दिसम्‍बर 2025 अंक

dec-2025-issue

आई वंडर…दिसम्‍बर, 2025 के अंक में आपका स्वागत है। यह अंक दो ऐसी थीम पर प्रकाश डालता है जिन पर परीक्षा केन्द्रित कक्षाओं में आमतौर पर कम ध्यान दिया जाता है — किशोरावस्था और पक्षी-अवलोकन। यदि इस अंक में प्रस्तुत लेखों और अलग किए जा सकने वाले कक्षा-संसाधनों में से कोई भी आपके कक्षा शिक्षण में सहायक होता है, तो हमें बताएँ कि कैसे। ऐसे अनुभव जो अन्य शिक्षकों के लिए मददगार हो सकते हैं, उन्हें अगले अंक में शामिल किया जाएगा।

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सम्पादक की ओर से...

आई वंडर… के इस अंक में आपका स्वागत है। इस अंक में मिडिल स्‍टेज की विज्ञान पाठ्यचर्या के एक महत्त्वपूर्ण, लेकिन कम चर्चा में रहने वाले, विषय ‘किशोरावस्था’ पर एक लेख शामिल है।

किशोरावस्था को अकसर बचपन और वयस्कता के बीच पुल के रूप में दर्शाया जाता है, एक ऐसा चरण जिसमें शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक परिवर्तन मिलकर भविष्य के वयस्क को आकार देते हैं। हालाँकि मिडिल स्‍टेज की विज्ञान पाठ्यचर्या का एक अध्याय इन परिवर्तनों पर केन्द्रित है, फिर भी विज्ञान शिक्षक इसे कक्षा में पढ़ाने में संकोच करते हैं। गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक बाधाएँ अकसर शिक्षकों की अपनी झिझक से और भी बढ़ जाती हैं और खुली चर्चा को सीमित कर देती हैं। परिणामस्वरूप, इस अध्याय और सम्‍बन्धित विषयों को कभी-कभी छोड़ दिया जाता है या सतही तौर पर पढ़ाया जाता है, जिससे विद्यार्थियों को विकास के इस महत्त्वपूर्ण चरण के दौरान मार्गदर्शन नहीं मिल पाता।

‘किशोरावस्था से गुज़रने में विज्ञान के ज़रिए विद्यार्थियों की मदद’ लेख में, अनी‍ता रावत ने इस परिवर्तनकारी चरण के दौरान विज्ञान शिक्षा किस प्रकार विद्यार्थियों की मदद कर सकती है, इस पर एक विचारपूर्ण और प्रभावशाली दृष्टिकोण प्रस्‍तुत किया है। किशोरावस्था के अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर, अनीता इसे जीवन के सबसे संवेदनशील चरणों में से एक मानती हैं। किशोर हार्मोनल परिवर्तनों, पहचान बनाने और सामाजिक दबावों से जूझते हैं। वे तीव्र भावनाओं का अनुभव करते हैं लेकिन अकसर आलोचना या गलत समझे जाने के डर से अपनी चिन्‍ताओं को खुलकर व्यक्त करने में संघर्ष करते हैं। व्यक्तिगत परिवर्तनों पर निर्देशित आत्म-चिन्‍तन और गुमनाम प्रश्न पेटी के उपयोग जैसी कक्षा की रणनीतियों के माध्यम से, अनीता ऐसे अवसर बनाती हैं जहाँ विद्यार्थी संवेदनशील प्रश्नों और चिन्‍ताओं को व्यक्त करने में सुरक्षित महसूस करते हैं। उनका दृष्टिकोण सहानुभूतिपूर्ण और व्यावहारिक दोनों है। शिक्षक और मार्गदर्शक की दोहरी भूमिका निभाते हुए, वह विद्यार्थियों को उनके सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने में सहायता करती हैं और उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खोजने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। माहवारी और किशोर लड़कियों के सामने आने वाली विशिष्ट चुनौतियों पर संवेदनशील चर्चाओं के माध्यम से, अनीता यह दर्शाती हैं कि शिक्षक कैसे उन रूढ़ियों को चुनौती दे सकते हैं जो लड़कियों की गतिशीलता, आत्मविश्वास और भागीदारी को सीमित करती हैं। साथ ही वे बताती हैं कि शिक्षक कैसे लड़कों में समानुभूति की भावना को बढ़ावा दे सकते हैं। उनका कार्य यह दिखाता है कि कैसे विज्ञान की कक्षाएँ न केवल अवधारणाओं को सीखने का स्थान बन सकती हैं, बल्कि गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक सोच को सम्‍बोधित करने का माध्यम भी बन सकती हैं।

अनीता के कार्य में सबसे शक्तिशाली सन्‍देशों में से एक उनका यह दावा है कि किशोरावस्था पर पाठ वैकल्पिक या अतिरिक्त विषय नहीं हैं; बल्कि वे समग्र शिक्षा के अनिवार्य घटक हैं। वह हमें याद दिलाती हैं कि एक विज्ञान शिक्षक की भूमिका अवधारणाओं, सूत्रों को पढ़ाने या प्रयोग करने से कहीं अधिक व्‍यापक है। इसमें युवाओं को जीवन की जटिलताओं से निपटने के लिए तैयार करना भी शामिल है — विशेषकर उन जटिलताओं से जो अनुत्तरित प्रश्नों और अनसुलझे भावनात्मक मुद्दों से उत्पन्न होती हैं। इनमें वयस्क समर्थन की आवश्यकता के साथ-साथ स्वतंत्रता की इच्छा के बीच सामंजस्य बिठाना, साथियों के दबाव के साथ व्यक्तिगत निर्णय का सन्‍तुलन बनाना, तिरस्कार के डर से निपटना, अपनी शारीरिक बनावट सम्‍बन्‍धी चिन्‍ताओं और साथियों के साथ अपनी तुलना को सम्‍हालना, विपरीत लिंग के साथ दोस्ती को लेकर होने वाली घबराहट को सम्‍हालना, और परिणामों के डर के बावजूद नए अनुभवों को आज़माने की इच्छा शामिल है। इस ज़‍िम्मेदारी को निभाने के लिए, शिक्षकों को अपनी झिझक को दूर करना चाहिए, विद्यार्थियों के साथ विश्वास कायम करना चाहिए और इन विषयों पर ईमानदारी और संवेदनशीलता से बातचीत करनी चाहिए। अनीता का अनुभव विज्ञान शिक्षकों के लिए एक आह्वान है : ऐसी कक्षाएँ बनाने के लिए जहाँ विज्ञान न केवल प्रकृति के नियमों को स्पष्ट करे, बल्कि ज़‍िम्मेदार और आत्मविश्वासी वयस्क बनने का मार्ग भी दिखाए।

शिव पाण्‍डेय
सदस्‍य,सम्‍पादकीय टीम

कक्षा में