बिना प्रयोगशाला विज्ञान करना

अनुवाद : माधव केलकर | पुनरीक्षण : सुशील जोशी | कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्याय

विज्ञान की प्रयोगशालाएँ विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा जगा सकती हैं, रचनात्मकता और कल्पनाशीलता विकसित करने के मौक़े दे सकती हैं, साथ ही, उनमें यह अहसास पैदा कर सकती हैं कि वैज्ञानिकों की तरह सोचने का क्या अर्थ होता है। लेकिन कुछ शालाओं में इतने संसाधन नहीं होते कि प्रयोगशालाएँ स्थापित की जा सकें। ऐसी शालाओं में शिक्षक ऐसी जगह कैसे बना सकते हैं, जो विद्यार्थियों को ‘करके सीखने’ के मौक़े दें?

अकसर हमारे विद्यार्थी पाठ्यपुस्तकों के पारिभाषिक शब्दों और परिभाषाओं को परीक्षा के लिए रटकर विज्ञान सीखते हैं। सम्भव है विद्यार्थी इन परीक्षाओं में अच्छे अंक भी पा जाएँ लेकिन वे कक्षा के बाहर इन वैज्ञानिक अवधारणाओं से जुड़ाव नहीं बना पाते। ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान याद करने वाली जानकारियों का पुलिन्दा नहीं है। विज्ञान एक जीवन्त और गतिशील प्रक्रिया है। जब तक विद्यार्थी विज्ञान को करके नहीं देखेंगे उन्हें यह प्रक्रिया समझ नहीं आएगी न ही वे वैज्ञानिकों की तरह काम करने का आनन्द ले सकेंगे। शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ़-एसई) 2023 के मुताबिक़ : “विज्ञान सीखने का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा अपने हाथों से ‘विज्ञान करते’ हुए अनुभव लेना है। इसमें ‘विज्ञान करने’ के तहत कोशिश करना और ग़लतियाँ करने से लेकर आस-पास की सामग्री के उपयोग, विज्ञान के बुनियादी यंत्रों (मापन के उपकरणों) के उपयोग से लेकर प्रयोगशाला के वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग तक शामिल है। इस प्रक्रिया में विद्यार्थी अवधारणात्मक समझ हासिल करते हैं। साथ ही जोड़-तोड़, डिज़ाइन करना, प्रयोग रचना और उनके प्रदर्शन के द्वारा विद्यार्थी क्षमताएँ विकसित करते हैं।” लेकिन बिना प्रयोगशाला वाली शालाओं में विद्यार्थी विज्ञान को कैसे करें? मैं तीन तरीक़े आपके साथ साझा कर रहा हूँ। जिनसे शिक्षक इस चुनौती का समाधान निकाल सकते हैं। मेरे ये विचार उत्तराखण्ड के चम्पावत के शासकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में विद्यार्थियों के साथ चार साल तक किए काम के अनुभवों पर आधारित हैं।

  • रचनात्मक कोना

रचनात्मक कोना कक्षा-3 और उससे बड़ी कक्षा के बच्चों के लिए उपयुक्त है। इस स्तर पर शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य बच्चों में उनके आस-पास के परिवेश के बारे में जिज्ञासा उत्पन्न करना है। विविधतापूर्ण आसानी से उपलब्ध होने वाली और सस्ती सामग्री को एक बॉक्स में रखें और इस बॉक्स को कक्षा के बीच में एक टेबल पर रख दें (देखें तालिका-1)।

क्रमाँक सामग्री इस्तेमाल तादाद
1 बड़ा ख़ाली बॉक्स सभी सामान रखने के लिए 1
2 टेबल सामान के बॉक्स को रखने के लिए। यदि टेबल उपलब्ध न हो तो कक्षा के किसी भी कोने में भी बॉक्स को रख सकते हैं। 1
3 चटाई बच्चों के बैठने के लिए 1
4 गत्ते के छोटे डिब्बे इन डिब्बों को कक्षा में रखें और विद्यार्थियों से कहें कि वे अपने सवाल काग़ज़ की पर्ची पर लिखकर इन डिब्बों में डाल दें। इन डिब्बों को ज़ोर-से हिलाने के बाद विद्यार्थियों से एक-एक पर्ची निकालने के लिए कहें। निकाली गई पर्ची पर जो लिखा है उसे कक्षा में ज़ोर से पढ़ना है। विद्यार्थियों को सवाल पर कुछ कहने के लिए प्रोत्साहित करें। 5
5 कील कक्षा में बच्चों के काम के प्रदर्शन हेतु। इस काम में शिक्षक की मदद चाहिए होगी। 13
6 फेविकोल/ गोंद कुछ बनाने में चिपकाने हेतु 1–2
7 आइसक्रीम स्टिक कई चीज़ों को बनाने हेतु, जैसे सीटी बनाने में 50
8 पुराने अख़बार पेपर मैशी आकार एवं चित्र 1 किलो
9 ड्रिकिंग स्ट्रा ध्वनि उत्पन्न करने, घूमने वाले खिलौनों के लिए 1 पैकेट
10 गुब्बारे खिलौने एवं सरल प्रयोगों हेतु 1 पैकेट
11 धागा भरी घिर्री धागे वाला टेलिफ़ोन बनाने हेतु 1 प्रति विद्यार्थी
12 कॉफी कप धागे वाला टेलिफ़ोन बनाने हेतु 2 प्रति विद्यार्थी
13 पुराने बल्ब उत्तल लैंस बनाने हेतु 4
14 पुरानी सीडी सीडी होवरक्राफ्ट बनाने हेतु 5
15 लाइट इमिटिंग डायोड आलू बैटरी से बल्ब जलाने हेतु 10
16 ताँबे का तार आलू बैटरी से बल्ब जलाने हेतु 1 फ़ुट
17 ज़िंक पट्टी आलू बैटरी से बल्ब जलाने हेतु 5
तालिका-1 : रचनात्मक कोना तैयार करने के लिए ज़रूरी सामग्री की सूची।

सरल प्रयोगों वाली किताबों की प्रतियाँ साझा करें। बेहतर होगा वर्कशीट के रूप में प्रदर्शित करें (बॉक्स-1 देखें)। कक्षा में इनमें से कुछ प्रयोगों को करके दिखाएँ। फिर बच्चों से कहें कि इस बॉक्स में रखी सामग्री का उपयोग करते हुए वे ख़ुद कुछ नई चीज़ें करने की कोशिश करें (देखें चित्र-1)। समूह कार्य और सहपाठियों से चर्चा को प्रोत्साहन दें।

बॉक्स-1 : रचनात्मक कोने के लिए अनुशंसित पुस्तकें

  1. Arvind Gupta. ‘Apane Haath Ganit’. URL: https://www. arvindguptatoys.com/arvindgupta/ h-apne-hath-ganit.pdf
  2. Arvind Gupta. ‘Little Science: Kabaad se Jugaad’. Published by Eklavya. URL: https://www. arvindguptatoys.com/arvindgupta/ kabad-jugad-ag.pdf.
  3. Arvind Gupta. ‘Vigyan ka Maza’. Published by Pratham. URL: https://www.arvindguptatoys. com/arvindgupta/vigyan-maza- pratham.pdf.
  4. Arvind Gupta. ‘Kachre se Kamaal’. Published by Pratham. URL: https://www.arvindguptatoys. com/arvindgupta/kachre-kamal- pratham.pdf.
  5. Arvind Gupta. ‘The Toy Bag’. Published by Eklavya. URL: https:// www.arvindguptatoys.com/ arvindgupta/Toy_bag.pdf.
  6. Arvind Gupta. ‘Best of Arvind Gupta: Science Skills and Thrills’. Published by Rubin DCruz, Director, Kerala State Institute of Children’s Literature. URL: https:// www.arvindguptatoys.com/ arvindgupta/skillsthrills.pdf.
Doing science fig 1
चित्र-1 : रचनात्‍मक कोने में काम करते हुए बच्‍चे। नोट : यह फ़ोटो एक वास्तविक कक्षा का है और उसे यहाँ फ़ोटो में दिख रहे बच्चों के अभिभावकों की अनुमति से प्रकाशित किया गया है। बच्चों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए सामने की ओर देख रहे बच्चों के चेहरे धुँधले कर दिए गए हैं। इस चित्र के पुनः उपयोग के विवरण के लिए कृपया यहाँ ‘इमेज और मीडिया उपयोग’ देखें। Credits: Satish Bhaskar. License: CC BY-NC-ND 4.0.
  • विज्ञान का कोना

यह माध्यमिक स्तर (कक्षा-6 से 8) के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त है। इन कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों में दिए गए प्रयोगों के लिए ज़रूरी सामग्री की सूची बना लें। इनमें से जितनी सम्भव हो उतनी सामग्री इकट्ठा कर लें। इस सामग्री को अलग-अलग ढेर में बाँट लें। हरेक ढेर में कक्षा-विशेष के लिए प्रयोग सामग्री हो। हरेक ढेर में रखी सामग्री को पारदर्शी बॉक्स (जैसा टॉफ़ी बेचने वालों के पास होता है) में रखें। हरेक बॉक्स पर कक्षा स्तर को इंगित करने के लिए लेबल लगा दें। इससे विद्यार्थियों को अपनी ज़रूरत की सामग्री खोजने में आसानी रहेगी। प्रयोगशाला को स्थापित करने के लिए अलग कमरा तलाशने की बजाय अपनी कक्षा में एक ऐसा कोना तलाशें जहाँ विद्यार्थियों को प्रयोग करने की स्वतंत्रता हो (देखें चित्र-2)। बेहतर होगा कि किसी ऐसी जगह का चुनाव करें जिसका लम्बे समय तक इस उद्देश्य के लिए उपयोग किया जा सके। कक्षा में एक टेबल को इस कोने में जमाकर अपनी प्रयोगशाला स्थापित करें।

Doing science fig 2
चित्र-2 : ऐसी शाला में विज्ञान कोना, जहाँ विज्ञान प्रयोगशाला नहीं है। Credits: Satish Bhaskar. License: CC BY-NC 4.0.

विद्यार्थियों को इस कोने और इसके उद्देश्य से परिचित कराएँ। विज्ञान कोने का सर्वोत्तम उपयोग करने हेतु आपको अपने पढ़ाने के तरीक़े में बदलाव करने की ज़रूरत हो सकती है। विद्यार्थियों को महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त रटने की बजाय उन्हें ख़ुद से प्रयोग करने, अवलोकन, चर्चा एवं चिन्तन के द्वारा सीखने के मौक़े दें। अपने विद्यार्थियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करें कि वे विज्ञान कोने से सामग्री को अपनी टेबल तक लेकर आएँ और प्रयोग को सेट करें। उन्हें यह चुनने की अनुमति दें कि वे प्रयोग अकेले या सहपाठी के साथ या छोटे समूह में करें। यह सुनिश्चित करें कि विद्यार्थियों को इस सामग्री के साथ काम करने, सवाल पूछने, सहपाठियों से चर्चा एवं ख़ुद से सीखने के अधिक-से-अधिक मौक़े मिल सकें। विद्यार्थियों से ऐसे सवाल पूछें जिनसे उन्हें और गहराई से यह सोचने में मदद मिले कि वे क्या कर रहे हैं और क्या देख रहे हैं।

कक्षा के अन्तिम कुछ मिनटों का इस्तेमाल उपयोग में नहीं लाई सामग्री को लेबल किए बॉक्स में वापस रखने में विद्यार्थियों की मदद में करें। विद्यार्थियों से कहें कि प्रयोग के दौरान के अपने अनुभवों को रिकार्ड करें और साझा करें। विद्यार्थियों को अपने काम को पोस्टर के रूप में प्रस्तुति के लिए प्रोत्साहित करें। इन पोस्टर्स को कक्षा की दीवार पर लगाकर प्रदर्शित करें। इनसे विद्यार्थी प्रेरित हो सकते हैं, उन्हें इनके बारे में सोचने के लिए और अधिक आत्म-विश्वास मिलेगा, उनकी सृजनशीलता को और प्रोत्साहन मिलेगा।

  • कबाड़ से जुगाड़

यह माध्यमिक स्तर या इससे ऊपर के विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त है। मैं ‘जुगाड़’ शब्द का उपयोग नवाचार के लिए और कबाड़ शब्द का उपयोग उस सामान के लिए कर रहा हूँ जिसे हम अपने घर या शाला में अनुपयोगी मानकर फेंक देते हैं। शाला में एक ऐसा कमरे चुनें जहाँ विद्यार्थी बेहिचक आ-जा सकें। कमरे के एक कोने में पेंचकस, हथौड़ी, स्प्रिंग, घिरनी, रेडियो बनाने की किट, पुराने मोबाइल फ़ोन, बेकार पड़े रेडियो और टेलीविज़न सेट, पुराने तार, फ़्यूज बल्ब, पुराने सेल जैसे औज़ार एवं सामग्री रखें। विद्यार्थियों को उनके घर या आस-पास की ऐसी कोई भी बेकार सामग्री जिसमें उनकी रुचि हो उसे इस संग्रह में जोड़ने के लिए प्रोत्साहित करें।

यह महत्त्वपूर्ण है कि इस स्थान को विद्यार्थियों की सृजनात्मकता के विकास के मौक़े के रूप में देखा जाए, जो स्वाभाविक ज़िज्ञासा को बढ़ावा दे और अनुभवों के आधार पर अपने किताबी ज्ञान को आगे ले जाने में मदद करे। उन्हें कबाड़ को छूने, वस्तुओं को खोलने के साथ-साथ इनसे अपने मॉडल बनाने और प्रयोग करने की आज़ादी दें। कबाड़ सामग्री के साथ काम करते हुए, भले ही विद्यार्थी का बनाया मॉडल काम न करता हो लेकिन सामग्री की विविध तरीक़ों से जोड़-तोड़ करना विद्यार्थियों को आत्म-विश्वास देगा। नवाचार की भावना जगाने के अलावा यह जगह पर्यावरण जागरूकता को बढ़ाने में मदद कर सकती है, वह इस तरह कि विद्यार्थी ख़ुद से यह पता लगा रहे हैं कि कितनी तरह से कबाड़ का पुनः उपयोग हो सकता है।

चलते-चलते

प्रयोगशाला जैसे स्थान पर शिक्षक एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • विद्यार्थी अपनी जिज्ञासा की वजह से इस स्थान की ओर आकर्षित होते हैं। शिक्षक सीखने का वातावरण बनाकर विद्यार्थियों को प्रेरित कर सकते हैं कि उन्होंने कक्षा में जो देखा है और किया है उससे सम्बन्धित ढेर सारे सवाल पूछ सकें। सवालों के जवाब देने की बजाय इस बात को बढ़ावा देना चाहिए कि विद्यार्थी ख़ुद जवाब की खोजबीन करें।
  • विद्यार्थी प्रायोगिक अनुभवों से सीखते हैं। शिक्षक इस तरह से सीखने को प्रोत्साहित करने के लिए विद्यार्थियों को प्रयोग करने और प्रयोग तैयार करने के कई मौक़े दे सकते हैं। विद्यार्थियों को अपने मॉडल या प्रयोग में निहित अवधारणाओं और कार्य को देखने और समझने की गुंजाइश देने से विद्यार्थियों को स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक होने का अर्थ समझ आता है।
  • विद्यार्थी क्या सोच और कर रहे हैं, इसके बारे में बात करके सीखते हैं। शिक्षक उन्हें बुलाकर उनसे अपना काम सहपाठियों तथा अन्य बच्चों के सामने प्रस्तुत करने के लिए कह सकते हैं। सुबह की प्रार्थना सभा ऐसी प्रस्तुतियों के लिए उपयोगी जगह हो सकती है। उदाहरण के लिए, मैंने देखा कि माध्यमिक कक्षाओं के दो विद्यार्थियों ने दिखाया कि किस तरह उन्होंने कबाड़ से ड्रोन बनाया। इस मॉडल में हल्की मोटर लगी थी इसलिए यह मॉडल ज़मीन से कुछ ऊपर तक उड़ सकता था। एक अन्य उदाहरण में कक्षा-5 के दो विद्यार्थियों ने दिखाया कि उन्होंने किस तरह पेपर कप की मदद से स्कूटर का मॉडल बनाया था। मैंने अकसर छोटी कक्षा के विद्यार्थियों को अपनी पाठ्यपुस्तकों की कहानियों को, ख़ुद बनाई कठपुतलियों के साथ प्रस्तुत करते देखा है। विद्यार्थियों को ऐसे मौक़े देने से उनका अपनी सृजनात्मकता में भरोसा बढ़ सकता है।

यद्यपि जिन शिक्षकों के साथ मैंने काम किया है, उन्हें ऐसी ‘लैब स्पेस’ बनाना और बनाए रखना हमेशा आसान नहीं लगा। लेकिन शाला में ऐसी लैब स्पेस की मौजूदगी के कई लाभ हैं। शुरुआत में विद्यार्थी उस सामग्री का उपयोग करते थे जो उन्हें उपलब्ध करवाई जाती थी, अपने शिक्षक के साथ काम करने का इन्तज़ार करते थे और प्रयोग करने या बनाने की पूरी प्रक्रिया के दौरान उन्हें शिक्षकों की मौजूदगी आवश्यक लगती थी। लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया। विद्यार्थियों ने अपने घर से टूटे-फूटे उपकरण लाने शुरू कर दिए ताकि वे उनकी जाँच-पड़ताल कर सकें या उनके हिस्सों का फिर से उपयोग कर सकें। विद्यार्थी ख़ुद के प्रोजेक्ट पर काम करने में रुचि दिखाने लगे, उदाहरण के लिए सीटी या कैलिडोस्कोप (रंगीन काँच के टुकड़ों से भरी एक ट्यूब जिसे घुमाने पर रंगीन पैटर्न उभरते हैं) बनाना। कभी-कभार विद्यार्थी किसी ऐसे प्रोजेक्ट का आइडिया लेकर आते थे, जो उपलब्ध सामग्री से करना सम्भव नहीं होता था। तब उनके शिक्षक और मैं विद्यार्थियों के साथ बैठक की योजना बनाते। बैठक शाला समय के बाद होती थी। हम बैठक की शुरुआत इस चर्चा से करते थे कि विद्यार्थी क्या बनाना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें क्या-क्या चाहिए होगा।

उनके शिक्षक और मैं ब्लैकबोर्ड पर ज़रूरी सामान की सूची बनाते थे और स्कूल में उपलब्ध न होने वाले सामान को हाइलाइट करते थे। इसके बाद हम खोजबीन करके वे स्रोत सुझाते थे जहाँ से ये सामग्री कम या बिना लागत प्राप्त हो सकती हैं। इन अनुभवों के मार्फ़त हमने पाया कि नई चीज़ें बनाने के लिए अधिकांश आवश्यक सामग्री पुरानी चीज़ों में मिल सकती है। इस अभ्यास ने विद्यार्थियों को अपने परिवेश में मौजूद सामग्रियों के बारे में सृजनशील तरीक़े से सोचने को प्रेरित किया। शाला में इस तरह की रचनात्मक जगह बनने के बाद विज्ञान से इतर भी बदलाव दिखने लगे। उदाहरण के लिए छोटी कक्षाओं के बच्चे अमूमन अपने बनाए मॉडल पर अपना नाम लिखना चाहते थे। जिन विद्यार्थियों को लिखना नहीं आता था उन्होंने शिक्षकों से मदद माँगी। कुछ महीनों तक यह अवलोकन करने के बाद कि शिक्षक उनके नाम को किस तरह लिखते हैं, बच्चों ने ख़ुद से ऐसा करना शुरू कर दिया (देखें चित्र-3)।

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चित्र-3 : बच्‍चों में अपने बनाए मॉडल्‍स के प्रति अपनेपन का भाव महसूस हुआ और वे इन पर अपना नाम लिखने को इच्‍छुक थे। नोट : यह फ़ोटो एक वास्तविक कक्षा का है और इसे यहाँ फ़ोटो में दिख रहे बच्चे के अभिभावक की अनुमति से प्रकाशित किया गया है। बच्चे की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बच्चे का चेहरा धुँधला कर दिया गया है। इस फोटो के पुनः उपयोग के विवरण के लिए कृपया यहाँ ‘इमेज और मीडिया उपयोग’ देखें। License: CC BY-NC-ND 4.0.

कई शिक्षकों ने पाया कि विद्यार्थी स्कूल आते ही उत्सुकता से प्रयोगशाला जैसी जगहों को खोजने लगते हैं। कुछ अन्य शिक्षकों ने बताया कि जो विद्यार्थी नियमित रूप से शाला में अनुपस्थित रहते थे, उनकी उपस्थिति ज़्यादा नियमित हुई। इनमें से कई विद्यार्थियों ने इस सृजनात्मक स्थान में जो कुछ करने मिलेगा उसके लिए उत्साह और सम्‍भावना प्रकट की। कुछ शिक्षकों ने बताया कि कैसे बच्चों को अपनी पसन्द की चीज़ें चुनने और करने की आज़ादी ने उनमें ज़िम्मेदारी की भावना विकसित करने में मदद की। कुल मिलाकर ऐसी लैब स्पेस विद्यार्थियों के लिए सीखने के अनगिनत अवसर खोल सकती हैं। आप इसके साथ क्या करते हैं यह आपकी पसन्द का मामला है।

मुख्‍य बिन्‍दु

बिना प्रयोगशाला विज्ञान करना
  • जब तक विद्यार्थी विज्ञान को ‘करेंगे नहीं’ वे इसकी प्रक्रिया को नहीं समझ सकेंगे या वैज्ञानिकों की तरह सोचने एवं करने का मज़ा नहीं ले पाएँगे।
  • जिन शालाओं में विज्ञान प्रयोगशाला नहीं हैं उन शालाओं के विज्ञान शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए कक्षा के अनुरूप कम ख़र्चीली, स्थानीय उपलब्ध या कबाड़ सामग्री को लाकर सीखने का स्थान बना सकते हैं। इसके लिए पूरे कमरे का इस्तेमाल करने की बजाय कक्षा के एक कोने में इसे बनाया जा सकता है।
  • सीखने की ऐसी जगहों का सबसे प्रभावी इस्तेमाल करने के लिए विज्ञान शिक्षकों को पढ़ाने के ऐसे तरीक़ों की ज़रूरत हो सकती है जो जिज्ञासा और प्रायोगिक अनुभवों को प्रेरित करें। इसके अलावा विद्यार्थियों को अपने सहपाठियों और शाला के अन्य बच्चों के समक्ष अपने काम की प्रस्तुति के अवसर भी दे सकें।

आभार

सम्पादक आभारी हैं सौरभ सोम, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, भोपाल के कि उन्‍होंने इस लेख को साझा किया एवं इसकी समीक्षा तथा डिज़ाइन करने में मदद की।

टिप्पणियाँ

  • लेख के आरम्‍भ में दिया गया फ़ोटो एक वास्तविक कक्षा का है और इसे यहाँ फ़ोटो में दिख रहे बच्चों के अभिभावकों की अनुमति से प्रकाशित किया गया है। इस फ़ोटो के पुनः उपयोग के विवरण के लिए कृपया यहाँ ‘इमेज और मीडिया उपयोग’ देखें। Credits : Satish Bhaskar. License: CC BY-NC-ND 4.0.