आस–पास के पक्षियों का अवलोकन : ध्यानमग्न बगुला

अनुवाद : प्रियेश गुप्ता | पुनरीक्षण : प्रतिका गुप्ता | कॉपी एडिटर : अतुल उपाध्याय

वैज्ञानिक अवधारणाओं को सिखाने के लिए कहानियाँ सुनाना एक रोचक और प्रभावशाली तरीक़ा हो सकता है। क्या हम विद्यार्थियों को अपने आस–पास के पक्षियों को ध्‍यान से देखने के लिए प्रेरित करने हेतु एक किसान और एक बगुले की इस कहानी का इस्तेमाल कर सकते हैं? इस कहानी का इस्तेमाल जैव विविधता और आजीविका के बीच स्थानीय सम्बन्धों को जानने के लिए कैसे कर सकते हैं?

मैं एक किसान हूँ। मैं, भूटान का दिल कहलाने वाली बमथांग घाटी में रहता हूँ। यह घाटी मनोरम दृश्यों और विशाल हरे जंगलों के लिए जानी जाती है। कोई भी यहाँ बैठकर इसके पहाड़ों, नदियों, पंछियों और जीवन की कभी न ख़त्म होने वाली चमक की सुन्दरता को घण्टों निहार सकता है। मैं बिना नागा मछली पकड़ने जाता हूँ।

मैं जो मछलियाँ पकड़ता हूँ वही मेरी आजीविका चलाने में सहायता करती हैं। मैं मछलियाँ पकड़ने के लिए दूसरे मछुआरों से दूर शान्त जगह चुनता हूँ। इससे मैं अच्छी-ख़ासी मछलियाँ पकड़ पाता हूँ, और शान्ति से प्राकृतिक वातावरण का आनन्द ले पाता हूँ।

मछली पकड़ने की मेरी पसन्दीदा जगह मेरे गाँव से पाँच किलोमीटर दूर, गाँव के मन्दिर वाले चौराहे से दक्षिण में है। मैं जिस रास्ते से जाता हूँ वह जंगल से होकर गुज़रता है और नदी किनारे जाकर खुलता है। उसके बाद मैं नदी के किनारे-किनारे तक़रीबन तीन किलोमीटर पैदल चलता हूँ।

मैं इस जगह को पत्थरों की तरतीबी से पहचानता हूँ और इन पत्थरों के कारण मैं आराम से बैठ पाता हूँ। मैं उस पत्थर पर बैठना पसन्द करता हूँ जो गूलर (Ficus) के पेड़ की छाँव तले है : मेरा दोस्त जो मुझे धूप और बारिश से बचाता है।

जब मैं मछली पकड़ता हूँ तो शायद ही कभी अकेला होता हूँ। मेरे साथ इस जगह पर एक और अजनबी होता है जो नदी की दूसरी ओर मछली पकड़ता है। वह एक बगुला है। यह एक संयोग हो सकता है कि जब भी मैं यहाँ आता हूँ, यह बगुला भी यहीं होता है। हम एक-दूसरे से परिचित हैं, लेकिन अपने-अपने काम में लगे रहते हैं। न मैं कभी इससे बातचीत करने या इसे कुछ खिलाने की कोशिश करता हूँ न ही कभी यह मेरे पास आता है। मैंने उस बगुले को अनगिनत बार देखा है। घण्टों तक नदी किनारे यह एक जगह स्थिर खड़ा रहता है : बिना हिले-डुले, बिना अपनी मुद्रा बदले मछली का इन्तज़ार करता रहता है (चित्र-1 देखें)। शायद यह अपनी ऊर्जा बचा रहा होता है। मन-ही-मन मैं इसे ‘ध्यानमग्न बगुला’ कहता हूँ। एक दिन मैं अपने बच्चों को इसके बारे में बताऊँगा।

Observing neighborhood fig 1
चित्र-1 : क्या आप ध्यानमग्न बगुले को ढूँढ़ पाए? Credits: Hemal Naik. License: Copyright owned by Hemal Naik. Used here with his permission.

मैं इसके मछली पकड़ने के तरीक़े का मुरीद हूँ। मैं आपको बताऊँ, जैसे ही यह पानी में मछली देखता है, फ़ौरन ही सतर्क हो जाता है और बेहद सटीकता से अपने शिकार की ओर बढ़ता है। कभी-कभी यह इतनी फुर्ती से मछली पकड़ता है कि मैं सोचता हूँ कि जिस मछली को पकड़ने यह जाता है उसे यह कैसा नज़र आता होगा। शायद उसे ऐसा लगता होगा जैसे दो बड़ी-सी चॉपस्टिक बहुत तेज़ी से उसकी ओर आ रही हों!

कभी-कभी मैं इसे नदी में एक ख़ास जगह की तरफ़ होले-होले बढ़ते हुए देखता हूँ। शायद वहाँ मौजूद किसी मछली के पास। वह उसे डराए बिना उसके पर्याप्त नज़दीक जाने की कोशिश करता है। जब वह मछली के काफ़ी क़रीब पहुँच जाता है तब बड़ी फुर्ती से आगे बढ़कर अपनी चोंच से उसे पकड़ लेता है।

लेकिन बगुला हमेशा ही सफल नहीं रहता। कई बार उसका निशाना चूक जाता है और मछली बच निकलती है। कई बार वह मछलियाँ तलाश नहीं पाता है। मछलियों के लिए सिर्फ़ बगुला ही नहीं, मैं भी काफ़ी मशक़्क़त कर रहा हूँ। अच्छा शिकार पकड़ना बहुत कठिन होता जा रहा है। पहाड़ों में ग्लेशियर (हिमनद) बहुत तेज़ी से पिघल रहे हैं। नदी का बहाव अब पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ हो गया है। नदी के ऊपर की ओर (Upstream) मछली पकड़ना बढ़ गया है। नदी किनारे के इलाक़े बदल रहे हैं। कई बार हम मछलियों के नज़र आने का घण्टों इन्तज़ार करते हैं। मैं देखता हूँ कि बगुला कितनी शान्ति और धैर्य के साथ इन्तज़ार करता है। मैं भी ऐसा ही करने की कोशिश करता हूँ। मैं सोचता हूँ कि क्या बगुला किसी और जगह भी मछली पकड़ता होगा (बॉक्स-1 देखें)।

बॉक्स-1 : पाठ्यक्रम से सम्बन्ध

यह कहानी प्रारम्भिक स्तर (कक्षा 3 से 5) की पर्यावरण अध्ययन की और माध्यमिक स्तर (कक्षा 6 से 8) की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में जीव-जगत के बारे में विद्यार्थी जो पढ़ते हैं उसे असल संसार से जोड़ने के कई तरीक़े उपलब्ध करवाती है। (देखें गतिविधि शीट I : मछुआरे पक्षियों को देखें; गतिविधि शीट II : आस-पास के पक्षियों के बारे में हुए बदलावों का दस्तावेज़ीकरण; शिक्षक मार्गदर्शिका : गतिविधि शीट I और II; गतिविधि शीट III : पक्षियों के लिए बर्डबाथ लगाएँ, और शिक्षक मार्गदर्शिका : गतिविधि शीट III)। साथ ही, यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में वर्णित शालेय शिक्षा के उद्देश्य : “शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य अच्छे इन्सानों का विकास करना है जो तर्कसंगत सोच और कार्यों में सक्षम हों, वह करुणा और सहानुभूति, साहस और लचीलापन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और रचनात्मक कल्पना, तथा मज़बूत नैतिक आधार और मूल्यों से सम्पन्न हों।1 को प्राप्त करने का सौम्य और ग़ैर–निर्देशनात्मक तरीक़ा भी देती है। शिक्षक इसे शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ़-एसई) 2023 द्वारा वर्णित सामाजिक सहभागिता की क्षमता विकसित करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें शामिल हैं :“सहानुभूति और करुणा केवल मूल्य या प्रवृत्तियाँ नहीं हैं; यह क्षमताएँ हैं जो सोचे-समझे अभ्यास से विकसित होती हैं।1 ख़ासतौर से इस कहानी के इर्द-गिर्द की चर्चाएँ और गतिविधि स्कूली शिक्षा के लिए एनसीएफ़-एसई 2023 में सूचीबद्ध पाठ्यचर्या सम्बन्धी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं :

  • प्राथमिक स्तर :
  • CG-2 : विद्यार्थी अवलोकन और अनुभव से पर्यावरण में परस्पर-निर्भरता को समझें। ताकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विचार को अपनाने का आधार विकसित हो। ख़ासकर यह विद्यार्थियों में : “बुज़ुर्गों और स्थानीय कहानियों के माध्यम से बताए गए पर्यावरण और उनके परिवार तथा समुदाय के जीवन में (व्यवसाय, खान-पान की आदतों, संसाधनों, उत्सवों, संचार में) आए बदलावों में सम्बन्ध स्थापित करने ” की क्षमता विकसित करने में सहायता करता है।
  • CG-4 : विद्यार्थी सामाजिक और प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करें। विशेष रूप से, यह विद्यार्थियों को निम्नलिखित दक्षता विकसित करने में मदद कर सकती है : “पौधों, पक्षियों, और जानवरों की ज़रूरतों को पहचानने में और उन्हें कैसे (पानी, मिट्टी, भोजन, देखभाल देकर) सहायता दी जा सकती है यह समझने में।1
  • माध्यमिक स्तर : CG-3 : वैज्ञानिक नज़रिए से जीव-जगत की खोजबीन करें। यह विद्यार्थियों को निम्नलिखित दक्षताओं को विकसित करने और उनका अभ्यास करने में मदद कर सकती है :
  • प्राकृतिक परिवेश (कीट, केंचुए, घोंघे, पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, मकड़ियाँ, विविध पौधे और कवक) में पाए जाने वाले जीवों में देखी जाने वाली विविधता का वर्णन करें।
  • “एक-दूसरे पर निर्भरता और एक-दूसरे के लिए प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में जीवित प्राणियों और उनके पर्यावरण के बीच सम्बन्धों के पैटर्न का विश्लेषण करें।”1

आठ साल बाद…

कुछ सालों तक यही काम इसी तरह करने के बाद, मैं दूसरा काम करना शुरू कर देता हूँ। मैं अपना एक व्यवसाय शुरू करता हूँ और शादी कर लेता हूँ। मेरे दो बच्चे हैं : ताशी और नुबा। मैं अपने बच्चों को मछली पकड़ने के दिनों के बारे में बताता हूँ। वह मछली पकड़ने वाली जगह को देखने के लिए उत्सुक हैं। एक दिन, मैं अपनी पसन्दीदा जगह पर फिर से जाने का मन बनाता हूँ और अपने साथ ताशी और नुबा को भी ले जाता हूँ। मेरे पुराने दोस्त — चट्टानें और गूलर — अभी भी वहीं हैं। वैसे-के-वैसे, मेरा स्वागत करते हुए। लेकिन अब वहाँ कुछ ठीक नहीं लग रहा। मुझे बगुला दिखाई नहीं दिया। हम घर लौट आए और मैंने इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा।

मैंने फिर से अपनी उसी जगह पर जाना शुरू कर दिया। जाते हुए कई दिन बीत गए, लेकिन अभी भी मुझे बगुला दिखाई नहीं दिया। मैं सोचता हूँ कि कहीं उसे जाड़े ने तो जकड़ नहीं लिया। एक दिन, मैं और मेरे बच्चे थिम्पू शहर में एक किताब की दुकान में गए। दुकान में एक हिस्सा वन्यजीवों पर किताबों का है। मैं अपने खोए हुए साथी के बारे में जानने को उत्सुक था।

इतने सालों में, मुझे उसके बारे में पढ़ने का कभी ख़्याल नहीं आया। मैंने उसे कई बार नदी किनारे धूप सेंकते हुए देखा है। मुझे पता है कि यह गर्मियों और सर्दियों में कैसा दिखता है। मुझे याद है कि उड़ान भरते हुए वह कितना शानदार दिखता है। और नदी किनारे घण्टों ध्यानमग्न यह कितना शान्त रहता है।

मैंने इसे ‘भूटान के पक्षी’ (Birds of Bhutan) नामक किताब में खोजा। लेकिन मुझे यह वहाँ नहीं मिला। किताब में मुझे बैंगनी बगुले, भूरे बगुले, एगरेट, ताल बक (pond heron) और नाइट बगुले (night heron) के बारे में ज़िक्र मिला, लेकिन उस बगुले के बारे में नहीं जिसे मैं ध्यानमग्न बगुला कहता हूँ।

फिर मुझे ख़्याल आया कि क्या इस पक्षी के बारे में जानकारी किसी अन्य हिस्से में है? मैंने ध्यान से अनुक्रमणिका खँगाली। अनुक्रमणिका में पृष्ठ 339 पर दुर्लभ प्रजातियों की एक प्रविष्टि मिली। मैं उस पृष्ठ पर गया, और वहाँ मुझे अपना ध्यानमग्न बगुला मिला! आख़िरकार! दूधिया सफ़ेद पेट और भूरे गले (ऊपरी) वाला बगुला मिल ही गया। मैंने पूरा पढ़ा… प्राकृतवास के विवरण और व्यवहार के बारे में जो भी लिखा था, सभी कुछ पूरी तरह उससे मेल खाता था (चित्र-2 देखें)। सब इसे ‘सफ़ेद पेट वाला बगुला’ या ‘शाही बगुला’ कहते हैं। और इसका वैज्ञानिक नाम अर्डिया इनसिग्निस (Ardea insignis) है।2,3

Observing neighborhood fig 2
चित्र-2 : सफ़ेद पेट वाला बगुला (Ardea insignis) नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान, चांगलांग, अरुणाचल प्रदेश, भारत। Credits: Rajkimar99, Wikimedia Commons. URL: https://en.wikipedia.org/wiki/File:WHITEBELLIED-HERON.jpg. License: CC BY-SA 4.0 International Deed.

मैंने ताशी और नुबा को किताब में बगुले की तस्वीर दिखाई। मैंने उन्हें बताया कि यही मेरा वह साथी है जो मछली पकड़ने के समय मेरे साथ हुआ करता था और जिसके बारे में मैं हमेशा बात करता था। इस किताब से उन्हें पहली बार मैं यह दिखा पाया था कि मेरा साथी बगुला कैसा दिखता था। नुबा ने उस पक्षी के नाम के सामने लगे * चिह्न की तरफ़ ध्यान दिलाया। यह चिह्न एक फ़ुटनोट पढ़ने का संकेत दे रहा था :

* आख़िरी बार इस प्रजाति को 2000 के दशक में देखा गया था। सम्भवतः यह अपने प्राकृतवास ख़त्म होने और अवैध शिकार के कारण विलुप्त हो चुका है।

मुख्‍य बिन्‍दु

आस–पास के पक्षियों का अवलोकन : ध्यानमग्न बगुला
  • यह एक किसान की कहानी है जो मछली पकड़कर अपनी आजीविका चलाता है। वह एक बगुले को देखता है जो उसकी मछली पकड़ने की जगह पर मौजूद होता है। बगुले से किसान का जुड़ाव बनने लगता है। इस कहानी का इस्तेमाल कक्षा में विद्यार्थियों को उनके पर्यावरण में पाई जाने वाली दूसरी प्रजातियों के बारे में सोचने और उनके साथ जुड़ाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
  • कहानी में किसान बगुले की विशेषताओं और भोजन की आदतों के बारे में अपने अवलोकन बताता है। विद्यार्थियों को अपने आस-पास के पक्षियों को देखने के लिए प्रोत्साहित करने से उन्हें दुनिया की जैव विविधता को खोजने और उसकी सराहना करने के मौक़े मिल सकते हैं।
  • कहानी में किसान बताता है कि कैसे मानव गतिविधियों ने उसकी और बगुले की मछली पकड़ने की क्षमता को प्रभावित किया है। हमने यह भी देखा कि कैसे बगुले की यह प्रजाति पृथ्वी से लुप्त हो रही है। इस कहानी का इस्तेमाल विद्यार्थियों को प्रजातियों की एक-दूसरे पर निर्भरता समझाने के लिए किया जा सकता है। साथ ही, हमारे पर्यावरण में मौजूद दूसरे मनुष्यों और प्रजातियों के जीवन में हमारी अलग-अलग भूमिकाओं पर चर्चा करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

आभार

हेमल नाइक से परिचय कराने के लिए सम्‍पादक बेंगलूरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के पारिस्थितिकी विज्ञान केन्द्र के मानद प्रोफ़ेसर राघवेन्‍द्र गडगकर का शुक्रिया अदा करते हैं। हम लेखक के साथ शुरुआती बातचीत के लिए अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलूरु की विजेता रघुराम को धन्यवाद देते हैं।

टिप्पणियाँ

  • लेख के शीर्षक की पृष्ठभूमि में इस्तेमाल की गई तस्वीर का श्रेय हेमल नाइक को जाता है। लाइसेंस : कॉपीराइट अधिकार हेमल नाइक के स्वामित्व में हैं। यहाँ उनकी अनुमति से तस्वीर प्रकाशित की गई है।
  • यह कहानी पहली बार https://hemalnaik.medium.com/the-meditating-heron-white-bellied-heron-an-emissary-from-the-past-6100aa1cb2a7 मीडियम पर प्रकाशित हुई थी। आई वंडर… में शामिल संस्करण में हमारे पाठकों के लिए इसमें थोड़े बदलाव किए गए हैं। यह बदलाव लेखक की अनुमति से किए गए हैं।
  • हेमल नाइक की और रचनाओं को https://hemalnaik.medium.com/ पर पढ़ा जा सकता है।
  • इस लेख में अलग किए जा सकने वाले पाँच कक्षा संसाधन दिए गए हैं : गतिविधि शीट-I : मछुआरे पक्षियों को देखें; गतिविधि शीट-II : आस-पास के पक्षियों में हुए बदलावों का दस्तावेज़ीकरण; गतिविधि शीट-III : पक्षियों के लिए बर्डबाथ बनाएँ; शिक्षक मार्गदर्शिका : गतिविधि शीट-I और II, और शिक्षक मार्गदर्शिका : गतिविधि शीट III ।

सन्दर्भ

  1. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks. ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.
  2. Dawa Gyelmo. ‘World’s rarest heron on the brink in its last Himalayan stronghold’. Dialogue Earth (2021). URL: https://dialogue.earth/en/nature/white-bellied- heron-threatened-in-bhutan/.
  3. The IUCN-SCC Heron Specialist Group. ‘White-bellied Heron’. Heron Conservation. URL: https://www.heronconservation.org/herons-of-the-world/list-of- herons/white-bellied-heron/.