76 साल तक प्लूटो एक ग्रह क्यों था?

अनुवाद : शहनाज़ | पुनरीक्षण : उमा सुधीर | कॉपी एडिटर : प्रतिका गुप्ता

2006 तक, हम प्लूटो को सौर मण्डल का नौवाँ ग्रह मानते थे। हममें से कइयों को अपने स्कूल की पाठ्यपुस्तक से यह तथ्य पता चला था। लेकिन हमारे विद्यार्थी यह सीखते हैं कि सौर मण्डल में केवल आठ ग्रह हैं। वैज्ञानिक इतने लम्बे अरसे तक प्लूटो को एक ग्रह क्यों मानते रहे? क्या ऐसा मानने के पीछे कोई वैज्ञानिक साक्ष्य था?

छठी कक्षा की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) का अध्याय 12 (पृथ्वी से परे) विद्यार्थियों को ग्रह की अवधारणा से कुछ इस तरह परिचित कराता है : “…एक विशाल और लगभग गोलाकार पिण्ड, जो सूर्य की परिक्रमा करता है।” इसी अध्याय में, विद्यार्थी सौर मण्डल के आठ ग्रहों के बारे में सीखते हैं। वे यह भी सीखते हैं कि एक पिण्ड, जिसे वैज्ञानिक लगभग 76 साल तक सौर मण्डल का नौवाँ ग्रह मानते रहे, अब एक बौने ग्रह (Dwarf Planet) के तौर पर देखा जाता है। पाठ्यपुस्तक के मुताबिक, प्लूटो की हैसियत में यह बदलाव 2006 में हुआ जब “अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (International Astronomical Union- IAU)… ने किसी पिण्ड के ग्रह कहलाने की आवश्यक शर्तों को पुनर्परिभाषित किया।1 इस संक्षिप्‍त विवरण से और अधिक जानने को इच्छुक विद्यार्थियों और शिक्षकों के मन में ये सवाल आ सकते हैं : वैज्ञानिक किन वजहों से प्लूटो को एक ग्रह मानते थे? क्या ऐसा मानने के पीछे कोई साक्ष्य था? इस सवाल का जवाब इसकी खोज की कहानी से जुड़ा हुआ है (बॉक्स-1 देखें)।

बॉक्स-1 : पाठ्यचर्या से सम्बन्ध

इस कहानी के इर्द-गिर्द चर्चा से शिक्षकों को शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-SE) द्वारा माध्यमिक कक्षा स्तर के लिए सुझाए गए नौ पाठ्यचर्यात्मक लक्ष्यों में से दो को पूरा करने में मदद मिल सकती है (देखें शिक्षक मार्गदर्शिका : प्लूटो, कक्षा में) :

  • CG-6 :वैज्ञानिक ज्ञान के उद्विकास और वैज्ञानिक जाँच में सक्रियता से सहभागी बनकर विज्ञान की प्रकृति और प्रक्रियाओं की पड़ताल करता है।” विशेष रूप से, इससे विद्यार्थियों को यह “दर्शाने की दक्षता विकसित करने में मदद मिल सकती है कि किस तरह से समय के साथ वैज्ञानिक ज्ञान और विचारों (पिण्डों और ग्रहों की गति के विवरण, ग्रहों की संख्या) में बदलाव आया। इसके साथ ही उन्हें उन वैज्ञानिक मूल्‍यों (वैज्ञानिक दृष्टिकोण, एक सामूहिक प्रयास के तौर पर विज्ञान…) की पहचान करने में भी मदद मिल सकती है, जो आमतौर पर स्वाभाविक रूप से वैज्ञानिक ज्ञान के उद्विकास का हिस्सा रहे हैं।
  • CG-9 : “यह समझने के लिए कि विज्ञान निरन्तर विकसित हो रहा है और अभी भी कई सवालों के जवाब ढूँढ़े जाने बाकी हैं, वैज्ञानिक ज्ञान के सभी क्षेत्रों की सबसे हालिया खोजों, विचारों और नए, अज्ञात या उन्नत क्षेत्रों के बारे में जागरूकता विकसित करता है”4

खोज शुरू होती है

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक, सौर मण्डल के पहले सात ग्रह खोज लिए गए थे।2 लेकिन खगोलशास्त्रियों ने देखा कि सूरज की परिक्रमा करते समय अरुण (Uranus) ने असल में जो कक्षा (Orbit) अपनाई, वह उनके पूर्वानुमान से अलग थी। इसके पीछे क्या वजह थी? 1841 में, ब्रिटिश खगोलशास्त्री जॉन काउच एडम्स ने प्रस्तावित किया कि ऐसा हो सकता है कि सूर्य के चारों ओर अरुण के अनुमानित रास्ते पर किसी दूसरे ऐसे ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल का असर पड़ रहा हो, जिसे खोजा जाना अभी बाकी है।3

1846 में, फ़्रांसीसी खगोलशास्त्री उरबैन ली वेरियर ने ऐसे किसी ग्रह की सम्भावित स्थिति का अन्दाज़ा लगाने के लिए गणितीय गणनाओं का इस्तेमाल किया। इसका ब्यौरा उन्होंने जर्मन खगोलशास्त्रीय जोहान गॉटफ्राइड गैल को भेजा। जब यह ब्‍यौरा गैल और उनके छात्र हेनरिक लुइस डी’अरेस्ट को मिला तो उन्‍होंने उसी रात इसकी अनुमानित स्थिति के एक डिग्री के भीतर ही इस ग्रह को पा लिया। इस ग्रह का नाम वरुण (Neptune) रखा गया।3

लेकिन वरुण के अवलोकनों और इसके द्रव्यमान की गणनाओं से इसकी पूरी तरह से व्याख्या नहीं हो पाई कि अरुण अपनी अनुमानित कक्षा से अलग कक्षा में परिक्रमा क्यों करता है। दरअसल सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते समय वरुण का रास्ता भी खगोलशास्त्रियों के अन्दाज़े से थोड़ा अलग था। क्या इन अन्तरों की वजह किसी अन्य पिण्ड की मौजूदगी थी? 1902 में, एक अमीर अमरीकी खगोलशास्त्री पर्सिवाल लोवेल ने प्रस्तावित किया कि यह पिण्ड सौर मण्डल का नौवाँ ग्रह था। उन्होंने इसे ‘X ग्रह’ का नाम दिया (यहाँ ‘X’ अँग्रेज़ी का वर्ण है, न कि रोमन अंक)।5

लोवेल का X ग्रह

लोवेल का जन्म 1855 में हुआ था और वे एक अमीर व्यवसायी के बेटे थे। 1876 में, गणित में विशेष योग्यता के साथ उन्होंने हार्वर्ड कॉलेज से स्नातक की उपाधि हासिल की। 1893 में, लोवेल ने फ़्रांसीसी खगोलशास्त्री कैमील फ्लैमेरियॉन की लिखी हुई किताब ‘La planète Mars’ में मंगल की सतह पर मौजूद ‘नहरों’ के बारे में पढ़ा। इन नहरों के बारे में विस्तार से जानने के उनके दृढ़ निश्चय ने उन्हें खगोलशास्त्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया।6,7 एक साल के भीतर ही, अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति और प्रभाव के बलबूते उन्होंने फ़्लैगस्टाफ़, एरिज़ोना, यूएसए में लोवेल वेधशाला की स्थापना की। इसमें ही 1906 में उन्होंने X ग्रह की खोज शुरू की।

अपनी खोज के पहले चरण में, वेरियर की तरह लोवेल ने भी नए ग्रह की सबसे ज़्यादा सम्भावित स्थिति का पता लगाने के लिए गणित की गणनाओं का इस्तेमाल किया। लोवेल वेधशाला के खगोलशास्त्रियों ने अलग-अलग दिनों को आसमान के इन विशिष्ट क्षेत्रों की तस्वीर लेने के लिए वेधशाला में मौजूद 42 इंच की दूरबीन का इस्तेमाल किया। लोवेल ने इन फोटोग्राफ़िक ग्लास प्लेटों के हरेक इंच की मेहनत के साथ जाँच करने के लिए एक हैंड मैग्निफ़ायर (हाथ में पकड़कर इस्तेमाल किया जाने वाला एक ग्लास, जिसका इस्तेमाल नज़दीकी निरीक्षण के लिए वस्तुओं को बड़ा करने के लिए किया जाता है) का इस्तेमाल किया (देखें बॉक्स-2)। 1910 तक, लोवेल की टीम ने लगभग 200 तस्वीरें खींचीं और हज़ारों तारों की स्थितियों को दर्ज़ किया। लेकिन उन्हें X ग्रह का कोई साक्ष्य नहीं मिला।

ऐसे में लोवेल ने अपने तरीक़े को बदलने का निर्णय लिया। सबसे पहले, उन्होंने ‘मानव कम्प्यूटरों’ की एक टीम को काम पर रखा। मानव कम्प्यूटर वे लोग (ज़्यादातर महिलाएँ) थे, जो गणित की जटिल गणनाओं को करते थे। इस टीम की नेतृत्वकर्ता अमरीकी खगोलशास्त्रीय एलिज़ाबेथ लैंगडन विलियम्स थीं। इस टीम के काम की बदौलत लोवेल आसमान के ऐसे क्षेत्रों का ज़्यादा सटीकता के साथ अन्दाज़ा लगा पाए, जहाँ X ग्रह के मिलने की सम्भावना थी। दूसरा, लोवेल ने स्प्राउल वेधशाला, पेंसिल्वेनिया से 9 इंच की एक दूरबीन उधार ली। उनका मानना था कि रात में आसमान की बारीकियों का अवलोकन करने के लिए छोटी दूरबीन ज़्यादा उपयुक्त रहेगी। अन्‍तत:, लोवेल ने एक विशेष तरह का स्टीरियो माइक्रोस्कोप खरीदा, जिसे आमतौर पर ‘ब्लिंक कोमपारेटर ’ (‘blink comparator’) कहा जाता था (चित्र-1 देखें)। इस यंत्र की मदद से वे थोड़े समय के अन्तराल में एक के बाद एक दो फ़ोटोग्राफ़िक प्लेटों की जाँच-पड़ताल और तुलना कर पाते थे। इस प्रक्रिया को लोकप्रिय रूप से ‘ब्लिंकिंग’ कहा जाता था (देखें बॉक्स-3)।

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चित्र-1 : एक ब्लिंक कोमपारेटर । लोवेल और टॉमबॉ लोवेल के ग्रह X की गतियों को देखने के लिए घण्टों इस यंत्र के सामने बैठे रहे और रात्रि के आकाश की तस्वीरों की तुलना करते रहे। Credits: Pretzelpaws, Wikimedia Commons. URL: https://en.wikipedia.org/wiki/File:Lowell_blink_ comparator.jpg. License: CC BY-SA 3.0. Unported DEED.

इस यंत्र के शुरुआती संस्करण में 6-इंच x 7-इंच की प्लेटें आ पाती थीं। लेकिन लोवेल की टीम ने पाया कि 14-इंच x 17-इंच की प्लेटों का अवलोकन करना उनके उद्देश्य के लिए ज़्यादा उपयुक्त था। अमरीकी खगोलशास्त्री कार्ल लैम्पलैंड इस टीम का हिस्सा थे। उन्होंने ब्लिंक कोमपारेटर में ऐसे समायोजन किए कि प्लेटों को खिसकाया जा सके, जिससे लोवेल एक समय पर बड़ी प्लेटों के एक चौथाई हिस्से की तुलना कर सके।5

लोवेल ने X ग्रह की तलाश के लिए रात के आसमान का बारीकी से निरीक्षण करने के लिए गणितीय और अवलोकनात्मक दृष्टिकोण दोनों का इस्तेमाल किया, लेकिन 1916 में स्ट्रोक की वजह से अचानक उनकी मृत्यु हो गई।7 उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने उनकी लाखों डॉलर की सम्पत्ति का अधिकांश हिस्सा वेधशाला को देने के उनके फ़ैसले का विरोध किया। नतीजन एक लम्बी क़ानूनी लड़ाई चली और उस लड़ाई के दौरान लोवेल वेधशाला की X ग्रह की खोज को रोक दिया गया। 1927 में, मुकदमे का फ़ैसला वेधशाला के पक्ष में आया और X ग्रह की खोज फिर से शुरू हुई।7,9 1929 में, अमरीकी खगोलशास्त्री डॉक्टर वेस्टो स्लिफ़र, वेधशाला के कार्यवाहक निदेशक, ने X ग्रह की खोज का काम 23 साल के नौजवान क्लाइड टॉमबॉ को सौंपा।

बॉक्स-2 : लोवेल क्या ढूँढ़ रहे थे?

लोवेल अलग-अलग दिनों की रात के आसमान की तस्वीरों का परीक्षण कर रहे थे, ताकि ऐसे पिण्डों का पता लगाया जा सके, जिन्होंने अपनी स्थिति बदली थी। आइए मान लेते हैं कि उन्हें ऐसा कोई पिण्ड मिल गया। उन्हें कैसे पता चलता कि वह एक ग्रह था, तारा नहीं? तारे भी स्थिति बदलते हैं। इस सवाल का जवाब यह है कि आसमान में बहुत दूर स्थित पिण्डों का पता लगाने की हमारी क्षमता हमारे द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरणों पर निर्भर करती है। लोवेल शायद इस बात पर भरोसा कर रहे थे कि X ग्रह को खोजने के लिए वे जिन दूरबीनों का इस्तेमाल कर रहे थे, वे इतनी शक्तिशाली थीं कि हमारे सौर मण्डल में किसी अन्य ग्रह की गति का पता लगा सकें, यहाँ तक कि उन ग्रहों की गति का भी, जो उस समय ज्ञात ग्रहों से काफ़ी दूर स्थित थे। पर वे इतनी शक्तिशाली नहीं थीं कि वे उन तारों की गतियों का पता लगा सकें, जो हमसे कहीं ज्‍़यादा दूरी पर स्थित हैं।

बॉक्स-3 : ब्लिंक कोमपारेटर क्या होता है?

रात के आसमान में मौजूद किसी पिण्ड में कोई हरकत हुई है या नहीं। आप आसमान की तस्‍वीरों से इस सवाल का जवाब कैसे ढूँढ़ेंगे। ऐसा करने के लिए आप पहली तस्वीर के हरेक पिण्ड को देखकर दूसरी तस्वीर में उनकी स्थिति की जाँच कर सकते हैं। यह प्रक्रिया काफ़ी धीमी हो सकती है। सोचिए अगर आप लगातार, हर दिन और कई महीनों तक, ऐसी तस्‍वीरों को देख रहे हों जिसमें बहुत-से छोटे-छोटे और मिलते-जुलते पिण्ड हों। ऐसे में आप बहुत जल्द ही थकान महसूस करने लगेंगे। ब्लिंक कोमपारेटर की मदद से आप बहुत ही ज़्यादा तेज़ी से दो तस्वीरें बारी-बारी से देख सकते हैं। उन दो तस्वीरों की हमारी अल्पकालिक स्मृति की बदौलत हम आसानी से उनके बीच के अन्तरों को पहचान पाते हैं।8

टॉमबॉ की भागीदारी

टॉमबॉ एक किसान के बेटे थे। उनका जन्म उसी साल हुआ जिस साल लोवेल ने X ग्रह की अपनी खोज शुरू की थी। टॉमबॉ ने 1925 में अपनी हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की थी। वे कॉलेज की शिक्षा का खर्च वहन करने में असमर्थ थे। 1924 में टॉमबॉ ने एक पत्रिका में प्रकाशित लेख पढ़ा। उस लेख को एक शौकिया खगोलशास्त्री लैटिमर जे. विल्सन ने लिखा था। उसका शीर्षक था — ‘दि ड्रिफ़्ट ऑफ़ जुपिटर्स मार्किंग्स’ (‘The Drift of Jupiter’s Markings’)। बृहस्पति की सतह पर दिखाई देने वाले निशानों के विल्सन ने जो चित्र बनाए थे, उन्हें देखकर टॉमबॉ मोहित हो गए, वे इन विशेषताओं को ख़ुद देखना चाहते थे। यही वजह है कि 1926 में 20 साल की उम्र में बेकार पड़ी कार के पुर्जों और कृषि में इस्तेमाल होने वाली मशीनरी का इस्तेमाल करके उन्होंने अपनी पहली दूरबीन बनाई। इस दूरबीन से सन्तुष्ट न होने की वजह से उन्होंने अगले दो साल दूरबीनें बनाने, उनके लिए स्वयं बनाए गए शीशों और लेंसों को घिसकर चिकना करने के कौशलों को निखारने में बिताए। 1928 में, टॉमबॉ ने एक दूरबीन बनाई, जिसकी मदद से वह बृहस्पति और मंगल की सतह के निशानों को देख सके (देखें चित्र- 2)।

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चित्र-2 : घर पर बनाए हुई अपनी 9 इंच की दूरबीन के साथ क्लाइड टॉमबॉ। उन्होंने इसके लिए दर्पण ख़ुद ही बनाए। इसके अलावा, उन्होंने अपने पिता की 1910 की ब्यूक (कार का एक मॉडल) के क्रैंकशाफ़्ट के हिस्से से और दूध से क्रीम को अलग करने वाली मशीन (उनके परिवार के फॉर्म पर इस्तेमाल होने वाली) के बेकार हिस्सों से दूरबीन को सहारा देकर खड़ा करने के लिए आधार बनाया। इस दूरबीन की बदौलत वे बृहस्पति और मंगल की सतह के निशानों को देख पाए। Credits: Popular Science Monthly, Wikimedia Commons. URL: https://en.wikipedia.org/wiki/File:Clyde_W._ Tombaugh.jpeg. License: CC BY.

तापमान और वायु प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए टॉमबॉ ने इस दूरबीन को 24 फ़ीट लम्बे, 8 फ़ीट गहरे और 7 फ़ीट चौड़े गड्ढे से संचालित किया, जिसे उन्होंने ख़ुद ही खोदा था। उन्होंने अपने अवलोकनों के विस्तृत चित्र लोवेल वेधशाला को भेजे।10,11 टॉमबॉ के अवलोकन के तीक्ष्ण कौशलों से प्रभावित होकर, स्लिफ़र ने उन्‍हें तीन महीने की परीक्षण अवधि वाले एक पद की पेशकश की।

वेधशाला में, टॉमबॉ ने रात के आसमान का एक व्यवस्थित सर्वेक्षण शुरू किया। लोवेल की कोशिशों से सीखते हुए, टॉमबॉ 14-इंच x 17-इंच की एक फ़ोटोग्राफिक प्लेट को 13-इंच की दूरबीन में लगे एक शक्तिशाली कैमरे में फ़िट करते और आसमान के लम्‍बे एक्‍सपोज़र वाली तस्वीरें लेते (देखें बॉक्स-4)। उन्होंने उन क्षेत्रों के अवलोकन पर ध्यान केन्द्रित किया, जहाँ लोवेल ने X ग्रह की मौजूदगी का अन्दाज़ा लगाया था। अकसर, एक तस्वीर लेने में उन्हें तीन घण्टे लग जाते। फिर वे कैमरे में एक नई प्लेट लगाते, आसमान में X ग्रह की अनुमानित मौजूदगी वाले क्षेत्र के नज़दीक के किसी क्षेत्र पर ध्यान केन्द्रित करते व एक और फोटो लेते। कुछ दिनों बाद वे आसमान के उन्हीं क्षेत्रों की फिर से तस्वीरें लेते। दिन के समय में, वे प्लेटें तैयार करते और उसी क्षेत्र की तस्वीरों की तुलना करने के लिए ब्लिंक कोमपारेटर का इस्तेमाल करते।5 लोवेल की तरह, वे इन तस्वीरों के हरेक इंच की जाँच करते। ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य ऐसे किसी छोटे से बिन्दु की तलाश करना था, जिसने अपनी स्थिति बदल दी हो। यह बहुत उबाऊ काम था और इसमें बहुत ज़्यादा ध्यान केन्द्रित करना पड़ता था। टॉमबॉ हरेक आधे घण्टे में कोमपारेटर से दूर हटकर एक छोटा-सा ब्रेक लेते थे। एकाग्रता में किसी भी तरह की चूक विफलता की वजह बन सकती थी और यह स्वीकार्य नहीं था।

जनवरी 1930 तक, टॉमबॉ ने ब्लिंक कोमपारेटर पर हज़ारों घण्टे खर्च किए और 15 लाख तारों की स्थिति का सूक्ष्म निरीक्षण किया। उन्होंने ऐसे कई बिन्दु देखे, जिन्होंने अपनी स्थिति बदल ली थी, यानी कि वे गति कर रहे थे। लेकिन उनकी गति से यही संकेत मिलता था कि वे पृथ्वी के इतने नज़दीक थे कि वे X ग्रह नहीं हो सकते थे। आखिरकार, 18 फ़रवरी, 1930 को टॉमबॉ को छोटा-सा एक पिण्ड नज़र आया, जिसकी स्थिति 23 जनवरी और 29 जनवरी को ली गई तस्वीरों में अलग-अलग थी। तस्वीर की स्पष्टता इतनी ज्‍़यादा थी कि एक धूमकेतु (Comet) के होने की सम्‍भावना कम थी। इसकी गति इतनी धीमी थी कि इसके क्षुद्रग्रह (Asteroid) या अन्तरिक्ष का मलबा (Space Debris) होने की सम्‍भावना भी कम थी। पर गति इतनी थी कि उसके पृथ्वी से वरुण की तुलना में ज्‍़यादा दूरी पर होने की सम्‍भावना थी।10,12 यह वैसा ही था जैसा लोवेल ने अनुमान लगाया था।

बॉक्स-4 : टॉमबॉ देर रात तक अवलोकन क्यों करते रहे?

क्योंकि वे रात्रि-आकाश की तस्वीरें ले रहे थे। देर रात तक अवलोकन करके, टॉमबॉ यह सुनिश्चित कर रहे थे कि कैमरे का शटर जितना धीरे हो सके, उतनी धीरे बन्द हो। इससे उस धुँधले से माहौल में कैमरे का लेंस ज़्यादा-से-ज़्यादा लम्बे समय तक खुला रह पाता था और उसमें ज़्यादा-से-ज़्यादा रोशनी प्रवेश कर पाती थी। इस तरह कैमरे के लेंस को रोशनी के प्रवेश के लिए खुला रखना गतिमान वस्तुओं और स्थिर वस्तुओं की तस्वीरों के बीच फ़र्क़ करने लिए भी उपयुक्त रहता होगा, हालाँकि इससे गतिमान वस्तुओं की तस्वीरें धुँधली नज़र आती होंगी।

X ग्रह की खोज की उद्घोषणा

जब टॉमबॉ ने इस अवलोकन के बारे में स्लिफ़र को बताया, तो लोवेल वेधशाला की पूरी टीम यह जाँच करने में जुट गई कि यह पिण्ड X ग्रह के बारे में लोवेल के पूर्वानुमानों को पूरा कर रहा है या नहीं। लोवेल की गणनाओं के मुताबिक, इस पिण्ड का द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का सात गुना होगा और यह सूर्य से 43 खगोलीय इकाइयों (Astronomical Units / AU) की औसत दूरी पर स्थित होगा। छठी कक्षा की पाठ्यपुस्तक के अध्याय 12 में कुछ इस तरह से दूरी की इस इकाई का परिचय दिया गया है : “पृथ्वी से सूरज की दूरी लगभग 150 मिलियन किमी है। सौर मण्डल के भीतर दूरियों को दर्शाने की एक उपयोगी इकाई ‘खगोलीय इकाई’ है (au), जो लगभग पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी है।1 टॉमबॉ ने अपनी दो दूरबीनों (13 इंच और 24 इंच) से आसमान के उसी क्षेत्र की ज़्यादा-से-ज्‍़यादा तस्वीरें लीं। इन्हीं दूरबीनों को लोवेल ने मंगल का अवलोकन करने के लिए इस्तेमाल किया था। अपने अवलोकनों के आधार पर, टॉमबॉ ने अन्दाज़ा लगाया कि इस पिण्ड का द्रव्यमान क़रीब-क़रीब पृथ्वी के द्रव्यमान के बराबर होगा। लोवेल ने जिस 42 इंच की दूरबीन का इस्तेमाल अपनी तलाश के पहले चरण में किया था, लैम्पलैंड ने उसी का इस्तेमाल करके पिण्ड की और ज़्यादा स्पष्ट तस्वीर खींचने की कोशिश की। लेकिन उस पिण्‍ड की तस्वीरें धुँधली ही रहीं और बाकी ग्रहों की तरह यह दिखने में डिस्क जैसा भी नहीं था।13 सूर्य के चारों ओर इसकी कक्षा का पता लगाने के लिए टॉमबॉ और लैम्पलैंड ने 26 मई तक हर दिन इसकी स्थिति को दर्ज़ किया। क्योंकि लोवेल वेधशाला में किसी के पास भी ग्रह की कक्षाओं की गणना करने का कोई अनुभव नहीं था, इसलिए स्लिफ़र ने इस काम में दूसरी वेधशालाओं के खगोलशास्त्रियों की मदद माँगी।5

आखिरकार, 12 मार्च, 1930 को स्लिफ़र ने इस खोज के विवरण के साथ हार्वर्ड कॉलेज की वेधशाला को एक टेलीग्राम भेजा। लोवेल वेधशाला की टीम द्वारा बहुत ध्‍यान से इकट्ठा किए गए प्रमाण के आधार पर 13 मार्च को इस खोज की घोषणा की गई। यह लोवेल का पिचहत्तरवाँ जन्मदिन था। जैसे-जैसे इस खोज की ख़बर फैलने लगी, लोवेल वेधशाला को एक हज़ार से भी ज़्यादा नामों के सुझाव मिले। सबसे लोकप्रिय नाम थे मिनर्वा (Minerva), पर्सेफ़ोनी (Persephone) और क्रोनस (Cronus)।9,10 ‘प्लूटो’ (रोमन अंडरवर्ल्ड के देवता) नाम का सुझाव 11 साल की वेनेशिया बर्नी ने दिया था। उनके दादा फ़ाल्केनर मदन को यह नाम पसन्द आया और उन्होंने एक खगोलशास्त्री मित्र के ज़रिए इसे लोवेल वेधशाला के साथ साझा किया।14 जब वोट लिया गया, तो इस नाम को 150 नामांकन प्राप्‍त हुए। लोवेल वेधशाला ने अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी और रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी दोनों से ही इस नाम को स्वीकृत कराया। 1 मई 1930 तक, X ग्रह आधिकारिक तौर पर प्लूटो के नाम से जाना जाने लगा था।

मुख्‍य बिन्‍दु

76 साल तक प्लूटो एक ग्रह क्यों था?
  • सौर मण्डल में नौवें ग्रह की उपस्थिति का प्रस्ताव तब रखा गया जब वरुण के अवलोकनों से अरुण ग्रह की अनुमानित और अवलोकन की गई कक्षाओं में अन्तर स्पष्ट नहीं हो सका।
  • खगोलशास्त्री पर्सिवाल लोवेल ने इस ग्रह (जिसे उन्होंने X ग्रह का नाम दिया) की खोज 1906 में लोवेल वेधशाला, एरिज़ोना, यूएसए में शुरू की। 1906 और 1916 के बीच लोवेल और उनकी टीम ने रात के आसमान में इस ग्रह की खोज के लिए गणितीय और अवलोकनात्मक तरीकों की एक मिली-जुली पद्धति, विकसित की। उन्‍होंने इस खोज में इस्‍तेमाल होने वाले उपकरणों (दूरबीनें और ब्लिंक कोमपारेटर) को भी परिष्कृत किया।
  • 1929 में, लोवेल वेधशाला के वेस्टो स्लिफ़र ने इस ग्रह की तलाश फिर से शुरू की और यह काम उन्होंने क्लाइड टॉमबॉ को दिया। क्लाइड टॉमबॉ बढ़िया दूरबीन बनाते थे और एक शौकिया खगोलशास्त्री थे। फरवरी 1930 में, लोवेल की पद्धतियों और उनके उपकरणों का इस्तेमाल करके टॉमबॉ ने एक पिण्ड की खोज की। इस पिण्ड की गतियाँ ग्रह के जैसी थीं और यह पृथ्वी से वरुण की तुलना में अधिक दूरी पर था।
  • मार्च 1930 में, इस ग्रह की खोज की उद्घोषणा की गई। इसका नाम ‘प्लूटो’ ग्यारह साल की एक लड़की वेनेशिया बर्नी ने सुझाया था।

आभार

लेखक हृदय कान्त दीवान को धन्यवाद देते हैं। उन्होंने इस कहानी को ऐतिहासिक तथ्यों के संकलन के तौर पर प्रस्तुत करने की बजाए विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की एक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। हम राधा गणेशन का भी धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (एनसीईआरटी, 2024-2025) के ‘ग्रह की अवधारणा’ और ‘अन्‍तरिक्ष में दूरियों को मापने की एक इकाई के तौर पर AU’ से सम्बन्धित अंशों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया।

टिप्पणियाँ

  • लेख के शीर्षक की पृष्ठभूमि में इस्तेमाल किए गए चित्र के लिए आभार : Pluto, NASA, Wikimedia Commons. URL: https://en.wikipedia.org/wiki/File:Pluto-01_ Stern_03_Pluto_Color_TXT.jpg. License: CC BY.
  • इस लेख में एक कक्षा संसाधन अलग से दिया गया है : शिक्षक मार्गदर्शिका : प्‍लूटो, कक्षा में।

सन्दर्भ

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  2. Jennifer Whitten (2024). ‘The Planets in Our Solar System—A Timeline’. National Air and Space Museum, Smithsonian. URL: https://airandspace.si.edu/stories/ editorial/planets-our-solar-system-timeline.
  3. Davor Krajnovic (2020). ‘Adams: mathematical astronomer, college friend of George Gabriel Stokes and promotor of women in astronomy’. Philosophical Transactions of the Royal Society A. 378: 20190517. URL: https://doi.org/10.1098/rsta.2019.0517.
  4. National Steering Committee for National Curriculum Frameworks. ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.
  5. Lowell Observatory. ‘History of Pluto’. Lowell Observatory. URL: https://lowell.edu/discover/history-of-pluto/. Accessed 22 November 2024.
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  7. Nola Taylor Tillman (2013). ‘Percival Lowell Biography’. Space, Future US, Inc. URL: https://www.space.com/19774-percival-lowell-biography.html. Accessed 22 November 2024.
  8. Dr. Erica. (2017). ‘प्लूटो की खोज: ब्लिंक कंपैरेटर के साथ प्रयोग’। रोजी रिसर्च। यूआरएल: https://rosieresearch.com/blink-comparator-pluto/ Accessed 22 November 2024.
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