स्टैलेरियम की मदद से सूर्य के पथ का पता लगाना

आकाश में खगोलीय पिण्डों की नुमाया (apparent) गति में पाए जाने वाले पैटर्न्स के व्यवस्थित अवलोकन ने हमारी समय की अवधारणा, दिशा की समझ और यात्रा के लिए मार्ग खोजने/बनाने के हमारे तरीक़ों को आकार देने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रिपरेटरी स्टेज पर्यावरण अध्ययन (EVS) और मिडिल स्टेज विज्ञान की पाठ्यचर्या विद्यार्थियों को इनमें से कुछ पैटर्न्स का ख़ुद अवलोकन करने के लिए प्रोत्साहित करती है (शिक्षक मार्गदर्शिका-I देखें)। लेकिन वास्तविक दुनिया में इन अवलोकनों को करना एक धीमी,लम्बी (जिसमें एक साल तक का समय लग सकता है) और अशुद्ध या त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया हो सकती है। किसी एक लोकेशन से अवलोकन करने पर पृथ्वी के अपने अक्ष पर झुके होने और इसके घूर्णन करने की वजह से पड़ने वाले फ़र्क़ का अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता। इसके अलावा, हो सकता है कि इस तरह के अवलोकन करना सभी सन्दर्भों में व्यवहारिक या सम्भव न हों।
इन्हीं सब वजहों से, आभासी तारामण्डल सॉफ़्टवेयर वास्तविक दुनिया के अवलोकन करने का एक अच्छा विकल्प हो सकता है। कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय 12 के अनुसार : “यह जानने के लिए कि आपकी स्थिति के अनुसार कोई तारामण्डल आकाश के किस भाग में और कब दिखाई पड़ेगा, आप किसी आकाश मानचित्रण एप की सहायता ले सकते हैं जिसे मोबाइल फ़ोन पर डाउनलोड किया जा सकता है या फिर किसी अन्य ऑनलाइन संसाधनों का उपयोग भी कर सकते हैं। तारों, तारामण्डलों एवं ग्रहों की मोबाइल फ़ोन से पहचान हेतु स्काइ मैप एक अत्यन्त सुविधाजनक ऐप है। स्टेलैरियम इसी प्रकार का एक अन्य ऐप है। स्टेलैरियम के कम्प्यूटर संस्करण में अनेक विशेषताएँ हैं और इसे निःशुल्क डाउनलोड किया जा सकता है।”1 यह स्टैलेरियम का एक अनुप्रयोग है। (बॉक्स-1 देखें)। शिक्षक इस इंटरैक्टिव और विद्यार्थियों को जोड़े रखने वाले शैक्षिक साधन का इस्तेमाल कक्षा में आकाश के कई पैटर्न्स की पड़ताल करने में मदद करने के लिए भी कर सकते हैं (शिक्षक मार्गदर्शिका-II देखें)। मैं कुछ उदाहरण साझा कर रहा हूँ।
बॉक्स-1 : स्टैलेरियम के बारे में
स्टैलेरियम को www.stellarium.org से निःशुल्क डाउनलोड किया जा सकता है। विद्यार्थी किसी भी दिन (तारीख़) के, किसी भी समय पर आकाशीय पिण्डों (जिसमें आकाशगंगाएँ और तारों के समूहों जैसे सौर मण्डल के बाहर के पिण्ड भी शामिल हैं) की स्थिति को देखने के लिए इस सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल कर सकते हैं। वे किसी पिण्ड को बड़ा या छोटा करके देख सकते हैं, वे अवलोकन के लिए अपनी लोकेशन पृथ्वी के किसी भी स्थान पर रख सकते हैं। वह यह देख सकते हैं कि आकाश अतीत में कैसा दिखता था या भविष्य में कैसा दिखेगा। वे पृथ्वी के वायुमण्डल के बिना आकाश कैसा दिखेगा यह देख सकते हैं और तारा मण्डलों के नामों और उनके सीमा-क्षेत्रों (boundaries) को दर्शाने वाले फ़ीचर चालू या बन्द कर सकते हैं। सॉफ़्टवेयर पर इन फ़ीचर्स को ढूँढ़ना और इन्हें इस्तेमाल करना काफ़ी आसान है और इसके साथ मिलने वाली यूज़र’स गाइड में भी इनका उल्लेख किया गया है।
सूर्य के उगने और डूबने की स्थितियाँ
विद्यार्थी सीखते हैं कि पृथ्वी पर किसी भी स्थान से देखने पर, सूर्य पूर्व से उगता और पश्चिम में अस्त होता प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए, कक्षा पाँच की पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-2025) के अध्याय-10 (बोलती इमारतें) में विद्यार्थियों से सवाल किया गया है : “पूर्व और पश्चिम दिशा कहाँ है? आप जिस जगह पर हैं वहाँ सूरज किस तरफ़ से उगता है और किस तरफ़ डूबता है? पता करो कि आप जहाँ खड़े हैं वहाँ से पूर्व दिशा में क्या-क्या है? आपके पश्चिम में क्या-क्या है? अब पता करो कि आपके उत्तर और दक्षिण में क्या-क्या है?”2 लेकिन क्या सूर्य हमेशा ठीक पूर्व दिशा से उगता है? क्या यह हमेशा ठीक पश्चिम में डूबता है? क्या सूर्य के उगने और डूबने की स्थितियाँ पूरे साल भर एक-सी रहती हैं? अगर हम इन्हें किसी अलग अक्षांश से देखें तो क्या हमें इन स्थितियों में कोई फ़र्क़ नज़र आएगा? विद्यार्थियों को स्टैलेरियम का इस्तेमाल करके इन सवालों की जाँच-पड़ताल करने के लिए कहिए (गतिविधि शीट-I देखें)।
इस गतिविधि के अन्त तक विद्यार्थी यह देखेंगे कि सूर्य उगने की स्थिति नीचे दिए गए पथ पर बदलती है :
- 21 मार्च को (± 1 यानी 1 दिन आगे या पीछे) : सूर्य ठीक पूर्व में उगता है।
- 22 मार्च-20 जून तक : सूर्य उगने की दिशा पूर्व के उत्तर की तरफ़ खिसकती जाती है।
- जून 21 को (± 1 दिन) : सूर्य उगने की दिशा पूर्व के अधिकतम उत्तर में होती है।
- 21 जून से 21 सितम्बर तक : सूर्य उगने की दिशा दक्षिण की तरफ़ खिसकती जाती है।
- 22 सितम्बर को (± 1 दिन) : एक बार फिर सूर्य ठीक पूर्व में उगता है।
- 23 सितम्बर से 21 दिसम्बर तक : सूर्य उगने की दिशा पूर्व के दक्षिण की तरफ़ खिसकती जाती है।
- 22 दिसम्बर को (± 1 दिन) : सूर्य उगने की दिशा पूर्व के अधिकतम दक्षिण में होती है।
- 23 दिसम्बर से 20 मार्च : सूर्योदय की दिशा उत्तर की तरफ़ खिसकती जाती है।
इन अवलोकनों के इर्द-गिर्द चर्चा से निम्नलिखित बातें उभारी जा सकती हैं :
- साल के अधिकतर दिन सूर्य पूर्वी क्षितिज पट्टी पर कहीं उगता है और पश्चिम पट्टी में कहीं डूबता है। यह हमेशा न तो ठीक पूर्व दिशा से उगता है और न ही ठीक पश्चिम दिशा में डूबता है।
- सूर्य साल में केवल दो बार ठीक पूर्व दिशा से उगता है और ठीक पश्चिम दिशा में डूबता है। इन दो दिनों को वसन्त विषुव (Vernal Equinox) या ‘वसन्त सम्पात’ [21 मार्च (± 1 दिन) को] और ‘शरद विषुव’ (Autumnal Equinox) या ‘शरद सम्पात’ [22 सितम्बर (± 1 दिन) को ] बताया जा सकता है। मोटेतौर पर, ‘विषुव’ का मतलब होता है ‘दिन और रात का बराबर होना’।
- भारत की सदियों पुरानी कैलेण्डर प्रणाली (पंचांग) साल को दो हिस्सों में बाँटती है। दिसम्बर से लेकर जून तक की छह महीने की समयावधि, जब सूरज के उगने (और डूबने) की स्थिति दक्षिण से उत्तर की ओर खिसक जाती है, उसे ‘उत्तरायण’ (‘उत्तरा’: उत्तर और ‘यन’: यात्रा) या ‘उत्तर की ओर’ यात्रा कहते हैं। जून से दिसम्बर तक की छह महीने की अवधि, जब सूर्य के उगने (और डूबने) की स्थिति उत्तर से दक्षिण की ओर खिसकती जाती है, ‘दक्षिणायन’ या ‘दक्षिण की ओर’ यात्रा कहलाती है।
यह देख सकते हैं कि इन सवालों की और अधिक पड़ताल करने के लिए इन्हें विद्यार्थियों के साथ साझा किया जा सकता है :
- अगर किसी अन्य अक्षांश पर स्थित किसी लोकेशन से सूर्योदय देखा जाए तो इससे उगने के पथ के पैटर्न में किस तरह का बदलाव आएगा? इसे समझने के लिए विद्यार्थी स्टैलेरियम पर ‘लोकेशन विंडो’ का इस्तेमाल कर उत्तरी और दक्षिणी दोनों गोलार्धों पर अपनी पसन्द की (एक-दो) लोकेशन चुनें और इन लोकेशन पर सूर्योदय और सूर्यास्त की स्थिति देखें। इसका इस्तेमाल इस तथ्य को उजागर करने के लिए किया जा सकता है कि पूरे साल भर में सूर्य के उगने और डूबने की स्थितियों में आने वाला बदलाव उत्तरी और दक्षिणी दोनों ही गोलार्धों में एक-सा ही रहता है।
- क्या सूर्य के अलावा तारे भी पूर्व से उगते हुए और पश्चिम में डूबते हुए प्रतीत होते हैं? विद्यार्थी स्टैलेरियम में नीचे दिए गए पैनल से समय की गति बढ़ाकर (फास्ट-फॉरवर्ड कर) सूर्य के अलावा आकाश में बाकी सितारों की गति का अवलोकन कर सकते हैं। इस अभ्यास से उन्होंने जो अवलोकन किए उनके इर्द-गिर्द चर्चा करके इस बात पर प्रकाश डाला जा सकता है कि सूर्य की तरह ही सभी तारे भी पूर्व से उगते हुए और पश्चिम में डूबते हुए इसलिए नज़र आते हैं क्योंकि पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन करती है (चित्र-1 देखें)। इसका मतलब यह है कि अगर पृथ्वी को उत्तरी ध्रुव के ऊपर से देखा जाए तो यह घड़ी की सुई से विपरीत दिशा में घूर्णन (जिसे प्रगामी घूर्णन भी कहा जाता है) करती नज़र आएगी।

दिन और रात की लम्बाई
सूर्य कब उगता है और कब डूबता है इससे विद्यार्थी सीखते हैं कि उस लोकेशन पर और वर्ष के किसी भी दिन और रात की लम्बाई निर्धारित होती है। उदाहरण के लिए, NCERT (2024-2025) की कक्षा-7 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक का अध्याय-9 (गति एवं समय) विद्यार्थियों को बताता है कि : “हमारे पूर्वजों ने यह देखा कि प्रकृति में बहुत-सी घटनाओं की निश्चित अन्तरालों के पश्चात् पुन: आवृत्ति होती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने यह पाया है कि सूर्य रोज सुबह उदय होता है। एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय के बीच के समय को एक दिन कहा गया। इसी प्रकार, एक अमावस्या (नवचन्द्र) से अगली अमावस्या के बीच की अवधि को माह कहा गया है। एक वर्ष उस अवधि को कहा गया, जितने समय में पृथ्वी, सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है।”3 लेकिन क्या साल के किसी भी समय पर दिन की लम्बाई रात के बराबर होती है? जिस जगह वे रहते थे क्या वहाँ दिन (या रात) की लम्बाई पूरे साल एक-सी रहती थी? क्या विभिन्न अक्षांशों पर यह बदल जाती है? विद्यार्थियों को स्टैलेरियम का इस्तेमाल करके इन सवालों की पड़ताल करने के लिए कहें (गतिविधि शीट-II देखें)।
इस गतिविधि के अन्त तक विद्यार्थी अवलोकन करेंगे कि :
- जो लोकेशन भूमध्य रेखा के आसपास स्थित हैं, वहाँ दिन और रात की अवधि मोटेतौर पर बराबर रहती है और पूरे साल भर में इसमें कुछ ख़ास बदलाव नहीं आता है।
- जो लोकेशन भूमध्य रेखा से दूर स्थित हैं वहाँ साल में दो दिन, दिन और रात की लम्बाई करीब-करीब बराबर होती है : 21 मार्च (± 1 दिन) को (या उत्तरी गोलार्ध में शरद विषुव और दक्षिणी गोलार्ध में वसन्त विषुव) और 22 सितम्बर (± 1 दिन) को (या उत्तरी गोलार्ध में वसन्त विषुव और दक्षिणी गोलार्ध में शरद विषुव)।
- उत्तरी गोलार्ध में स्थित लोकेशन पर दिन की लम्बाई दिसम्बर से जून (उत्तरायण के समय) के बीच बढ़ती जाती है, यानी इस समय दिन लम्बे और रातें छोटी होती जाती हैं। और जून से दिसम्बर (दक्षिणायन के समय) के बीच घटती जाती है, यानी दिन छोटे और रातें लम्बी होती जाती हैं। इस गोलार्ध में वर्ष का सबसे लम्बा दिन आमतौर पर 21 जून (± 1 दिन) को होता है [जिसे ‘ग्रीष्मकालीन अयनान्त (Summer Solstice)] कहा जाता है।) यहाँ दिसम्बर से जून के बीच रात की लम्बाई आनुपातिक रूप से कम होती जाती है और जून से दिसम्बर के बीच बढ़ती जाती है। इस गोलार्ध में वर्ष की सबसे लम्बी रात आमतौर पर 22 दिसम्बर (± 1 दिन) को होती है [जिसे ‘शीतकालीन अयनान्त’ (Winter Solstice)] कहा जाता है)।
- दक्षिणी गोलार्ध के लोकेशन पर दिन की लम्बाई दिसम्बर और जून के बीच घटती जाती है और जून से दिसम्बर के बीच बढ़ती जाती है। इस गोलार्ध में वर्ष का सबसे लम्बा दिन (या ग्रीष्मकालीन अयनान्त) आमतौर पर 22 दिसम्बर (± 1 दिन) को होता है। रात की अवधि आनुपातिक रूप से दिसम्बर से जून के बीच बढ़ जाती है और जून से दिसम्बर के बीच घट जाती है। इस गोलार्ध में वर्ष की सबसे लम्बी रात (या शीतकालीन अयनान्त) आमतौर पर 21 जून (± 1 दिन) को होती है।
- दोनों गोलार्धों में विपरीत ऋतुएँ होती हैं। उदाहरण के लिए, दिसम्बर में, जब सूर्य अपनी दक्षिणायन की यात्रा पूरी कर लेता है तो उत्तरी गोलार्ध में जाड़े का मौसम होता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में गर्मी का मौसम होता है। जून में, जब उत्तरायण ख़त्म होने की कगार पर होता है तो उत्तरी गोलार्ध में गर्मी का मौसम होता है और दक्षिणी गोलार्ध में जाड़े का।
- दोनों ही भौगोलिक ध्रुवों पर, एक दिन [जिसे ध्रुवीय दिन (Polar Day) कहा जाता है] छह महीने का होता है। छह महीने तक लगातार यहाँ सूरज की रौशनी पड़ती रहती है। इसके बाद रात [ध्रुवीय रात (Polar Night)] होती है, जब छह महीने तक लगातार अँधेरा छाया रहता है। जब उत्तरी ध्रुव पर दिन होता है, तब दक्षिणी ध्रुव पर रात होती है और जब दक्षिणी ध्रुव पर दिन होता है, तब उत्तरी ध्रुव पर रात होती है।
पृथ्वी का दैनिक चक्र
पृथ्वी के दैनिक चक्र की लम्बाई वह समय होता है, जिसे यह अपनी धुरी पर 360° का एक घूर्णन पूरा करने में लगाती है। यह कब पूरा हो गया इसका पता हमें कैसे चलेगा? इसके लिए हमें किसी अन्य खगोलीय पिण्ड के सापेक्ष पृथ्वी के घूर्णन के अवलोकन करना होंगे। यह पिण्ड सूर्य या फिर कोई और तारा हो सकता है। पृथ्वी को अपनी धुरी पर पूरा एक चक्कर लगाने में लगने वाले समय की गणना इस शुरुआती बिन्दु (बाहरी खगोलीय पिण्ड) के सापेक्ष अपनी मूल स्थिति में लौटने में लगने वाले समय को मापकर की जा सकती है। कक्षा-6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक (NCERT, 2024-25) का अध्याय-12 (पृथ्वी से परे) विद्यार्थियों को बताता है कि : “सूर्य की परिक्रमा करने के साथ-साथ पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन भी करती है। अपने अक्ष पर एक बार पूरा घूम जाने में पृथ्वी को लगभग 24 घण्टे का समय लगता है, जो एक दिन कहलाता है।”1 यह समय आकाश में सूर्य की नुमाया दैनिक गति पर आधारित है। पृथ्वी से देखने पर ऐसा लगता है कि सूर्य को पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में 24 घण्टे लगते हैं। लेकिन क्या यह अवधि सटीक 24 घण्टे ही होती है या फिर लगभग 24 घण्टे होती है? अगर हम सूर्य की जगह किसी अन्य तारे को सापेक्ष बिन्दु लें तब भी यह अवधि इतनी ही रहेगी? अपने विद्यार्थियों को स्टैलेरियम का इस्तेमाल करके इन सवालों की पड़ताल करने के लिए कहें (गतिविधि शीट-III देखें)। इस अभ्यास के लिए, विद्यार्थियों को यह मापना होगा कि सूर्य को आकाश में फिर से उतनी ही ऊँचाई तक पहुँचने में कितना समय लगता है (बॉक्स-2 देखें)।
इस गतिविधि के अन्त तक विद्यार्थी अवलोकन करेंगे कि :
- पृथ्वी पर जिस बिन्दु से हम अवलोकन कर रहे हैं उसे सूर्य के सापेक्ष उसी स्थिति में पहुँचने में 24 घण्टे का समय लगता है। इस अवधि को ‘सौर दिवस’ (Solar Day) कहा जाता है। क्योंकि हमारी रोज़ाना की गतिविधियाँ सूरज के उगने और डूबने से जुड़ी होती हैं, इसीलिए हम जिन भी घड़ियों का इस्तेमाल करते हैं वे सभी सौर समय पर आधारित हैं।
- पृथ्वी पर हमारे अवलोकन बिन्दु को सूर्य के अलावा किसी अन्य तारे के सापेक्ष उसी स्थिति पर वापस लौटने में 23 घण्टे और 56 मिनट का समय लगता है। समय की इस अवधि को ‘साइडरियल डे’ (Sidereal शब्द लैटिन के एक शब्द से आया है जिसका मतलब है ‘तारों के सापेक्ष’) कहा जाता है। चूँकि खगोलशास्त्रियों की सूर्य से परे के पिण्डों में रुचि होती है, जो रात में दिखाई देते हैं, इस वजह से वे अकसर नक्षत्र-काल (sidereal time) का इस्तेमाल करते हैं।
इस अन्तर के बारे में चर्चा को निम्नलिखित बातों को साझा करके समझाया जा सकता है : सूर्य के चारों ओर 360° का चक्कर पूरा करने में पृथ्वी को 365 दिन लगते हैं। इसके मायने यह हैं कि पृथ्वी अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने में एक डिग्री से थोड़ा कम समय लेती है। सूर्य के सापेक्ष अपनी सटीक स्थिति पर वापस लौटने के लिए इसे एक अतिरिक्त चक्कर लगाना होगा, जो कि एक पूरे चक्कर के 1/356वें भाग के बराबर होता है। इस दूरी को पूरा करने में पृथ्वी चार मिनट का समय लेती है। यही वजह है कि सौर दिवस नक्षत्र-काल से ज़्यादा लम्बा होता है।
बॉक्स-2 : स्टैलेरियम पर उन्नतांश (altitude) की गणना करना
हमारे क्षितिज से कोई पिण्ड कितने ऊपर या नीचे है इसकी माप उन्नतांश कहलाती है। पूर्वी क्षितिज से उग रहे किसी तारे का उन्नतांश 0° होता है। पश्चिमी क्षितिज पर डूब रहे किसी तारे का उन्नतांश भी 0° होता है। हमारे सिर के ठीक ऊपर (जिसे ‘उच्चतम बिन्दु या जेनिथ पॉइंट’ कहा जाता है) स्थित कोई तारा 90° के उन्नतांश पर होता है। जो तारा अपने उच्चतम बिन्दु को पार कर चुका होता है, उसका उन्नतांश 90° से कम होता है (चित्र-2 देखें)। जिस तरह से एक घण्टा साठ मिनटों में बँटा होता है और एक मिनट साठ सेकंड्स में बँटा होता है, ठीक उसी तरह एक डिग्री को भी मिनट और सेकंड में विभाजित किया जाता है। 1 मिनट एक डिग्री का 1/60वाँ हिस्सा होता है और एक सेकंड एक मिनट का 1/60वाँ हिस्सा होता है। कोणों को दशमलव में लिखने की बजाय, उन्हें आमतौर पर मिनट और सेकंड में दर्शाया जाता है। इस प्रकार, 45.5° को 45 डिग्री और 30 मिनट (या 45°30’) भी लिखा जाता है। इसी प्रकार, 60.73° को 60 डिग्री 43 मिनट 48 सेकंड (या 60°43’48’’) भी लिखा जाता है।

बॉक्स-3 : पाठ्यचर्या से सम्बन्ध
ये गतिविधियाँ और चर्चाएँ शालेय शिक्षा के लिए पाठ्यचर्या की राष्ट्रीय रूपरेखा (एनसीएफ़-एसई) 2023 में उल्लिखित पाठ्यचर्या के निम्न लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकती हैं :
- प्रिपरेटरी स्टेज पर्यावरण विज्ञान :
- CG-1 : [विद्यार्थी] अपने आसपास के प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की पड़ताल करे और उसके साथ जुड़े। विशेष तौर पर ये विद्यार्थियों को निम्न दक्षताओं के विकास में मदद कर सकती हैं : (i) C-1.1 : “अपने आसपास के परिवेश में मौजूद प्राकृतिक (… सूरज और चाँद, तारों, ग्रहों …) और सामाजिक घटकों का अवलोकन करना और उनकी पहचान करना”, और (ii) C-1.3 : “अपने आसपास के परिवेश में उन्होंने जिन सरल पैटर्न्स (जैसे मौसम के बदलने में…चन्द्रमा की कलाओं में, तारों और ग्रहों की गतियों में …) का अवलोकन किया हो, उनके बारे में सवाल करना और आगे क्या होगा उसका पूर्वानुमान लगाना।’’4
- मिडिल स्टेज विज्ञान :
- CG-2 : [विद्यार्थी] भौतिक दुनिया की पड़ताल वैज्ञानिक और गणितीय नज़रिए से करे। विशेष तौर पर, ये विद्यार्थियों को निम्न दक्षता के विकास में मदद कर सकती हैं : C-2.5 : “एक साधारण दूरबीन और चित्रों/तस्वीरों का इस्तेमाल करके आकाशीय पिण्डों (तारों… ) का अवलोकन करना और उनकी पहचान करना। एवं रास्ते तलाशने में और दिशाओं का पता लगाने में, कैलेण्डरों में और अन्य घटनाक्रमों में उनकी भूमिका की व्याख्या करना। (…पृथ्वी पर जीवन)।”4
- CG-6 : [विद्यार्थी] वैज्ञानिक ज्ञान के विकास और वैज्ञानिक पड़ताल के माध्यम से विज्ञान की प्रकृति और प्रक्रियाओं को समझता है। ख़ासतौर पर यह विद्यार्थियों में निम्न दक्षताओं के विकास में मदद कर सकती हैं : C-6.2 : “किसी घटना की सम्भावित वजहों, पैटर्न्स और व्यवहार को समझने के लिए वैज्ञानिक शब्दावली का इस्तेमाल करके प्रश्न तैयार करना और साक्ष्य के तौर पर (प्राकृतिक वातावरण के अवलोकन, सरल प्रयोगों के ज़रिए) डेटा एकत्र करना …।”4
चलते-चलते
स्टैलेरियम की मदद से विद्यार्थी अपनी कक्षा में बैठे-बैठे ही अलग-अलग अक्षांशों से एक वर्ष में सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी की गति का वास्तविक अवलोकन कर पाते हैं। इससे विद्यार्थियों को यह समझने में भी मदद मिल सकती है कि समय और दिशा के बारे में हमारी अवधारणाओं को आकार देने में इन अवलोकनों ने क्या भूमिका निभाई है (बॉक्स-3 देखें)।
इस लेख में साझा की गई गतिविधियाँ उन अभ्यासों का एक हिस्सा भर हैं, जिन्हें स्टैलेरियम की मदद से किया जा सकता है। जब आप और आपके विद्यार्थी इस सॉफ़्टवेयर के इंटरैक्टिव फ़ीचर्स से और ज़्यादा परिचित हो जाएँगे तो आप बदलते हुए आकाश में होने वाली अन्य गतियों और पैटर्न्स की पड़ताल करने के लिए अपने ख़ुद के अभ्यास लिखने में सक्षम हो जाएँगे।
मुख्य बिन्दु
- हमारे आकाश में सूर्य और अन्य तारों की नुमाया गति पर नज़र रखने से विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि समय और दिशा की हमारी अवधारणा को आकार देने में उनकी क्या भूमिका है।
- अगर विद्यार्थी वास्तविक दुनिया के अवलोकनों के ज़रिए इन अवधारणाओं को आकार देने वाले पैटर्न्स का पता लगाने की कोशिश करेंगे तो यह काफ़ी धीमी, सीमित और अनिश्चित प्रक्रिया हो सकती है।
- कक्षा में शिक्षण के उपकरण के रूप में स्टैलेरियम जैसे निःशुल्क आभासी तारामण्डल सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल करके विद्यार्थी यह समझ और देख पाते हैं कि एक वर्ष की अवधि में और विभिन्न अक्षांशों पर ये पैटर्न किस प्रकार बदलते हैं।
टिप्पणियाँ
- Credits for the image (Sundial) used in the background of the article title: CarolinaP (pixabay.com). URL: https://www.needpix.com/photo/558618/sun-dial-tarragona-tourist-traditional-solar-ancient-watch-clock-day. License: Public Domain.
- यह लेख पहले आई वंडर… (हिन्दी) के जनवरी, 2017 के अंक में, पृ. 151-157 पर प्रकाशित हुआ था। इसे यहाँ देखा जा सकता है : https://anuvadasampada.azimpremjiuniversity.edu.in/229/ प्रिपरेटरी स्टेज पर्यावरण विज्ञान और मिडिल स्टेज विज्ञान पढ़ाने वाले हमारे पाठकों के लिए अधिक पठनीय बनाने के लिए इस अंक में प्रकाशित लेख के ढाँचे और शब्दावली को बदला गया है। साथ ही इसमें नई सामग्री शामिल की गई है।
- इस लेख में पाँच संसाधन शामिल हैं : शिक्षक मार्गदर्शिका-। : सूर्य पर नज़र रखना; शिक्षक मार्गदर्शिका-।। : कम्प्यूटर पर स्टैलेरियम का इस्तेमाल करना; गतिविधि शीट-। : सूरज के उगने और डूबने की स्थितियों का पता लगाएँ; गतिविधि शीट-।। : दिन की लम्बाई का पता लगाएँ और गतिविधि शीट- III : दिन-रात चक्र की लम्बाई का पता लगाएँ।
- लेख के हिन्दी अनुवाद की समीक्षा करने के लिए हम हृदय कान्त दीवान के आभारी हैं।
सन्दर्भ
- National Council of Educational Research and Training (2024). ‘Chapter 12: Beyond Earth’. Science Textbook for Grade VI: 231-252. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?fecu1=12-12.
- National Council of Educational Research and Training (2024). ‘Chapter 10: Walls Tell Stories’. EVS Textbook for Grade V: 87-98. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?eeap1=10-22.
- National Council of Educational Research and Training (2024). ‘Chapter 9: Motion and Time’. Science Textbook for Grade VII: 92-108. URL: https://ncert.nic.in/textbook.php?gesc1=9-13.
- National Steering Committee for National Curriculum Frameworks (2023). ‘National Curriculum Framework for School Education 2023’. National Council of Educational Research and Training. URL: https://ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf.