जीवन का आधार : मृदा की खोज-पड़ताल

अनुवाद : हिमालय तहसीन | पुनरीक्षण : उमा सुधीर | कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्याय

खेती के पारिस्थितिक तंत्र की बुनियाद मृदा से बनती है। क्या स्कूल की विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की पाठ्यचर्याओं को पारम्परिक तौर-तरीक़ों से इस तरह जोड़ा जा सकता है कि किसान परिवारों के विद्यार्थी मृदा के कटाव को रोकने में अपनी भूमिका को समझ सकें?

कक्षा-8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025) के अध्याय–12 (‘प्रकृति कैसे सामंजस्य में कार्य करती है’) में बताया गया है, “…पर्यावास में जैविक घटक (पादप, जन्‍तु और सूक्ष्मजीव) और अजैविक घटक (वायु, जल, मृदा, सूर्य का प्रकाश और तापमान) एक-दूसरे के साथ परस्पर क्रिया करके एक पारितंत्र (पारिस्थितिक तंत्र) बनाते हैं।“1 इस ओर ध्यान खींचते हुए कि मानव के अस्तित्व और बने रहने और उसकी ख़ुशहाली के लिए पारितंत्र कितने ज़रूरी हैं, यह बताता है कि कैसे : “मानवीय क्रियाकलाप, जैसे — प्रदूषण, वनों की कटाई, पर्यावास हानि, जलवायु परिवर्तन, आक्रामक प्रजातियाँ और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन पारितंत्रों के लिए संकट उत्पन्न करते हैं। …उनकी रक्षा करना… महत्त्वपूर्ण है।“1

कर्नाटक के रामनगर ज़िले के कनकपुरा ताल्लुका में जिन सरकारी स्कूलों के साथ हम काम करते हैं, उनके बहुत-से विद्यार्थी किसान परिवारों से हैं। खेत उनके बिलकुल पास का वह पारितंत्र है, जिसका वह हिस्सा हैं। वे अपनी ख़ुशहाली के लिए इनके महत्त्व को जानते हैं। उपजाऊ मृदा इन पारितंत्रों की बुनियाद है। मृदा को बचाने में विद्यार्थी क्या भूमिका निभा सकते हैं? हमने ख़ुद करके सीखने वाली गतिविधियों के ज़रिए पूछ-ताछ आधारित चर्चाओं की मदद से इस सवाल की तहक़ीक़ात की।

मृदा1 क्या है?

कक्षा-8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025) का अध्याय–1 (‘प्राकृतिक संसाधन और उनका उपयोग’) विद्यार्थियों के सामने यह सवाल रखता है : “विश्व की अनेक स्थानीय परम्पराओं में प्रकृति को पवित्र माना जाता है। ऐसी परम्पराओं में प्रकृति को पालनकर्ता और पोषणकर्ता के रूप में देखा जाता है। क्या आप ऐसी प्रथाओं के बारे में जानते हैं जो इसे प्रतिबिम्बित करती हैं?“2 हमारा अनुभव बताता है कि अध्याय की शुरुआत किसी लुभावनी पहेली, कविता, छोटी कहानी या विद्यार्थियों के आस-पास की किसी घटना से करना उनका ध्यान खींचने का असरदार तरीक़ा हो सकता है। तो हमने एक जानी–पहचानी कन्नड़ कविता के ज़रिए कक्षा–8 के 24 विद्यार्थियों के साथ चर्चा शुरू की :

ಬೆಳಗಾಗಿ ನಾನೆದ್ದು ಯಾರ್ಯಾರ ನೆನೆಯಾಲಿ ಎಳ್ಳು ಜೀರಿಗೆ ಬೆಳೆಯೋಳ | ಭೂಮ್ರಾಯ ಎದ್ದೊಂದು ಗಳಿಗೆ ನೆನೆದೇನ |3 (भोर होते ही, मैं किसे याद करूँ? ख़ुद धरतीमाता को — जो उगाती हैं तिल और जीरा; मैं अपने हर जागते पल में उन्हें याद करता हूँ।) कुछ विद्यार्थी विज्ञान की कक्षा में कविता सुनकर हैरान रह गए। एक विद्यार्थी ने कहा, “ಈ ತರ ಬೇರೆ ಎಲ್ಲೋ ಕಲಿತ ವಿಷಯಗಳನ್ನು ಇನ್ನೊಂದು ವಿಷಯದಲ್ಲಿ ಲಿಂಕ್ ಮಾಡಬಹುದು ಅಂತ ಅಂದುಕೊಂಡಿರಲಿಲ್ಲ | (मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक विषय में सीखी गई बातें दूसरे विषय से इस तरह जुड़ सकती हैं)।” हमने अपने विद्यार्थियों से पूछा : पद्य की इस पंक्ति का क्या मतलब है? इसकी ख़ास बात क्या है? चर्चा से विद्यार्थी समझ पाए कि कैसे यह आसान–सा पद्य लोगों और मृदा के बीच के गहरे रिश्ते को दिखाता है। वे इस बात से भी जुड़ पाए कि किसान धरतीमाता को न सिर्फ़ भोजन का ज़रिया मानते हैं, बल्कि जीवन देने वाली भी मानते हैं और शुक्रगुज़ार होकर धरतीमाता को याद करते हुए अपने दिन की शुरुआत करते हैं। कक्षा–8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय–1 (‘फ़सल उत्पादन एवं प्रबन्ध’) में विद्यार्थियों ने पढ़ा कि : “…मृदा में खनिज, जल, वायु व कुछ सजीव होते हैं।“4 इस अवधारणा को और पुख़्ता करने के लिए, हमने विद्यार्थियों से कहा कि वे अपने आस-पास से मृदा के नमूने इकट्ठा करें। नमूने एक मुट्ठी भर मृदा से ज़्यादा न हों (चित्र–1 देखें)। कक्षा में लौटने पर विद्यार्थियों ने अपने अवलोकन बताने की शुरुआत इस बात से की कि सबसे पहले उन्‍होंने क्या देखा। उन्होंने मृदा के रंग के बारे में बताया और मृदा में मौजूद चीज़ों की पहचान की, जैसे कि रेत, पत्थर, कीड़े, काग़ज़, प्लास्टिक, लकड़ियाँ और पत्तियाँ।

1सामान्य बोल-चाल की भाषा में जिसे ‘मिट्टी’ कहा जाता है, उसके लिए तकनीकी और वैज्ञानिक शब्द ‘मृदा’ है। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में भी मृदा शब्द का ही उपयोग किया गया है । इसलिए इस लेख में हम भी मृदा ही कह रहे हैं। – अनुवाद सम्पादक

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चित्र-1 : मृदा के नमूनों की जाँच। विद्यार्थियों ने (क) आस-पास से मृदा के नमूने इकट्ठा किए; (ख) उनकी बनावट और दिखावट में अन्‍तर का अवलोकन किया; और (ग) अपने अवलोकनों को दर्ज किया। नोट : (ख) और (ग) में बच्‍चों की निजता की सुरक्षा के लिए उनके चेहरे धुँधले किए गए हैं। Please see ‘Publication Terms’ here for details to republish or use this image’. Credits: MaaDoo Team. License: CC-BY-NC-ND 4.0.

ज़्यादा गहराई से छान-बीन को बढ़ावा देने के लिए, कक्षा–8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025) के अध्याय–13 (‘हमारा आवास पृथ्वी एक अद्वितीय जीवनदायी ग्रह’) की ओर विद्यार्थियों का ध्यान दिलाया जा सकता है, जिसमें लिखा है : “मृदा एक साधारण धूल जैसी होती है परन्तु यह पोषक तत्त्वों से समृद्ध होती है, जैसे — नाइट्रोजन एवं पोटैशियम। ये पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक तत्‍व होते हैं।“5 धीरे-धीरे, विद्यार्थियों के अवलोकन मृदा के उन गुणों तक पहुँचे जिन्हें छूकर महसूस किया जा सकता था, जिनमें मृदा की बुनावट और उसमें पानी की मात्रा शामिल थीं। ये ऐसी ख़ास–ख़ास बातें थीं जिन्हें विद्यार्थियों ने अपने माता-पिता या बड़ों को पारम्परिक रूप से खेतों में परखते हुए देखा था, इस परख से वे यह तय कर पाते हैं कि कौन–सी फ़सलें उगाई जा सकती हैं। अगर विद्यार्थी उत्सुक हों, तो उन्हें मृदा के नमूनों की तुलना करके उनकी पौधों की वृद्धि में मदद देने की क्षमता की तुलना करने के लिए बढ़ावा दिया जा सकता है। (गतिविधि शीट–1 देखें)।

हमने कक्षा का समापन करते हुए कक्षा–8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024–2025) के अध्याय–2 (‘भूमि, मृदा, जल, प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन संसाधन’) की ओर विद्यार्थियों का ध्यान दिलाया, जहाँ उन्होंने पढ़ा : “मृदा का निर्माण चट्टानों से प्राप्त खनिजों और जैव पदार्थ व भूमि पर पाए जाने वाले खनिजों से होता है।“6

कुछ विद्यार्थियों में स्वाभाविक जिज्ञासा जगी, तो उन्होंने पूछा : मृदा कैसे बनती है? दूसरों ने तरह-तरह की बातें सुझाईं — कुछ ने कहा कि बहता हुआ पानी मृदा लेकर आता है, जबकि दूसरों को लगा कि ज्वालामुखी फटने से निकलने वाले लावे से मृदा बनती है। आश्‍चर्यजनक रूप से एक विद्यार्थी का मानना ​​था कि मृदा इन्सानों ने बनाई, फिर उसने पूछा, “इन्सानों के होने से पहले मृदा कैसे बनी होगी?” ज़्यादातर विद्यार्थियों ने यह पहचाना कि मृदा बनना एक धीमी, क़ुदरती प्रक्रिया है।

बॉक्स–1 : पाठ्यचर्या से सम्‍बन्‍ध

ये गतिविधियाँ और चर्चाएँ निम्नलिखित लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार हो सकती हैं :

  • मिडिल स्‍टेज विज्ञान के पाठ्यचर्या लक्ष्य :
  • CG-3 : [विद्यार्थी] जीव-जगत की वैज्ञानिक दृष्टि से खोज-बीन करता है। विशेष रूप से यह विद्यार्थियों में निम्‍नलिखित दक्षता विकसित कर सकते हैं, (C-3.3) : “सजीवों और उनके पर्यावरण के बीच एक-दूसरे पर निर्भरता और प्रतिक्रिया के सम्बन्धों के पैटर्न का विश्लेषण करना।”
  • CG-6 : [विद्यार्थी] विज्ञान की प्रकृति और प्रक्रियाओं की खोज-बीन,विज्ञान के ज्ञान के उद्विकास और वैज्ञानिक जाँच करने के माध्‍यम से करता है। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों को निम्‍नलिखित दक्षता विकसित करने में सहायता कर सकता है (C-6.2) : “वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग करके प्रश्न तैयार करना…और साक्ष्य के रूप में डेटा एकत्र करना (प्राकृतिक वातावरण के अवलोकन, सरल प्रयोगों की रूपरेखा बनाने या सरल वैज्ञानिक उपकरणों के उपयोग के माध्यम से)।”15
  • अधिगम के प्रतिफल :
  • मिडिल स्‍टेज विज्ञान : [विद्यार्थी] प्रश्नों के उत्तर ज्ञात करने के लिए सरल छान-बीन करता है, प्रक्रियाओं और परिघटनाओं को कारणों से सम्बन्धित करता है और वैज्ञानिक अवधारणाओं की समझ को दैनिक जीवन में प्रयोग करता है।
  • कक्षा–7 विज्ञान : [विद्यार्थी] पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, …मृदा के क्षरण को रोकने के लिए वृक्ष लगाना; प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग के परिणामों के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाना।
  • कक्षा–8 सामाजिक विज्ञान : [विद्यार्थी] सभी क्षेत्रों के विकास को बनाए रखने के लिए प्राकृतिक संसाधनों, जैसे — जल, मृदा, वन इत्यादि के विवेकपूर्ण उपयोग के सम्बन्ध को तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।16

पाठ्यपुस्तक में दी गई व्याख्याओं को दोहराने की बजाय हमने ‘चट्टानों से मृदा कैसे बनी’ [‘How was Soil Formed from Rocks’] शीर्षक का छोटा एनिमेटेड वीडियो दिखाया और बच्चों को समझने में मदद करने के लिए दृश्यों को कन्नड़ में समझाया।7 हमने ज़्यादा गहराई से सोचने के लिए बढ़ावा देने के लिए विद्यार्थियों के उनके ख़ुद के खेती के अनुभवों पर आधारित सवाल पूछे। मृदा कितनी गहरी होती है? क्या ज़्यादा गहराई तक खोदने पर भी यह एक जैसी ही मिलती है? क्या आपने गड्ढा या खाई खोदते वक़्त अलग-अलग परतें देखी हैं? इन अनुभवों से सीखते हुए, विद्यार्थियों ने जाना कि मृदा कई परतों में बनी होती है।

इस अवधारणा को विद्यार्थियों के लिए अधिक मूर्त करने के लिए हमने कक्षा को पाँच से सात विद्यार्थियों के समूहों में बाँट दिया। फिर, हर समूह को मृदा की अलग-अलग परतें दर्शाने वाले कार्डबोर्ड के कट-आउट दिए। फिर उन्हें उनके अवलोकनों और पहले के ज्ञान के आधार पर इन कट-आउटों को जमाने के लिए कहा गया (चित्र–2क देखें)।8,9 जब विद्यार्थियों ने ऐसा कर लिया तो हर समूह ने कट-आउटों की अपनी-अपनी जमावट को कक्षा में पेश किया और उन्होंने जो जमावट रखी थी उसके कारण समझाने के लिए अपने तर्क दिए। फिर हमने ‘पृथ्वी की मृदा की बनावट — मृदा की परतें और क्षितिज’ [‘Soil Profile of Earth — Soil Layers and Horizons’] शीर्षक वाला दूसरा वीडियो दिखाया। इससे विद्यार्थियों को अपने-अपने मॉडल की वीडियो से तुलना करने और यह जानने का मौक़ा मिला कि उनके मॉडल के कौन–से हिस्से सही थे और किन हिस्सों में बदलाव की ज़रूरत थी।10

आख़िर में, विद्यार्थियों का ध्‍यान कक्षा–8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024–2025) के अध्याय–2 की ओर दिलाया, जिसमें मृदा की चार परतों के बारे में बताया गया है : (क) ऊपरी मृदा जो कि ह्यूमस और वनस्पति से समृद्ध; (ख) बालू, गाद, क्ले के साथ उपमृदा; (ग) अपक्षयित चट्टानी पदार्थ; और (घ) मूल चट्टानें।6 विद्यार्थियों को प्रोत्‍साहित किया कि वे अपने आस-पास की सामग्रियों का इस्तेमाल करके इन परतों का दृश्य रूप तैयार करें (चित्र–2ख देखें)।

मृदा क्यों मायने रखती है?

कक्षा–8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025) के अध्याय–13 में विद्यार्थियों ने पढ़ा : “हमारे पैरों के नीचे कुछ अद्भुत है! वह है पृथ्वी की भू-पर्पटी। यह चट्टानों, मृदा एवं खनिजों से बनी है। यह कठोर एवं निर्जीव प्रतीत होती है परन्तु यह जीवन की वृद्धि के लिए एवं जीवित रहने के लिए लगभग सभी आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करती है।“5 उन्होंने यह भी पढ़ा : “पृथ्वी पर अनेक प्रकार की भू-आकृतियाँ, चट्टानें, मृदा इत्यादि विद्यमान हैं। इस विविधता एवं इन्हें आकार देने वाले प्रक्रम को भूविविधता कहा जाता है।… यह अद्वितीय पर्यावासों के सर्जन में सहायता करती है जहाँ विभिन्न प्रकार के जीव पनप सकते हैं।“5 विद्यार्थियों को खेती लायक़ ज़मीन की कमी को समझाने के लिए हमने प्याज़ का इस्तेमाल किया। एक प्याज़ को पृथ्वी मानते हुए उसकी परतों को समुद्र, रेगिस्तान, पहाड़ और बस्तियों के रूप में हटाया। विद्यार्थी देख सकते थे कि अब खेती के लिए ज़मीन का बहुत छोटा-सा हिस्सा ही बचा था।11 यह उदाहरण कक्षा–8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024–2025) के अध्याय–1 से जुड़ता है, जिसे पढ़कर विद्यार्थी यह जानते हैं कि धरती पर मृदा की ऊपरी परत ही एक मात्र ऐसी परत है जो पेड़-पौधों को पनपने में मददगार है।4 हमने बताया कि इन्सानों के पास भोजन उगाने के लिए धरती पर खेती लायक़ ज़मीन के छोटे–से हिस्से की यह पतली बाहरी परत ही है। इस बात को दृश्य रूप में देखने पर विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिली कि मृदा की यह पतली परत कितनी सीमित और कितनी क़ीमती है।

इससे स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठा : वह क्या है जो मृदा की ऊपरी परत को अपनी जगह पर बनाए रखता है? कक्षा–8 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025) के अध्याय–12 में विद्यार्थियों ने पढ़ा कि “…मृदा पादपों की वृद्धि के लिए एक माध्यम है जो उन्हें अनिवार्य पोषक तत्त्व प्रदान करती है” …और पौधों की “…जड़ें मृदा को अपने स्थान पर थामे रखती हैं और अपरदन को रोकती हैं।“1  विद्यार्थियों को यह बताने की बजाय हमने ख़ुद करके सीखने वाली उस गतिविधि को अपनाया जो कक्षा–8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024–2025) के अध्याय–2 में दी गई है : “एक ही आकार की दो ट्रे A और B लें। इनके एक सिरे पर छह छेद बनाएँ और इनमें बराबर मात्रा में मृदा भरें। A ट्रे की मृदा को ख़ाली छोड़ दें, जबकि B ट्रे में गेहूँ अथवा धान के दाने बो दें। जब B ट्रे के बीज पौधे बनकर कुछ सेंटीमीटर ऊँचे हो जाएँ तब दोनों ट्रे को इस तरह रखें कि वे ढलान पर हों। दोनों ट्रे में समान ऊँचाई से, एक तरफ से मग से पानी डालें। दोनों ट्रे के छेदों से निकलने वाले मटमैले पानी को दो अलग-अलग डिब्बों में एकत्रित करें और तुलना करें कि प्रत्येक ट्रे से कितनी मृदा बह गई है।”6  विद्यार्थियों को समूहों में काम करते हुए उथली ट्रे में फ़सलें उगाने का सुझाव दिया गया (गतिविधि शीट–2 देखें)। हर ट्रे को मृदा और खाद मिलाकर तैयार किया गया। इस गतिविधि के लिए हमने रागी, हरा चना और ज्वार जैसे बीज चुने क्योंकि वे आमतौर पर विद्यार्थियों के घरों में मिल जाते हैं और उनमें अंकुरण जल्‍दी होता है। विद्यार्थियों से कहा गया कि वे बीजों को बोने से पहले उन्‍हें रात भर भिगोएँ। फिर, हर समूह ने अपने–अपने तय बीज बोए और पौधों की देखभाल की। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि पौधों को पर्याप्‍त धूप और नियमित रूप से पानी मिलता रहे।

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चित्र-3 : बारिश की नक़ल करना। विद्यार्थियों ने पानी के कनस्तर के आगे फ़व्वारे का सिरा लगाकर बारिश की नक़ल की। नोट : बच्चों की निजता की सुरक्षा के लिए उनके चेहरे धुँधले किए गए हैं। Please see ‘Publication Terms’ here for details to republish or use this image’. Credits: MaaDoo Team. License: CC-BY-NC-ND 4.0.

एक हफ़्ते बाद विद्यार्थी अपनी-अपनी ट्रे कक्षा में लाए और अपने अवलोकन सबके साथ साझा किए। कई विद्यार्थियों ने अपने पौधों की बख़ूबी निगरानी की थी। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया कि बीजांकुरण (germination) कब हुआ, मृदा से अंकुर (sprouts) कैसे बाहर निकलकर आए, पत्तियों का आकार कैसा था और समय के साथ पत्तियों की संख्या में क्या बदलाव आया। कुछ ट्रे में स्वस्थ, घनी उपज दिखी, जबकि कुछ में छितरी हुई या असमान उपज नज़र आई। यह भिन्नता शायद बीजों के प्रकार या पौधों को मिली देखभाल के स्तर में फ़र्क़ की वजह से आई थी। इसे विफलता मानने की बजाय यह कम उपज वाली ट्रे गतिविधि के अगले चरण के लिए तुलना का महत्त्वपूर्ण मानक बन गईं।

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चित्र-4 : मृदा के नुक़सान की तुलना। नक़ली बारिश के बाद विद्यार्थी ख़ुद देख सकते थे कि ज़्यादा पौधों वाली और अलग-अलग तरह के पौधों वाली ट्रे में मृदा का नुक़सान कम हुआ था, जबकि कम पौधों वाली ट्रे में मृदा का नुक़सान ज़्यादा हुआ था। Credits: MaaDoo Team. License: CC-BY-NC-ND 4.0.

अगले चरण में, हर ट्रे के निचले हिस्‍से में एक छोटा छेद किया गया और पानी की निकासी की व्‍यवस्‍था की नकल के लिए वहाँ लगभग छह इंच लम्बा प्लास्टिक का पाइप लगाया गया। फिर, बारिश की नक़ल करते हुए उसी तरह से ट्रे में पानी डाला गया (चित्र–3 देखें)। मृदा में से बहने वाले पानी को इकट्ठा करने के लिए पाइप के नीचे पारदर्शी कप रखे गए। सभी कप पर लेबल लगाकर उन्हें एक-दूसरे के बग़ल में रखा गया। विद्यार्थियों ने उन कप में जमा हुए पानी में नज़र आने वाले अन्तरों को दर्ज किया और इस विभिन्नता के सम्भावित कारणों पर चर्चा की (चित्र–4 देखें)। इस गतिविधि के ज़रिए, विद्यार्थी मृदा के कटाव के लिए ज़िम्मेदार कुछ कारणों की पहचान कर पाए और इसे रोकने में वनस्पति की भूमिका को समझ पाए (तालिका–1 देखें)।

कप में पानी कैसा दिख रहा है ट्रे में पौधे की वृद्धि निष्कर्ष
साफ़, बहुत कम मृदाएक ही तरह के पौधों की घनी वृद्धिमृदा का बहुत कम नुक़सान
साफ़, लगभग कोई मृदा नहींपौधों की मिली-जुली और घनी वृद्धिमृदा का लगभग कोई नुक़सान नहीं
मटमैला और कीचड़ भराछितरी हुई या कहीं-कहीं वृद्धिमृदा का भारी नुक़सान
तालिका–1 : विद्यार्थियों के नतीजों का रिकॉर्ड।

चलते-चलते

पिछली गतिविधि में जिन ट्रे में मृदा का भारी नुक़सान दिखा था, उनका ज़िक्र करते हुए हमने ‘मृदा के कटाव या अपरदन’ (soil erosion) की शब्दावली से विद्यार्थियों को परिचित करवाया। हमने बताया कि बारिश या हवा से मृदा की ऊपरी परत के हट जाने को ‘मृदा का कटाव या अपरदन’ कहते हैं। हमने इसे कक्षा–8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024–2025) के अध्याय–2 से जोड़ा, जहाँ विद्यार्थियों ने पढ़ा : “मृदा अपरदन और क्षीणता, मृदा जैसे संसाधन के लिए प्रमुख ख़तरे हैं। मानवीय और प्राकृतिक दोनों ही कारक मृदा के निम्नीकरण का कारण बन सकते हैं।’’6 सिर्फ़ कर्नाटक में ही 7,522 हेक्टेयर खेती की ज़मीन पर मृदा के कटाव का बुरा असर पड़ा है।12

हमने विद्यार्थियों से पूछा : मृदा के कटाव को कैसे रोका जा सकता है? अपने अवलोकनों के आधार पर कई विद्यार्थियों ने ज़्यादा पौधे उगाने का सुझाव दिया। हमने उन्हें प्रेरित करने के लिए जादव पायेंग (Jadav Payeng) की कहानी सुनाई, जिन्होंने असम के माजुली द्वीप पर बंजर भूमि को पौधे लगाकर और उनकी देखभाल करके बदल दिया, जो अन्‍तत: एक जंगल के रूप में विकसित हो गया।13,14 इस जंगल ने मृदा के कटाव को कम करने और पारिस्थितिकी सन्तुलन को फिर से क़ायम करने में मदद की है। जादव पायेंग की इस कहानी को विद्यार्थियों ने बहुत दिलचस्पी से सुना और कुछ ने तो अपने घर के पीछे कुछ पौधारोपण भी किया।

पहले की चर्चा पर वापस आते हुए, हमने विद्यार्थियों से उन तरीक़ों के बारे में सोचने को कहा जिनसे उनके खेतों में मृदा का कटाव कम हो पाए। विद्यार्थियों ने देखा था कि मिले-जुले बीजों वाली ट्रे में मृदा का बहुत कम नुक़सान हुआ था, तो उनमें से कुछ विद्यार्थियों ने अलग-अलग तरह के पौधों को साथ-साथ उगाने का सुझाव दिया। हमने समझाया कि इस तरीक़े को ‘बहु-फ़सली खेती’ (multi-cropping) कहते हैं और यह कई छोटे, पारम्परिक खेतों में आम है। इस चर्चा ने विद्यार्थियों को अपने समुदायों के तौर-तरीक़े साझा करने के लिए उत्साहित किया। उदाहरण के लिए, कुछ विद्यार्थियों ने बताया कि कैसे उनके माता-पिता और बड़े-बुज़ुर्ग खेती की ढलवाँ ज़मीन पर बारिश के पानी के बहाव (run off) और मृदा की ऊपरी परत के नुक़सान को रोकने के लिए ‘बन्ध’ बनाते हैं और कैसे इन ‘बन्धों’ की नियमित जाँच की जाती है और उन्हें मज़बूत किया जाता है, ख़ासकर भारी बारिश के बाद उनका बराबर रख-रखाव होता है।

हमने यह भी चर्चा की कि कैसे मृदा का कटाव न सिर्फ़ मृदा के उपजाऊपन को कम करता है, बल्कि यह बाढ़, भू-स्खलन और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं की वजह भी बन सकता है। फिर, हमने कक्षा–8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024–2025) के अध्याय–2 में से बचाव के तरीक़ों के बारे में बताया : मल्च (पलवार) बनाना,चट्टान बाँध बनाना, कंटूर जुताई, वेदिका (टेरेस) फ़ार्म, फसल चक्र, अन्तर-फसल खेती और रक्षक मेखलाएँ उगाना।6  कुछ विद्यार्थियों ने अपने खेतों पर देखे पेड़ों के बारे में बताया। इस खोज–बीन से पहले, वे मानते थे कि खेतों के आस-पास लगे पेड़ों का इस्तेमाल मुख्य रूप से भेड़ और बकरियों को चारा देने के लिए किया जाता था। अब उन्होंने समझा कि खेत की मृदा बाँधकर रखने और उसकी सेहत को बनाए रखने में भी पेड़ मददगार हैं।

हालाँकि हमारे ज़्यादातर विद्यार्थी खेती करने वाले समुदायों से आते हैं, इस खोज-बीन ने उन्हें अपने खेत पर और उसके अलावा भी मृदा की ऊपरी, पतली, उपजाऊ परत को बचाने के महत्त्व को समझने में मदद की। इससे यह भी हुआ कि वे अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के अवलोकनों को विज्ञान की और सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (बॉक्स–1 देखें) की अवधारणाओं के साथ जोड़ पाए।15,16 हमने चर्चा तो यहीं ख़त्म की, लेकिन हमारी योजना है कि कक्षा को आस-पास के खेतों पर ले जाएँगे, जिससे कि विद्यार्थी मृदा के संरक्षण के उन तरीक़ों को देख पाएँ और उन्हें दर्ज कर पाएँ जिन्हें उनके समुदाय के किसान अपनाते हैं।

मुख्‍य बिन्‍दु

जीवन का आधार : मृदा की खोज-पड़ताल
  • कक्षा–8 की पाठ्यचर्या विद्यार्थियों को पारिस्थितिक तंत्रों की भूमिका और उन्हें बचाने के महत्त्व से परिचित करवाती है।
  • खेत सबसे क़रीब के ऐसे पारिस्थितिक तंत्र हैं जिनसे खेती करने वाले परिवारों के विद्यार्थी अपने को सीधा जोड़कर यह समझ सकते हैं कि अच्छी, स्वस्थ मृदा इन पारिस्थितिक तंत्रों का आधार है।
  • अपने आस-पास से मृदा के नमूने इकट्ठा करके और उनके गुणों का अवलोकन करके, विद्यार्थी वैज्ञानिक विश्लेषण को उन तरीक़ों से जोड़ सकते हैं जिनसे उनके बड़े-बुज़ुर्ग यह तय करते हैं कि किस मृदा में कौन–सी फ़सलें उगानी हैं।
  • विद्यार्थियों से मृदा खोदने के उनके अनुभव का इस्तेमाल करके मृदा की परतों की प्रदर्शनी बनाने के लिए कहना, उन्‍हें अपने स्‍वयं के अवलोकनों से मृदा की परतों को पहचानने और समझने में सक्षम बनाता है।
  • ऐसी ख़ुद करने वाली गतिविधि, जिससे विद्यार्थी यह परीक्षण कर पाते हैं कि वनस्‍पति मृदा के कटाव को कैसे प्रभावित करती है, यह उन्हें इस बात को समझने में मदद करेगी कि मृदा की ऊपरी परत को बचाना क्यों ज़रूरी है। और वे इससे खेती के ऐसे पारम्परिक तरीक़ों पहचान पाते हैं जो मृदा के नुकसान को कम करते हैं।

टिप्पणियाँ

  • Credits for the image (Reinforcing bunds after the rains) used in the background of the article title: Created for i wonder… using ChatGPT, under prompting by Chitra Ravi (Dec 2025). License: CC BY-NC-ND 4.0.
  • इस लेख में, दो कक्षा संसाधन शामिल हैं जिन्हें अलग करके इस्तेमाल किए जा सकता है : गतिविधि शीट–1 : मृदा के कौन–से गुण पौधों की अच्छी वृद्धि में मददगार होते हैं?’ और ‘गतिविधि शीट–2 : क्या पौधे मृदा को बह जाने से रोकने में मददगार होते हैं?
  • लेख के हिन्‍दी अनुवाद की समीक्षा के लिए हम हृदय कान्‍त दीवान के आभारी हैं।

सन्दर्भ

  1. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (2025)। ‘अध्याय–12 : प्रकृति कैसे सामंजस्य में कार्य करती है’। जिज्ञासा, कक्षा–8 के लिए विज्ञान की पाठ्यपुस्तक : 190–209। URL : https://ncert.nic.in/textbook.php?hhcu1=12-13.
  2. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (2025)। ‘अध्याय–1 : प्राकृतिक संसाधन एवं उनका उपयोग’। कक्षा-8 के लिए सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) : 1–20। URL : https://ncert.nic.in/textbook.php?hhes1=1-7.
  3. ಕನ್ನಡ ನುಡಿ (n.d.). ಗೀತವಿಹಾರ: ಜಾನಪದ ಗೀತೆಗಳು. ‘ಬೆಳಗಾಗಿ ನಾನೆದ್ದು ಯಾರ್ಯಾರ ನೆನೆಯಾಲಿ’. URL: https://kannadanudi.com/geethavihaara/jaanapada/Belagagii%20Nandeddu%20Yaryara%20Neneyali#google_vignette.
  4. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (2024-25)। ‘अध्याय–1 : फ़सल उत्पादन एवं प्रबन्ध’। जिज्ञासा, कक्षा–8 के लिए विज्ञान की पाठ्यपुस्तक : 1–16। URL : https://kannadanudi.com/geethavihaara/jaanapada/Belagagii%20Nandeddu%20Yaryara%20Neneyali#google_vignette.
  5. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (2025)। ‘अध्याय–13 : हमारा आवास पृथ्वी एक जीवनदायी ग्रह’। जिज्ञासा, कक्षा–8 के लिए विज्ञान की पाठ्यपुस्तक : 210–228। URL : https://ncert.nic.in/textbook.php?hhcu1=13-13
  6. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (2024-25)। ‘अध्याय–2 : भूमि, मृदा, जल, प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन संसाधन’। कक्षा–8 के लिए सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) : 7–21। URL : https://ncert.nic.in/textbook/pdf/hhss402.pdf
  7. Bodhaguru (2014). ‘Science – How Was Soil Formed from Rocks (3D Animation)—English’. YouTube video. URL: https://www.youtube.com/watch?v=Fx8r3o2gsLk
  8. Worksheets Library. ‘Layers of Soil: Worksheet 362005’. URL: https://worksheets.clipart-library.com/worksheet/soil-layer-worksheet-4.html
  9. Worksheets Library. ‘Layers of Soil: Worksheet 362058’. URL: https://worksheets.clipart-library.com/worksheet/soil-layer-worksheet-19.html
  10. MocomiKids (2022). ‘Soil Profile of Earth – Soil Layers and Horizons’. YouTube video. URL: https://www.youtube.com/watch?v=vqtdFaclWf0
  11. Farm to Home Lesson Series (2018). ‘Earth: The Apple of Our Eye’. YouTube video. URL: https://www.youtube.com/watch?v=-vquGl0d3LQ
  12. Ministry of Agriculture & Farmers Welfare (2022). ‘Survey on Soil Erosion’. Press Information Bureau, Government of India. URL:https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1810912
  13. Sony BBC Earth (2023). ‘Meet Jadav Payeng: The Forest Man of India’. Earth Champion Series, YouTube video. URL: https://www.youtube.com/watch?v=w8OtZUcjKFU
  14. McMaster, William D (2014). ‘Forest Man’. YouTube video. URL: https://www.youtube.com/watch?v=HkZDSqyE1do
  15. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks (2023). ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf
  16. National Council of Educational Research and Training (2017). ‘Learning Outcomes at the Elementary Stage’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/publication/otherpublications/tilops101.pdf.