‘वे सब जो साँस लेते हैं’ : शिकारी पक्षी क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

“इस तहख़ाने में वक़्त अलग ही तरीक़े से गुज़रता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि यहाँ काम करते-करते मेरा कलेजा फट जाएगा और उसमें से चीलें उड़ेंगी।” सऊद की आँखें जब एक चील की आँखों से मिलती हैं, जिसके पंख पर पट्टी बँधी हुई है तो उसके चेहरे पर दुख, प्रेम और धीरज के मिले-जुले भाव आते हैं (चित्र-1 देखें)। पिछले बीस सालों से मोहम्मद सऊद और उनके भाई नदीम शहज़ाद बीमार और घायल शिकारी पक्षियों (मुख्य रूप से काली चीलों) की देखभाल एक कामचलाऊ अस्थायी अस्पताल में करते आए हैं। यह अस्पताल दिल्ली में उनके अपने घर में है जो दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित महानगरों में शुमार है। ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित वृत्तचित्र ‘वे सब जो साँस लेते हैं’ (All that breathes) एक भारतीय फ़िल्म निर्माता शौनक सेन द्वारा बनाया गया है। यह सऊद और शहज़ाद के चील बचाव कार्य का सशक्त और संवेदनशील चित्रण है (चित्र-2 देखें)।
इस फ़िल्म में दोनों भाइयों और उनके प्यारे से सहायक सालिक रहमान की गतिविधियाँ दिखाई गई हैं जो साधारण-सी लगती हैं। वह महानगर की तंग गलियों में घूम-घूमकर बीमार पक्षियों को खोजकर बचाते हैं (बॉक्स-1 देखें)। इस फ़िल्म में हमें शहर में रहने वाले कई जीव-जन्तुओं की झलक दिखाई देती है। गन्दी नालियों में घूमते सूअर; कूड़े में भटकता कछुआ; पानी भरी सड़कों पर चलती गायें; कूड़े के ढेर में कुछ खोजते चूहे; बिजली के तारों और निर्माण कार्य के बीच में से राह बनाते बन्दर; मक्खियों की भिनभिनाहट नेपथ्य में लगातार सुनाई देती है।


बॉक्स-1 : पाठ्यक्रम से सम्बन्ध
यह संसाधन विद्यार्थियों को प्रारंभिक स्तर (कक्षा III-V) में पर्यावरण अध्ययन (EVS) और मध्य स्तर (कक्षा VI-VIII) में विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में जीवित जगत के बारे में जो कुछ भी सिखाया जाता है, उसे उनके वास्तविक जीवन से जोड़ने के अनेक तरीके प्रदान कर सकता है ( गतिविधि पत्रक I: आपके आकाश में पतंगें, गतिविधि पत्रक II: अन्य शिकारी पक्षियों से मिलना, और शिक्षक मार्गदर्शिका: गतिविधि पत्रक I और II देखें)। यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 द्वारा वर्णित स्कूली शिक्षा के उद्देश्य को पूरा करने का एक सरल और गैर-आदेशात्मक तरीका भी प्रदान कर सकता है: “शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य तर्कसंगत विचार और कार्य करने में सक्षम, करुणा और सहानुभूति , साहस और लचीलापन, वैज्ञानिक सोच और रचनात्मक कल्पना से युक्त, सुदृढ़ नैतिक मूल्यों और आधारों वाले अच्छे मनुष्यों का विकास करना है।”1 इसका उपयोग राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा पाठ्यक्रम ढांचा (NCF-SE) 2023 में वर्णित सामाजिक जुड़ाव की क्षमता विकसित करने के लिए भी किया जा सकता है, जिसमें भावात्मक पहलू शामिल हैं: “सहानुभूति और करुणा केवल मूल्य या प्रवृत्तियाँ नहीं हैं; ये ऐसी क्षमताएँ हैं जो जानबूझकर अभ्यास के माध्यम से विकसित होती हैं”।1 अंत में, शिक्षक इस कहानी के इर्द-गिर्द ऐसी गतिविधियों की योजना बना सकते हैं जो NCF-SE 2023 में सूचीबद्ध निम्नलिखित पाठ्यचर्या लक्ष्यों के अनुरूप हों:
- प्राथमिक स्तर :
- CG–2 : पर्यावरण में आपसी निर्भरता को विद्यार्थी अवलोकन और अनुभवों के माध्यम से समझता है ताकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम् ’ की कल्पना का आधार विकसित हो सके। ख़ासतौर पर, इससे विद्यार्थियों में : “पर्यावरण में बदलावों को परिवार और समुदाय के जीवन से जोड़ने की क्षमता विकसित हो सके, जैसा उन्हें बुज़ुर्गों ने और स्थानीय कहानियों के माध्यम से बताया था (व्यवसाय, खानपान की आदतों, संसाधनों, उत्सवों, सम्प्रेषण में बदलाव)।”
- CG–4 : विद्यार्थी में सामाजिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता विकसित होती है। ख़ासतौर पर, इससे विद्यार्थियों में : “पौधों, पक्षियों और जीव-जन्तुओं की आवश्यकताओं को पहचानने, और उन्हें सहारा देने (पानी, मिट्टी, भोजन, देखभाल) की क्षमता विकसित हो सकती है।”1
- माध्यमिक स्तर : CG–3 : यह वैज्ञानिक दृष्टि से जीव-जगत की खोजबीन करता है। यह विद्यार्थियों को निम्नलिखित क्षमताएँ विकसित करने और उनका इस्तेमाल करने के क़ाबिल बनाता है :
- “प्राकृतिक परिवेश में देखे गए जीवधारियों की विविधता का वर्णन करना (कीट, केंचुए, घोंघे, पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, मकड़ियाँ, विविध प्रकार के पौधे और कवक)।’’
- “एक-दूसरे पर निर्भरता और एक-दूसरे के लिए प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में जीवित प्राणियों और उनके पर्यावरण के बीच सम्बन्धों के पैटर्न का विश्लेषण करें।”1
और हमें दिखाई पड़ती हैं लैंडफ़िल में शहर के कूड़े के विशाल ढेरों पर मँडराती चीलें (चित्र-3 देखें)। फ़िल्म में सालिक एक स्थान पर अनुमान लगाता है कि एक चील प्रतिदिन 10-15 ग्राम भोजन लेती है। इसलिए वह कहता है कि लैंडफ़िल पर मँडराने वाली लगभग 10,000 चीलें एक दिन में 100-150 किलोग्राम कूड़ा खा जाती हैं। फिर सऊद शहर की तुलना आमाशय से और चीलों की तुलना उन बैक्टीरिया से करता है जो जीव-जन्तुओं को पचाने में मदद करते हैं।
अलग-अलग प्रजातियों के आपस में उलझे हुए जीवन यह याद दिलाते हैं कि प्रकृति से परे कोई स्थान नहीं है चाहे शहर इन आपसी सम्बन्धों के प्रति उदासीन क्यों न हों। हाशिए पर पड़ी ज़िन्दगियों (मानव और ‘ग़ैर-मानव’ दोनों की) और उनके जीवन की नज़ाकत देखकर ‘How to be a poet’ (कवि कैसे बनें) कविता याद आती है :
“कोई स्थान अपवित्र नहीं है;
केवल पवित्र स्थान हैं और वे स्थान हैं
जिन्हें अपवित्र बना दिया गया है।”
– वेंडेल बैरी2

सऊद और नदीम को वे कहानियाँ याद आती हैं जो उनकी माँ उन्हें बचपन में सुनाया करती थी। उनकी माँ की मृत्यु कैंसर से हो गई थी। इन कहानियों के मुख्य पात्र जीव-जन्तु व अन्य प्राणी हुआ करते थे और उनके आपसी सम्बन्ध जीवन के मूल तथ्यों की तरह इन कहानियों में गुँथे होते थे। हालाँकि, आपसी निर्भरता के ऐसे प्रकट रूप वह कारण नहीं हैं जिनकी वजह से यह दोनों भाई चीलों को बचाने का बिना फ़ायदे का काम कर रहे हैं। उनके सतत और बेचैन प्रयासों की प्रेरणा काफ़ी निजी और सशक्त है। सऊद और नदीम बताते हैं कि वह किस प्रकार चीलों को देखते हुए बड़े हुए। जब वे किशोरावस्था में थे तब उन्हें पहली बार एक घायल चील मिली और वे उसे पास के पक्षियों के अस्पताल में ले गए। लेकिन अस्पताल ने एक मांसभक्षी पक्षी को भर्ती करने से मना कर दिया। मुस्लिम धर्म में ऐसी मान्यता है कि चीलों को खाना खिलाने से आपकी चिन्ताएँ कम हो जाती हैं क्योंकि मांसभक्षी पक्षी ‘आपकी चिन्ताओं को खा जाते हैं।’ वह घायल चील इन भाइयों की पहली मरीज़ थी। फिर और पक्षी आते गए। सऊद और नदीम पिछले 15-20 सालों में लगभग 20,000 चीलों का इलाज कर चुके हैं।
हालाँकि इस काम के प्रति समर्पण आसान नहीं है। हम देखते हैं कि दोनों भाई अपने काम के लिए पैसों की कमी के चलते पक्षियों को खिलाने के लिए कसाई से मांस की क़ीमत कम करने का अनुरोध करते हैं। कसाई मना कर देता है। बाद में, चीलों को खिलाने के लिए मांस का कीमा बनाते समय सालिक सऊद से पूछता है कि यदि वह मरने का स्वांग करे तो क्या चीलें उसे भी खा जाएँगी। सऊद मज़ाक़ में उससे कहता है कि कोशिश करके देखो, जबकि नदीम गम्भीरता से कहता है, “इन्सान यह भूल जाते हैं कि वे ख़ुद मांस के टुकड़े हैं…।”
वृत्तचित्र शहर के असन्तोष और सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) के विरोध की पृष्ठभूमि में आगे बढ़ता है।3 नदीम यह सोचने लगता है कि उसके पिता के सरकारी पहचान पत्र में हिज्जे की एक ग़लती से उनकी नागरिकता जा सकती है। क्या इस तरह के मनमाने मापदण्ड किसी को ‘पराया बनाने’ की प्रक्रिया को इतना आसान बना सकते हैं? घर के बाहर, विरोध प्रदर्शनों के कारण फ़िरक़ापरस्त दंगों की आग भड़क उठती है। शहर में एक दबा हुआ डर छाया हुआ है। हवा की गुणवत्ता इतने ख़तरनाक स्तर तक पहुँच चुकी है कि पक्षी आकाश से टपकने लगते हैं (चित्र-4 देखें)।

फिर भी दोनों भाई अपना काम जारी रखते हैं मानो चीलों से भरे आकाश से निकलती कोई रहस्यमय शक्ति उन्हें प्रेरित कर रही हो। चीलों के साथ सऊद के रिश्ते की बात करते हुए नदीम कहता है, “ऐसा कहते हैं कि शास्त्रीय संगीत गाते समय कोई किसी राग को अच्छी तरह गा दे तो परम आनन्द की अनुभूति होती है। लेकिन आप इस अनुभूति के मालिक नहीं बन सकते, पकड़कर नहीं रख सकते। एक क्षण के लिए आप उसे छू भर सकते हैं। सऊद इसी प्रकार की राहत को तब स्पर्श करता है जब चीलें उसके साथ होती हैं।” ख़ुद अपने काम को वह कैसे देखता है, यह बताते हुए नदीम अपने काम की तुलना एक बैंड-एड से करता है जिसे एक विशाल घाव पर लगाया जा रहा है जो यह पूरा शहर है।
वह यह भी स्वीकार करता है कि उसे अपने जीवन से कुछ और भी चाहिए। जब उन्हें उनके काम के लिए विदेशी फ़ंडिंग लेने की औपचारिक अनुमति मिल जाती है तब हम एक राहत महसूस करते हैं। हम तब सऊद के दुख में भागीदार बन जाते हैं जब वह उन पक्षियों के मृत शरीरों से घिरा होता है जिन्हें वह बचा न सके। वृत्तचित्र यह दिखाता है कि प्रदूषण, साम्प्रदायिक हिंसा और पक्षियों की बढ़ती मृत्यु दर के गन्दले पानी के बीच अपने काम को बढ़ाने की आशा में दोनों भाइयों का मनोबल कैसे ऊँची उड़ान भरता है लेकिन यह किसी महान कथानक या अन्तिम निर्णय तक नहीं पहुँचता, वह केवल उस सत्य की पुष्टि करता है जिसे हम भीतर तक महसूस कर सकते हैं : “चीज़ों की परवाह इसलिए नहीं की जाती क्योंकि उनका देश, या मज़हब, या राजनीति आप जैसी है। ज़िन्दगी ख़ुद एक तरह की रिश्तेदारी है, हम सब हवा के बिरादर हैं। इसलिए हम पक्षियों को छोड़ नहीं सकते।”
मुख्य बिन्दु
- दिल्ली में बीमार और घायल शिकारी पक्षियों का बचाव और देखभाल करने वाले तीन व्यक्तियों की कहानी के माध्यम से ‘All that Breathes’ फ़िल्म हमें इन मांसभक्षी पक्षियों के साथ हमारे अन्तर्सम्बन्धों की खोजबीन करने के लिए आमंत्रित करती है।
- प्राथमिक स्तर के विद्यार्थियों को आस-पास के शिकारी पक्षियों के प्रति संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण परिचय दिलाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
- शिकारी पक्षियों की लैंडफ़िल पर भूमिका की ओर ध्यान आकर्षित करके माध्यमिक स्तर के विद्यार्थी एक स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र बनाए रखने में इन पक्षियों की भूमिका के महत्त्व को समझ सकते हैं।
- यह फ़िल्म विद्यार्थियों और शिक्षकों को प्रजातियों की विविधता और आपसी निर्भरता को महसूस करने में भी मदद कर सकती है।
आभार
इस लेख की अनुशंसा करने के लिए और इसे प्रकाशित करने की अनुमति प्राप्त करना सुलभ बनाने के लिए सम्पादक अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की विजेता रघुराम का आभार व्यक्त करते हैं।
टिप्पणियाँ
- लेख के शीर्षक की पृष्ठभूमि में इस्तेमाल किए गए चित्र के लिए श्रेय : Black kite, Ron Knight, Wikimedia Commons. URL: https://commons.wikimedia.org/wiki/ File:Black_Kite_%28Milvus_migrans%29_%288079585185%29.jpg. License: CC-BY 2.0 Generic Deed.
- इस फिल्म की समीक्षा सबसे पहले इकोलॉजिकल मैटर्स (https://www.ecologicalcitizen.net/): https://www.ecologicalcitizen.net/pdfs/epub-092.pdf में प्रकाशित हुई थी। यहाँ प्रकाशित लेख में शब्दावली और संरचना को माध्यमिक स्कूलों के विज्ञान शिक्षकों और प्राथमिक स्कूलों के पर्यावरण अध्ययन शिक्षकों की सुविधा की दृष्टि से बदला गया है। यह बदलाव लेखक की अनुमति से किए गए हैं।
- सऊद, नदीम और सालिक के काम के बारे में अधिक जानकारी के लिए और उसमें योगदान देने के लिए https://www.raptorrescue.org/ पर जाएँ।
- डेबोराह दत्ता के लेखन के बारे में अधिक जानकारी के लिए https://linktr.ee/deborahdutta देखें।
- इस लेख के साथ तीन गतिविधि शीट हैं जिन्हें अलग किया जा सकता है। गतिविधि शीट I : आपके आकाश में चीलें; गतिविधि II : अन्य शिकारी पक्षियों से मिलें, और शिक्षक निर्देशिका : गतिविधि शीट I और II. गतिविधि शीट I में दिखाई गई चीलें हैं : (क) काली चील, (ख) काले कानों वाली चील, (ग) काले पंखों वाली चील, और (च) ब्राह्मिनी चील।
सन्दर्भ
- National Steering Committee for National Curriculum Frameworks. ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.
- Berry W (2001). ‘How to be a poet (to remind myself)’. Poetry Foundation. URL: https://www.poetryfoundation.org/poetrymagazine/poems/41087/how-to-be- a-poet.
- Bhatia KV & Gajjala R (2020). ‘Examining anti-CAA protests at Shaheen Bagh: Muslim women and politics of the Hindu India’. International Journal of Communication (14): 18.