हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में बहुत सारे निर्णय लेते हैं — अपने भोजन के बारे में, अपने स्वास्थ्य के बारे में, पानी और विभिन्न वस्तुओं के इस्तेमाल के बारे में। ये निर्णय हमारे द्वारा पढ़ी गई, सुनी गई बातों, हमारे अनुभवों और साथ-ही-साथ हमारी धारणाओं व भावनाओं से प्रभावित होते हैं। ये निर्णय निकटतम परिवेश से, एक-दूसरे से और अन्य जीवों के साथ हमारे जुड़ाव के तरीक़े को भी तय करते हैं। प्रिपरेटरी और मिडिल स्टेज के बच्चे (6-14 वर्ष) अपनी पर्यावरण अध्ययन (ईवीएस) और विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों (एनसीईआरटी, 2024-25) में रोज़मर्रा के इन अनुभवों और सम्बन्धों (भोजन, स्वास्थ्य, रोग, पानी, सभी जीवों की देखभाल) से जुड़ी कई अवधारणाओं के बारे में पढ़ते हैं। लेकिन हो सकता है कि कक्षा में सीखी हुई बातों को रोज़मर्रा के जीवन से जोड़ने के अवसरों के अभाव में इन बच्चों को अपनी वास्तविक दुनिया में इस शिक्षा की कोई प्रासंगिकता न दिखाई दे। हो सकता है विज्ञान उनके लिए स्कूल में सीखा जाने वाला एक विषय भर बनकर रह जाए, उनकी वास्तविकताओं से कहीं दूर और असम्बद्धित विषय।
शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ़-एसई) 2023, के मुताबिक़ स्कूली विज्ञान को : “विद्यार्थियों को उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण का उपयोग करके अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के निर्णय और चुनाव करने में समर्थ बनाना चाहिए। जैसे कि ख़ुद को टीका लगवाने का निर्णय, स्वास्थप्रद खान-पान का चुनाव करना, मीडिया के दावों की तार्किक पड़ताल करना या अपनी धारणाओं की तार्किक रूप से पड़ताल करके एक समावेशी समाज में अपना योगदान देना…।” यह स्कूली विज्ञान शिक्षा को लेकर एनसीएफ़-एसई के एक लक्ष्य को आकार देता है, जो है “तार्किक और प्रमाण-आधारित चिन्तन की क्षमताएँ विकसित करके और भय एवं पूर्वाग्रह से मुक्ति के द्वारा” विद्यार्थियों में वैज्ञानिक मिजाज़ पैदा करना। यह इसे “विज्ञान के सीखने” और विद्यार्थियों को “सच्चाई, ईमानदारी, संशयवाद, वस्तुनिष्ठता, दृढ़ता, लगन, सहयोग और सहकारिता, जीवन के प्रति ज़िम्मेदारी और पर्यावरण की सुरक्षा जैसे वैज्ञानिक मूल्यों और प्रवृत्तियों को आत्मसात करने” में मदद करने का आधार मानता है।
हम विज्ञान को इस तरह कैसे पढ़ा सकते हैं कि विद्यार्थियों को स्पष्टता से और तार्किक ढंग से सोचने में मदद मिल सके ताकि वे धारणाओं को तथ्यों से अलग कर सकें? हम किस प्रकार उन्हें अपने स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़े सोचे-समझे चुनाव करने के लिए ज़रूरी ज्ञान और कौशलों से लैस कर सकते हैं? अमोल आनन्दराव काटे और राकेश तिवारी आपके साथ साझा कर रहे हैं कि अण्डों से जुड़ी धारणाओं पर एक तथ्य-आधारित चर्चा विद्यार्थियों और उनके माता-पिता को उनके आहार की पोषण-सम्बन्धी गुणवत्ता के बारे में ज़्यादा तार्किक ढंग से सोचने और पाठ्यपुस्तक की अवधारणाओं को उनके स्वास्थ्य सम्बन्धी निर्णयों से जोड़ने में कैसे मदद कर सकती है। आदित्य प्रकाश बता रहे हैं कि विद्यार्थियों को अवधारणाओं को समझने, वैज्ञानिक कौशल विकसित करने और दोनों को रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के उपयोगों से जोड़ने के लिए विज्ञान सीखने के व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना उन्हें अपनी वास्तविक दुनिया में विज्ञान की प्रासंगिकता को देखने में कैसे मदद कर सकता है। गीयां-बारे सिंड्रोम (GBS) के हालिया प्रकोपों के बारे में सत्यजीत रथ का लेख शिक्षकों को वास्तविक दुनिया का एक उदाहरण देता है। इसके ज़रिए शिक्षक विद्यार्थियों को संक्रामक रोगों, स्वच्छता और पीने के साफ़ पानी की उपलब्धता के बारे में उनके द्वारा सीखी जाने वाली बातों की प्रासंगिकता को देखने में मदद कर सकते हैं। इस लेख को विद्यार्थियों को सुरक्षात्मक क़दम उठाने में शामिल करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
वास्तविक दुनिया के वे कौन-से अनुभव हैं जो विद्यार्थियों को यह समझने में मदद कर सकते हैं कि विज्ञान धैर्य, लगन और प्राकृतिक दुनिया के बारे में गहराई से फ़िक्र करने से भी जुड़ा हुआ है? लावण्या कार्तिक ने भारतीय वनस्पतिविज्ञानी जानकी अम्माल के बचपन के अनुभवों का परिचय दिया है। यह विद्यार्थियों को प्राकृतिक दुनिया के साथ अपने रिश्ते को गहरा करने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह उन्हें वह जिज्ञासा और साहस भी दे सकता है जिसकी ज़रूरत शायद उन्हें हो, ताकि प्राकृतिक दुनिया के साथ बना रिश्ता उनके जीवन को आकार दे सके।
आपने अपने विद्यार्थियों को उनके रोज़मर्रा के जीवन में विज्ञान की प्रासंगिकता को देखने में किस प्रकार मदद की? इस प्रक्रिया ने उनकी वास्तविक दुनिया को प्रभावित करने वाले मुद्दों के बारे में उनकी सोच को किस तरह आकार दिया? इसने आपकी शिक्षण प्रक्रिया को किस तरह आकार दिया? अपने विचार और अनुभवों को हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
राधा गोपालन
सलाहकार सम्पादक