रात को रात ही रहने दो

हम रात के आसमान को देख रहे थे, तभी मेरी दोस्त ने कहा, “उस बड़े से जगमगाते बादल को देखो! अद्भुत लग रहा है न?!” वह जिस ओर इशारा कर रही थी, उसे देखते हुए मैंने कहा, “वह आकाशगंगा का केन्द्र है।” वह दंग रह गई और मेरी ओर मुड़कर बोली, “मैंने पहली बार ऐसा अद्भुत नज़ारा देखा है।”
मेरी दोस्त मुम्बई में पली-बढ़ी थी। कृत्रिम रोशनी से भरे महानगरों में रहने वाले कई और लोगों की तरह, उसने कभी तारों से भरा आसमान नहीं देखा था। मैं मुम्बई से 40 किलोमीटर दूर एक छोटे-से शहर कल्याण में पला-बढ़ा था। यह उस समय की बात है जब अपार्टमेंट दुर्लभ थे। ज़्यादातर बस्तियों में घर छोटे-छोटे और एक-दूसरे से काफ़ी दूर होते थे। रात के आसमान में कृत्रिम रोशनी नहीं होती थी। मेरे घर से कई तारा-मण्डल (नक्षत्र) दिखाई देते थे। यहाँ तक कि कर्क, सीटस और कैमेलोपार्डालिस जैसे धुँधले तारा-मण्डल भी। तभी मैंने पहली बार उन्हें देखा और पहचानना सीखा। अगले कुछ दशकों में यह नज़ारा बदल गया। जैसे-जैसे मुम्बई का आकार बढ़ता गया, इसकी रोशनी की चमक पश्चिम के क्षितिज को और ज़्यादा छिपाती गई। फिर, जैसे-जैसे ख़ुद हमारा शहर बड़ा होता गया, हमारा कृत्रिम रोशनी का इस्तेमाल बढ़ता गया। अब मेरे घर से कई तारे और तारा-मण्डल दिखाई नहीं देते थे। रात के आसमान का अच्छा नज़ारा देखने के लिए मुझे अब शहर से लगभग 60-70 किलोमीटर दूर जाना पड़ेगा। आज, हम कल्याण से बमुश्किल कोई तारे देख पाते हैं।
मैं अब दक्षिणी राजस्थान के एक छोटे-से शहर सिरोही में रहता हूँ। 2011 में जब मैं यहाँ आया, मैं अपने घर की छत से रात का आसमान एकदम साफ़ देख सकता था (चित्र-1 देखें)। लेकिन यह ख़ुशी बहुत कम समय के लिए थी। 2016 में, राजस्थान सरकार ने अपने सभी शहरी स्थानीय निकायों में स्ट्रीट लाइटिंग राष्ट्रीय कार्यक्रम (एसएलएनपी) लागू करने का फ़ैसला किया। पाँच लाख पारम्परिक स्ट्रीट लाइटों को लाइट-एमिटिंग डायोड (प्रकाश उत्सर्जक डायोड/एलईडी) लैम्प से बदल दिया गया। बल्ब और फ्लोरोसेंट लैम्प की तुलना में एलईडी लैम्प प्रकाश को लक्षित इलाक़े में फैलाने में बेहतर हैं और अधिक ऊर्जा कुशल हैं, यानी कम ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं।1 चूँकि वह बहुत कम लागत पर रोशनी का मनचाहा स्तर मुहैया करा देते हैं, इसीलिए राजस्थान सरकार कई नई प्रकाश इकाइयाँ लगाने का ख़र्च उठा पाई है। लोगों ने इस बदलाव का स्वागत किया क्योंकि उजली सड़कें सुरक्षित लगती हैं। लेकिन यह सभी प्रकाश इकाइयाँ ज़रूरी नहीं हैं और इस नेकनीयत कोशिश ने हमारे रात के आसमान के नज़ारे को बुरी तरह प्रभावित किया है।2 आकाशगंगा का जगमगाता एलईडी लाइटों की चमक से मिट गया है।
यह दुनिया भर में एक बढ़ती हुई चुनौती है। अनुमान है कि कृत्रिम रोशनी स्रोतों की संख्या और चमक हर साल लगभग 2-6 फ़ीसदी तक बढ़ रही है।3 इस वृद्धि में तीव्र आर्थिक विकास और शहरीकरण की मुख्य भूमिका है।4 हम इस वृद्धि के नकारात्मक प्रभावों के बारे में शायद ही कभी सुनते हैं क्योंकि उन्हें पहचानना और उनका अध्ययन करना दूसरे प्रदूषकों की तुलना में ज़्यादा कठिन रहा है।

प्रकाश प्रदूषण के प्रभाव
कृत्रिम प्रकाश का कोई भी अनचाहा, ज़रूरत से ज़्यादा, दख़ल देने वाला या अनुपयुक्त उपयोग प्रकाश प्रदूषण कहलाता है।5,6 अन्तर्राष्ट्रीय खगोल संघ (आईएयू) के मुताबिक़, जब कृत्रिम स्रोतों की वजह से प्रकाश का स्तर वहाँ के प्राकृतिक प्रकाश से 10 फ़ीसदी से ज़्यादा हो तो वह इलाक़ा प्रकाश प्रदूषित कहलाता है। 2016 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक़, लगभग 83 फ़ीसदी मानव आबादी प्रकाश प्रदूषित इलाक़ों में रह रही थी और उस समय दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी आकाशगंगा नहीं देख पाती थी।7 लेकिन रात का आकाश सिर्फ़ अपनी सुन्दरता के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है।
सदियों से, मानव अपने कुछ सबसे गहरे सवालों के जवाब खोजने और ब्रह्माण्ड में अपने स्थान की समझ विकसित करने के लिए रात के आकाश को ही निहारता रहा है। इसने पृथ्वी पर हमारे अस्तित्व के सभी पहलुओं को प्रभावित किया है — धर्म, दर्शन, कला, साहित्य, और विज्ञान। वैज्ञानिक खोजों का इतिहास आकाश की इस सार्वभौमिक प्रयोगशाला से काफ़ी मज़बूती से जुड़ा है। कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के अध्याय-12 (पृथ्वी से परे) में बच्चों का इससे परिचय कराया जाता है। ‘रात्रि-आकाश का अवलोकन’ शीर्षक वाला खण्ड बच्चों और शिक्षकों को इस कक्षा में सीखे गए कुछ आकाशीय पिण्डों (ग्रहों, तारों और तारा-मण्डलों) को देखने के लिए आमंत्रित करता है। लेकिन यह उन्हें सावधान भी करता है : “प्रकाश प्रदूषण रात के आकाश में तारों और नक्षत्रों का आनन्द लेने और उनका अध्ययन करने की हमारी क्षमता को कम कर रहा है… अगर यह बिना बादल वाली एक साफ़ रात है तो आकाश में बड़ी संख्या में तारे दिखाई दे सकते हैं। अगर आप किसी बड़े शहर में रहते हैं तो वहाँ प्रकाश प्रदूषण की वजह से रात के आसमान में केवल कुछ तारे ही दिखाई देते हैं। गाँवों या उन इलाक़ों में जहाँ प्रकाश प्रदूषण कम है, बड़ी संख्या में तारे देखे जा सकते हैं।”8 कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था इस साझा विरासत तक उनकी (और हमारी) पहुँच में बाधा पहुँचा रही है (चित्र-2 देखें)।

हम यह भी जान रहे हैं कि प्रकाश प्रदूषण कई तरह से मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, दिन/रात का चक्र हमारे प्राकृतिक सोने-जागने के चक्र (जिसे सरकेडियन चक्र कहा जाता है) को प्रभावित करता है। प्राकृतिक अँधेरे के सम्पर्क में आने पर हमारे मस्तिष्क में मौजूद पीनियल ग्रन्थि मेलाटोनिन नामक नींद लाने वाले हार्मोन का उत्पादन करती है। यह हार्मोन हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मज़बूती देता है, हमारे कोलेस्ट्रॉल स्तर को कम करता है, और हमारे शरीर की दूसरी हार्मोन पैदा करने वाली ग्रन्थियों (जैसे थायरॉयड, अग्न्याशय, अधिवृक्क ग्रन्थियाँ, अण्डाशय और वृषण) के कामों को नियंत्रित/दुरुस्त करने में मदद करता है। कृत्रिम प्रकाश के सम्पर्क में आने से मेलाटोनिन का उत्पादन कम हो जाता है जिससे हमारी नींद की अवधि और गुणवत्ता कम हो जाती है। सभी कृत्रिम प्रकाश का यही प्रभाव होता है, लेकिन गर्म प्रकाश स्रोतों (जैसे बल्ब) की तुलना में ठण्डे प्रकाश स्रोत (जैसे सफ़ेद रोशनी उत्सर्जित करने वाले एलईडी) हमारी नींद में ज़्यादा बाधा डालते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मेलाटोनिन के उत्पादन को कम करने वाले प्रकाशग्राही नीली तरंगदैर्ध्य के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं और ठण्डे प्रकाश स्रोत गर्म प्रकाश स्रोतों की तुलना में ज़्यादा नीला प्रकाश उत्पन्न करते हैं। अच्छी नींद नहीं होने से दिन में हमारी काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। यह उच्च रक्तचाप, मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग, चिन्ता और अवसाद के जोख़िम को भी बढ़ा सकता है। कुछ अध्ययनों से पता चला है कि शायद प्रकाश प्रदूषण और स्तन कैंसर की ज़्यादा सम्भावना के बीच जुड़ाव हो सकता है।9
दिन/रात का चक्र सिर्फ़ इन्सानों ही नहीं, बल्कि कई दूसरे पौधों और जानवरों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, कृत्रिम रोशनी कई उड़ने वाले कीड़ों को आकर्षित करती है, औेर वह इतने लम्बे समय तक उनके नीचे मँडराते रहते हैं कि थककर मर जाते हैं। यह नुक़सान उन सभी पौधों और जानवरों की प्रजातियों को प्रभावित कर सकता है जो भोजन या परागण के लिए कीटों पर निर्भर हैं। दुनिया भर के अध्ययनों से पता चलता है कि कृत्रिम रोशनी हर साल लाखों समुद्री कछुओं की मौत का कारण बनती है। यह सरीसृप समुद्र तट पर दिए गए अण्डों से निकलते हैं और अँधेरे टीलों से दूर रेंगते हुए समुद्र के पानी के चमकीले क्षितिज की ओर बढ़ते हैं। लेकिन बीच रिसॉर्ट, जगमगाती सड़कों और होर्डिंग की चमकदार रोशनी उन्हें गुमराह करती है और शहर की ओर खींचती है। कई तो पानी की कमी और थकावट से मर जाते हैं। कुछ को शिकारियों द्वारा खा लिया जाता है या वाहनों द्वारा कुचल दिया जाता है। वृक्षारोही मेंढकों (ट्री फ़्रॉग) की कई प्रजातियों के नर सम्भावित साथियों को अपनी जगह बताने के लिए रात को आवाज़ लगाते हैं। रात की लम्बाई और अँधेरे को कम करके, कृत्रिम रोशनी उनके प्रजनन चक्र में बाधा डाल सकती है। रात में शिकार करने से उल्लू और चमगादड़ दिन के शिकारियों (जैसे शिकारी पक्षियों) से दूर रह सकते हैं और दूसरे कीटभक्षी या कृन्तकभक्षी पक्षियों से प्रतिस्पर्धा से बच सकते हैं। प्रकाश प्रदूषण उनके लिए शिकार करने के मौक़ों को कम करता है और उन पर दूसरे पक्षियों या जानवरों द्वारा हमलों के जोख़िम को बढ़ाता है। कृत्रिम रोशनी प्रवासी पक्षी प्रजातियों के बहुत जल्दी या बहुत देर से यात्रा शुरू करने का कारण बन सकती है। इससे उन्हें घोंसले बनाने और चारा-दाना खोजने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ नहीं मिल पाएँगी। रात में आसमान साफ़ न होने से प्रवासी पक्षी अपने रास्ते से भटक सकते हैं। कभी-कभी तो यह उड़ान इतनी लम्बी होती है कि वह थकान के कारण गिरकर मर जाते हैं।10
चलते-चलते
विद्यार्थियों के साथ प्रकाश प्रदूषण के कारणों और प्रभावों की चर्चा करना महत्त्वपूर्ण है। और यह ध्यान दिलाना भी ज़रूरी है कि यह अब सिर्फ़ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। यह छोटे शहरों और बड़े गाँवों को भी प्रभावित करने लगा है। इस तथ्य की ओर भी उनका ध्यान खींचना ज़रूरी है कि दूसरे तरह के प्रदूषणों की तरह प्रकाश प्रदूषण पर्यावरण में जमा नहीं होता है और इसे पलटा जा सकता है। हमें क्यों और कितनी मात्रा में प्रकाश की ज़रूरत है, यह जाँचने के लिए विद्यार्थियों को एक अभ्यास में शामिल करें। इस अभ्यास से मिले उनके जवाबों का इस्तेमाल यह पता लगाने और चर्चा करने के लिए किया जा सकता है कि हम में से प्रत्येक कैसे निम्नलिखित में से चुन सकता है : (क) गरम और अधिक ऊर्जा-कुशल (कम ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाले) प्रकाश स्रोतों का इस्तेमाल करना, (ख) अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए ज़रूरी सबसे कम तीव्रता वाले प्रकाश स्रोतों का चयन करना, (ग) यह सुनिश्चित करना कि रोशनी के बिखराव को कम करने के लिए उनके ऊपर कुछ आड़ दी गई हो, (घ) खुले स्थानों पर प्रकाश की मात्रा को कम-से-कम करना, और (ङ) जब ज़रूरत न हो तो लाइट (घर के अन्दर और बाहर) बन्द करना। इसी उम्मीद में कि फिर से अँधेरी रात हो। न सिर्फ़ हमारे लिए बल्कि पृथ्वी पर समस्त जीवन के लिए।
मुख्य बिन्दु
- कृत्रिम प्रकाश का कोई भी अनचाहा, ज़रूरत से ज़्यादा, दख़ल देने वाला या अनुपयुक्त उपयोग प्रकाश प्रदूषण कहलाता है।
- प्रकाश प्रदूषण रात के आसमान तक हमारी पहुँच को प्रभावित करता है और आकाशीय पिण्डों को देखने की हमारी क्षमता में बाधा डालता है।
- रात में कृत्रिम प्रकाश के सम्पर्क में आने से हमारी सरकेडियन चक्र बाधित होता है और कई शारीरिक तथा मानसिक बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है।
- प्रकाश प्रदूषण कई दूसरे पौधों और जानवरों के अस्तित्व को भी प्रभावित करता है जो शिकार, नेविगेशन (दिशा ज्ञान), नींद, शिकारियों से सुरक्षा, प्रजनन या प्रवास के लिए प्राकृतिक दिन/रात चक्र पर निर्भर करते हैं।
- दूसरे प्रदूषणों की तुलना में प्रकाश प्रदूषण को पलटा जा सकता है। कृत्रिम रोशनी का इस्तेमाल सिर्फ़ तभी और जहाँ ज़रूरी हो वहाँ करके और कम हानिकारक व कम ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाली प्रकाश इकाइयों का चयन करके हम प्रदूषण में योगदान देने से बच सकते हैं।
टिप्पणियाँ
- Credits for the image used in the background of the article title: Earth at Night, NASA. URL: https://earthobservatory.nasa.gov/images/90008/night-light- maps-open-up-new-applications. License: CC BY.
सन्दर्भ
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