मिड-डे-मील में अण्डा क्यों शामिल करें?

अनुवाद : प्रियेश गुप्ता | पुनरीक्षण : प्रतिका गुप्ता | कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्याय

हमने अपने स्‍‍कूल के विद्यार्थियों को उनके मिड-डे-मील में अण्डा लेने का विकल्प चुनने का अवसर दिया। मिड-डे-मील में अण्डा शामिल करने के क्या-क्या लाभ हो सकते हैं? अण्डे से जुड़ी ऐसी कुछ आम धारणाएँ क्या हैं जो बच्चे और अभिभावकों के मन में आ सकती हैं? इन मान्यताओं की वैधता का विश्लेषण करने के लिए क्या हम पोषण विज्ञान को एक साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं?

2017 में अज़ीम प्रेमजी स्कूल, सिरोही, राजस्थान, में कक्षा-1 से 8 तक की कक्षाओं के प्रत्येक विद्यार्थी को हमने उनके मिड-डे-मील में अण्डा लेने का विकल्प चुनने का अवसर दिया। हमारे विद्यालय में अधिकांश विद्यार्थी आस-पास के गाँव से आते थे। उनमें से कुछ के लिए स्कूल में दिया गया मिड-डे-मील ही पूरे दिन में उनको मिलने वाला एकमात्र पौष्टिक आहार था। (बॉक्स-1 देखें) हमारे कई विद्यार्थियों, ख़ासतौर से लड़कियों की, ऊँचाई और वज़न उनकी उम्र के हिसाब से तय मानकों के अनुरूप नहीं थे। (विद्यार्थियों की ऊँचाई और वज़न हमारे स्वास्थ्य निगरानी कार्यक्रम के तहत नियमित रूप से मापे जाते थे।) उनमें अल्पपोषण के अन्य लक्षण जैसे थकान, बार-बार बीमार होना, एकाग्रता में कठिनाई भी नज़र आए।

बॉक्स-1 : स्कूली शिक्षा में मिड-डे-मील की भूमिका

14 साल की उम्र तक बच्चे अपने शरीर, अंग, मस्तिष्क और संज्ञानात्मक (सोचने–समझने की प्रक्रिया) के विकास में तेज़ी से हो रहे बदलाव से गुज़रते हैं।1 इन बदलावों के लिए अच्छा पोषण अतिआवश्यक है। लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS)-5 ने 2019-2021 में पाया कि 5 साल से कम उम्र के 35.5% बच्चों का कद उनकी उम्र के हिसाब से कम (stunting) हैं, 32.1% अपनी उम्र के हिसाब से कम वज़न वाले (underweight) हैं और 19.3% बच्चे अपने क़द के हिसाब से कम वज़न वाले (wasting) हैं।2,3 इससे पता चलता है कि कई बच्चे स्कूल में दाख़िल होने से पहले ही अल्पपोषित होते हैं। व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (CNNS) 2016-2018 में देखा गया था कि स्कूली उम्र (5-9 वर्ष) के 38,355 बच्चों में से 22% बच्चों का कद उम्र के हिसाब से कम था, 35% उम्र के हिसाब से कम वज़न वाले थे, 21.5% बच्चों में विटामिन ए की कमी थी और 18.2% में विटामिन डी की कमी थी।4,5 खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा और पोषण पर एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 में 70.5% भारतीय एक स्वास्थ्यप्रद आहार का ख़र्च वहन करने में असमर्थ थे।5,6 अल्पपोषण की अधिकता और इसके प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों, ग़रीब परिवारों और वंचित समुदायों के बच्चों में अधिक है। महामारी और लॉकडाउन के कारण सम्‍भव है पोषण की स्थिति और भी ख़राब हो सकती है।7 शिक्षा में पोषण की भूमिका राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्रतिबिम्बित होती है : “जब बच्चे कुपोषित या अस्वस्थ होते हैं तो वे बेहतर तरीक़े से सीख नहीं पाते हैं। इसलिए, बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य (जिसमें मानसिक स्वास्थ्य भी शामिल है) में स्वास्थ्यप्रद भोजन के माध्यम से सुधार किया जाएगा।’’8 मिड-डे-मील योजना (MDMS), जिसे अब प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना (पीएम-पोषण योजना) कहा जाता है, का उद्देश्य देश के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में कक्षा-1 से 8 के बच्चों को प्रतिदिन एक समय ताज़ा-गर्म सन्तुलित भोजन प्रदान करके उनके आहार में कमी की पूर्ति करना है।9 जैसा कि कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-25) के अध्याय-3 (उचित आहार : स्वस्थ शरीर का आधार) में विस्तार से बताया गया है : “इस योजना ने देश भर में लाखों बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य और पोषण को बेहतर बनाने में भूमिका निभाई है।’’10 इसने इन स्कूलों में बच्चों के दाख़िले, नियमित उपस्थिति और पढ़ाई जारी रखने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।11

क्या अण्डे के बारे में आम धारणाएँ वैज्ञानिक रूप से सही हैं?

हमारे स्कूल के 35 से 40 प्रतिशत बच्चों के अभिभावक स्कूल के मिड-डे-मील में अण्डा परोसे जाने को लेकर चिन्तित थे। इनमें से उनकी कुछ चिन्ताएँ आगे दी गई मान्यताओं पर आधारित थीं :

  • धारणा : यदि बच्चों को पर्याप्त भोजन मिल रहा है तो उन्हें रोज़ भोजन में अण्डा लेने की आवश्यकता नहीं है।

तथ्य : ये धारणा बहुत आम है कि पर्याप्त खाना (पर्याप्त कैलोरी) खाने से अच्छा पोषण मिल जाता है। हालाँकि, भोजन को सन्तुलित बनाने के लिए जिन खाद्य स्रोतों से ये कैलोरी मिलती है उनकी पोषण गुणवत्ता, कैलोरी की मात्रा से अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए यह सिफ़ारिश की जाती है कि मिड-डे-मील के ज़रिए कक्षा-1 से 5 के विद्यार्थियों की 450 कैलोरी एवं 12 ग्राम प्रोटीन की दैनिक ज़रूरत और कक्षा-5 से 8 के विद्यार्थियों की 700 कैलोरी एवं 20 ग्राम प्रोटीन की दैनिक ज़रूरत पूरी की जाए। (बॉक्स-2 देखिए)।12 मिड-डे-मील मुख्य अनाज (cereal) या मोटे अनाज (millet) से तैयार किया जाता है और इनमें अतिरिक्त पोषक तत्व भी अलग से मिलाए जाते हैं। यह कैलोरी की ज़रूरत तो पूरी कर सकता है लेकिन यह सिफ़ारिश की गई मात्रा में प्रोटीन की पूर्ति नहीं कर पाता है।7 इसके उलट, प्रोटीन से भरपूर आहार को मिड-डे-मील में शामिल करने से दोनों (कैलोरी+प्रोटीन की) ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं।

बॉक्स-2 : बच्चों के लिए सन्तुलित आहार

बच्चों के विकास, वृद्धि और समग्र स्वास्थ्य में मदद के लिए सन्तुलित आहार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करने और बाद के जीवन में स्वास्थ्य समस्याओं को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-25) का अध्याय-3 (उचित आहार : स्वस्थ शरीर का आधार) सन्तुलित आहार को इस तरह परिभाषित करता है कि सन्तुलित आहार वह है जिसमें : “शरीर की उचित वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व, रेशेदार आहार (roughage) और पानी सही मात्रा में हों।10 भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद-राष्ट्रीय पोषण संस्थान (ICMR-NIN) एक बच्चे के आहार की योजना बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है ताकि :

  • किसी बच्चे को उसकी उम्र, लिंग, शारीरिक क्रियात्‍मक दशा और शारीरिक गतिविधि के अनुसार जितना पोषण चाहिए, उसके आहार में उतने पोषक तत्वों, रेशेदार आहार और पानी की मात्रा हो।
  • पोषक तत्व और रेशेदार आहार ऐसे विभिन्न प्रकार के खाद्य स्रोतों से मिलते हों जो स्थानीय रूप से उपलब्ध और सुलभ हों।
  • यह बच्चों को अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक एंटीऑक्सीडेंट भी प्रदान करता हो।13

कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-25) के अध्याय-3 (उचित आहार : स्वस्थ शरीर का आधार) में विद्यार्थी यह सीखते हैं कि हमें प्रोटीन (शरीर-निर्माण पोषक तत्व) पौधों और जानवरों दोनों से मिल सकता है (चित्र-1 देखें)। प्रोटीन से भरपूर वनस्‍पति आधारित खाद्य पदार्थों में दालें, मटर, बीन्स, सोया और गिरियाँ शामिल हैं। प्रोटीन से भरपूर पशु-आधारित खाद्य पदार्थों में दूध, पनीर, अण्डे, मांस और मछली शामिल हैं।10

Why add eggs to midday meals fig 1
चित्र-1 : यह चित्र कक्षा-6 की विज्ञान की पुस्तक (NCERT, 2024-25) के अध्याय-3 (उचित आहार : स्वस्थ शरीर का आधार) में दिए चित्र के आधार पर बनाया गया है। इस चित्रण में प्रोटीन के कुछ आम स्रोतों को दर्शाया गया है। (क) वनस्पति-आधारित स्रोत जिसमें गिरियाँ, चना, मटर, मूँग दाल, सोया और राजमा शामिल हैं। (ख) पशु-आधारित स्रोत जिसमें मांस, मछली, अण्डे, पनीर और दूध शामिल हैं। Credits: i wonder… Apr 2025 issue. License: CC BY-NC 4.0.

राजस्थान के मिड-डे-मील में प्रोटीन की सिफ़ारिश की गई ज़रूरी मात्रा को पूरा करने के लिए दूध और दालें शामिल की गई हैं। हमने अण्डे को भी एक विकल्प के रूप में पेश करना चुना क्योंकि अण्डा पोषक तत्वों से भरपूर उच्च बायोलॉजिकल वेल्यू वाला प्रोटीन का स्रोत है। (बायोलॉजिकल वेल्यू यानी उस आहार में मौजूद प्रोटीन की शरीर द्वारा अवशोषित करने की मात्रा। उच्च बायोलॉजिकल वेल्यू का मतलब है शरीर उस आहार से उच्च मात्रा में प्रोटीन अवशोषित करता है।) प्रतिदिन औसत आकार का सिर्फ़ एक अण्डा (44-56 ग्राम का) खाने से एक बच्चे को 6-7 ग्राम प्रोटीन मिल सकता है जो : (i) बच्चे के शरीर द्वारा आसानी से पचाया जा सकता है, (ii) पाचन के बाद नौ अमीनो एसिड (जो कि हमारे लिए आवश्यक हैं लेकिन मानव शरीर द्वारा नहीं बनाए जाते हैं) स्रावित करता है और (iii) बच्चे के शरीर को इन अमीनो एसिड को आसानी से अवशोषित करने और उपयोग करने देता है। इतना ही नहीं, प्रत्येक अण्डे में लगभग सभी विटामिन (विटामिन-सी को छोड़कर) और कई महत्त्वपूर्ण खनिज (जैसे कैल्शियम, जस्ता, सेलेनियम, लोहा, आयोडीन और फॉस्फोरस) होते हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं (जैसे ल्यूटिन और ज़ेक्सैन्थिन जो आँखों को स्वस्थ रखने में सहायता करते हैं) और यह कोलाइन के सबसे समृद्ध स्रोतों में से एक है (जो संज्ञानात्मक कार्यों में मदद करता है)। अण्डे में जिस तरह प्रोटीन उच्च अवशोषण क्षमता के साथ मौजूद होता है, उसी तरह इसमें कई अन्य पोषक तत्व भी अत्यधिक जैवउपलब्ध (bioavailable) रूप में मौजूद होते हैं। यानी कि वे बच्चे के शरीर द्वारा आसानी से अवशोषित किए जा सकते हैं।14,15 इसके अलावा, अण्डे स्वादिष्ट होते हैं, हर जगह उपलब्ध होते हैं, अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं और दूध और केले की तुलना में ज़्यादा दिन बिना ख़राब हुए रह सकते हैं। अण्डे पकाने में आसान होते हैं (उबले अण्डे परोसे जा सकते हैं) और इनमें दालों और दूध की तुलना में मिलावट (जैसे पानी मिलाना) की सम्भावना भी कम रहती है (शिक्षक मार्गदर्शिका-। देखें)।

  • धारणा : एक बच्चे की प्रोटीन की दैनिक ज़रूरत को पूरा करने के लिए एक अण्डा ही पर्याप्त है।

तथ्य : बढ़ते बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में प्रोटीन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ICMR-NIN 7-9 वर्ष के बच्चे के लिए 23 ग्राम प्रोटीन और 10-12 वर्ष के बच्चे के लिए 33 ग्राम प्रोटीन की दैनिक आवश्यकता की सिफ़ारिश करता है।13 हालाँकि अण्डा प्रोटीन का एक बहुत ही अच्छा स्रोत है, लेकिन उबला हुआ केवल एक अण्डा बच्चे की दैनिक प्रोटीन आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे आहार, जिसमें अण्डे के साथ प्रोटीन के अन्य स्रोत (जैसे दुग्ध उत्पाद, फलियाँ या सोया चंक्स) शामिल हों, से बच्चे की प्रोटीन की दैनिक ज़रूरत पूरी करने की सम्भावना अधिक है, साथ-ही-साथ यह आहार अन्य पोषक तत्व भी प्रदान करता है।

  • धारणा : चूँकि अण्डे से चूज़ा बन सकता है, इसलिए अण्डा मांसाहारी भोजन है।

तथ्य : शाकाहारी आहार कई तरह के होते हैं। कई शाकाहार आहार में पशुओं से प्राप्त कोई भी उत्पाद शामिल नहीं होता, इसे शुद्ध शाकाहारी या वीगन (vegan) कहा जाता है। कुछ शाकाहार में दूध और दुग्ध उत्पाद होते हैं, जो कि प्राणियों के दूध से मिलते हैं इन्‍हें लेक्‍टो-वेजिटेरियन (lacto-vegetarian)कहा जाता है। कुछ शाकाहारी लोग अपने आहार में अण्‍डे को भी शामिल करते हैं, पर कोई अन्‍य मांस के पदार्थ नहीं खाते, ये ओवो-वेजिटेरियन (ovo-vegetarian) कहलाते हैं। कुछ लोग शाकाहार के साथ मछलियाँ भी खाते हैं, पर कोई अन्‍य मांस नहीं खाते, इन्‍हें पेस्‍काटेरीयन (pescatarians) कहते हैं। एक आम धारणा है कि अण्डा मांसाहारी भोजन है क्योंकि अण्‍डे से चूज़ा बन सकता है। यह पूरी तरह सच नहीं है। अधिकांश अण्डे जो व्यावसायिक रूप से उपभोग के लिए बेचे जाते हैं, अनिषेचित होते हैं, उनसे चूजा नहीं निकल सकता है (शिक्षक मार्गदर्शिका-।। देखें)।

  • धारणा : अण्डे खाने से पाचन सम्बन्धी समस्याओं, जैसे गैस बनना और पेट फूलने, के कारण पेट दर्द हो सकता है।

तथ्य : अण्डे प्रोटीन का अच्‍छा स्रोत माने जाते हैं, जो कि आसानी से पच जाता है।1,16 लेकिन कुछ (लगभग 2%) बच्चों को (ख़ासतौर से 5 वर्ष से कम आयु के) अण्डे के प्रोटीन से एलर्जी हो सकती है, जबकि कुछ अन्य बच्चों को अण्‍डा पचता नहीं है। यानी अण्‍डे का प्रोटीन उनके शरीर को ठीक नहीं लगता है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि जो बच्चे अण्डा युक्त भोजन के सेवन के बाद प्रतिकूल प्रभाव महसूस कर रहे हैं उनके अभिभावक इसके कारण को सुनिश्चित करने के लिए डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें।17,18

ऐसे बच्चे जिन्हें अण्डे के प्रोटीन से एलर्जी है या जिन्‍हें अण्‍डा पचता नहीं है उनके आहारीय प्रोटीन के वैकल्पिक स्रोत के लिए पीएम पोषण योजना में दूध, केले, गुड़-मूँगफली (चिक्की) की सिफ़ारिश की गई है। ऐसे बच्चे जिन्हें ऐसी कोई एलर्जी और खाद्य असहिष्‍णुता नहीं है उनके लिए अण्डे आवश्यक पोषक तत्वों के सबसे सुलभ और किफ़ायती स्रोत हैं, ज़रूरी नहीं है कि ये पोषक तत्व अन्य खाद्य विकल्पों से हमेशा मिल ही जाएँ (तालिका-1 देखें)।

पोषक तत्वउबले अण्डेकेलेदूधमूँगफली
प्रति 100 ग्राम में
कार्बोहाइड्रेट (ग्राम)1.1222.84.6321.3
प्रोटीन (ग्राम)12.61.093.2724.4
फैट (ग्राम)
सन्तृप्त वसा3.270.1121.867.72
कोलेस्ट्रॉल0.37200.0120
ट्रांस फैट000.1120.027
ओमेगा-3एस0.0430.0270.0080.026
विटामिन B के अलावा अन्य विटामिन (माइक्रो ग्राम)
A1493320
D2.200.960
E1030100504930
K0.30.55.10
C0870000
विटामिन B (मिग्रा)
B10.0660.0310.0560.152
B20.5130.0730.1380.197
B30.0640.6650.10514.4
B60.1210.3670.0610.466
B90.0440.0200.097
B120.001100.000540
मिनरल्स (मिग्रा)
कैल्शियम50512358
आयरन1.190.2601.58
पोटेशियम126358150634
कॉलिन2949.817.864.6
जिंक1.050.150.422.77
फॉस्फोरस17222101363
फाइटोकैमिकल (मिग्रा)
बीटा – केरोटिन0.0110.0260.0070
ल्यूटीन – ज़ेक्सैन्थिन0.3530.0220.0060
कैलोरी1558960587
तालिका-1 : उबले अण्डे, केले, दूध और मूँगफली (प्रत्‍येक 100 ग्राम) के पोषण मूल्य की तुलना। दूध और अण्डों में सभी 9 ज़रूरी अमीनो एसिड होते हैं जबकि केले में 7 और मूँगफली में 8 होते हैं।
  • धारणा : उबले हुए अण्डे स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं होते हैं क्योंकि ये रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ाते हैं जिससे भविष्‍य में हृदयाघात या अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ हो सकती हैं।

तथ्य : स्वाभाविक रूप से अण्डे में कोलेस्ट्रॉल अधिक (उसकी ज़र्दी में) होता है। लेकिन शोध से पता चलता है कि यह रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को उतना नहीं बढ़ाते जितना कि सन्तृप्त वसा और ट्रांस वसा से भरपूर खाद्य पदार्थ (जैसे पाम ऑयल, वनस्पति घी, मक्खन, आइसक्रीम, तले हुए खाद्य पदार्थ, केक और पेस्ट्री) बढ़ाते हैं।19,21

हालाँकि कुछ अध्ययनों का कहना है कि प्रति सप्ताह आप जितने ज़्यादा अण्डे खाते हैं उतना ही अधिक हृदय रोग का ख़तरा बढ़ जाता है। लेकिन यह जोखिम बढ़ना इस पर निर्भर करता है कि अण्डे को किस तरह पकाया जा रहा है (उदाहरण के लिए सन्तृप्त वसा जैसे तेल या मक्खन में तलकर) और फिर अण्डे को किसके साथ खाया जा रहा है (उदाहरण के लिए तेल में सिंके पराठे या ब्रेड–बटर के साथ)।21 मिड-डे-मील में उबले अण्डे दिए जाते हैं और ये सन्तृप्त वसा युक्त खाद्य पदार्थों में नहीं पकाए जाते या इनका इस्‍तेमाल करके तैयार किए भोजन के साथ नहीं दिए जाते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ आहार के माध्यम से प्रतिदिन अधिकतम 300 मिलीग्राम कोलेस्ट्रॉल लेने की सलाह देते हैं। यदि बच्चों के बाक़ी आहार में कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक न हो तो वे प्रतिदिन एक अण्डा खा सकते हैं (50 ग्राम के एक अण्डे में 186 मिलीग्राम कोलेस्ट्रोल होता है)।21 अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल सिरोही में प्रत्येक बच्चे को सप्ताह में छह दिन, रोज़ एक अण्डा मिलता है। कई राज्यों में, पीएम पोषण योजना के अन्तर्गत प्रत्येक बच्चे को प्रति सप्ताह केवल 2-3 अण्डे मिलते हैं।12

  • धारणा : ग्रीष्म ऋतु के गर्म महीनों में अण्डा खाने से बेचैनी, निर्जलीकरण (dehydration) या गर्मी से सम्बन्धित अन्य समस्याएँ हो सकती हैं।

तथ्य : अध्ययनों से पता चलता है कि बच्‍चे नियंत्रित मात्रा में अण्डे साल भर खा सकते हैं। अण्डे गर्म मौसम के दौरान ऊर्जा के स्तर को बनाए रखने के लिए आवश्यक पोषक तत्व भी प्रदान कर सकते हैं। हालाँकि कई अध्ययनों से पता चलता है कि गर्मी के महीनों में खान–पान से होने वाली बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए अण्डे को पर्याप्त स्वच्छता से रखने और पकाने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतना पड़ सकती है, ताकि ऐसी बीमारियों से बचा जा सके।

इससे यह सुनिश्चित करने में भी मदद मिल सकती है कि बच्चों को पर्याप्त स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो और उनके भोजन में पानी से भरपूर स्थानीय सब्ज़ियाँ शामिल हों (जैसे खीरा, लौकी, कुम्हड़ा और तुरई)। ये क़दम बच्चों को गर्मियों के दौरान हाइड्रेटेड रहने और गर्मी की तपन के कुछ नकारात्मक प्रभावों से निपटने में मदद कर सकते हैं।

  • धारणा : अण्डे के सेवन से यौवनावस्था प्रारम्भ होने का समय बदल सकता है।

तथ्य : हमें इस धारणा को पुष्ट करने वाले कोई भी प्रमाण नहीं मिले हैं। बल्कि, एक बच्चे को उसके विकास के हर चरण में सन्तुलित आहार मिलना आवश्यक है, इसके प्रमाण मौजूद हैं। पर, जैसा कि कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT 2024-2025) के अध्याय-7 (किशोरावस्था की ओर बढ़ना) में ज़ोर दिया गया है। यह सन्तुलित आहार ख़ासतौर से किशोरावस्था में यौवन और मासिक धर्म चक्र के दौरान एकाएक तेज़ी से होने वाली वृद्धि में सहायता के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।22 अण्डे को रक्षक भोज्य पदार्थ माना जाता है क्योंकि यह पोषण तत्वों की कमी से रक्षा करता है और समग्र स्वास्थ्य में मदद करता है। किशोरों, विशेषकर लड़कियों, के आहार में अण्डे को शामिल करना उनके स्वस्थ विकास और यौवन-आयु (puberty) के दौरान हड्डियों के विकास के लिए आवश्यक प्रोटीन, लौह (आयरन) और विटामिन डी की दैनिक आवश्यकता को पूरा करने में मदद कर सकता है (शिक्षक मार्गदर्शिका-।।। देखें)।23

बॉक्स-3 : पाठ्यचर्या से सम्‍बन्‍ध

विद्यार्थी मिड-डे-मील योजना के बारे में कक्षा-4 की पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यपुस्तक (NCERT 2024-2025) के अध्याय 20 (एक साथ भोजन करना) में पहली बार पढ़ते हैं।24 इसके बारे में और अधिक वे कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT 2024-2025) के अध्याय-3 (उचित आहार : स्वस्थ शरीर का आधार) में पढ़ते हैं।10 ये दोनों अध्याय बच्चों को जो वे खाते हैं उसकी पोषण गुणवत्ता के बारे में समालोचनात्मक नज़रिए से विचार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। प्रिपरेटरी स्‍टेज पर्यावरण अध्ययन के शिक्षक और मिडिल स्‍टेज विज्ञान के शिक्षक इन अध्यायों का उपयोग मिड-डे-मील में अण्डे को शामिल करने के बारे में विद्यार्थियों से चर्चा करने के लिए कर सकते हैं।

यह चर्चाएँ प्रत्येक नागरिक के लिए हमारे संविधान के अनुच्छेद 51A(h) में सूचीबद्ध मौलिक कर्तव्य : “वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानवतावाद और ज्ञान-अर्जन एवं सुधार की भावना विकसित करना25 को विकसित करने में सहायता कर सकती हैं। यह कर्तव्य स्कूली विज्ञान के उद्देश्य को आकार देता है, जैसा कि शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा (NCF-SE) 2023 में रेखांकित किया गया है : “…आलोचनात्मक और साक्ष्य-आधारित सोच की क्षमता विकसित करके और भय एवं पूर्वाग्रह से मुक्ति दिलाकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण का निर्माण करना।” NCF-SE 2023 इस उद्देश्य को : “…विज्ञान सीखने के केन्‍द्र में26 होना मानता है।

ये चर्चाएँ निम्नलिखित को प्राप्त करने में भी सहायक हो सकती हैं :

  • मिडिल स्‍टेज विज्ञान पाठ्यचर्या लक्ष्य (CG-4) : [विद्यार्थी] स्वास्थ्य, स्वच्छता और सेहत के घटकों को समझते हैं। यह विशेषकर विद्यार्थियों में इन दक्षताओं को विकसित करने में मदद कर सकता है : (क) C-4.1 : “भारतीय पाक प्रथाओं के विशेष सन्दर्भ में और पोषण की आधुनिक समझ के साथ खाद्य घटकों का पोषण आधारित विश्लेषण करना और स्वास्थ्य पर पोषण के प्रभाव की व्याख्या करना,” (ख) C-4.2 : “खाद्य स्रोतों, पोषक तत्वों, जलवायु परिस्थितियों और आहार की विविधताओं के विभिन्न पहलुओं का परीक्षण करना,” (ग) C-4.3 : “किशोरावस्था के दौरान होने वाले परिवर्तनों (विकास, हार्मोन सम्बन्धी परिवर्तनों) का वर्णन करना और समग्र स्वास्थ्य के लिए आवश्यक उपायों को अपनाना।26
  • अधिगम के प्रतिफल : (क) कक्षा-6 का विज्ञान : विद्यार्थी सीखी-समझी विज्ञान की अवधारणाओं का प्रयोग ‘‘सन्तुलित आहार के लिए खाद्य सामग्री चुनने में करते हैं।’’ और (ख) कक्षा-8 का विज्ञान : विद्यार्थी सीखी-समझी विज्ञान की अवधारणाओं का प्रयोग ‘‘किशोरावस्था के मिथकों और वर्जनाओं (टैबू) को चुनौती देने में करते हैं।’’27

चलते-चलते

कक्षा-1 से लेकर 8 तक के बच्चों के भोजन के चुनाव के निर्णय अधिकांशतः उनके अभिभावकों द्वारा ही लिए जाते हैं। भोजन के प्रति बच्चों और उनके अभिभावकों की धारणाएँ, ख़ासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में, उस बड़े समुदाय से प्रभावित हो सकती हैं जिसका वे हिस्सा हैं। मिड-डे-मील में अण्डे को शामिल करने के अपने अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि बच्चों और उनके अभिभावकों के साथ लगातार खुली चर्चा करना भोजन सम्बन्धित सभी धारणाओं को तोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हमने ऐसी चर्चाओं का उपयोग इन बातों के लिए किया : (i) अण्डे के बारे में बच्चों और उनके अभिभावकों की चिन्ताओं को जानने और उन्हें ध्यान में रखने के लिए। (ii) अण्डे के बारे में वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्यों और मानव स्वास्थ्य पर उनके प्रभावों को बच्चों और उनके अभिभावकों तक पहुँचाने लिए। इस प्रक्रिया ने विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में पोषण पर दी गई अवधारणाओं को विद्यार्थियों के दैनिक जीवन से जोड़ने और स्कूल में (जैसे कि मिड-डे-मील में उनके द्वारा चुने गए विकल्प) और स्कूल के बाहर (बॉक्स-3 देखें) उनके द्वारा भोजन सम्बन्धी लिए जाने वाले निर्णयों को लेने में मदद की है। इससे उनके पोषण में सुधार हुआ है और हमारे विद्यालय में आहार विविधता के प्रति अधिक खुली सोच विकसित करने में मदद मिली है। देश भर के नौ अज़ीम प्रेमजी स्कूलों (कर्नाटक, छत्तीसगढ़, राजस्थान और उत्तराखण्ड में) में विद्यार्थियों के समक्ष मिड-डे-मील में अण्डा एक विकल्प के रूप में रखा गया है। अण्डे के बारे कुछ धारणाएँ जो अज़ीम प्रेमजी स्कूल, सिरोही के बच्चों के अभिभावकों की थीं, वही धारणाएँ इन बाक़ी स्कूलों या देश के अन्य स्कूलों के बच्चों के अभिभावकों की भी हो सकती हैं। हमने अपना अनुभव इस आशा के साथ साझा किया है कि इससे देश भर के शिक्षकों और अभिभावकों को पोषण विज्ञान का उपयोग करके बच्चों के लिए स्वास्थ्यवर्धक भोजन चुनने में मदद मिलेगी।

मुख्‍य बिन्‍दु

मिड-डे-मील में अण्डा क्यों शामिल करें?
  • 6 से 14 साल तक के बच्चों की हड्डियों में, दिमाग़ और सोचने-समझने की क्षमता की प्रक्रिया में तेज़ी से वृद्धि और बदलाव दिखते हैं। इन बदलावों को सम्बल प्रदान करने के लिए सन्तुलित आहार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
  • अण्डे पोषक तत्वों से भरपूर प्रोटीन के स्रोत हैं, जिन्हें बच्चों का शरीर आसानी से पचा और अवशोषित कर सकता है। इसके अलावा, अण्डे आसानी से उपलब्ध, सस्ते और पकाने में सरल होते हैं।
  • कक्षा-1 से 8 के विद्यार्थियों को उनके मिड-डे-मील में अण्डा शामिल करने का विकल्प देने से उनके पोषण और विकास में ख़ासी मदद मिल सकती है। हालाँकि, कुछ भौगोलिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों में अण्डे को शामिल करना अभिभावकों की धारणाओं और समुदाय के खान-पान के नियमों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • अण्डे के बारे में आम धारणाओं पर तथ्य आधारित चर्चा आयोजित करने से अभिभावकों को अपने बच्चों के भोजन में अण्डा शामिल करने के बारे में और अधिक तर्कसंगत निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।
  • अण्डों के बारे में प्रचलित आम धारणाओं पर तथ्य-आधारित चर्चाओं में विद्यार्थियों को शामिल करने से उन्हें अपने द्वारा खाए जाने वाले भोजन की पोषण गुणवत्ता के बारे में अधिक समालोचनात्मक रूप से सोचने में मदद मिल सकती है। वे स्वास्थ्य, पोषण और विकास के बारे में जो कुछ भी मिडिल स्‍टेज विज्ञान के पाठ्यक्रम में सीखते हैं, इससे उन्‍हें अपने रोज़मर्रा के जीवन में उसकी प्रासंगिकता देखने में भी मदद मिल सकती है।

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  • लेख के शीर्षक की पृष्ठभूमि में उपयोग की गई तस्वीर (उबले अण्डे) : रितेश मान ताम्रकार के सौजन्‍य से। URL:https://www.flickr.com/photos/_. License: CC BY 2.0 Generic Deed.
  • इस लेख में जहाँ प्रासंगिक हो, अण्डे के सेवन से सेहत पर होने वाले प्रभाव की जानकारी पालकों को दी गई है। इसमें, इस विषय पर हुए नवीनतम अध्ययनों से प्राप्त जानकारी शामिल है।
  • अण्‍डे से एलर्जी होने पर हल्की से लेकर गम्‍भीर प्रतिक्रियाएँ (जैसे एनाफिलैक्सिस) हो सकती है, लेकिन घातक परिणाम दुर्लभ हैं। अधिकांश लक्षण हल्के होते हैं और त्वचा में जलन, मितली, दस्त, गले में सूजन के रूप में जल्दी दिखाई देते हैं। अगर आप अपने मिड-डे-मील में अण्‍डा शामिल करना चाहते हैं तो पहले बच्‍चों के माता-पिता से बात कर सकते हैं, कि बच्चों को अण्‍डे से एलर्जी है या नहीं। साथ ही, अगर किसी बच्‍चे में कोई एलर्जी दिखाई दे तो तुरन्‍त डॉक्टर से सलाह लें। कुछ बच्चे अण्‍डे के प्रति असहिष्णु होते हैं यानी वे अण्‍डे को पचा नहीं पाते, जिससे पेट में दर्द, उल्टी, ऐंठन और दस्त हो सकते हैं। इन बच्चों को अण्‍डे की जगह प्रोटीन का दूसरा स्रोत दिया जा सकता है। 2% बच्चों में अण्‍डे से एलर्जी और असहिष्णुता दिखाई देती है जो इनमें से 50% बच्चों में बढ़ती उम्र के साथ कम भी हो जाती है।
  • इस लेख में कक्षा में इस्तेमाल किए जाने वाले तीन संसाधन हैं : शिक्षक मार्गदर्शिका-। : अण्डे के छिलकों का हम क्या करें?; शिक्षक मार्गदर्शिका-।। : क्या सभी मुर्गी के अण्डों से चूजे निकल सकते हैं? और शिक्षक मार्गदर्शिका-।।। : क्या अण्डा खाने से यौवन (प्युबर्टी) शुरू होने के समय में बदलाव आ सकता है?
  • लेख के हिन्‍दी अनुवाद की समीक्षा करने के लिए हम हृदय कान्‍त दीवान के आभारी हैं।

सन्दर्भ

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