प्राकृतिक अम्ल-क्षार सूचकों की खोज-पड़ताल : शिक्षण के अनुभव

अनुवाद : भरत त्रिपाठी | पुनरीक्षण : उमा सुधीर | कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्याय

रोज़मर्रा के पदार्थों को अम्लीय, क्षारीय या उदासीन पदार्थों के रूप में वर्गीकृत करने के लिए प्राकृतिक सूचक सरल और सस्ते साधन होते हैं। हम इन सूचकों के जाने-पहचाने और नए स्रोतों की व्यावहारिक खोज-पड़ताल में विद्यार्थियों और शिक्षकों को किस तरह शामिल कर सकते हैं?

शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ़-एसई) 2023 के अनुसार, मिडिल स्‍टेज की विज्ञान पाठ्यचर्या का एक लक्ष्य विद्यार्थियों में पदार्थों को उनके रासायनिक गुणों के आधार पर अम्लीय, क्षारीय और उदासीन के रूप में वर्गीकृत कर पाने की क्षमता विकसित करना है।1 कक्षा-7 की नवीनतम विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-2026) के अध्याय-2 (‘पदार्थों का अन्वेषण : अम्लीय, क्षारीय एवं उदासीन’) इन श्रेणियों को इनके कारण लिटमस पेपर के रंग में हुए परिवर्तन के आधार पर परिभाषित करता है : “लिटमस पेपर दो रंगों में उपलब्ध होते हैं — नीला और लाल… पदार्थ… जैसे नींबू का रस, आँवले का रस, इमली का पानी और सिरका नीले लिटमस पेपर को लाल कर देते हैं। इसका अर्थ है कि ये पदार्थ अम्लीय प्रकृति के होते हैं… पदार्थ… जैसे साबुन का विलयन, बेकिंग सोडा का विलयन, चूने का पानी और कपड़े धोने के पाउडर का विलयन लाल लिटमस पेपर को नीला कर देते हैं। यानी ये पदार्थ क्षारीय प्रकृति के होते हैं… पदार्थों… जैसे नल का पानी, शक्कर के विलयन और नमक के विलयन से दोनों प्रकार के लिटमस पेपरों का रंग नहीं बदलता है। क्या आप इनकी प्रकृति के विषय में पूर्वानुमान लगा सकते हैं? इन पदार्थों को उदासीन कहा जाता है क्योंकि ये न तो अम्लीय होते हैं और न ही क्षारीय।“2 लेकिन कई सरकारी स्कूलों में लिटमस पेपर उपलब्ध नहीं होता। जहाँ यह उपलब्ध होता भी है, वहाँ शिक्षक इसे केवल प्रदर्शन के लिए ही उपयोग कर पाते हैं। इस सीमा को ध्यान में रखते हुए, इस अध्याय में दो अन्य तरीक़ों का सुझाव दिया गया है : (क) खाद्य पदार्थों की जाँच स्वाद के आधार पर करना; और (ख) अखाद्य पदार्थों की जाँच प्राकृतिक सूचकों की सहायता से करना। यहाँ हम दूसरे तरीक़े की खोज-पड़ताल के लिए कुछ व्यावहारिक दिशा-निर्देश साझा कर रहे हैं। ये दिशा-निर्देश कर्नाटक के विजयपुरा और उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ के विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ इस विषय पर किए गए काम के हमारे अनुभवों पर आधारित हैं।


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चित्र-1 : पौधों के रसों में सूचक गुणों की उपस्थिति की जाँच। उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ के विद्यार्थियों ने नए पौधों के रसों को नींबू के रस और डिटर्जेंट के विलयन के साथ परखा। टिप्पणी : निजता की रक्षा के लिए विद्यार्थियों के चेहरे धुँधले किए गए हैं।
  • खोज-पड़ताल के उद्देश्य का परिचय दें :

विद्यार्थियों को अम्ल और क्षार की अवधारणा अमूर्त लग सकती है। खाद्य पदार्थों को चखकर इन श्रेणियों में वर्गीकृत करने के लिए विद्यार्थियों को कहना उन्हें इस अवधारणा से जोड़ने का एक सरल तरीक़ा है। उदाहरण के लिए, कक्षा-7 की पुरानी विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-4 (‘अम्ल, क्षार और लवण’) में इन दोनों श्रेणियों का परिचय इस प्रकार दिया गया है : “दही, नींबू का रस, सन्तरे का रस और सिरके का स्वाद खट्टा होता है। इन पदार्थों का स्‍वाद खट्टा इसलिए होता है, क्योंकि इनमें अम्ल होते हैं। ऐसे पदार्थों की रासायनिक प्रकृति अम्लीय होती है…। खाने का सोडा (बेकिंग सोडा) कैसा होता है? क्या इसका स्वाद भी खट्टा होता है? यदि नहीं, तो इसका स्वाद कैसा है? क्‍योंकि इसका स्वाद खट्टा नहीं है, जिसका मतलब है कि इसमें कोई अम्ल नहीं है। इसका स्वाद कड़वा है। यदि आप इसके विलयन को अपनी अँगुलियों के बीच रगड़ें, तो यह साबुन जैसा चिकना लगता है। सामान्यतः ऐसे पदार्थ, जिनका स्वाद कड़वा होता है और जो स्‍पर्श करने पर साबुन जैसे लगते हैं, क्षारक कहलाते हैं। इन पदार्थों की प्रकृति क्षारकीय कहलाती है।“3 कक्षा-7 की नवीनतम विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-2026) के अध्याय-2 की गतिविधि-2.2 में रोज़मर्रा उपयोग होने वाले 11 पदार्थों की एक सूची दी गई है (तालिका-1 देखें)।2 विद्यार्थियों से यह विचार करने को कहा जाता है कि इनमें से कौन-से पदार्थ खाने योग्य हैं और जिन्हें स्वाद के आधार पर अम्ल या क्षार के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। चूँकि इस सूची में साबुन का विलयन, चूने का पानी और वॉशिंग पाउडर का विलयन जैसे अखाद्य पदार्थ भी शामिल हैं, इसलिए विद्यार्थी यह समझ पाते हैं कि वर्गीकरण के लिए केवल स्वाद पर्याप्त नहीं है और भी तरीक़ों की ज़रूरत है। उदाहरण के लिए, जब यह पूछा गया कि इस उद्देश्य के लिए केवल स्वाद क्यों पर्याप्त नहीं है, पिथौरागढ़ के कक्षा-7 के एक विद्यार्थी ने तर्क दिया कि कुछ पदार्थ इतने हानिकारक होते हैं कि उन्हें छूना या चखना सुरक्षित नहीं होता। लेकिन वे अम्लीय हैं या क्षारीय, यह जानना हमें उन्हें सुरक्षित रूप से सम्हालने में मदद कर सकता है।

क्रमपदार्थखाने लायक है या नहीं?
1नींबू का रस
2साबुन का विलयन
3आँवले का रस
4इमली का पानी
5सिरका
6बेकिंग सोडा का विलयन
7चूने का पानी
8नल का पानी
9वॉशिंग पाउडर का विलयन
10शक्कर का विलयन
11नमक का विलयन
तालिका-1 : अम्ल या क्षार के रूप में वर्गीकृत करने के लिए रोज़मर्रा उपयोग होने वाले 11 पदार्थों की सूची। यह सूची कक्षा-7 की नवीनतम विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-2026) के अध्याय-2 की गतिविधि-2.2 में
दी गई है।2
  • ख़ुद करने के अनुभव की ज़रूरत पर ज़ोर देना :

कक्षा-7 की पुरानी विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-4 और कक्षा-7 की नवीनतम पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025-2026) के अध्याय-2 में प्राकृतिक सूचकों के कुछ सामान्यतः उपलब्ध स्रोतों व उन्हें तैयार करने की सरल और कम ख़र्चीली विधियाँ सुझाई गई हैं।2,3 अंकिता चतुर्वेदी ने भी ‘शिक्षक मार्गदर्शिका-1 : सम्भावित प्राकृतिक सूचकों को प्राप्त करना’ (आई वंडर…, अप्रैल 2025) में कुछ अन्य स्रोतों और समान प्रक्रियाओं को साझा किया है।4 उनकी विधियाँ — काटना, मसलना, भिगोना और छानना — रोज़मर्रा के रसोई कार्यों में प्रयुक्त होती हैं। फिर भी, अनेक विद्यार्थी और शिक्षक सूचकों के बारे में केवल पढ़कर ही छोड़ देते हैं। पिथौरागढ़ के विद्यार्थियों ने बताया कि उन्होंने न तो कभी सूचक तैयार किए थे और न ही उनका उपयोग किया था। विजयपुरा व पिथौरागढ़, दोनों जगह के शिक्षकों ने साझा किया कि वे कक्षा में इन गतिविधियों को आज़माकर देख नहीं पाए थे।

इस थीम के इर्द-गिर्द विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए स्‍वयं करने के अनुभवों में शामिल होने की ज़रूरत पर ज़ोर देना महत्त्वपूर्ण है। इस लेख की एक लेखिका ने विजयपुरा के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के एक समूह के साथ एक व्यक्तिगत अनुभव साझा करके ऐसा किया। कक्षा की तैयारी के दौरान उन्होंने अपने बेटे से सदाबहार (periwinkle) के फूल इकट्ठा करने को कहा। जब बेटे ने उन्हें इसका रस निकालते (extract) और उसे नींबू के रस व साबुन के पानी के साथ परखते देखा, तो उसकी जिज्ञासा जाग उठी। यह देखने की उत्‍सुकता में कि वे कौन-से रंग परिवर्तन दिखाएँगे, वह ख़ुद जाँचने के लिए अन्य फूल (जैसे गुलाब और जंगली फूल) लाने लगा। हालाँकि कुछ रसों से अस्पष्ट परिणाम मिले, फिर भी उसका उत्साह कम नहीं हुआ। लेखिका ने इस अनुभव का उपयोग यह रेखांकित करने के लिए किया कि कैसे प्राकृतिक सूचक बच्चों में वास्तविक जिज्ञासा और स्वप्रेरित अन्वेषण को जन्म दे सकते हैं। शिक्षकों को भी विद्यार्थियों को ऐसे ही अवसर देने के लिए, चाहे स्कूल में या फिर घर पर (यदि कक्षा में समय की सीमा हो) प्रोत्‍साहित किया गया। बाद में कुछ शिक्षकों ने बताया कि उन्होंने यह तरीक़ा अपनाया।

  • पाठ्यपुस्तक से शुरू करना :

कई शिक्षक ख़ुद से करने के काम की शुरुआत पाठ्यपुस्तकों में सुझाए गए स्रोतों से करना अधिक पसन्‍द करते हैं। उदाहरण के लिए, जब एक लेखिका को यह पता चला कि जिन शिक्षकों के साथ वे काम कर रही थीं, उनमें से किसी ने भी सूचक तैयार नहीं किए थे, तो उन्होंने इन शिक्षकों के साथ अंकिता चतुर्वेदी की ‘शिक्षक मार्गदर्शिका-2 : प्राकृतिक सूचकों में रंग परिवर्तन’ (आई वंडर…, अप्रैल 2025) साझा की।5 उनका उद्देश्य इसे दिखाकर शिक्षकों को प्रेरित करना था कि अंकिता ने प्राकृतिक सूचकों के कितने विविध स्रोतों के साथ प्रयोग किया है।अगले सत्र में उन्हें यह जानकारी मिली कि सभी शिक्षकों ने हल्दी और गुड़हल [कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024–2025) के अध्याय-4 में सूचीबद्ध दो स्रोत] का उपयोग करके सूचक तैयार किए थे।3 किसी शिक्षक ने भी किसी अन्य स्रोतों के साथ खोज नहीं की थी।

ऐसी स्थितियों में, पाठ्यपुस्तक से शुरुआत करने से शिक्षकों को स्‍वयं प्रयोग करने के लिए आत्म-विश्वास विकसित करने में मदद मिल सकती है। इसके बाद शिक्षकों और विद्यार्थियों को विधियों में छोटे-छोटे परिवर्तन करने या नए स्रोतों के साथ खोज-पड़ताल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, विजयपुरा के शिक्षकों ने पाठ्यपुस्तक में दी गई विधियों में कुछ छोटे संशोधन करते हुए सूचक तैयार किए :

  • सूचक विलयन : पाठ्यपुस्तक गुड़हल के फूलों को गर्म पानी में ‘भिगोकर रखने से’ प्राप्त रंगीन रस को छानने का सुझाव देती है, लेकिन शिक्षकों ने उन्हें उबाल लिया।3 उन्होंने हल्दी पाउडर को पानी में मिलाकर भी एक विलयन तैयार किया
  • सूचक पट्टियाँ : पाठ्यपुस्तक में ‘हल्दी’ के पेस्ट को ‘फ़िल्टर पेपर’ पर रगड़कर सुखाने और फिर उसे पतली पट्टियों में काटने का सुझाव दिया गया है।3 शिक्षकों ने सादे काग़ज़ का उपयोग किया और गुड़हल के फूलों के पेस्ट से भी पट्टियाँ तैयार कीं।
  • स्थानीय स्रोतों की खोज को प्रोत्साहित करना :

विद्यार्थियों और शिक्षकों द्वारा बताई गई एक सामान्य चुनौती यह थी कि सूचकों के कुछ ज्ञात स्रोत स्थानीय रूप से या मौसमी कारणों से उपलब्ध नहीं थे (तालिका-2 देखें)। उदाहरण के लिए, पिथौरागढ़ के विद्यार्थियों ने अपने स्कूल या घरों के आस-पास लाइकेन नहीं देखी थी। विजयपुरा के शिक्षकों ने बताया कि लाल पत्तागोभी और बैंगनी रतालू स्थानीय रूप से उपलब्ध नहीं थे। यद्यपि स्ट्रॉबेरी नवम्बर और दिसम्बर में उपलब्ध रहती हैं, लेकिन इस चर्चा के समय (जुलाई) वे उपलब्ध नहीं थीं। शिक्षकों का यह मानना था कि लाल शिमला मिर्च शायद कुछ दुकानों में मिल सकती है, लेकिन उन्होंने उन्हें उन स्थानीय बाज़ारों में नहीं देखा था, जहाँ से वे आमतौर पर सब्ज़ियाँ ख़रीदते हैं। ऐसी परिस्थितियों में विद्यार्थियों और शिक्षकों को उन स्रोतों के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है जो उनके लिए स्थानीय और मौसमी रूप से उपलब्ध हों। उदाहरण के लिए, विजयपुरा के शिक्षकों ने चुकन्दर, अनार और अंगूर से सूचक निकाले — ये सभी वहाँ स्थानीय रूप से उगाए जाते हैं और पूरे वर्ष आसानी से उपलब्ध रहते हैं।

क्रम प्राकृतिक सूचकों के ज्ञात स्रोत विद्यार्थी/ शिक्षक इसके बारे में कहाँ पढ़ते हैं?
1हल्दी की जड़कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक का अध्याय-4 (एनसीईआरटी, 2024-25)
2गुड़हल के फूल
3लाइकेन
4लाल गुलाब के फूलकक्षा-7 की नवीनतम विज्ञान पाठ्यपुस्तक का अध्याय-2 (एनसीईआरटी, 2025-26)
5चुकन्दर
6जामुन का फल
7लाल/ बैंगनी पत्तागोभी
8बैंगनी रतालूअंकिता चतुर्वेदी की ‘शिक्षक मार्गदर्शिका-2 : प्राकृतिक सूचकों में रंग परिवर्तन (आई वंडर…, अप्रैल 2025)
9लाल शिमला मिर्च
10लाल पालक की पत्तियाँ
11स्ट्रॉबेरी फल
12अनार के छिलके और बीज
13काले अंगूर
तालिका-2 : प्राकृतिक सूचकों के 13 ‘ज्ञात’ स्रोतों की सूची।2,3,5शालोम सुनैना ने यह सूची विजयपुरा के शिक्षकों के साथ साझा की थी।

प्राकृतिक सूचकों के ज्ञात स्रोतों की अनुपलब्धता का उपयोग विद्यार्थियों और शिक्षकों को नए स्रोत खोजने के लिए प्रोत्साहित करने में भी किया जा सकता है। इससे उनकी स्वाभाविक जिज्ञासा और अवलोकन कौशल सक्रिय हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब शिक्षकों ने अवसर दिया, तो विजयपुरा के कक्षा-6 और 7 के कुछ विद्यार्थियों ने उस समय खिले हुए जंगली फूलों से रस तैयार किए, जबकि वे इन पौधों के नाम भी नहीं जानते थे। उनके कुछ शिक्षकों ने भी इन जंगली फूलों के साथ प्रयोग किए। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कॉफ़ी और नीम जैसे कुछ नए लेकिन परिचित स्रोतों के रसों की भी जाँच की। कुछ मामलों में किसी विशेष स्रोत की ओर ध्यान दिलाना उपयोगी हो सकता है। उदाहरण के लिए, चूँकि विजयपुरा के शिक्षकों ने स्थानीय उपज की खोज-पड़ताल में रुचि व्यक्त की थी, एक लेखिका ने क्षेत्र में उगने वाले ड्रैगन फ्रूट के रस की जाँच का सुझाव दिया।

  • असुरक्षित या अज्ञात पौधों के साथ काम करते समय सावधानी बरतने पर ज़ोर देना :

बच्चे अपने आस-पास के पौधों के प्रति बहुत जिज्ञासु हो सकते हैं, लेकिन कुछ स्थानीय पौधे ऐसे हो सकते हैं जिनके साथ काम करना सुरक्षित नहीं हो। उदाहरण के लिए, विजयपुरा के एक विद्यार्थी ने कनेर (जिसे कन्नड़ में कनागली कहा जाता है) के फूलों की जाँच की, वह इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ था कि इस पौधे के सभी भाग अत्यन्त विषैले होते हैं और इसके रस के सम्पर्क से त्वचा में जलन हो सकती है। इसी प्रकार, पिथौरागढ़ के कक्षा-7 के विद्यार्थियों ने बिच्छू बूटी (Urtica dioica) को सम्भावित स्रोत के रूप में जाँचने का सुझाव दिया। कारण पूछे जाने पर पता चला कि उन्होंने यह पौधा अपने स्कूल के पास उगते देखा था और लम्बे समय से इसके बारे में जानना चाहते थे। उन्होंने सुना था कि बिच्छू घास के नाम से पुकारे जाने वाले इस पौधे को छूने से चुभन होती है। इसी कारण विद्यार्थियों ने इस पौधे को ‘तीखेपन’ या ‘रासायनिक-जैसी’ प्रकृति से जोड़ा और तर्क दिया कि क्योंकि यह त्वचा पर स्पष्ट प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, इसमें ऐसे पदार्थ हो सकते हैं जो अम्लीय और क्षारीय विलयनों के साथ अलग-अलग प्रकार से अभिक्रिया करते हों।

जोख़िम कम करने के लिए शिक्षकों को चाहिए कि वे इस बात पर ज़ोर दें कि विद्यार्थी किसी भी नए स्रोत की जाँच-पड़ताल करने से पहले उस पर चर्चा करें। विषैले पौधों से बचना चाहिए और अपरिचित पौधों की जाँच-पड़ताल केवल शिक्षक ही करें। विद्यार्थियों को यह भी याद दिलाया जाना चाहिए कि :

  • खोज-पड़ताल में उपयोग किए गए किसी भी पदार्थ को चखें नहीं और न ही उन्हें खाएँ।
  • प्रत्येक खोज-पड़ताल के बाद साबुन और पानी से हाथ अच्छी तरह धोएँ।
  • ऐसी खोज-पड़ताल घर या स्कूल में केवल वयस्कों की देख-रेख में ही करें।
  • सीखने और आगे की खोज-पड़ताल में मदद के लिए चर्चा का उपयोग करें :

चर्चा के माध्यम से एक लेखिका को यह पता चला कि पिथौरागढ़ के जिन शिक्षकों के साथ वे काम कर रही थीं, उनमें से कुछ कक्षा में सूचकों की खोज-पड़ताल करने से हिचकिचाते थे, मुख्यतः संसाधनों की कमी और प्रक्रियात्मक शुद्धता से जुड़ी चिन्ताओं के कारण। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इन गतिविधियों का मूल्य आदर्श प्रयोगशाला स्थितियाँ बनाने में नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की अवलोकन करने, सोचने और प्रश्न उठाने की क्षमता को सुदृढ़ करने में निहित है। उन्होंने यह भी साझा किया कि विद्यार्थियों को न केवल उस स्रोत, जिसे वह जाँचना चाहते हैं को चुनने, बल्कि उसे जाँचने की विधि तय करने की स्वतंत्रता देना कितना महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, एक कक्षा में उन्होंने देखा कि विद्यार्थियों ने एक पौधे के रस को दो कपों में बाँटा और एक में नींबू का रस और दूसरे में डिटर्जेंट का विलयन मिलाया (चित्र-1 देखें)। पहला विलयन लाल और दूसरा नीला हो गया। प्रक्रियात्मक दृष्टि से यह तरीक़ा कुछ चिन्ताएँ उत्पन्न कर सकता है, विशेषकर सूचक और परीक्षण विलयन के आयतन के अनुपात को लेकर। सामान्यतः यह सुझाव दिया जाता है कि सूचक को बहुत कम मात्रा में, जाँच किए जा रहे विलयन में मिलाया जाए, क्योंकि इससे सूचक की अपनी कमज़ोर अम्लीय या क्षारीय प्रकृति से उत्पन्न होने वाली त्रुटियों की सम्भावना कम हो जाती है। लेकिन लेखिका यह समझ गईं कि विद्यार्थियों ने यह तरीक़ा केवल इसलिए अपनाया था कि ‘देखें, क्या होता है’। इसे ध्यान में रखते हुए, उन्होंने गतिविधि के बाद की चर्चा की शुरुआत इस बात पर ज़ोर देकर की कि सूचक अम्लीय और क्षारीय पदार्थों में स्पष्ट और दिखाई देने वाले रंग परिवर्तन करते हैं। इसके बाद उन्होंने परीक्षण विलयनों में सूचक की सबसे कम सम्भव मात्रा (धीरे-धीरे, बूँद-बूँद करके) मिलाने के महत्त्व और उसके कारणों को समझाया — ताकि प्रयोगात्मक त्रुटियाँ न्यूनतम की जा सकें।

दूसरी लेखिका ने विजयपुरा के शिक्षकों को सूचकों को निकालने और उनकी जाँच करने की प्रक्रिया से परिचित कराया। उन्होंने पूरी विधि का प्रदर्शन किया और प्रत्येक चरण पर विस्तार से चर्चा की। इससे कई शिक्षक स्वयं कुछ सूचक तैयार करने और उनकी जाँच करने के लिए प्रेरित हुए (तालिका-3 देखें)। इससे उनमें से कुछ को यह तरीक़ा अपने विद्यार्थियों के साथ आज़माने की प्रेरणा भी मिली। उदाहरण के लिए, एक शिक्षिका ने यह गतिविधि अपने विद्यार्थियों को गृहकार्य के रूप में दी और निम्नलिखित तरीक़ों से चर्चा के माध्यम से उनकी खोज-पड़ताल में मदद की :

  • गतिविधि से पहले : शिक्षिका ने उपयुक्त स्रोतों और विधियों के बारे में स्पष्ट निर्देश साझा किए। उन्होंने कुछ सामान्य और आसानी से उपलब्ध फल-फूल सुझाए, जिनसे विद्यार्थी शुरुआत कर सकते थे। यह भी समझाया कि कैसे थोड़े से पानी (कमरे के तापमान पर) में स्रोत सामग्री को मसलकर घर पर सूचक तैयार किए जा सकते हैं। विद्यार्थियों को स्वयं पानी उबालने का प्रयास न करने के निर्देश दिए गए व अपने सभी अवलोकनों और प्रश्नों को सावधानीपूर्वक दर्ज करने के लिए कहा गया।
  • गतिविधि के बाद : शिक्षिका ने विद्यार्थियों को कक्षा में अपने अवलोकन और प्रश्न साझा करने के लिए कहा। कई विद्यार्थियों ने अपने सूचकों को शैम्पू, कॉफ़ी का काढ़ा, नहाने का साबुन और कपड़े धोने का साबुन जैसे घरेलू उत्पादों पर आज़माया था। उन्होंने एक चुनौती यह बताई कि सूचक हमेशा स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाला रंग परिवर्तन नहीं करते थे। उदाहरण के लिए, गहरे भूरे रंग के कॉफ़ी के काढ़े में सूचक मिलाने पर रंग में किसी परिवर्तन को पहचानना विद्यार्थियों के लिए कठिन था। एक अन्य चुनौती अवलोकनों की व्याख्या करना थी। प्रत्येक सूचक विभिन्न परीक्षण विलयनों में अलग-अलग प्रकार का रंग परिवर्तन करता था और विद्यार्थी यह तय नहीं कर पा रहे थे कि इन परिवर्तनों का उपयोग घरेलू उत्पादों को अम्लीय या क्षारीय के रूप में वर्गीकृत करने के लिए कैसे किया जाए।
क्रम सूचक का स्रोत ज्ञात अम्ल में रंग परिवर्तन ज्ञात क्षार में रंग परिवर्तन
1हल्दीपीलालाल-भूरा
2कनेरगुलाबीहरा-सा
3गुड़हललालहरा
4सदाबहारगुलाबी (गहरा)हरा-सा (गहरा)
5नीमरंगहीनहल्का पीला
6कॉफ़ी का विलयनगहरा भूरा, पर स्पष्ट अन्तर नहींकोई परिवर्तन नहीं
7लाल गुलाबगहरा लालहरा
8पास के खेत में उगने वाला जंगली फूल (नाम ज्ञात नहीं)रंगहीनहरा-सा
9प्याज़गन्ध बनी रहती हैकोई गन्ध नहीं
10चुकन्दरकोई विशिष्ट परिवर्तन नहीं देखा गयाकोई विशिष्ट परिवर्तन नहीं देखा गया
तालिका-3 : विजयपुरा के कक्षा 6-7 के शिक्षकों द्वारा पौधों के रसों की अम्ल–क्षार सूचक के रूप में कार्य करने की क्षमता की जाँच के दौरान देखे गए परिणामों का रिकार्ड।

दिलचस्प बात है कि विद्यार्थियों ने यह भी बताया कि सफ़ेद और गुलाबी, दोनों प्रकार के सदाबहार फूलों से तैयार किए गए रसों ने परीक्षण विलयनों में एक ही प्रकार के रंग परिवर्तन किए। इन कठिनाइयों से निपटने के लिए शिक्षिका ने सुझाव दिया कि विद्यार्थी अपने सूचकों की जाँच उन पदार्थों से शुरू करें जिनकी प्रकृति अम्लीय या क्षारीय है, यह उन्हें पहले से पता है, जैसे नींबू का रस, इमली का रस, साबुन का विलयन और चूने का पानी। शिक्षिका ने कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024–2025) के अध्याय-4 की तालिका-4.3 का एक संशोधित रूप भी साझा किया और विद्यार्थियों से उसी प्रारूप में अपने अवलोकन दर्ज करने के लिए कहा (तालिका-4 देखें)।3 जब विद्यार्थियों को परिणाम फिर भी भ्रमित करने वाले लगे, तो शिक्षिका ने समझाया कि : (क) कई प्राकृतिक सूचक अलग-अलग pH मानों पर भिन्न रंग परिवर्तन दिखाते हैं और (ख) अलग-अलग सूचक एक ही पदार्थ में अलग-अलग रंग दे सकते हैं। इसके बाद उन्होंने कक्षा में गतिविधि को दोहराया और विद्यार्थियों को लिटमस पेपर का उपयोग करके परीक्षण नमूनों को अम्ल या क्षार के रूप में वर्गीकृत करने का अवसर दिया। इससे विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिली कि लिटमस पेपर अधिक स्पष्ट और विश्वसनीय रंग परिवर्तन करता है। उन्होंने यह भी सीखा कि यद्यपि प्राकृतिक सूचक खोज के लिए उपयोगी उपकरण हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे हमेशा सटीक परिणाम दें। शिक्षिका ने इस अभ्यास का उपयोग यह रेखांकित करने के लिए किया कि लिटमस पेपर किसी पदार्थ की अम्लीय या क्षारीय प्रकृति को रंग परिवर्तन से जोड़ने का एक सरल और भरोसेमन्द तरीक़ा प्रदान करता है।

  • पाठ्यपुस्तक और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से जुड़े सम्बन्धों पर चिन्तन को प्रोत्साहित
    करना :

हमारा पहला सुझाव यह है कि चर्चा की शुरुआत प्राकृतिक सूचकों की खोज-पड़ताल करने के उद्देश्य से की जाए (पदार्थों को अम्लीय, क्षारीय या उदासीन के रूप में वर्गीकृत करने के लिए सरल और कम लागत वाले उपकरणों के रूप में)। हमारा दूसरा सुझाव यह है कि चर्चा का समापन इस वर्गीकरण की प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श के साथ किया जाए :

  • विद्यार्थियों के लिए : इन चर्चाओं को उन पहलुओं से जोड़ना उपयोगी हो सकता है जिनमें स्वयं विद्यार्थी रुचि दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, विजयपुरा के कक्षा-7 के विद्यार्थियों के एक समूह ने यह निर्धारित किया कि कॉफ़ी का काढ़ा अम्लीय प्रकृति का होता है। इसके बाद उनके शिक्षक ने उन्हें यह विचार करने के लिए कहा कि इसका अधिक मात्रा में सेवन करने से स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। एक अन्य उदाहरण में, इस खोज में भाग लेने के बाद पिथौरागढ़ के कक्षा-7 के एक विद्यार्थी ने यह तर्क दिया कि ईनो (सामान्यतः उपयोग में आने वाले एक एंटासिड का ब्रांड नाम) अवश्य ही क्षारीय प्रकृति का होगा। उसने समझाया : “हम इसका उपयोग तब करते हैं जब हमारे पेट में अम्लता होती है।” इस सीख के प्रत्यक्ष और रोचक उपयोग को दर्शाने के लिए, विजयपुरा के कुछ शिक्षकों ने वार्षिक कालिका हब्बा, जो विद्यार्थियों के अधिगम और विज्ञान दिवस समारोहों की प्रदर्शनी है, के दौरान प्राकृतिक सूचकों का उपयोग करके गुप्त सन्देश बनाने और प्रदर्शित करने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया (चित्र-2 देखें)। विद्यार्थियों ने इस गतिविधि का आनन्द लिया और इससे उन्हें इस खोज-पड़ताल की प्रासंगिकता को एक अलग और ज़्यादा मज़ेदार तरीक़े से समझने में मदद मिली।

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चित्र-2 : प्राकृतिक सूचकों के एक ‘रोचक’ उपयोग की खोज। कर्नाटक के विजयपुरा के विद्यार्थियों ने हल्दी काग़ज़ पर एक स्वागत सन्देश तैयार किया और उसे प्रदर्शित किया। बेकिंग सोडा के विलयन का छिड़काव करने पर यह सन्देश ‘प्रकट’ होता है। टिप्पणी : निजता की रक्षा के लिए विद्यार्थियों के चेहरे धुँधले किए गए हैं।
  • शिक्षकों के लिए : इस खोज को मिडिल स्‍टेज की विज्ञान पाठ्यचर्या के अन्य विषयों से जोड़ना सहायक हो सकता है। उदाहरण के लिए, विजयपुरा के शिक्षकों के साथ हुई चर्चाओं में इस लेख की एक लेखिका ने यह रेखांकित किया कि प्राकृतिक सूचकों को निकालने की विधियाँ [जिनका वर्णन अंकिता चतुर्वेदी ने अपने लेख ‘प्राकृतिक सूचकों से अम्ल और क्षार की जाँच-पड़ताल’ (आई वंडर…, अप्रैल 2025) में किया है] वही हैं जिन्हें सीखने की अपेक्षा कक्षा-6 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, पुनर्मुद्रण 2025–2026) के अध्याय-9 (‘दैनिक जीवन में पृथक्करण की विधियाँ’) में विद्यार्थियों से की जाती है।6,7 उदाहरण के लिए, जब विद्यार्थी शिक्षक को गुड़हल के फूलों से सूचक निकालने के लिए फूलों को पानी में उबालते हुए देखते हैं (कभी अतिरिक्त पानी को कम करने और अधिक सान्‍द्र विलयन प्राप्त करने के लिए) और फिर उस विलयन को छानते हुए देखते हैं। इन चरणों को वाष्पीकरण और निस्पन्दन (छानना – filtration) की प्रक्रियाओं से जोड़ा जा सकता है। इसके विपरीत, जब जंगली फूलों को बिना उबाले उनसे सूचक निकाले जाते हैं, तो विद्यार्थी फूलों को मसलते हैं, उन्हें पानी में भिगोते हैं और फिर विलयन को छानते हैं। इन चरणों को निस्तारण (decantation) और निस्पन्दन से जोड़ा जा सकता है। ऐसी कड़ियों को सशक्त करने के लिए लेखिका ने सुझाव दिया कि शिक्षक मार्गदर्शक प्रश्न पूछें, जैसे : हम प्राकृतिक सूचक कैसे तैयार करते हैं? इसमें कौन-कौन-से चरण शामिल हैं? इस प्रक्रिया में पृथक्करण की कौन-सी विधियाँ उपयोग की जाती हैं? जिन शिक्षकों ने इस तरीक़े को अपनाया, उन्होंने बताया कि इससे उन्हें कक्षा-6 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, पुनर्मुद्रण 2025–2026) के अध्याय-9 की प्रमुख अवधारणाएँ समझाना अधिक आसान हो गया।7 उसी लेखिका ने शिक्षकों का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि सूचकों द्वारा उत्पन्न रंग परिवर्तन को कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2025) के अध्याय-5 (‘हमारे आस-पास के परिवर्तन : भौतिक एवं रासायनिक’) में प्रस्तुत रासायनिक परिवर्तन की अवधारणा से जोड़ा जा सकता है।8 एक शिक्षिका ने अपनी कक्षा में यह सम्बन्ध साझा करते हुए समझाया कि जब किसी अम्ल या क्षार में सूचक मिलाया जाता है, तो जो रंग परिवर्तन दिखाई देता है, वह साधारण भौतिक मिश्रण का परिणाम नहीं, बल्कि एक रासायनिक अभिक्रिया का परिणाम होता है। उन्होंने बताया कि इस उदाहरण से विद्यार्थियों को रासायनिक परिवर्तनों की अवधारणा को अधिक दृश्य और ठोस रूप में समझने में सहायता मिली।
क्रम परीक्षण विलयन हल्दी के विलयन पर प्रभाव गुड़हल के विलयन पर प्रभाव अन्य सूचक पर प्रभाव (नाम लिखें) टिप्पणी
1नींबू का रस
2सन्तरे का रस
3सिरका
4मिल्क ऑफ़ मैग्नेशिया
5बेकिंग सोडा
6चूने का पानी
7शक्कर
8साधारण नमक
तालिका-4 : विजयपुरा की एक शिक्षिका द्वारा अपने विद्यार्थियों के साथ साझा की गई तालिका। यह कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-4 की तालिका-4.3 का संशोधित रूप है।3

बॉक्स-1 : पाठ्यचर्या से सम्बन्ध

प्राकृतिक सूचकों की इस खोज-पड़ताल से जुड़ी गतिविधियाँ और चर्चाएँ निम्नलिखित को पूरा करने में सहायक हो सकती हैं :

  • मिडिल स्‍टेज विज्ञान पाठ्यचर्या लक्ष्य
  • CG-1 : [विद्यार्थी] पदार्थ की दुनिया व उसके अवयवों, गुणों और व्यवहार की खोज-पड़ताल करता है। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों में निम्‍नलिखित दक्षता (C-1.1) विकसित करने में सहायक हो सकता है, “दिखाई देने वाले भौतिक गुणों (जैसे ठोस, द्रव, गैस…, पारभासी…, सुचालक, कुचालक) और रासायनिक गुणों (जैसे शुद्ध, अशुद्ध ; अम्ल, क्षार ; धातु, अधातु ; तत्त्व, यौगिक) के आधार पर पदार्थों का वर्गीकरण करना।’’
  • CG-6 : [विद्यार्थी] वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के अध्‍ययन में शामिल होकर और वैज्ञानिक जाँच करते हुए विज्ञान की प्रकृति और उसकी प्रक्रियाओं को समझता है। विशेष रूप से, य‍ह विद्यार्थियों में निम्‍नलिखित दक्षता (C-6.2) विकसित करने में सहायता कर सकता है “वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग करके प्रश्न तैयार करना… और प्रमाण के रूप में डेटा एकत्र करना (प्राकृतिक वातावरण के अवलोकन, सरल प्रयोगों की रूपरेखा बनाने या सरल वैज्ञानिक उपकरणों के उपयोग के माध्‍यम से)।”
  • CG-7 : [विद्यार्थी] विज्ञान से सम्‍बन्धित प्रश्नों, अवलोकनों और निष्कर्षों को सम्‍प्रेषित करता है। विशेष रूप से, य‍ह विद्यार्थियों में निम्‍नलिखित दक्षता (C-7.1) विकसित करने में सहायता कर सकता है “वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग करके मौखिक, लिखित और चित्रों के माध्यम से वर्णन करके विज्ञान को सटीक रूप से सम्‍प्रेषित करना।“1
  • कक्षा-7 विज्ञान के लिए अधिगम प्रतिफल : [विद्यार्थी] ऐसे प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए सरल जाँच-पड़ताल करता है, जैसे : “क्या रंगीन फूलों के रस का उपयोग अम्ल–क्षार सूचकों के रूप में किया जा सकता है?“9

चलते-चलते

प्राकृतिक सूचकों की खोज-पड़ताल में विद्यार्थियों को शामिल करना, मिडिल स्‍टेज विज्ञान पाठ्यचर्या के अनेक लक्ष्यों को पूरा करने में शिक्षकों की सहायता कर सकता है (बॉक्स-1 देखें)।1  इस प्रकार की गतिविधियाँ विद्यार्थियों की जिज्ञासा को जगा सकती हैं और यह समझ मज़बूत कर सकती हैं कि विज्ञान रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के सन्दर्भों में कैसे कार्य करता है। इसका एक अन्य महत्त्वपूर्ण परिणाम वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास है। इन खोजों के माध्यम से विद्यार्थी सावधानीपूर्वक अवलोकन करना, पूर्वानुमान लगाना और साक्ष्य-आधारित निष्कर्ष निकालना सीखते हैं। इससे वे रटने की बजाय करके सीखते हैं, जिससे उनकी अवधारणात्मक समझ अधिक गहरी होती है। इसके अतिरिक्त, विद्यार्थी अपने विचार साझा करने में अधिक सम्मानित और आत्म-विश्वास से भरा महसूस करते हैं, जिससे कक्षा में एक सकारात्मक और सहायक वातावरण के निर्माण में मदद मिलती है।

मुख्‍य बिन्‍दु

प्राकृतिक अम्ल-क्षार सूचकों की खोज-पड़ताल : शिक्षण के अनुभव
  • मिडिल स्‍टेज विज्ञान पाठ्यचर्या का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य विद्यार्थियों को रोज़मर्रा उपयोग किए जाने वाले पदार्थों को अम्लीय, क्षारीय या उदासीन के रूप में वर्गीकृत करने में सक्षम बनाना है। प्राकृतिक सूचक इस वर्गीकरण के लिए सरल और सस्ते उपकरणों के रूप में काम करते हैं।
  • विद्यार्थियों और शिक्षकों को पाठ्यपुस्तक में सूचीबद्ध स्रोतों से प्राकृतिक सूचकों की खोज-पड़ताल की शुरुआत करने देने से दोनों का आत्म-विश्वास बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
  • सूचक तैयार करते समय, प्रक्रियात्मक शुद्धता की तुलना में स्‍वयं करके देखने के अनुभव को प्राथमिकता देने से विद्यार्थियों और शिक्षकों को अवलोकन करने, सोचने और प्रश्न पूछने के अवसर मिलते हैं।
  • सूचकों के स्रोतों में मौसमी या स्थानीय अवरोधों को नए स्रोतों की खोज के अवसर के रूप में उपयोग करना, स्थानीय पौधों के प्रति विद्यार्थियों और शिक्षकों की जिज्ञासा को प्रोत्साहित कर सकता है।
  • खोज-पड़ताल से पहले और बाद वाली चर्चाएँ भ्रान्तियों को दूर करने, प्रक्रियात्मक विकल्पों की जाँच करने और समझ को गहरा करने में सहायक होती हैं।

आभार

इस लेख में साझा किए गए अभ्यासों के उदाहरण शिव पाण्डे के अनुरोध पर सबसे पहले शालोम सुनैना और मेघा अरोड़ा द्वारा, आई वंडर… के पूर्व अंकों पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रस्तुत किए गए थे। बाद में ईमेल के माध्यम से राधा गोपालन और चित्रा रवि के साथ अतिरिक्त विवरण साझा किए गए। इन अनुभवों को चित्रा रवि द्वारा एक साथ लाया गया, पुनर्गठित किया गया और इस लेख के रूप में संकलित किया गया है। आई वंडर… टीम लेखकों को अपने अनुभव उदारतापूर्वक साझा करने और उन्हें इस रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति देने के लिए धन्यवाद देती है।

टिप्पणियाँ

  • Credits for the image (Extracting indicator from periwinkle flowers) used in the background of the article title: Created for i wonder… using ChatGPT, under prompting by Chitra Ravi (Dec 2025). License: CC BY-NC-ND 4.0.
  • लेख के हिन्‍दी अनुवाद की समीक्षा के लिए हम हृदय कान्‍त दीवान के आभारी हैं।

सन्दर्भ

  1. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks (2023). ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.
  2. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (2025)। ‘अध्‍याय-2 : पदार्थों का अन्‍वेषण : अम्‍लीय,क्षारीय एवं उदासीन’। जिज्ञासा, कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 7-22. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?ghcu1=2-12.
  3. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (2024)। ‘अध्‍याय-4 : अम्‍ल, क्षारक और लवण’। जिज्ञासा, कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 38-46. URL:https://www.ncert.nic.in/textbook/pdf/ghsc104.pdf.
  4. चतुर्वेदी, अंकिता (2025)। ‘शिक्षक मार्गदर्शिका-1 : सम्‍भावित प्राकृतिक सूचकों को प्राप्‍त करना। आई वंडर… (12): URL: https://anuvadasampada.azimpremjiuniversity.edu.in/5122/.
  5. चतुर्वेदी, अंकिता (2025)। ‘शिक्षक मार्गदर्शिका-2 : प्राकृतिक सूचकों में रंग परिवर्तन। आई वंडर… (12): URL: https://anuvadasampada.azimpremjiuniversity.edu.in/5123/.
  6. चतुर्वेदी, अंकिता (2025)। ‘प्राकृतिक सूचकों से अम्‍ल और क्षार की जाँच-पड़ताल’। आई वंडर (12): URL: https://anuvadasampada.azimpremjiuniversity.edu.in/5109/.
  7. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (पुनर्मुद्रण 2025-2026)। ‘अध्‍याय-9 : दैनिक जीवन में पृथक्‍करण विधियाँ’। जिज्ञासा, कक्षा-6 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 163-181. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?fhcu1=9-12
  8. राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (2025)। ‘अध्‍याय-5 : हमारे आस-पास के परिवर्तन : भौतिक एवं रासायनिक’। जिज्ञासा, कक्षा-7 की विज्ञान पाठ्यपुस्‍तक : 57-72. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?ghcu1=5-12.
  9. National Council of Educational Research and Training. ‘Learning Outcomes at the Elementary Stage’. First Edition. National Council of Educational Research and Training (2017). URL: https://ncert.nic.in/pdf/publication/otherpublications/tilops101.pdf.