने का मौक़ा दे सकते हैं। इससे माता-पिता का शिक्षकों पर भरोसा बढ़ाने में और बच्चों को स्कूल भेजने और उनका समर्थन हासिल करने में मदद मिल सकती है।

आभार

सम्पादकगण आदित्य प्रकाश को धन्यवाद देते हैं कि वे साक्षात्कार के लिए हमारे अनुरोध पर सहमत हुए और अपने काम से जुड़े इन पहलुओं को हमारे साथ साझा किया। साथ ही लेख के हिन्‍दी अनुवाद की समीक्षा करने के लिए हम हृदय कान्‍त दीवान के आभारी हैं।

टिप्पणियाँ

  • Credits for the image (A Science Experiment) used in the background of the article title: GPE/Deepa Srikantaiah (Flickr.com). URL: https://www.flickr.com/photos/gpforeducation/8644430776. License: CC BY-NC-ND 2.0.
  • यह लेख आदित्य प्रकाश के साक्षात्कार पर आधारित है। साक्षात्कार के लिए सवाल विजेता रघुराम, राधा गोपालन और चित्रा रवि ने तैयार किए थे। साक्षात्कार विजेता रघुराम और राधा गोपालन ने किया। इसे DESCRIPT का इस्तेमाल करके विजेता रघुराम ने लिपिबद्ध किया। राजेश उत्साही ने प्रतिलेख को बेहतर बनाया और हिन्दी से अँग्रेज़ी में अनुवाद किया। राधा गोपालन ने अँग्रेज़ी प्रतिलेख की समीक्षा की और उसे बेहतर बनाया। इस आलेख में प्रस्तुत अंशों का चयन, सम्पादन और संरचना चित्रा रवि ने की है।

सन्दर्भ

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  2. National Council of Educational Research and Training (2006). ‘Position Paper National Focus Group on Teaching of Science’. URL: https://ncert.nic.in/pdf/focus-group/science.pdf.
  3. Tandon, Shruti (2019). ‘Gandhi’s Educational Thoughts’. URL: https://www.mkgandhi.org/articles/Gandhis-educational-thoughts.php. Accessed on February 7, 2025.
  4. Clark, Donald R. (1999). ‘Bloom’s Taxonomy of Learning Domains’. URL: http://www.nwlink.com/~donclark/hrd/bloom.html.
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  9. National Council of Educational Research and Training (2024). ‘Chapter 10: Electric Current and its Effects’. Science Textbook for Grade VII: 109-122. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?gesc1=10-13.
  10. Gandhi, M. K (1969). ‘The Selected Works of Mahatma Gandhi, Vol. 5: The Voice of Truth’. Navijan Publishing House. URL: https://www.mkgandhi.org/ebks/the-voice-of-truth.pdf.
  11. National Council of Educational Research and Training (2024). ‘Chapter 11: Chemical Effects of Electric Current’. Science Textbook for Grade VIII: 138-149. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?hesc1=11-13.