एक भारतीय वैज्ञानिक का परिचय : जानकी अम्माल

अनुवाद : भरत त्रिपाठी | पुनरीक्षण : प्रतिका गुप्ता | कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्याय

एक किताब है जो जानकी अम्माल का परिचय पेड़-पौधों की दुनिया को खोजने का सपना देखने वाली एक बच्ची के रूप में देती है। क्या यह किताब बच्चों को स्‍वयं के साथ जोड़ने में मदद कर सकती है? क्या यह उन्हें अपने लिए ऐसे जीवन का सपना देखने के लिए प्रेरित कर सकती है?

मिडिल स्‍टेज विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों (एनसीईआरटी, 2024-25) में कई वैज्ञानिकों की वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताया गया है, जिनमें से एक हैं जानकी अम्माल। कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक ‘जिज्ञासा’ (एनसीईआरटी, 2024-25) के अध्याय-2 (सजीव जगत में विविधता) में अम्माल के बारे में इस प्रकार वर्णन किया गया है, ‘‘जानकी अम्माल एक भारतीय वनस्पतिशास्‍त्री थीं जो पर्यावरण सम्बन्धी कार्यों के प्रति समर्पित थीं। उन्होंने भारत के पौधों की समृद्ध जैव विविधता का प्रलेखन और संरक्षण करने में सहायता की। उन्होंने ‘साइलेंट वैली बचाओ’ आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण प्रमुख के रूप में उन्होंने भारत में पौधों की विविधता का प्रलेखीकरण करने के लिए कार्यक्रमों की शुरुआत की।’’1 लेकिन अम्माल बचपन में कैसी थीं? कौन-से शुरुआती अनुभवों ने वैज्ञानिक के रूप में उनके जीवन और कार्य को आकार दिया?

इन सवालों पर लेखक व चित्रकार लावण्या कार्तिक अपनी किताब ‘दी गर्ल हू वॉज़ अ फॉरेस्ट : जानकी अम्माल’ (चित्र-1 देखें) में बात करती हैं। यह किताब नन्हें पाठकों से अम्माल का परिचय, उनके बचपन के अनुभवों और पेड़-पौधों की दुनिया की खोजबीन करने के उनके सपनों के माध्यम से कराती है। यह बच्चों को अम्माल के उस संकल्प और दृढ़ता को जानने का अवसर देती है जिसके साथ उन्होंने अपने जुनून का पीछा किया और जेंडर व जाति की सामाजिक बाधाओं को पार करके विज्ञान से भरा जीवन जिया। इस किताब में अम्माल के जीवन और कार्य को आकार देने में उनके पिता के सहयोग और प्रोत्साहन की भूमिका का भी वर्णन किया गया है। हमने इस किताब की लेखिका के साथ किताब पर चर्चा की।

Introducing an indian-fig
चित्र-1 : ‘द गर्ल हू वॉज़ अ फॉरेस्ट : जानकी अम्माल’। डकबिल बुक्स द्वारा प्रकाशित इस किताब का मूल्य है ₹135. आप इसकी प्रति अमेज़न इंडिया से मँगवा सकते हैं। (URL: https://www.amazon.in/Girl-WhoWas-Forest-Dreamers/dp/0143451537).

प्रश्न-1 : यह किताब 6-9 वर्ष के बच्चों के लिए लिखी गई है। आपने यह आयु वर्ग ही क्यों चुना? आपके इस निर्णय ने किताब के टेक्स्ट, भाषा और डिज़ाइन को किस प्रकार प्रभावित किया है?

लावण्या : दरअसल यही वह उम्र है जिसमें बच्चे ख़ुद से पढ़ना शुरू करते हैं। वे नए विचारों और नई प्रकार की कहानियों के प्रति ग्रहणशील हो जाते हैं। उनकी टेक्स्ट और चित्रों के बीच के कहे-अनकहे तालमेल की समझ बढ़ने लगती है। इसी उम्र में उनके हमउम्र साथी उनके लिए ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होने लगते हैं। इसी दौरान वे चिन्ता, अकेलेपन और असफलता के एहसासों को ज़्यादा तीव्रता से महसूस करने लगते हैं। मैं ऐसे लोगों की जीवनियाँ लिखना चाहती थी जिन्होंने बचपन में मुझे प्रेरित किया था। ऐसे लोग जिनके बारे में आज की पीढ़ी के बच्चों ने शायद ही सुना हो। मैं इन किताबों के क़िरदारों को भी इस तरह प्रस्तुत करना चाहती थी कि छोटी उम्र के पाठक उनसे जुड़ाव महसूस कर सकें। पारम्परिक जीवनियाँ विभिन्न क्षेत्रों में वयस्क लोगों की उपलब्धियों पर बात करती हैं। मुझे नहीं लगता कि ज़्यादातर बच्चे ऐसी प्रस्तुतियों से जुड़ाव बना पाते हैं। आख़िरकार, बच्चों की नज़र में तो हर वयस्क कुछ भी हासिल करने के लिए सक्षम और सशक्त होता है। बच्चे दूसरे बच्चों के बारे में पढ़ना चाहते हैं। वे ख़ुद को उन कहानियों में देखना चाहते हैं जिन्हें वे पढ़ते हैं। ‘ड्रीमर्स’ शृंखला में यही किया गया है। इस शृंखला की हर किताब अपने मुख्य क़िरदार के बचपन के अनुभवों पर केन्द्रित है और ऐसे किसी निर्णायक अनुभव की बात करती है जिसने उन्‍हें वह बनाया जो वे अब हैं (बॉक्स-1 देखें)। नन्हें पाठक यह देख सकते हैं कि जिन भावनाओं के साथ अकसर उन्हें संघर्ष करना पड़ता है उन भावनाओं ने इन किताबों के मुख्य क़िरदारों को भी परेशान किया था। उदाहरण के लिए, मालगुड़ी डेज़ के लेखक आर. के. नारायण को यह लगने लगा था कि वे कभी भी एक सफल लेखक नहीं बन पाएँगे। व्यवसायी और परोपकारी, जे. आर. डी. टाटा को स्कूल में इसलिए सताया (या छेड़ा) जाता था क्‍योंकि वे बाकी बच्‍चों से कुछ अलग थे। जादूगर पी. सी. सरकार को जब अपना हुनर साबित करके दिखाना था, तब वे इतने दबाव में आ गए कि उन्होंने हार मान ली। अपनी पहली दौड़ में धावक पी. टी. ऊषा ऐसी लड़की के ख़िलाफ़ दौड़ी थीं जिसके बारे में उन्हें लगता था कि वे उसे हरा नहीं पाएँगी।

मैं हर किताब में चित्रकला के साथ भी कुछ नया करना चाहती थी। हर किताब के चित्रों की शैली किसी-न-किसी तरह से किताब के मुख्य क़िरदार से जुड़ी हुई है। उदाहरण के लिए, सालिम अली पर लिखी गई किताब की कला मुगल चित्रकारी से प्रेरित है क्योंकि सालिम अली को ये चित्र बेहद पसन्द थे। मुगल चित्रकला शैली में पक्षियों को बहुत जगह भी दी जाती है। पर्वतारोही बछेन्द्री पाल पर केन्द्रित किताब हिमालय क्षेत्र की थांका चित्रकला से प्रेरित है। और पी. सी. सरकार पर केन्द्रित किताब में कालीघाट चित्रकला की बाबू-बीबी शैली का इस्तेमाल किया गया है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर सामाजिक व्यंग्य की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता है। हर किताब में सीमित रंगों का इस्तेमाल किया गया है। ऐसा करना मेरे लिए एक और चुनौती थी और मुझे इस चुनौती के साथ खेलने में मज़ा आया।

कोई भी किताब अपने मुख्य क़िरदार या कला शैली की सम्पूर्ण तस्वीर बनाने (सम्पूर्ण जीवन प्रस्तुत करने) की कोशिश नहीं करती। बल्कि ऐसी खिड़कियाँ बनाने की कोशिश करती है जिनमें झाँककर बच्चे उन लोगों व कलाओं के बारे में और अधिक जानने के लिए प्रेरित हों जिनका परिचय मैंने इन किताबों में करवाया है।

बॉक्स-1 : ‘ड्रीमर्स’ सीरीज़ के बारे में

यह नन्हें पाठकों (छह वर्ष और उससे अधिक उम्र वाले) के लिए बनाई गई 12 किताबों का सेट है जिसका लेखन और चित्रांकन लावण्या कार्तिक द्वारा किया गया है। ये किताबें सत्यजीत रे, तीजन बाई, जे. आर. डी. टाटा, जानकी अम्माल, महाश्वेता देवी, बछेन्द्री पाल, सालिम अली, पी. टी. ऊषा, आर. के. लक्ष्मण, आर. के. नारायण, पी. सी. सरकार, नेकचन्द और शकुन्तला देवी जैसे लोगों के वास्तविक जीवन की कहानियों से प्रेरित हैं। ये किताबें इन लोगों के बचपन के अनुभवों को प्रस्तुत करती हैं और बच्चों से इनका परिचय सपने देखने वाले बच्चों के रूप में करवाती हैं – ऐसे बच्चे जिन्होंने न केवल दुनिया को बदलने के सपने देखे बल्कि अपने वयस्क जीवन में इन सपनों को पूरा करने के लिए बड़ी लगन के साथ प्रयास किया।

प्रश्न-2 : 6-9 साल की उम्र वाले कई बच्चों के लिए ‘वैज्ञानिक’ एक बहुत अमूर्त शब्द हो सकता है। फिर आपने इस बारे में क्यों लिखा?

लावण्या : वैज्ञानिक ही नहीं, अधिकांश पेशेवर भूमिकाएँ इस उम्र के बच्चों को अमूर्त लगती हैं। मैंने यह किताब इसलिए लिखी क्योंकि मैं अम्माल की कहानी बताना चाहती थी। वे पीएचडी हासिल करने वाली दुनिया की शुरुआती महिलाओं में से एक थीं। यह उस वक़्त की बात है जिस वक़्त न के बराबर महिलाएँ हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी कर पाती थीं। मेरी किताब इन कठिन परिस्थितियों में अम्माल की प्रगति को दिखाने के लिए मैंग्रोव के बीज का उपयोग एक सशक्त रूपक के तौर पर करती है। ऐसे समय में जब उनके समुदाय में महिलाओं को सिर्फ़ माँ और पत्नी ही बनने दिया जाता था, उन्होंने अपने लिए स्वछन्द जीवन जीने की राह बनाई।

उन्होंने श्वेत पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्र में एक अश्वेत महिला के रूप में अपनी पहचान बनाए रखी। वे महिलावादी, गाँधीवादी और एक वैज्ञानिक थीं − मुझे उनके बारे में लिखना ही था! उनकी कहानी सिर्फ़ विज्ञान तक सीमित नहीं है, यह अपने जीवन के उद्देश्य को खोजने की कहानी भी है। यह कहानी है अपने जीवन को किसी ऐसे जुनून या पसन्द पर केन्द्रित करने की जो आपके जीवन को आकार देती है, आपकी राह बनती है और आपको अपने भाग्य को नियंत्रित करने का अवसर देती है। यह किताब उनके पिता की कहानी भी है, जिनका सहयोग अम्माल की सफलता में बेहद महत्त्वपूर्ण था और पक्षी विज्ञान में उनकी जीवन भर की रुचि ने अम्माल को विज्ञान के लिए समर्पित जीवन की सम्भावनाएँ दिखाईं। प्राकृतिक परिवेश से जुड़ी कहानी होने के कारण भी मैं इसकी तरफ आकर्षित हुई क्योंकि मुझे पेड़-पौधों और पक्षियों के चित्र बनाना बहुत पसन्द है। इस कहानी ने मुझे उस क्षेत्र के मैंग्रोव, जलमार्गों और पक्षियों के चित्र बनाने का मौक़ा दिया जहाँ अम्माल बड़ी हुई थीं।

प्रश्न-3 : बच्चों के लिए ‘भारत’ की ‘महिला’ वैज्ञानिकों के बारे में जानना कितना ज़रूरी है?

लावण्या : बहुत ज़रूरी है! हमारे देश ने जितनी भी प्रगति की है उसके बावजूद, हम अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए हैं जो हमें ख़ुद को पश्चिम की तुलना में कमतर महसूस कराता है। न ही हम उस पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं जो महिलाओं को समाज में सीमित भूमिकाओं तक रोक देते हैं। किताबें बच्चों के लिए उन महत्त्वपूर्ण झरोखों में से एक हैं जिनके ज़रिए वे अपने सम्भावित भविष्यों की कल्पना कर सकते हैं और अपना भविष्य बना सकते हैं। ऐसे क्षेत्रों में भारतीय महिलाओं के फलने-फूलने और आगे बढ़ने के बारे में पढ़ना जिनमें कि पारम्परिक रूप से उन्हें बाहर रखा गया था, छोटे लड़कों और लड़कियों, दोनों के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण है। विज्ञान का सम्बन्ध जिज्ञासा, विधि, धैर्य और अवलोकन से भी है − ये ऐसे गुण हैं जिनका अकसर अंकों, रटकर याद करने और असफलता के भय से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था में अवमूल्यन कर दिया जाता है। सोशल मीडिया का प्रभाव एक और बड़ा दबाव है क्योंकि इसका ध्यान तत्काल मिलने वाली सन्तुष्टि और साथियों की स्वीकृति पर होता है। अम्माल जैसी कहानियाँ नन्हें पाठकों को यह बताती हैं कि अपनी स्वतंत्र राह बनाना सम्भव है भले ही दुनिया किसी और राह पर चलती रहे या आपको हतोत्साहित करती रहे। विज्ञान का सम्बन्ध प्राकृतिक परिवेश के रहस्यों का अवलोकन करने में बिताए गए जीवन की शान्‍त ख़ुशियों और विजय के बारे में है।

प्रश्न-4 : आपने अम्माल के जीवन के बारे में शोध किस तरह किया? यह करने का आपका अनुभव कैसा रहा?

लावण्या : वनस्पतिविज्ञान में अम्माल का बहुत योगदान है। लेकिन जब मैंने इस किताब को लिखना शुरू किया तो उनके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं थी। उनकी कोई प्रकाशित जीवनियाँ नहीं थीं। मेरा शोध पूरी तरह ऑनलाइन ही था और दो महिलाओं द्वारा लिखे गए लेखों पर आधारित था। दिलचस्प बात यह है, कि दोनों उनकी वंशज हैं। इन लेखों ने मुझे उनके जीवन के बारे में गहरी समझ प्रदान की। इन लेखों ने मुझे थालासेरी में बिताए गए उनके बचपन, उस इलाक़े के ख़ूबसूरत प्राकृतिक वातावरण और पक्षियों में उनके पिता की रुचि की झलक दिखाई। मेरी कहानी में ये सभी सूत्र साथ आकर जुड़ गए। संयोगवश, मेरी किताब के कुछ महीने बाद अम्माल की एक विस्तृत जीवनी प्रकाशित हुई। यह किताब वैज्ञानिक के रूप में उनके कार्य पर केन्द्रित थी।

बॉक्स-2 : पाठ्यक्रम से सम्बन्ध

  • मिडिल स्‍टेज विज्ञान : इस संसाधन का उपयोग कर शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ-एसई) 2023 में माध्यमिक स्तर के विज्ञान के पाठ्यक्रम सम्बन्धी लक्ष्यों के आधार के रूप में जिसे वर्णित किया गया है, उस सबको विकसित किया जा सकता है : “…विद्यार्थियों को प्रकृति और विज्ञान की प्रक्रियाओं के साथ जुड़ने और वैज्ञानिक मूल्य व प्रवृत्तियाँ विकसित करने में मदद करना (वैज्ञानिकों के जीवन और कार्यों की पड़ताल करने और वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के माध्यम से) जो उन्हें अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के निर्णय लेने और वृहत समाज में भागीदारी करने में सक्षम बनाएगा।2  ख़ासतौर पर, इसका इस्तेमाल पाठ्यक्रम के निम्नलिखित लक्ष्यों (Curricular Goals) को पूरा करने के लिए किया जा सकता है :
  • CG-3 : [विद्यार्थी] वैज्ञानिक सन्दर्भों में सजीव जगत की खोजबीन करे। ख़ासतौर पर, इसका इस्तेमाल विद्यार्थियों को निम्नलिखित दक्षता के अभ्यास के लिए प्रेरित करने हेतु किया जा सकता है : C-3.1 : “सामाजिक परिवेश में देखी गई सजीव चीज़ों (कीड़े, केंचुए, घोंघे, पक्षी, स्तनपाई, सरीसृप, मकड़ियाँ, विविध प्रकार के पौधे और कवक), तथा छोटे स्‍तर पर सूक्ष्मजीवों को शामिल करते हुए उनकी विविधता का वर्णन करना।2
  • CG-6 : [विद्यार्थी] वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के साथ जुड़कर और वैज्ञानिक पड़ताल करने के माध्यम से विज्ञान की प्रकृति और प्रक्रियाओं की खोजबीन करे। ख़ासतौर पर, इसका इस्तेमाल आगे उल्लिखित दक्षता को विकसित करने में किया जा सकता है : C-6.1 : “…पूरे वैज्ञानिक ज्ञान के विकास में अन्तर्निहित और समूचे विज्ञान के लिए सामान्‍य वैज्ञानिक मूल्यों (वैज्ञानिक मिजाज़, एक सामूहिक प्रयास के रूप में विज्ञान को देखना, जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण करना) की पहचान करना।2
  • CG-8 : [विद्यार्थी] विज्ञान का निर्माण करने वाली विभिन्न शाखाओं सहित उसके समग्र क्षेत्र में, अतीत में और वर्तमान में, भारत के योगदान को समझे व सराहे। ख़ासतौर से, इसका इस्तेमाल सम्बद्ध योग्यता का निर्माण करने के लिए किया जा सकता है : C-8.1 : “पाठ्यक्रम के भीतर एकीकृत तरीक़े से अध्ययन की जाने वाली समस्त विषयवस्तु (अवधारणाएँ, व्याख्याएँ, विधियाँ) में भारत के महत्त्वपूर्ण योगदानों को जानना और समझाना।2
  • इसका सम्बन्ध आगे उल्लिखित कक्षा-6 से 8 के विज्ञान के सीखने के परिणामों से भी है : [विद्यार्थी] “ईमानदारी, निष्पक्षता, सहयोग, भय और पूर्वाग्रहों से मुक्ति के मूल्यों का प्रदर्शन करता है।3
  • प्रिपरेटरी स्‍टेज पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस) : इस संसाधन का उपयोग पाठ्यक्रम के निम्नलिखित लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भी किया जा सकता है :
  • CG-1 : [विद्यार्थी] अपने परिवेश के प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण की खोजबीन करे और उसके साथ जुड़े। ख़ासतौर से यह आगे उल्लिखित दक्षताओं के विकास में मदद कर सकता है : (i) C-1.1 : “प्राकृतिक (कीड़े, पौधे, पक्षी, पशु, भौगोलिक विशेषताएँ, सूर्य और चन्द्रमा, तारे, ग्रह, प्राकृतिक संसाधन) और सामाजिक (घर, रिश्ते) घटकों का अपने निकटतम परिवेश में अवलोकन करना और उन्हें पहचानना” और (ii) C-1.2 : “परिवार व समुदाय के रिश्तों (मनुष्यों और पशुओं/ प्रकृति के बीच रिश्तों सहित) और परम्पराओं (कला के रूप, उत्सव, त्यौहार) का वर्णन करना।2
  • CG-4 : [विद्यार्थी] अपने सामाजिक और प्राकृतिक वातावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित करे। ख़ासतौर से, इसका उपयोग आगे उल्लिखित दक्षताओं के विकास को सहयोग देने के लिए किया जा सकता है : (i) C-4.1 : “अपने निकटतम परिवेश के पौधों, पक्षियों और पशुओं के बीच विविधता का अवलोकन और वर्णन करना (आकृति, ध्वनियाँ, खानपान की आदतें, विकास, आवास” और (ii) C-4.6 : “विभिन्न स्थितियों में रहने वाले लोगों की आवश्यकताओं को पहचानना – संसाधनों की सुलभता, समान अवसर, कार्य का वितरण और आवास के सन्दर्भों में।2

प्रश्न-5 : हमारे कई पाठक सम्भवतः अपनी विज्ञान की कक्षा में इस किताब का उपयोग करना चाहें। वे ऐसा किन तरीक़ों से कर सकते हैं, इसके बारे में आपके कुछ सुझाव।

लावण्या : भारत भर में कई स्कूलों ने पूरी ‘ड्रीमर्स’ शृंखला अपने विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई है। उन्होंने इनकी विषयवस्तुओं के बारे में चर्चाएँ आयोजित की हैं और विद्यार्थियों को अपने इर्द-गिर्द छोटे-छोटे प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए प्रोत्साहित भी किया है। ऐसा लगता है कि अम्माल वाली किताब के साथ नन्हें पाठक जुड़ पाते हैं, विशेष रूप से लड़कियाँ (बॉक्स-2 देखें)। यह किताब विज्ञान के बारे में उतनी नहीं है जितनी कि यह अपनी मर्ज़ी का जीवन जीने के लिए अम्माल द्वारा तय किए गए रास्ते के बारे में है। लेकिन अम्माल और उनके पिता ने अपनी-अपनी खोज में जो आनन्द पाया वह दरअसल बारीक़ विवरणों में था − पेड़-पौधों या पक्षियों की वे अनोखी विशेषताएँ जिन्हें उन्होंने धैर्यपूर्ण अवलोकन के द्वारा खोजा। इससे प्रेरित होकर अम्माल ने गन्ने की ऐसी प्रजातियाँ विकसित कीं जो पहले की प्रजातियों की तुलना में बहुत अधिक मीठी थीं। उनके पिता ने केरल के पक्षियों पर दो किताबें लिखीं। स्कूलों में इस किताब पर चर्चा करते हुए मैं कुछ मज़ेदार बातें करती हूँ। मसलन जब मैं विद्यार्थियों को यह बताती हूँ कि उनकी पसन्‍दीदा टॉफियों और चॉकलेट की मिठास में सीधा-सीधा योगदान अम्माल द्वारा गन्नों पर किए गए शोधकार्य का है तो बच्चों के भीतर गहरी रुचि पैदा हो जाती है। तब विज्ञान प्रयोगशालाओं में होने वाली कोई दूर की चीज़ नहीं रह जाता; वह सीधे-सीधे उनकी ज़िन्दगियों को छूता है, हर बार जब वे कोई मीठी चीज़ खाते हैं। मैंने किताब में एक छोटी टिप्पणी भी शामिल की है जिसमें अम्माल के बारे में और अधिक जानकारियों का उल्लेख किया गया है। मैं आशा करती हूँ कि इससे बच्चों को उनके बारे में और पढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।

अम्माल के बारे में मेरा शोध मुझे चीज़ों को बहुत गहराई से जानने की ओर ले गया, जहाँ मैं अन्य चीज़ों के अलावा मैंग्रोव के बारे में भी जानने लगी। मुझे लगता है बच्चों को भी इस तरह की गतिविधियाँ अच्छी लगेंगी − किसी पौधे, पक्षी या जानवर की प्रजाति के बारे में और अधिक जानना और उन विशेषताओं का अवलोकन करना जो उन्हें अनोखा बनाती हैं (गतिविधि शीट 1-3 और शिक्षक मार्गदर्शिका देखें)। किताब में, मैंने एक पोशीदा पसन्द (गुप्‍त बग़ीचे) के विचार पर बात की है − एक ऐसी पसन्द जो आपको वह होने का अवसर देती है जो आप वास्तव में हैं, जिसे आप किसी अन्य लाभ की बजाय सिर्फ़ उससे मिलने वाली सच्ची ख़ुशी के लिए करते हैं। बच्चों को शान्ति से किसी जानवर, पौधे या प्राकृतिक घटना का अवलोकन करने के लिए प्रोत्साहित करना उन्हें ख़ुद के बारे में सोचने और अपनी ख़ुद की पोशीदा पसन्‍द (गुप्त बग़ीचा) खोजने के लिए प्रेरित करने का एक अच्छा तरीक़ा हो सकता है!

मुख्‍य बिन्‍दु

एक भारतीय वैज्ञानिक का परिचय : जानकी अम्माल
  • दी गर्ल हू वॉज़ अ फॉरेस्ट : जानकी अम्माल’ एक जीवनी है जो भारतीय वनस्पतिविज्ञानी जानकी अम्माल के बचपन के उन अनुभवों के माध्यम से बच्चों से उनका परिचय कराती है जिन अनुभवों ने अम्माल के जीवन और काम को आकार दिया।
  • बच्चे शायद ऐसी पारम्परिक जीवनियों से जुड़ने में कठिनाई महसूस करें जो वयस्क लोगों की उपलब्धियों और अमूर्त सुनाई देने वाले पेशों पर केन्द्रित होती हैं। अम्माल के जीवन को आकार देने वाले उनके बचपन के अनुभवों को केन्द्र में रखने से यह किताब बच्चों को अम्‍माल के जीवन के उस हिस्से की झलक दिखाती है जिसके साथ वे ज़्यादा स्वाभाविक ढंग से जुड़ सकते हैं।
  • छोटे लड़के-लड़कियों को ऐसी भारतीय महिलाओं के बारे में जानने का अवसर देकर, जो ऐसे क्षेत्रों में फल-फूल रही हैं और तरक्की कर रही हैं जिनसे उन्हें पारम्परिक रूप से दूर रखा गया था, यह कहानी बच्चों को ऐसे सम्भावित भविष्य के सपने देखने व कल्पना करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
  • अम्माल की कहानी के माध्यम से बच्चे शायद यह सीख सकें कि किस तरह विज्ञान जिज्ञासा, विधियों, धैर्य और अवलोकन से जुड़ा हुआ है − ऐसे गुण जिन्हें अकसर अंकों, याद करके सीखने और असफलता के भय से प्रेरित शिक्षा व्यवस्था में महत्त्व नहीं दिया जाता।
  • प्राकृतिक दुनिया के प्रति अम्माल का प्यार सम्भवतः बच्चों को अपने इलाक़े के किसी पौधे, पक्षी या अन्य पशु प्रजाति का अवलोकन करके उनकी ऐसी विशेषताओं को खोजने के लिए प्रेरित कर सकता है जो उन्हें अनोखा बनाती हैं।

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  • लेख के शीर्षक की पृष्ठभूमि में उपयोग किए गए चित्र (काला मैंग्रोव) के लिए आभार : portioid, iNaturalist. URL: https://www.inaturalist.org/ photos/27435593. License: CC BY-SA 4.0 International Deed.
  • इस इंटरव्यू के लिए सवाल विजेता रघुराम, राधा गोपालन और चित्रा रवि द्वारा तैयार किए गए थे।
  • ‘ड्रीमर्स’ सीरीज़ के बारे में और जानने के लिए, कृपया देखें : https://www.penguin.co.in/book/dreamers-delightfully-illustrated-short-biographies- to-inspire-young-readers-boxset-of-ten-inspirational-indian-men-and-women-who-changed-the-world-perfect-for-7-years/.
  • इस लेख के साथ अलग किए जा सकने वाले चार कक्षा संसाधन दिए गए हैं : गतिविधि शीट-1 : किसी दीवार पर मौजूद जीवन की खोज करें; गतिविधि शीट-2 : छुपी हुई प्रकृति को खोजें; गतिविधि शीट-3 : मानव-निर्मित ढाँचों के उपयोगों का अवलोकन करें और शिक्षक मार्गदर्शिका : प्रकृति-आधारित बाहर की जाने वाली गतिविधियाँ।
  • वैज्ञानिकों की जीवनियाँ वैज्ञानिक खोज की प्रक्रिया से विद्यार्थियों को परिचित कराने का एक दिलचस्प और प्रभावी तरीक़ा हो सकती हैं। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हम कौन-सी शिक्षण विधियों का उपयोग कर सकते हैं? आई वंडर…दिसम्बर, 2024 अंक में पढ़ें कि किस प्रकार एक सरकारी स्कूल के विज्ञान शिक्षक नरेश कुमार सेन ने ‘वैज्ञानिकों के जीवन को जानने का प्रोजेक्ट-केन्द्रित तरीक़ा’ नामक लेख में इस सवाल की पड़ताल की है। URL: https://anuvadasampada.azimpremjiuniversity.edu.in/4981/
  • कई भारतीय महिलाओं ने विज्ञान में महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं। उनके कुछ योगदानों का सीधा जुड़ाव उन अवधारणाओं और उपयोगों के साथ है जिनके बारे में विद्यार्थी मिडिल स्‍टेज विज्ञान पाठ्यक्रम में सीखते हैं। ‘गतिविधि शीट : ये वैज्ञानिक कौन हैं?’ के माध्यम से अपने विद्यार्थियों का परिचय छह ऐसी महिलाओं से कराएँ। विजेता रघुराम द्वारा तैयार किया गया यह कक्षा संसाधन आई वंडर…दिसम्बर, 2024 अंक में प्रकाशित हुआ था। URL: https://anuvadasampada.azimpremjiuniversity.edu.in/4981/
  • लेख के हिन्दी अनुवाद की समीक्षा करने के लिए हम हृदय कान्त दीवान के आभारी हैं।

सन्दर्भ

  1. National Council of Educational Research and Training (2024). ‘Chapter 2: Diversity in the Living World’. Science Textbook for Grade VI: 9-34. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?fecu1=2-12.
  2. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks (2023). ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.
  3. National Council of Educational Research and Training (2017). ‘Learning Outcomes at the Elementary Stage’. First Edition. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/publication/otherpublications/tilops101.pdf.