किशोरावस्था से गुज़रने में विज्ञान के ज़रिए विद्यार्थियों की मदद

अनुवाद : जयजीत अकलेचा | पुनरीक्षण : उमा सुधीर | कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्या

किशोरावस्था में शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक बदलाव बड़े तेज़ी से होते हैं। विज्ञान की कक्षाओं को ऐसे सुरक्षित स्थानों में कैसे बदला जा सकता है, जहाँ विद्यार्थी इन बदलावों की खुलकर पड़ताल कर सकें, और उन्‍हें समझ सकें?

कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025) के अध्याय-6 (किशोरावस्था : वृद्धि एवं परिवर्तन की अवस्था) में विद्यार्थी पढ़ते हैं : “…यह द्रुत वृद्धि और विकास की अवधि है, जो विशिष्‍ट रूप से 10 से 19 वर्ष की आयु की अवधि में होती है। किशोरावस्था के दौरान शरीर वयस्क होने के लिए तैयार होने लगता है।”1 यह अध्याय बताता है कि “अधिकांश सजीवों की भाँति मानव-शिशु भी जन्म के तत्काल बाद जनन नहीं कर सकते हैं। जनन करने में सक्षम होने के लिए मानव-शिशु के शरीर को वृद्धि कर परिपक्व अवस्था तक पहुँचने की आवश्यकता होती है। मनुष्य जैसे-जैसे वृद्धि और विकास करते हैं, वे महत्त्वपूर्ण शारीरिक, संवेगात्मक और व्यवहारगत परिवर्तनों का अनुभव करते हैं और जनन करने की क्षमता अर्जित करते हैं। इनमें से कुछ परिवर्तन अत्यन्‍त स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो सकते हैं जबकि अन्य आन्‍तरिक रूप से होते हैं और ये दृष्टिगोचर नहीं होते हैं।” विकास के इस चरण में विद्यार्थियों ने अपने में और अपने साथियों में भी ऐसे अनेक बदलावों को पहले ही देखा हो सकता है (बॉक्स-1 देखें)।2 इन बदलावों को देखकर विद्यार्थियों में अकसर ऐसे सवाल और आशंकाएँ पैदा होती हैं जिन्हें वे अपने परिजनों के साथ साझा करने में हिचकिचाते हैं। पाठ्यपुस्तक का यह अध्याय कक्षा में कुछ ऐसी सरल गतिविधियों का सुझाव देता है, जिनके ज़रिए विद्यार्थियों को अपने साथियों और शिक्षकों के साथ इन मसलों पर चर्चा करने का अवसर मिलता है (बॉक्स-2 देखें)।1 मैंने इनमें से कुछ गतिविधियाँ अपने विद्यार्थियों के साथ आज़माईं। मैंने पाया कि पाठ्यपुस्तक व इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री किशोरों की अनेक आम आशंकाओं और डरों को समझने व उनका समाधान करने में मददगार साबित होती है। लेकिन यह सामग्री मेरे विद्यार्थियों के विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों व उनके निजी जीवन के अनुभवों से जुड़े सवालों का ठीक ढंग से समाधान करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। मैं इस आलेख में ऐसे ही कुछ मुद्दों को साझा कर रही हूँ और साथ ही यह भी बता रही हूँ कि इन पर कार्य करने के लिए मैंने कौन-सा रास्ता अपनाया।

बॉक्स-1 : किशोरावस्था के चरण

विकास की इस अवस्था को तीन चरणों में बाँटा जाता है :

  • प्रारम्भिक किशोरावस्था : यह अवस्था आमतौर पर 10 से 14 वर्ष की आयु के बीच होती है। यह यौवनावस्‍था की शुरुआत है। हार्मोनल बदलावों के कारण शरीर में वृद्धि बड़ी तेज़ी से होती है। इस अवस्था में विद्यार्थी मुख्‍यतौर पर ठोस संक्रियात्‍मक सोच प्रदर्शित करते हैं और उनमें आत्‍मचेतना बढ़ जाती है।
  • मध्य किशोरावस्था : यह सामान्यतः 15 से 17 वर्ष की आयु के बीच होती है। इस दौरान यौवनावस्‍था अपने चरम पर होती है। विद्यार्थियों की यौन परिपक्वता में तेज़ी दिखाई देती है। उनमें अमूर्त और कल्‍पनात्‍मक सोच का विकास होता है व समस्या-समाधान की क्षमता भी मज़बूत होने लगती है। वे अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाने लगते हैं, उन पर अपने हमउम्र साथियों का प्रभाव बढ़ता है और विपरीत लिंग के प्रति जिज्ञासा बढ़ जाती है।
  • उत्तर किशोरावस्था : इस चरण तक शारीरिक विकास पूरा हो जाता है। विद्यार्थी अधिक मज़बूत औपचारिक संक्रियात्‍मक सोच व बेहतर निर्णय लेने की क्षमता, स्‍वयं की पहचान की भावना, स्थिर और बढ़ा हुआ आत्म-नियंत्रण दिखाते हैं।2

व्यक्तिगत बदलावों पर निर्देशित आत्‍म-चिन्‍तन

मैंने शुरुआत एक ऐसी गतिविधि (कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के अध्याय-6 की गतिविधि संख्या 6.1) से की, जो विद्यार्थियों को स्‍वयं में नज़र आने वाले बदलावों को पहचानने और उन पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है : “एक डिब्बा और काग़ज़ की कुछ पर्चियाँ लें। कक्षा 5 से 8 तक आते-आते विद्यार्थियों में जो परिवर्तन आपने देखे हैं, उन्हें लिखें। ये परिवर्तन लम्बाई, शारीरिक ताक़त, व्यवहार या किसी भी अन्य पहलू से जुड़े हो सकते हैं। कृपया पर्चियों पर कोई नाम न लिखें। पर्चियों को मोड़कर उन्हें डिब्बे में डाल दें…।” इस गतिविधि से मुझे जो प्रतिक्रियाएँ मिलीं, वे इस तरह हैं :

  • सभी विद्यार्थियों ने लम्बाई और वज़न में बढ़ोतरी की बात बताई।
  • कई विद्यार्थियों ने कहा कि उन्हें शरीर की बनावट में अन्तर महसूस हुआ। इनमें लड़कों में कन्धों व छाती का चौड़ा होना, जबकि लड़कियों में कूल्हों के आकार में विस्तार व स्तनों का उभार जैसे परिवर्तन शामिल थे।
  • कई विद्यार्थियों ने बताया कि उनकी आवाज़ पहले की तुलना में भारी हो गई।
  • कुछ विद्यार्थियों ने मुँहासे होने का उल्लेख किया।
  • अनेक विद्यार्थियों ने शरीर के कुछ हिस्सों में बाल उगने की बात कही। उदाहरण के लिए, लड़कों ने मूँछें आने का ज़िक्र किया।
  • लड़कियों ने माहवारी की शुरुआत होने की बात बताई।
  • कुछ लड़कियों ने अपनी योनि से सफ़ेद स्राव रिसता दिखाई देने का उल्लेख किया ( इसे ल्यूकोरिया कहा जाता है)।

इन शारीरिक परिवर्तनों पर चर्चा करने के लिए मैंने पाठ्यपुस्तक और विद्यार्थियों के अनुकूल छोटे-छोटे वीडियोज़ का उपयोग किया।3 ख़ासकर, मैंने विद्यार्थियों का ध्यान पाठ्यपुस्तक के इस पैरा की ओर दिलाया : “किशोरावस्था में हमारे शरीर में हार्मोन नामक कुछ रसायनों के उत्‍पादन के कारण मासिक धर्म एवं यौवनारम्‍भ के अन्‍य लक्षणों सहित अनेक परिवर्तन होते हैं। हार्मोन शरीर के प्रकार्यों को सुनिश्‍चित करते हुए शरीर की वृद्धि और विकास को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हार्मोन शरीर के अलग-अलग अंगों में उत्‍पादित होते हैं और मस्तिष्क द्वारा संकेत दिए जाने की अनुक्रिया-स्‍वरूप उपयुक्‍त समय पर निर्मुक्‍त होते हैं।1 पुरुषों और महिलाओं में प्रजनन हार्मोन किस तरह अलग-अलग ढंग से काम करते हैं, इस पर चर्चा करते हुए मैंने बताया कि विद्यार्थी अपने में जो परिवर्तन देख पा रहे हैं, वे विकास की एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। मैंने यह भी बताया कि किशोरावस्था के दौरान होने वाले कुछ बदलाव अन्दरूनी होते हैं और तुरन्त नज़र भी नहीं आते।

बॉक्स-2 : पाठ्यपुस्तक के अध्याय के मुख्‍य अधिगम प्रतिफलों का मेरा विश्लेषण

13 से 17 साल के बीच का समय विशेष रूप से संवेदनशील होता है। इस अवधि के दौरान किशोर-किशोरियाँ तेज़ी से होने वाले शारीरिक परिवर्तनों के साथ-साथ भावनात्मक और सामाजिक बदलावों के उथल-पुथल भरे दौर से गुज़रते हैं। इस समय अकसर उन्हें सही मार्गदर्शन की बहुत अधिक दरकार होती है, लेकिन वे उसे माँगने में हिचकिचाते हैं। मिडिल स्‍टेज विज्ञान पाठ्यपुस्तक में इस विषय पर अध्याय को शामिल करने से शिक्षकों को इन परिवर्तनों पर उस वक़्त चर्चा करने का अवसर मिलता है, जब विद्यार्थी इस अवस्था में या तो प्रवेश करने वाले होते हैं या इससे गुज़रना शुरू ही कर रहे होते हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए मैंने पाठ्यपुस्तक के इस अध्याय का विश्लेषण कर मुख्‍य अधिगम प्रतिफलों की पहचान की है :

  • किशोरावस्था के अर्थ और उसके आयु-प्रसार को समझना।
  • इस अवधि से जुड़े शारीरिक, जैविक और भावनात्मक परिवर्तनों को पहचानना।
  • इन बदलावों (जैसे माहवारी) के शुरू होने के कारणों की व्याख्या करना।
  • दूसरे जेंडर और अन्य लोगों के अनुभवों के प्रति संवेदनशीलता दिखाना।
  • किशोरावस्था से जुड़े मिथकों और तथ्यों में अन्तर कर पाना।
  • स्वस्थ जीवनशैली से जुड़े सुझावों और पौष्टिक आहार की आवश्यकता को
    समझना।1

मेरे विद्यार्थी जिस समुदाय से सम्‍बन्धित हैं उसके सांस्‍कृतिक मूल्‍य और उसमें प्रचलित मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए मैंने निम्नलिखित अधिगम प्रतिफलों को भी शामिल किया है :

  • किशोरियाँ माहवारी के दौरान व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखने के उपायों को समझें और अपनाएँ।
  • किशोरियाँ माहवारी से जुड़ी सामाजिक एवं सांस्कृतिक धारणाओं की वैज्ञानिक दृष्टि से जाँच करें और स्वयं यह तय करें कि वे सही हैं या ग़लत।
  • किशोरियाँ माहवारी सम्बन्धी अपनी समस्याओं के बारे में अपने परिजनों और शिक्षकों को बिना संकोच बताने का आत्मविश्वास पैदा करें।
  • किशोर लड़के अपने परिवार में माहवारी से गुज़र रहीं महिला सदस्यों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनें और आवश्यकता पड़ने पर इस विषय पर उनके साथ चर्चा करें।
  • किशोर लड़के और लड़कियाँ उन भरोसेमन्द वयस्कों के साथ अपने विचार और चिन्ताएँ साझा करने का आत्मविश्वास विकसित करें, जो उन्हें उचित मार्गदर्शन दे सकते हैं।
  • किशोर लड़के और लड़कियाँ भावी जीवन में उन्‍हें जो ज़िम्मेदारियाँ निर्वाह करनी होंगी उनकी समझ विकसित करें।

माहवारी से सम्बन्धित धारणाओं को समझने हेतु प्रश्नावली

पाठ्यपुस्तक विद्यार्थियों को बताती है : “किशोरवय लड़कियों से सम्‍बन्धित एक महत्त्वपूर्ण आन्‍तरिक परिवर्तन आर्तव चक्र (ऋतु चक्र) का आरम्‍भ है। यह प्रति 28 से 30 दिन में होता है और इसे प्रचलित रूप से माहवारी (पीरियड्स) कहते हैं। कई स्वस्थ लड़कियों में ऋतु चक्र 21 से 35 दिनों का हो सकता है। ऋतु चक्र प्रमुख प्राकृतिक प्रक्रिया है और यह अच्‍छे जनन स्वास्थ्य के संकेतों में से एक है।1 लेकिन इसके बावजूद विद्यार्थियों में मासिक धर्म या माहवारी को लेकर कई तरह की ग़लत धारणाएँ (भ्रान्तियाँ) हो सकती हैं (देखें गतिविधि शीट और स्‍टूडेंट हैंडआउट-1)। माहवारी से गुज़रने वाली लड़कियों व महिलाओं को आने वाली चुनौतियों के बारे में किशोरों की जानकारी और संवेदनशीलता का आकलन करने के लिए मैंने एक प्रश्नावली डिज़ाइन की। इस प्रश्नावली में शारीरिक और भावनात्मक असहजता, व्यक्तिगत स्वच्छता से जुड़ी आदतों व इससे सम्बन्धित सामाजिक चिन्ताओं पर आधारित प्रश्न शामिल थे। विद्यार्थियों को अपने स्वयं के अनुभवों के आधार पर उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित किया गया। उनके उत्तरों के विश्लेषण से निम्नलिखित बातें सामने आईं :

  • आधे से अधिक लड़कियों ने बताया कि वे माहवारी के दौरान दोबारा इस्‍तेमाल हो सकने वाले कपड़े से बने पैड्स का उपयोग करती हैं।
  • अधिकांश लड़कियों ने बताया कि माहवारी के दौरान उन्हें शारीरिक दिक्‍़क़तें (जैसे पेट एवं पीठ में दर्द, हाथ-पैरों में पीड़ा, थकान आदि) और उदासी की भावना महसूस होती है।
  • कुछ लड़कियों ने बताया कि माहवारी के दौरान उनके परिवार के लोग उन्हें कुछ खाद्य पदार्थों (जैसे अचार और बड़ी) को छूने, खट्टी चीज़ें खाने, ठण्डा पानी पीने व भाग-दौड़ वाले खेलों में हिस्सा लेने से रोकते हैं। दो लड़कियों ने तो यह भी बताया कि उन्हें इस दौरान नहाने से भी रोका जाता था।
  • सभी लड़कियों ने बताया कि माहवारी उनके लिए शर्मिन्दगी की वजह है और अधिकांश को इस बात की चिन्‍ता रहती है कि इस दौरान उनके कपड़ों पर ख़ून के दाग़ लग जाते हैं, जो दूसरों को नज़र आते हैं।
  • लड़कों के उत्तरों से स्पष्ट हुआ कि उन्हें माहवारी से गुज़र रही लड़कियों और महिलाओं की शारीरिक व भावनात्मक चुनौतियों के बारे में बहुत कम जानकारी रही है।
  • क़रीब 80 फ़ीसदी लड़कों ने बताया कि उन्होंने माहवारी के विषय में कभी भी अपने घर की महिला सदस्यों या सहपाठिनों से चर्चा नहीं की (देखें स्टूडेंट हैंडआउट-2)।

मैंने अगली कक्षा की शुरुआत में विद्यार्थियों से कहा कि वे इस पर विचार करें कि माहवारी के दौरान किशोर लड़कियों और वयस्क महिलाओं को किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह देखते हुए कि लड़के चर्चा में बहुत कम भाग ले रहे हैं, मैंने लड़कियों के उत्तर ज़ोर-ज़ोर से पढ़े और उन पर विस्तार से बातचीत की। इस चर्चा के दौरान मेरा उद्देश्य निम्नलिखित बातों की समझ विकसित करना था :

  • माहवारी एक स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया है। हर महीने माहवारी होना जनन स्वास्थ्य की बेहतरी का संकेत होता है।
  • माहवारी के दौरान व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। स्वच्छता का मतलब केवल शरीर की सफ़ाई से ही नहीं है, बल्कि उसमें इस दौरान उपयोग किए जाने वाले अन्तर्वस्त्रों और कपड़े/सैनिटरी पैड का साफ़ होना भी शामिल है। यदि किशोरियाँ माहवारी के दौरान कपड़े के पैड का उपयोग करती हैं, तो इस्तेमाल से पहले उसे अच्छी तरह से धोना बेहद ज़रूरी है।
  • माहवारी के दौरान कभी-कभार कपड़ों पर ख़ून के दाग़ लग जाना सामान्य बात है। यह कोई गम्भीर समस्या नहीं है और इसमें शर्म महसूस करने की भी ज़रूरत नहीं है। जैसे ही अवसर मिले, दाग़ लगे कपड़े बदल लेने चाहिए, ताकि स्वच्छता बनाई रखी जा सके। अन्तर्वस्त्रों को अच्छी तरह धोकर धूप में सुखाना चाहिए, ताकि वे कीटाणुरहित हो सकें। इससे संक्रमण का जोख़िम कम होता है।
  • माहवारी के दौरान भोजन पर आमतौर पर लगाई जाने वाली पाबन्दियों पर कड़ी आलोचनात्मक दृष्टि डालना आवश्यक है। कक्षा-5 की ईवीएस की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025) के अध्याय-3 (‘भोजन का रहस्य’) में विद्यार्थियों को भोजन के ख़राब होने में सूक्ष्मजीवों की भूमिका के बारे में पढ़ने को मिलता है।4 इसी समझ के आधार पर विद्यार्थियों को इस पर सोचने के लिए प्रोत्साहित किया गया कि अचार या बड़ी जैसे खाद्य पदार्थ माहवारी के कारण ख़राब होते हैं या फिर ग़लत तरीक़ों से की गई सार-सम्‍हाल व ग़लत तरह के उपयोग की वजह से!
  • माहवारी के दौरान लड़कियों को तब तक खेलकूद बन्द करने की ज़रूरत नहीं है, जब तक कि शारीरिक गतिविधि के कारण उन्हें असुविधा या दर्द न हो।
  • यदि माहवारी के दौरान इतना तेज़ दर्द हो कि रोज़मर्रा की गतिविधियों में दिक्‍़क़तें आने लगें, तो चिकित्सकीय परामर्श लेना आवश्यक है। ‘राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम’ के तहत 11 से 19 वर्ष तक के सभी किशोर-किशोरियाँ सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क जाँच और उपचार की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं। यह सेवा हमारे स्कूल के निकट स्थित सरकारी अस्पताल में उपलब्ध है। विद्यार्थियों को बताया गया कि इसके लिए उन्‍हें उम्र के प्रमाण के रूप में आधार कार्ड की आवश्‍यकता होगी।

बहुत-सी लड़कियों व महिलाओं को माहवारी के दौरान महसूस होने वाली पीड़ा, तक़लीफ़ों और सामाजिक पाबन्दियों को रेखांकित करते हुए मैंने इस बात पर ज़ोर दिया कि लड़कों को माहवारी से गुज़रने वाली लड़कियों व महिलाओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। हमने उन तरीक़ों पर भी चर्चा की कि लड़के किस तरह बिना कोई असहजता या शर्मिन्दगी पैदा किए अपनी सहपाठी लड़कियों और परिवार की महिलाओं को सम्‍बलन दे सकते हैं।

बॉक्स-3 : पाठ्यचर्या के साथ सम्बन्ध

इन गतिविधियों और उनसे जुड़ी चर्चा से निम्नलिखित की प्राप्ति में मदद मिल सकती है :

  • मिडिल स्‍टेज विज्ञान के पाठ्यचर्या लक्ष्य (CG-4) : [विद्यार्थी] स्वास्थ्य, स्वच्छता और अपनी भलाई के घटकों को समझता है। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों में निम्‍नलिखित दक्षता (C-4.3) को विकसित करने में मदद कर सकती है “किशोरावस्था के दौरान होने वाले जैविक परिवर्तनों (वृद्धि, हार्मोनल बदलाव) की व्याख्या कर सकें और अपने भले के लिए क़दम उठा सकें।
  • कक्षा-8 के विज्ञान के अधिगम प्रतिफल
  • [विद्यार्थी] किशोरावस्था और किशोर आयु को परिभाषित करता/ करती है, ताकि यौवनारम्भ के समय होने वाले परिवर्तनों को समझा सके।
  • [विद्यार्थी] यौवनारम्भ में शरीर में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों को बता सकता/ सकती है, जिससे बदलते मानव शरीर पर किशोरावस्था के प्रभावों को समझा पाता है।
  • [विद्यार्थी] किशोरावस्था और किशोर आयु को परिभाषित करता/ करती है, ताकि यौवनारम्भ के समय होने वाले परिवर्तनों को समझा सके।
  • [विद्यार्थी] सीखी गई वैज्ञानिक अवधारणाओं को दैनिक जीवन/ वास्तविक परिस्थितियों में समस्‍याओं को हल करने में/समाधान सुझाने में/निवारक उपाय करने में इस्‍तेमाल करता/ करती है। उदाहरण के लिए, किशोरावस्था से जुड़ी भ्रान्तियों और सामाजिक वर्जनाओं को चुनौती देना आदि।7

भावनात्मक परिवर्तनों को समझने के लिए खुली चर्चा

मैंने इस गतिविधि की शुरुआत ब्लैकबोर्ड पर उन भावनात्मक परिवर्तनों को लिखकर की, जिनका उल्लेख विद्यार्थियों ने प्रश्नावली के अपने उत्तरों में किया था :

  • माता-पिता की तुलना में अपने मित्रों के साथ अपनी समस्याएँ साझा करने में अधिक सहजता महसूस करना।
  • छोटी-छोटी बातों पर आसानी से चिढ़ जाना।
  • सामान्य से अधिक बातचीत करने की इच्छा होना।
  • नए मित्र बनाने की चाहत होना।
  • रोमान्टिक आकर्षण का अनुभव करना (जैसे किसी के प्रेम में पड़ना जाना और फिर किसी और के प्रति आकर्षित होकर उसे धोखा देना)।
  • मामूली बातों को भी बहुत गम्भीरता से लेना।
  • सामान्य से अधिक तनाव महसूस करना।
  • ख़ुद को छिपाने की इच्छा होना, जैसे शरीर को ढँककर रखना।
  • दूसरों की समस्याओं के प्रति अधिक जागरूक और संवेदनशील होना।

खुली चर्चा करवाने का मेरा उद्देश्य इन भावनात्मक परिवर्तनों के लिए विद्यार्थियों को मानसिक रूप से तैयार करना था। इसके लिए मैंने निम्नलिखित बिन्दुओं को सामने रखा :

  • किशोरावस्था में छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन, मानसिक दबाव और तनाव सामान्य है। यह प्रायः शरीर और भावनाओं में तेज़ी से हो रहे बदलावों के साथ ताल-मेल बैठाने की चुनौतियों की वजह से पैदा होता है।
  • किशोरावस्था में आकर्षण और किसी के प्रति निकटता महसूस करना जीवन का एक स्‍वाभाविक और महत्त्वपूर्ण अनुभव होता है। लेकिन यह वह समय भी होता है, जब विद्यार्थी स्वयं को समझने और अपनी प्राथमिकताओं को पहचानने की प्रक्रिया में होते हैं। इस चरण में पढ़ाई, मित्रताओं, रुचियों और व्यक्तिगत लक्ष्यों पर ध्यान देने से भावी रिश्तों के लिए एक मज़बूत नींव तैयार हो सकती है।
  • जब विद्यार्थी अपनी समस्याएँ केवल अपने हम-उम्र मित्रों, जिनके अनुभव भी उनके अनुभवों जैसे ही होते हैं, के साथ साझा करते हैं, तो क्या उन्हें इसका सार्थक समाधान मिल पाता है? यदि नहीं, तो वे मार्गदर्शन के लिए कौन-से अन्य भरोसेमन्द लोगों से सम्पर्क कर सकते हैं?
  • किशोरियाँ अपने शारीरिक परिवर्तनों के कारण, विशेषकर किशोरावस्था के शुरुआती चरण में, सामाजिक रूप से संकोच या झिझक महसूस कर सकती हैं। ये भावनाएँ स्वाभाविक होती हैं और प्रायः अस्थाई भी, क्योंकि समय के साथ शरीर स्वयं को इन परिवर्तनों के अनुरूप ढाल लेता है और धीरे-धीरे बदलावों की गति धीमी हो जाती है। इसको मद्देनज़र रखते हुए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि लड़कियाँ इस झिझक की वजह से अपना आत्मविश्वास कम न होने दें और न ही इसे अपने व्यक्तित्व के विकास की राह में बाधा बनने दें।

सामाजिक चुनौतियों को साझा करने के लिए ‘गुमनाम’ प्रश्न पेटी

सामाजिक बदलावों के साथ तालमेल बिठाना किशोरावस्था के सबसे कठिन पहलुओं में से एक होता है। इसकी और अधिक पड़ताल करने के लिए मैंने विद्यार्थियों को काग़ज़ की कोरी पर्चियाँ देकर उनसे अपने जीवन के इस पहलू से जुड़े किसी भी सवाल या चिन्ता को लिखने के लिए कहा। मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी प्रतिक्रियाओं को पूरी तरह से गुमनाम रखा जाएगा। यानी किसी को यह पता नहीं चलेगा कि किसने क्या लिखा है। इससे उन्हें उन मुद्दों को साझा करने की हिम्मत मिली, जिनके बारे में बताने में वे अकसर संकोच या शर्म महसूस करते हैं। कक्षा ख़त्म होने के बाद विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी पर्चियाँ एक पेटी में डाल दीं (देखें चित्र-1)। विद्यार्थियों द्वारा साझा की गईं कुछ चिन्ताओं के उदाहरण यहाँ दिए गए हैं :

  • एक बार जब मैं सड़क पर पैदल जा रही थी, उस समय कुछ लड़कों ने मुझे छेड़ा। मुझे अपनी सहेली को यह बात बताना अच्छा नहीं लगा। क्या मुझे इस बारे में अपनी माँ को बताना चाहिए?
  • जब से मैं 11 साल की हुई, उसके बाद से मुझे कोई खेल खेलने नहीं दिया जाता। ऐसा क्यों?
  • जब मैं 13 साल की हुई, तो मेरे बाहर जाने पर कुछ पाबन्दियाँ लगा दी गईं। अब मैं 14 साल की हूँ और मेरा बाहर आना-जाना पूरी तरह से बन्द कर दिया गया है। लेकिन मेरे भाई को बाहर जाने से नहीं रोका जाता। लड़कियों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? क्या यह सही है या ग़लत?
  • एक बार रामलीला देखने के बाद मैं रात को अकेले ही घर लौट रही थी। रास्ते में लड़कों का एक झुण्ड देखकर मैं बहुत डर गई थी।
  • अगर कोई लड़का मुझे घूरता है, छेड़ता है और तंग करने के लिए उल्टे-सीधे नामों से बुलाता है, तो मुझे क्या करना चाहिए?
  • अगर मुझसे कोई बहुत बड़ी ग़लती हो गई हो, तो मैं उसे कैसे सुधार सकता/ सकती हूँ?
  • हमारे मन में जो भी बातें हैं, क्या हमें उन्हें दूसरों के साथ साझा करना चाहिए या अपने तक ही सीमित रखना चाहिए?
  • मुझे डर रहता है कि अगर मैं अपनी कोई समस्या किसी दोस्त/ सहेली को बताऊँगा/ बताऊँगी, तो ऐसा न हो कि वह किसी और को बता दे।
  • एक लड़का, जिसे मैं भी जानती हूँ, जब अपने दोस्तों के साथ एक घर के सामने से निकला तो उसने दोस्तों से कहा कि वहाँ रहने वाली लड़की उसकी गर्लफ्रेंड है। मुझे लगा कि वह उस लड़की की बदनामी कर रहा है।
  • मैं मानता था कि भूत होते हैं। क्या यह सच है?
  • मेरे एक दोस्त का कहना है कि किशोरावस्था में सभी के मन में बुरे विचार आते हैं। क्या यह सही है या ग़लत?
  • सब लोग कहते हैं कि लड़कियों के लिए पढ़ाई उपयोगी नहीं है। उनका कहना है कि लड़कियों को घर सम्हालना सीखना चाहिए और लड़कों को बाहर काम करना। ऐसे फ़ैसले क्यों लिए जाते हैं?
  • स्कूल से घर लौटते समय हमारे ही स्कूल के दो लड़कों ने मुझे और मेरी सहेली को परेशान करना शुरू कर दिया। मैंने अपनी सहेली से कहा, ‘चलो, यहाँ से भाग चलते हैं।’ हम बहुत तेज़ी से वहाँ से भाग निकले। बाद में हमने उन लड़कों की शिकायत स्कूल के एक शिक्षक से करने का निर्णय लिया। सर ने हमारी बात सुनी और उन लड़कों को डाँटा-फटकारा। अगर हमारा सामना फिर से उन लड़कों से हो जाए, तो हमें क्या करना चाहिए?
चित्र-1 : किशोरावस्था के दौरान सामने आने वाली सामाजिक चुनौतियों के कुछ उदाहरण। ये कुछ पर्चियाँ हैं, जो विद्यार्थियों ने गुमनाम प्रश्न पेटी में डाली थीं। Credits: Photos taken and shared by Shiv Pandey. License: CC BY-NC-ND 4.0

मैंने हर पर्ची को ध्यान से पढ़ा और बहुत सोच-समझकर उनके जवाब तैयार किए। अगली कक्षा में मैंने इन चिन्ताओं को अपने विद्यार्थियों के साथ साझा किया और उन पर चर्चा की। मेरे कुछ जवाब इस प्रकार थे :

  • यदि सड़क पर या कहीं और भी कोई आपके साथ ग़लत व्‍यवहार करता है, तो ऊँची आवाज़ में उसका विरोध करें। यदि आप सहेलियों या दोस्तों के साथ हैं, तो मिलकर विरोध करें। ऊँची आवाज़ लोगों का ध्यान आकर्षित करती है और तंग करने वाले व्यक्तियों को हतोत्साहित करती है। इससे उनके दोबारा ऐसा करने की सम्भावना कम हो जाती है। ऐसी किसी भी घटना की जानकारी अपने माता-पिता को देना भी बहुत ज़रूरी है।
  • यदि आपसे कोई ऐसी ग़लती हुई है, जिसे आप स्वयं सुधार सकती/सकते हैं, तो उसे सुधारने का प्रयास करें। अगर वह आपकी क्षमता से बाहर है, तो किसी शिक्षक या अपने माता-पिता से बात करें।
  • कई परिवारों में लड़कियों को शाम के वक़्त बाहर जाने की अनुमति नहीं होती है। ऐसा अकसर इसलिए किया जाता है, क्योंकि माता-पिता और घर के बड़े-बुजुर्ग अपनी बच्चियों की सुरक्षा को लेकर चिन्तित रहते हैं। यह पाबन्दी असहज लग सकती है, लेकिन लड़कियों के लिए ज़रूरी है कि वे धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक रूप से ख़ुद को इतना मज़बूत बनाएँ कि परिवार के लोगों में यह भरोसा पैदा हो सके कि उनकी बच्चियाँ अपनी रक्षा स्वयं करने में समर्थ हैं। इसके लिए स्कूलों में चलाए जा रहे ‘रानी लक्ष्मीबाई आत्म-रक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम’ में भाग लेना एक अच्छा तरीक़ा हो सकता है। इस कार्यक्रम की रचना किशोरियों को आत्म-सुरक्षा से जुड़ी सामान्य परिस्थितियों से निपटने के लिए सरल कौशल और तकनीकें सिखाने के लिए की गई है।
using science figure-2
चित्र-2 : घरेलू कामों में हाथ बँटाना। इससे किशोर लड़के और लड़कियाँ वयस्क जीवन की ज़िम्मेदारियाँ उठाने के लिए तैयार होते हैं। Credits: Created for i wonder… using ChatGPT, under prompting by Chitra Ravi (Nov 2025). License: CC BY-NC-ND 4.0.
  • पढ़ाई ज़रूरी है, लेकिन घर के कामों में हाथ बँटाना भी ज़रूरी है। लड़की हो या लड़का, दोनों को घर की ज़िम्मेदारियाँ साझा करनी चाहिए (देखें चित्र-2)। घरेलू कामों में शामिल होने से विद्यार्थी भविष्य की ज़िम्मेदारियों के लिए तैयार होते हैं। इससे माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को उन्हें ज़िम्मेदार, संवेदनशील और सामाजिक रूप से जागरूक पारिवारिक सदस्य व बेहतर नागरिक बनने के लिए निर्देशन देने का अवसर मिलता है।
  • स्कूली कार्य के साथ-साथ कुछ विद्यार्थियों को ऐसे हुनर सीखने के अवसर भी मिल सकते हैं, जो भविष्य में उन्‍हें आजीविका कमाने में मदद करें (देखें चित्र-3)। इन अवसरों को गम्भीरता से लेना चाहिए, क्योंकि यह व्यावहारिक अनुभव दे सकते हैं, बल्कि ये भविष्य में आत्मनिर्भर बनने के रास्ते भी खोल देते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 भी व्यावसायिक शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित करती है और विद्यार्थियों को नियमित पढ़ाई के साथ-साथ ऐसे कौशल खोजने और उन्‍हें विकसित करने के लिए भी प्रोत्साहित करती है।5
Engaging in vocational education
चित्र-3 : व्यावसायिक शिक्षा से जुड़ाव। किशोर-किशोरियों को स्कूली पढ़ाई के अलावा अन्य हुनर सीखने के लिए प्रोत्साहित करने से उन्हें भविष्य में आजीविका से जुड़े व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। Credits: Created for i wonder… using ChatGPT, under prompting by Chitra Ravi (Dec 2025). License: CC BY-NC-ND 4.0.

चलते-चलते

मेरे किशोरवय विद्यार्थियों द्वारा साझा किए गए प्रश्नों, विचारों और चिन्ताओं ने मुझे अपने किशोरवय दौर की कई दुविधाओं और अन्तर्द्वन्दों की याद करवा दी। इस दौरान होने वाले शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन तथा ऐसे समय में उनके प्रति समाज का रवैया किशोर-किशोरियों के व्यक्तित्व को काफ़ी गहराई तक प्रभावित करता है। कुछ लड़के-लड़कियाँ तो अपने आत्मविश्वास व सही निर्णय लेने के सामर्थ्य के बलबूते और अपने आस-पास के लोगों (परिवार व शिक्षकों) के सहयोग से ख़ुद को इन बदलावों के अनुरूप ढालकर सामाजिक चुनौतियों पर विजय हासिल कर लेते हैं। लेकिन कई ऐसे भी होते हैं, जिन्हें आगे बढ़ने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसी वजह से मेरा मानना है कि तेज़ी से होने वाले इन शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक बदलावों की इस अवधि में शिक्षकों को चाहिए कि वे विद्यार्थियों को उचित मार्गदर्शन प्रदान करें।

मेरी कक्षा के अनुभवों ने मिडिल स्‍टेज विज्ञान पाठ्यक्रम में किशोरावस्था पर एक अध्याय शामिल किए जाने की अहमियत को फिर से साबित किया (देखें बॉक्स-3)।6,7 साथ ही इसने शिक्षकों के लिए इस अध्याय पर गहराई और गम्भीरता कार्य करने की ज़रूरत को भी रेखांकित किया। इस अध्याय पर कार्य करते समय मानव प्रजनन और किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों जैसे विषयों पर चर्चा करनी होती है − ये ऐसे विषय हैं जो अकसर संवेदनशील होते हैं या सामाजिक वर्जनाओं से जुड़े होते हैं। इन पर खुलकर और आलोचनात्मक दृष्टि से बात करने के लिए शिक्षकों को अपने व्यक्तिगत संकोच या झिझक को एक ओर रखकर आत्मविश्वास,सावधानी और समझदारी के साथ आगे आना होगा।

यह चर्चा खुलकर हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि शिक्षक अपने विद्यार्थियों का भरोसा हासिल करें। अगर विद्यार्थी अपने परेशान करने वाले सवालों, जिज्ञासाओं और चिन्ताओं को गुमनाम रहकर साझा करते हैं, तो वे अपने आपको बिना हिचकिचाहट के अधिक स्‍वतंत्रता से व्‍यक्‍त कर पाएँगे। उनकी चिन्ताओं पर संवेदनशीलता और सम्मान के साथ प्रतिक्रिया देने से विद्यार्थियों को यह महसूस करने में मदद मिलेगी कि वे सुरक्षित हैं, और विकास के इस दौर से गुज़रते समय उन्‍हें मदद उपलब्‍ध है।

मुख्‍य बिन्‍दु

किशोरावस्था से गुज़रने में विज्ञान के ज़रिए विद्यार्थियों की मदद
  • कक्षा-7 की पाठ्यचर्या विद्यार्थियों के समक्ष किशोरावस्था को विकास के एक ऐसे पड़ाव के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसमें कई शारीरिक, जैविक और भावनात्मक परिवर्तन होते हैं।
  • विद्यार्थियों को उनके भीतर हो रहे शारीरिक बदलावों पर ग़ौर करने और उन पर चर्चा करने के लिए प्रेरित करने से उन्हें यह समझने में मदद मिलती है कि इस उम्र के लिए ये परिवर्तन स्वाभाविक और सामान्य हैं।
  • माहवारी से जुड़े अनुभवों पर चर्चा स्वच्छता और पोषण के प्रति किशोरियों में जागरूकता बढ़ाती है, किशोरों को माहवारी से गुज़र रहीं सहपाठिनों या परिवार की महिलाओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार सिखाती है और सामाजिक वर्जनाओं पर आलोचनात्मक मनन को बढ़ावा देती है।
  • भावनात्मक परिवर्तनों की पड़ताल विद्यार्थियों को मददगार और भरोसेमन्द वयस्क लोगों से मार्गदर्शन लेने के महत्त्व को समझने में सक्षम बनाती है।
  • सामाजिक चुनौतियों पर चर्चा किशोर-किशोरियों को स्वयं की सुरक्षा के उपायों पर विचार करने, घरेलू ज़िम्मेदारियों में योगदान देने और व्यावसायिक कौशल सीखने के अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करती है।
  • कक्षा में सुरक्षित और अनुकूल वातावरण में विद्यार्थियों को उनकी पहचान को उजागर किए बग़ैर अपनी चिन्ताएँ साझा करने के अवसर देने से खुली और सम्मानजनक चर्चा को प्रोत्साहन मिलता है।

आभार

आई वंडर… टीम अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन के शिव पाण्‍डेय को लेखक को यह अनुभव लिखने के लिए प्रोत्साहित करने, उनके लेख का ड्राफ़्ट हमसे साझा करने और इसे प्रकाशित करने में उनके सहयोग के लिए धन्यवाद देती है। हम अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के राजेश उत्साही को भी लेख के मूल ड्राफ़्ट को हिन्‍दी से अँग्रेज़ी में अनूदित करने में सहयोग के लिए धन्यवाद देते हैं।

टिप्पणियाँ

  • Credits for the image (Adolescent hygiene) used in the background of the article title: Created for i wonder… using ChatGPT, under prompting by Chitra Ravi (Dec 2025). License: CC BY-NC-ND 4.0.
  • इस लेख में तीन अलग किए जा सकने वाले कक्षा संसाधन हैं : गतिविधि शीट : माहवारी से जुड़ी आम धारणाएँ — मिथक या तथ्य?, स्टूडेंट हैंडआउट-1 : माहवारी से जुड़े मिथक और तथ्य, और स्टूडेंट हैंडआउट-2 : माहवारी को समझना : लड़कों के लिए एक मार्गदर्शिका।
  • एकलव्य द्वारा किशोरावस्था पर प्रकाशित तीन किताबें शिक्षकों के लिए कक्षा में शिक्षण के लिए उपयोगी हो सकती हैं : माई बॉडी माई लाइफ (URL: https://eklavyapitara.in/products/my-body-my-life); बेटी करे सवाल (URL: https://eklavyapitara.in/products/beti-kare-sawal) और बेटा करे सवाल (URL: https://eklavyapitara.in/products/beta-kare-sawal)। धन्या के. द्वारा आई वंडर… के जून 2023 के अंक में लिखा लेख ‘मानव प्रजनन शिक्षण’ भी उपयोगी हो सकता है (URL: https://anuvadasampada.azimpremjiuniversity.edu.in/3923/)।
  • लेख के हिन्दी अनुवाद की समीक्षा के लिए हम हृदय कान्त दीवान के आभारी हैं।

सन्दर्भ

  1. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (2025)। ‘अध्‍याय-6 : किशोरावस्‍था : वृद्धि एवं परिवर्तन की अवस्‍था’। जिज्ञासा, कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 73–88. URL: https://ncert.nic.in/textbook/pdf/ghcu106.pdf.
  2. Fiveable Content Team (2024). ‘1.1 Defining adolescence and its stages—Adolescent Development’. Fiveable. Last updated in Sep 2025. URL: https://fiveable.me/adolescent-development/unit-1/defining-adolescence-stages/study-guide/JNmXpy8kKnLRp1ka. Accessed on: Nov 10, 2025.
  3. सम्‍पर्क दीदी (2024)। ‘किशोरावस्‍था एवं यौवनारम्‍भ’। YouTube. URL: https://www.youtube.com/watch?v=nu1igmJ81l8.
  4. National Council of Educational Research and Training (2025). ‘Chapter 3: The Mystery of Food’. Our Wondrous World, Textbook of EVS (The World Around Us) for Grade V: 40–54. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?eeev1=3-10.
  5. Ministry of Human Resource and Development, Government of India (2020). ‘National Education Policy 2020’. Ministry of Education. URL: https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_Final_English_0.pdf.
  6. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks (2023). ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.
  7. Central Board of Secondary Education (2020). ‘Teachers’ Resource for Achieving Learning Outcomes, Classes 1 to 10’. URL: https://cbseacademic.nic.in/web_material/Manuals/TeachersResource_LODoc.pdf.